लोकमत पत्र के तत्वाधान में आयोजित लोकमत राष्ट्रीय अंतर धार्मिक सम्मेलन में पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज का उद्बोधन
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पूज्य स्वामी जी ने 24 अक्टूबर नागपुर में अपने उद्बोधन में कहा कि आज करवा चौथ का दिन है जिसमें पत्नी अपने पति की आयु को बढ़ाने के लिए व्रत रखती हैं। उसी प्रकार कुछ पुरुष भी अपनी पत्नी की आयु को बढ़ाने के लिए व्रत कर लेते हैं। जबकि एक संन्यासी व्रत लिये होता है सबकी आयु बढ़ाने के लिए, सबको स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि, शान्ति, वैभव, ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए। आज विजय दरड़ा साहब ने जो विजय अभियान शुरु किया है वह मानव धर्म, राष्ट्रधर्म, विश्व धर्म, युग धर्म और योगधर्म के लिए बहुत श्रेष्ठ है। जो लोक चाहता है और उसके अनुरूप जो आचरण करते हैं, उन अपेक्षाओं पर जो खरा उतरे, वह लोकमत है। विजय दरड़ा साहब में यशस्विता के साथ प्रकाश के स्तर पर, ज्ञान के स्तर पर, संवेदनाओं के स्तर पर, पुरुषार्थ के स्तर पर, कर्म के स्तर पर जो तेजस्विता है, और सब मत-पंथ-सम्प्रदायों का एकीकृत भाव भी है। इस राष्ट्र व विश्व के उन्नति के लिए यह जो आयोजन है, इसकी आप सभी को बधाई। इस आयोजन में कई श्रेष्ठ महापुरुषों का आगमन हुआ है। इस समय इस राष्ट्रधर्म के सबसे बड़े पुरोधा हमारे नितिन गडक़री जी भी इस आयोजन में उपस्थित हैं, उनका अभिनन्दन। अभिनन्दन इस बात के लिए की राजनीति में रह कर सेवा, सृजन का बड़ा कार्य एक शिल्पकार बनकर उन्होंने पूरा किया। देश के 5 लाख से अधिक गांव तक, देश के कोने-कोने में जहाँ हमारा सफर पहले 5 या 6 घंटे का हुआ करता था, उन्होंने उस सफर को मात्र 2.5 से 3 घंटे का कर दिया है। उन्होंने पूरे हिन्दूस्तान में आज देश का लाखों-करोड़ रुपये के डीजल, पेट्रोल की बचत करवाई है। उसका श्रेय तो माननीय नितिन गडक़री जी को ही जाता है। पहले दिल्ली से हरिद्वार पहुँचने में 5 से 6 घंटे लगते थे लेकिन इनके अथक पुरुषार्थ के फलस्वरूप अब यह सफर मात्र 2.5 घंटे में पूरा हो जाता है। तब समय के साथ-साथ डीजल, पेट्रोल भी दोगुना लगा करता था। आज समय व पैसे दोनों की बचत हो रही है। माननीय नितिन गडक़री जी को मैं पिछले 2 दशकों से जानता हूँ और इनकी निष्पक्ष और बहुत व्यापक सोच है। मुझे तो ऐसा लगता है जब हम राष्ट्रगान में जो कई बार जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता कहते हैं, वह माननीय नितिन गडक़री जैसे लोगों को ही सम्बोधित करते हैं। ऐसे व्यक्तित्व ही भारत का निर्माण कर रहे हैं। इसके लिए नितिन गडक़री जी का बहुत अभिनन्दन है। आज इस दुनियां के लिए सबसे बड़ा खतरा है, मजहबी आतंकवाद। फिर आर्थिक आतंकवाद, राजनैतिक आतंकवाद। इसके बाद इसमें मेडिकल आतंकवाद आता है। इस पर जब मैंने बोला था तब काफी आलोचनायें होने लगी थी। आज राजनैतिक आतंकवाद सबसे बड़ा है। मजहबी व धार्मिक आतंकवाद वाले दूसरे दर्जे पर आते हैं। फिर आता है आर्थिक आतंकवाद, जो कार्पोरेट आतंकवाद है, वह बड़ा खतरनाक है। फिर मेडिकल आतंकवाद है जो बहुत खतरनाक है। आज मजहबी आतंकवाद के नाम पर इंसानों को गाजर-मूली की तरह काट दिया जाता है। मैं तो कहता हूँ कि पूरी दुनियां में सर्व धर्म सम्मेलन नहीं, सर्व पंथ सम्मेलन होना चाहिए। धर्म तो एक ही है, वह है मानव धर्म, सत्य धर्म व न्याय धर्म। धर्म अलग कैसे हो सकते हैं? पानी, हवा, धरती, पेड़-पोधों, सूर्य व चांद का जैसे एक धर्म होता है, वैसे ही सभी मनुष्यों का भी एक ही धर्म होता है। यह मत, पंथ, सम्प्रदाय अलग-अलग हैं। मत, पंथ, सम्प्रदाय अलग होने से इनके जो सत्य हैं वह अलग नहीं हो सकते, वह सत्य हैं एकत्र हैं।
