प्रकृति संरक्षण- अस्तित्व का संरक्षण

प्रकृति संरक्षण- अस्तित्व का संरक्षण

वंदना बरनवाल, राज्य प्रभारी

महिला पतंजलि योग समिति - उ.प्र. (मध्य)

प्रकृति यानी एक ऐसी कृति जो पहले से ही अस्तित्व में है। यह ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य उपहार है जो सम्पूर्ण मानव समाज का एक मात्र महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है, जिस प्रकार मानव जीवन को हम ईश्वरीय उपहार मानते हैं और इस शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कुछ नियम और अनुशासन अपनाते हैं ठीक वैसे ही ‘प्रकृतिके संग रहने ‘प्रकृतिके संग चलने के लिए हमें ‘प्रकृतिद्वारा बनाये नियम और अनुशासन का पालन करना ही होगा क्योंकि ‘प्रकृतिका अस्तित्व तो पहले से है और हमारा अस्तित्व इसी प्रकृति का परिणाम है।

पंचतत्वों के महत्व को जानें

भारतीय दर्शन तथा योग में पृथ्वी (क्षिति), जल (अप्), अग्नि (ताप), वायु (पवन) एवं गगन (शून्य) को पंचतत्व या पंचमहाभूत कहा जाता है। पंचतत्व को ब्रह्मांड में व्याप्त लौकिक एवं अलौकिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारण और परिणति माना गया है, इसीलिए वेदों को सृष्टि विज्ञान का प्रमुख ग्रंथ भी माना गया है। वेदों में प्रकृति ही नहीं बल्कि शरीर के तीनों दोषों वात, पित्त एवं कफ के संतुलन एवं असंतुलन के लिए पंच तत्वों अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी एवं आकाश का स्तवन अनेक स्थलों में किया गया है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि तत्व के स्तवन से होता है जिसमें अग्नि को पिता के समान कल्याणकारी कहा गया है ‘अग्ने। ‘सूनवे पिता इव न: स्वस्तये आ सचस्व।इसी प्रकार जल के महत्त्व को बतलाते हुए कहा गया है ‘अप्सु अन्त:अमृतं, अप्सु भेषजंअर्थात् जल में अमृत है। जल में औषधि गुण विद्यमान रहते हैं बस आवश्यकता है जल की शुद्धता, स्वच्छता बनाये रखने की, पृथ्वी की स्वच्छता पर बल देते हुए इसमें कहा गया है ‘पृथ्वी: पू: च उर्वी भव:’ अर्थात् समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे। स्पष्ट है कि यजुर्वेद में समूचे पर्यावरण को शान्तिमय बनाने की बहुत ही स्पष्ट स्तुति है। जो कि यह दर्शाती है कि हमारे पुरातन वैज्ञानिकों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की कितनी गहरी जानकारी थी। उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंधों को इस तरह स्थापित किया जिससे मानव द्वारा प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके।

प्रकृति मानव समाज की पूँजी

आज भले ही हमें ऐसा लगता हो कि प्राकृतिक संसाधन असीमित हैं, पर यह तभी तक सत्य हो सकता है जब तक इसके उपयोग के साथ इसके संरक्षण पर भी निरंतर दृष्टि रखी जाये। प्राकृतिक संपदा हमारी पूँजी है जिसका लाभकारी कार्यों में सुनियोजित ढंग से उपयोग होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए और इसके लिये हमें अपने देश एवं प्रदेश के संसाधनों की जानकारी भी होनी चाहिए। जो संसाधन या प्राकृतिक संपदा सीमित हों उसे अंधाधुंध समाप्त करना निश्चित रूप से अदूरदर्शिता कहलाएगी। हो सकता है आज हमें ये संसाधन भले ही असीमित लगते हों किन्तु यदि हम इनका दुरुपयोग करने लग गए या फिर अज्ञानतापूर्वक उपयोग करते रहे तो एक दिन ऐसा आएगा जब यह स्वत: ही खत्म होने की कगार पर पहुँच जायेंगे। इन्हीं संसाधनों में से एक अति महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन पीने योग्य जल भी है जिसके लिए अब अक्सर कहा जाने लगा है कि अगला विश्वयुद्ध होगा तो पेयजल के लिए होगा। इस प्रकार की कोई नौबत न आने पाए इसके लिए ही संसाधनों का संरक्षण जरूरी हो जाता है। मानव विभिन्न प्राकृतिक साधनों का उपयोग अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिये करता आ रहा है। खाद्यान्नों और अन्य कच्चे पदार्थों की पूर्ति के लिये उसने भूमि को जोता है, सिंचाई और शक्ति के विकास के लिये उसने वन्य पदार्थों एवं खनिजों का उपयोग किया है। पिछली दो शताब्दियों में जनसंख्या तथा औद्योगिक उत्पादनों की वृद्धि तीव्र गति से हुई है। क्या आप जानते हैं कि दुनिया की आबादी को 1 अरब तक पहुंचने में 2,00,000 साल का समय लगा जबकि पिछले मात्र 200 साल में यह 7 अरब को पार करते हुए 8 अरब के नजदीक पहुँच चुकी है। ये तो तय है कि हमारी धरती का आकार नहीं बढऩे जा रहा और यहां मौजूद संसाधन भी अब बढऩे वाले नहीं, जैसे पानी, खेती के लायक जमीन। पर बढ़ती आबादी से हमारी भोजन, वस्त्र, आवास, परिवहन, साधन, विभिन्न प्रकार के यंत्र, औद्योगिक कच्चे माल आदि की खपत कई गुनी बढ़ गई है और इस कारण हम प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से गलत व विनाशकारी ढंग से शोषण करते जा रहे हैं। बावजूद इसके विशेषज्ञ अब भी यही मानते हैं कि बढ़ती आबादी से कहीं ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों का बेजा इस्तेमाल ज्यादा बड़ी चिंता है। शायद इसीलिए जुलाई माह में जहाँ 11 जुलाई को विश्व जनसँख्या दिवस मनाया जाता है तो वहीं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संदेश पूरे विश्व को देने के लिए हर वर्ष  28 जुलाई को विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस भी मनाया जाता है।

