परम पूज्य योग-ऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से निःसृत शाश्वत सत्य...
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भ्रान्ति व सत्य
जीवन व जगत् के सन्दर्भ में जितना हमें सत्य विदित होता है उतना या इससे भी अधिक हम भ्रान्तियों में ही जीते रहते हैं और विविध शोषण, अन्याय व अपूर्णीय क्षति भी उठाते रहते हैं। इन्हीं वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक व वैश्विक भ्रान्तियों, कुंठाओं, रहस्यों व षड्यन्त्रकारी लूट, अन्याय व शोषणों के सन्दर्भ में हम संकेत करना चाहते हैं जिससे लोग इस त्रासदी से बचें।
1- वैयक्तिक भ्रान्ति
हम स्वभाव से ही अनन्त ज्ञान, ज्योति, प्रकाश, अनन्त प्रेम, करुणा, वात्सल्यादि संवेदनाओं, अनन्त प्रेम, करुणा, वात्सल्यादि संवेदनाओं, अनन्त सामर्थ्य, शौर्य, पराक्रम, वीरता व अखंड पुरुषार्थ से युक्त सच्चिदानन्द स्वरूप आत्माएं होते हुए भी भ्रान्ति के शिकार हो जाते हैं और अपने आपको अज्ञान, अश्रद्धा, अकर्मण्यता व अधर्मयुक्त, रोगी, दु:खी, दरिद्र, अविवेकी, असमर्थ, बेबस, लाचार मानकर एक दयनीय जीवन जीते रहते हैं। मैं संसार के सब लोगों को इस भ्रान्ति, कुंठा से बाहर निकालना चाहता हूँ। सब स्वयं को जानें, स्वयं को योग व कर्मयोग के पथ पर चलकर जगाएं व अपनी शक्तियों को स्वयं के व समष्टि संसार के सृजन में लगायें।
2- पारिवारिक भ्रान्तियां
हम व्यक्तिगत तौर पर भले ही एक छोटी सी इकाई दिखाई देते हों लेकिन यह सत्य नहीं है, हम स्वयं में एक पूर्ण स्वाधीन आत्मा होते हुए भी परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व व प्रकृति के समस्त घटकों के सहयोग से निर्मित एक सामूहिक सत्ता हैं। एकत्व, सहअस्तित्व, सौहार्द्य, सामंजस्य, एकता, समानता एवं सामूहिकता में ही हमारे जीवन का अस्तित्व, सुख, शान्ति, समृद्धि, खुशहाली व सर्वविध समाधान है।
3- सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक भ्रान्तियां
माता-पिता, गुरुजन, परिवार, समाज, प्रकृति व संस्कृति के सामूहिक सहयोग, संकल्प व पुरुषार्थ का परिणाम है। हमारा जन्म, शिक्षा, दीक्षा, संस्कार, समृद्धि जो कुछ भी हमारे पास है उसमें माना हमारी भी एक भूमिका होती है लेकिन हमारे जन्म में हमारा कर्माशय प्रारब्ध कारण होते हुए भी माता-पिता बहुत बड़े कारण हैं, हमारे भीतर अनन्त ज्ञान होते हुए भी इस ज्ञान ज्योति, ज्ञानदीप को गुरु ही जलाते हैं, माना कि हम व्यवसायिक दृष्टि से विविध क्षेत्रों में पुरुषार्थ करके अर्थ अर्जित करते हैं लेकिन ये सब अर्थ हमे सबके विश्वास व सहयोग से ही प्राप्त होता है तो हमारा भी कत्र्तव्य है कि हम प्राप्त अर्थ को परमार्थ में लगाएं और अपने स्वधर्म में सर्वस्व समर्पित करने हेतु संकल्पित रहें लेकिन अधिकांश लोग ऐसा नहीं करते क्योंकि भ्रान्ति, अज्ञान का पर्दा पड़ा है।
4- राजनैतिक भ्रान्तियां
सभी प्रकार की भ्रान्तियों का मूल स्रोत है धर्म सत्ता व राज सत्ता। यदि संसार के सभी धार्मिक लोग एक स्वर में नि:स्वार्थ भाव से संसार के लोगों को सभी प्रकार की भ्रान्तियों, कुंठाओं व अंधविश्वासों से पूरी ईमानदारी से उभारें तथा विश्व के सभी शक्तिशाली नेता सारे संसार में ऐसे ही नियम, कानून व व्यवस्थायें स्थापित कर दें कि समाज में किसी भी प्रकार की कोई भ्रान्तिायां, अज्ञान, अंधकार फैलाकर किसी भी रूप में लोगों को कोई लूटे नहीं, कोई किसी भी प्रकार का षड्यंत्र न फैलाएं तो ये दुनिया बहुत ही सुखी हो सकती है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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