वह सत्य है न्याय, वह सत्य है मैत्री। यही वेद का सब धर्म ग्रन्थों का संदेश, उपदेश है। एकत्व, सह-अस्तित्व, सौहार्द, विश्व बन्धुत्व, एकता, समानता के विषय में सारे विश्व में धर्माचार्य, मत, पंथ, सम्प्रदायों के व्यक्ति एक सुर में कहें कि हम एक ही ईश्वर की संतान हैं, एक ही पूर्वजों की संतान हैं, एक ही धरती माता, प्राकृतिक माता की संतान हैं और सबके सब एक समान हैं। सब एक समान और सभी महान लेकिन यहाँ पर क्या आवाज़ें उठती हैं? हिन्दू महान हैं, मुस्लमान महान हैं, ईसाई महान हैं। हम सबको हिन्दू बनायेंगे, हम सबको मुस्लमान बनायेंगे, हम सबको ईसाई बनायेंगे। जबकि बात यह होनी चाहिए कि आज हम सबको इंसान बनायेंगे। यह जो अपना-अपना मत, पंथ, सम्प्रदाय बढ़ाने के लिए होड़ लगी है, वह सही नहीं है। इसलिए हमने कोई सम्प्रदाय नहीं बनाया। हम तो यह चाहते हैं कि एक एकता के स्वर उठें। समानता के न्यायता के स्वर उठें। आज कुछ लोग कहते हैं कि ब्राह्मण महान हैं, फिर कुछ लोग आते हैं कि ओ.बी.सी. (पिछड़ा वर्ग) महान हैं, कुछ कहते हैं कि क्षत्रीय महान हैं, फिर उधर से आवाज आती है कि शुद्र महान हैं। यह सब क्या चक्कर है भाई? सभी समान हैं, सभी महान हैं। फिर आपस में क्यों लडऩा? मनुष्य तभी आगे बढ़ेगा। हमारा लक्ष्य विकास होना चाहिए, प्रगति होनी चाहिए। आज नॉलिज, साइंस, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, इनवेंशन का दौर है। माननीय गडक़री जी कहते हैं कि इस नोलिज, साइंस, टेक्नोलॉजी, इनवेंशन को वेल्थ में क्रिएट, अपने हित के लिए नहीं, अपितु सबके कल्याण के लिए होना चाहिए। अपने जीवन में परम पुरुषार्थ करना, यही सच्चा धर्म है, यही अध्यात्म है। धर्म के नाम पर राम-राम जपना, पराया माल अपना, इस प्रकार नहीं होना चाहिए।
मैं चाहता हूँ कि लोग योग करें, कर्म योग करें, पुरुषार्थ करें, तभी वे आगे बढ़ेंगे और तभी देश-दुनियां बचेगी। अब तो कोरोना ने सबको बता भी दिया है कि जो योग नहीं करेगा उसकी सांसे रूक जायेंगी। इसलिए आज सबको प्राणायाम करने की आवश्यकता है। आज एक छोटे से कोरोना ने आदमी को डराकर रख दिया। उसकी हैसियत ही क्या है? आज एक छोटा सा मच्छर आदमी को मार देता है। अब आप ही बतायें, आदमी ताकतवर है या मच्छर। आज हम एक मच्छर से भी ज्यादा गये-बीते हो गये। हमें इसलिए आज योग, प्राणायाम की आवश्यकता है।
आज लोकमत की स्वर्ण जयंती के लिए अभिनन्दन है। लोकमत ने निर्भिकता के साथ पत्रकारिता धर्म के 50 वर्ष पूरे किए। यह किसी पक्ष या किसी पार्टी, किसी मत, किसी पंथ, किसी सम्प्रदाय का नहीं है। विजय दरड़ा जी के लिए पत्रकारिता एक धर्म है, इनके लिए सबसे बड़ा राष्ट्र धर्म, मानव धर्म व युग धर्म है, यह इसके पुरोधा हैं।