प्रकृति बनाम भारतीय संस्कृति

हमारे पुरातन वैज्ञानिकों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंधों को इस तरह स्थापित किया जिससे मानव द्वारा प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। हमारे शास्त्र किसी भी उद्देश्य को ध्यान में रखकर क्यों न रचे गये हों, एक बात स्पष्ट है कि भारतीय वैदिक और सनातन चिंतन प्रकृति के संरक्षण के लिये किये जाने वाले उपायों को नयी दिशा देने में विशेष रूप से कारगर ही नहीं बल्कि प्राकृतिक संसाधनों में हो रही कमियों और उस कारण से उत्पन्न चुनौतियों को जड़ से समाप्त करने में सक्षम भी हैं। भगवान जिसमें भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि एवं न से नीर तत्व शामिल है। यानि प्रकृति के पंच तत्व को हमने भगवान माना है। ऐसे में भारतीय सनातन संस्कृति के सन्देश को समझने और विश्व के लोगों तक इस सन्देश को पहुंचाने में हम गुरु की भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं। हमारी संस्कृति सदा से ही प्रकृति की संरक्षक ही नहीं अपितु प्रकृति की पूजक भी रही है। पेड़, पौधे, वनस्पति, पशु, अन्न, जल, पत्थर आदि से लेकर मिट्टी तक अर्थात प्रकृति से प्राप्त हर सजीव निर्जीव वस्तु की पूजा के बहाने सबको प्रकृति संरक्षण का संदेश देने का काम भारतीय सनातन संस्कृति हमेशा से करती चली आ रही है। हमारे पूर्वजों ने किसी संस्था से शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन अपनी रचनाओं में प्रकृति को इस तरह चित्रित किया कि इसके विनाश की बात सोची भी नहीं जा सकती। धार्मिक ग्रन्थों, उपनिषदों में वन, नदी, जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है। विचार करें तो समझ में आयेगा कि पर्वतराज हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक तीर्थों की जो शृंखला बनी हुई है उनकी यात्रा से हमें विभिन्न जगहों की भौगोलिकता, पर्यावरण का ज्ञान, लोगों के रहन-सहन, जीवनचर्या और जीवन-यापन करने के तौर-तरीकों के साथ ही प्राकृतिक संसाधन और उसके संरक्षण का शानदार बोध होता है।

प्रकृति से अपनी प्रवृति सँवारें

मत्स्य पुराण में लिखा है कि दश कूप समा वापी, दशवापी समोहद्र:, दशहृद सम: पुत्रो, दशपुत्रो समो द्रुम:। अर्थात् दस कुंओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावडिय़ों के बराबर एक तालाब होता है, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी पेड़ को प्रकृति संरक्षण का सबसे अहम आधार माना गया है। इसीलिए प्रकृति को सबसे बड़ा वैज्ञानिक भी माना गया है क्योंकि मानव की आवश्यकता के अनुरूप हज़ारों-लाखों वर्षों में उसने जो कुछ विकसित किया है, वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में उसी से सीखने-समझने की कोशिश करते हैं। हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों ने इसीलिए प्रकृति को एक माँ, एक पिता और इन सबसे बढक़र एक गुरु की तरह पूजा है। प्रकृति के कण-कण से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। कहा भी गया है कि मनुष्य के जन्म से भी पहले से उसकी गुरु प्रकृति स्वयं है। प्रकृति ने हमें इस संसार में अद्भुत और अनोखी रचनाएं उपहार में दी हैं। यद्यपि वर्तमान में वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से सम्पूर्ण विश्व लगभग बाहर निकल चुका है पर तमाम दावों के बीच दुनिया में कोई नहीं जानता कि कोविड-19 मैन मेड था या प्राकृतिक। ऐसे में दो वर्षों पूर्व का वह समय याद कीजिये जब इस महामारी के कारण मनुष्य के प्राण ही संकट में पड़ गए थे। एक तरफ संसार गतिहीन हो गया था तो दूसरी तरफ मनुष्यों का प्रकृति में हस्तक्षेप बन्द हो गया। नतीजतन प्रकृति ने पुन: स्वयं को संवारना प्रारंभ कर दिया। नदियाँ स्वच्छ हो गईं, प्रदूषण कम हो गया। कोरोना महामारी ने समस्त मानव जाति को एक सबक सिखाया कि प्रवृत्ति संवारने में प्रकृति की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है-

प्रकृति ने हमें इतना कुछ दिया है कि हम सोच भी नहीं सकते, तो आइये हम सब अपनी परंपराओं की ओर पुन: लौटते हुए प्रकृति वंदन करें और प्रकृति को यह अहसास करवायें कि हम उसके प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहअस्तित्व के अनुगामी हैं। पिछली पीढ़ी ने प्रकृति को हमें जिस पवित्र रूप में सौंपा था, अगली पीढ़ी को हम उसी रूप में सौंपने के लिए आबद्ध रहें। हमारे भीतर प्रकृति-प्रेम सदा परिलक्षित होता रहे क्योंकि यह प्रेम ही प्रकृति का संरक्षण करने में हमारी मदद करेगा।

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिब्र्रह्म शान्ति:,
सर्वं शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि।।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।।

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