आज हमें इस संकल्प के साथ जीना चाहिए कि सुबह उठते ही हमें महसूस होना चाहिए कि मैं ईश्वर का अंश हूँ, मैं ऋषियों का वंशधर हूँ। मैं धरती माता की संतान हूँ और मुझे कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे मेरे राष्ट्र का नाम बदनाम होता हो और ऐसा कोई काम नहीं छोडऩा जिससे मेरे देश का सुनाम होता है।
मैं भी एक अनपढ़ माँ-बाप की संतान हूँ। सरकारी स्कूल में पढ़ा हूँ। उसके बाद मैं गुरुकुलम् में पढ़ा और मुझे फक्र है कि एक अनपढ़ माँ-बाप के घर से पढक़र, गुरुकुलम् में पढक़र कर संस्कृत व हिन्दी बोलने वाले को आज कई भाषाएँ आती हैं। आज भाषा का प्रश्न नहीं है। कहाँ हमारी शिक्षा-दीक्षा हुई है, यह भी प्रश्न नहीं है। प्रश्न सिर्फ यह है कि आपकी नीयत कैसी है? आपके विचारों में दुर्विचार नहीं होने चाहिए, दुर्भावना नहीं होनी चाहिए। जीवन में दुर्गुण, दोष नहीं होने चाहिए। सब विचारों से, सद्भाव से, गुणों से हम आगे बढ़े। सबमें सममति, भक्ति, कृति, शक्ति, संस्कृति हो, यह तो प्रगति के आधार हैं।
यह जो आयोजन है, यहाँ पर भाषणों की महत्ता नहीं है। यह आयोजन सबको दिलों से जोडऩे का प्रयास है। इतने गहरे हमारे संबंध हैं कि दुनियां की कोई ताकत हमको तोड़ नहीं सकती। आज यह संदेश सब तक जाना चाहिए कि क्यों मत-पंथ-सम्प्रदायों के नाम पर, जातियों के नाम पर, महजबों के नाम पर हमारी पहचान होनी चाहिए, हम सब एक अध्यात्म, राष्ट्रवाद, मानवतावाद के पोषक हैं, यह सारी सृष्टि भगवान के विधान से ही चलती है। यह यूनिवर्सल है, इसे कोई टाल नहीं सकता है।

सृष्टि का नियम, विधान, क्रम कौन तोड़ सकता है? सारी सृष्टि भगवान् के विधान से चलती है। देश संविधान से चलता है। तो समाज को मानव धर्म कहो, नैतिक धर्म कहो, सत्य कहो, न्याय कहो, यही धर्म का सार है। सारा समाज आध्यात्म के आधार पर चलता है, राजनेता समाज को नहीं चलाते। किसी भी दुनिया, किसी भी देश को किसी राजनेता ने नहीं बनाया अपितु सारा समाज तपस्वियों ने बनाया है। भारत को तो मूलत: ऋषियों ने ही बनाया है। इसलिए जो हमारी मूल प्रकृति है, जो मूल संस्कृति है, जो जड़ें है, उन पर हमें गर्व होना चाहिए। सबसे पहले हमें अपने जीवन में अध्यात्म धर्म, नैतिक धर्म, अहिंसा को आत्मसात करना होगा। सत्य, एकता, समानता रहे, मेरे देश में चरित्र की महानता रहे, इन मूल्यों के साथ हम आगे बढ़ेगें। मैं पंथों को अलग नहीं मानता, मैं राह अलग नहीं मानता, साधन अलग-अलग हो सकते हैं मगर सिद्धान्त भी अलग नहीं हो सकते। मनुष्य अपने कर्म को पवित्र कर ले तो धरती स्वर्ग बन जायेगी। मनुष्य अपने कर्म से, पुरुषार्थ से आगे बढ़े तो यह संभव है। भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को पुरुषार्थ कहा गया है। हमारे कर्म पवित्र होने चाहिए, कर्म की पवित्रता भी जरूरी है। इसी को ज्ञान, योग, भक्ति, कर्म योग कहते हैं। मैं इस पुण्य पुरुषार्थ के लिए, पुण्य प्रभास के लिए विजय दरड़ा साहब का बहुत-बहुत अभिनन्दन करता हूँ और आप सभी इस पवित्र दिन यहाँ पर आए इसलिए आपका भी अभिनंदन। लोकमत की यह यात्रा अभी आगे 100 साल तक चलेगी। लोकमत ने 50 साल यशस्विता के साथ पूरे किये हैं और इसके 100 साल पूर्ण होने पर भी मैं दोबारा आऊंगा। क्योंकि मैं अभी 75 साल और जीने वाला हूँ।
भारत माता की जय।
लेखक
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01 Mar 2025 17:58:05
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