परम पूज्य योग-ऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से निःसृत शाश्वत सत्य...
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शिक्षा एवं नेतृत्व
1. शिक्षा का एक लक्ष्य साक्षरता, सूचनाएं, नए युग के साथ तालमेल, शिक्षा या ज्ञान, कुशलता, महत्वाकांक्षाओं प्रखर पुरुषार्थ के बल पर समृद्धि के नये कीर्तिमान स्थापित करना तथा सामान्य रूप से जीविकोपार्जन/ लेकिन इससे भी बड़ा या सबसे बड़ा शिक्षा का ध्येय है राष्ट्र व विश्व को श्रेष्ठतम नेतृत्व देना।
2. शिक्षा से नेतृत्व- नेतृत्व शब्द जैसे ही हमारे कानों में गूंजता है तो नेतृत्व की पृष्ठभूमि या उसके स्रोतों के सन्दर्भ में अनायास ही हमारा ध्यान जाता है वंश परम्परा से नेतृत्व- गुरु परम्परा से नेतृत्व, संस्था या संगठन की सामूहिक शक्ति से उत्पन्न नेतृत्व, किसी अप्रतिम ईश्वरीय या प्रकृति की व्यवस्था से बड़े व्यक्तित्व का जन्म और उसके कृतित्व, व्यक्तित्व एवं योगदान से नेतृत्व, प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ के ऐसे संगम से जो इतिहास में कभी-कभी घटित होता है कि कोई प्रारब्ध या भगवान् के विधान से नितान्त अभावों, संघर्षों के बीच कोई व्यक्ति पैदा होता है जो अपने पुरुषार्थ, पराक्रम, वीरता, साहस, शौर्य, तप, त्याग व बलिदान से युग की दिशा बदल देता है।
इस सभी प्रकार के नेतृत्व में शिक्षा-दीक्षा एवं संस्कारों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। अर्थात् वंश परम्परा से लेकर सभी प्रकार के व्यक्तित्व नेतृत्व को स्वरूप या आकार देने में शिक्षा, शिक्षक, शिक्षा, वातावरण और युगधर्म का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है।
यद्यपि नेतृत्व का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है किसी इसे मुख्य रूप से राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक- इन पांच भागों में विभक्त करके देख सकते हैं। इन्हें तीन में विभक्त करते हैं तो राजसत्ता, अर्थसत्ता व धर्मसत्ता सर्वोपरि होते हैं। मैंने अर्थ को मध्य में इसलिए रखा कि राजकाज तथा धर्म-कर्म सबके केन्द्र में अर्थ ही होता है। राजसत्ता के पास अर्थ का नियन्त्रण कर एवं राष्ट्रीय सम्पदाओं के उपयोग से होता है और इसके लिए संविधान एवं कानून को टूल के रूप में उपयोग करते हैं।
धार्मिक, सांस्कृतिक या आध्यात्मिक रूप से स्थापित लोग धार्मिक भावनाओं या आस्थाओं, विश्वासों, संस्कृति, सभ्यता या मूल्यों को प्रबल रूप से उभार कर या इनके सन्दर्भ में एक उन्माद, श्रद्धा का अतिरेक या ध्रुवीकरण, भय या असुरक्षा पैदा करके तथा स्वयं को उनका सबसे बड़ा हितैषी, शुभचिन्तक या उद्धारक बताकर वे लोगों को लीड करते हैं और अपनी गतिविधियों के संचालन हेतु दान का मुख्य रूप से सहारा लेते हैं।
आर्थिक नेतृत्व मुख्य रूप से बाजारवाद के सिद्धान्त पर खड़ा होता है। इसमें ब्रांड, वाद एवं साम्राज्यवाद आदि कई प्रकार की जटिलताएँ सन्निहित हैं।
यद्यपि राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक नेतृत्व के अच्छे व बुरे उदाहरणों से देश व दुनियां भरी पड़ी है। इसमें बहुत बुरे लोग भी हैं जिन्हें मैं पोल्टिकल टैरेरिज़म, रिलीजियस टैरेरिज़म तथा इकोनोमिक या कोर्पोरेट टैरेरिज़म के नाम से बोलता रहता हूँ लेकिन यह भी सत्य है कि इन सभी क्षेत्रों में शिक्षा एवं संस्कारों के बल पर एक श्रेष्ठ राष्ट्र विश्व के निर्माण हेतु श्रेष्ठ नागरिकों को घड़ा जा सकता है।
3. वैदिक ज्ञान एवं आधुनिक विज्ञान सनातन एवं नूतन के संगम से स्प्रिचुलिटी एवं साइंस के श्रेष्ठतम सदुपयोग से हम विश्व के श्रेष्ठतम नागरिकों या प्रतिभाओं को घडऩा चाहते हैं और इसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु पतंजलि विश्वविद्यालय, पतंजलि गुरुकुलम्, आचार्यकुलम्- यह हमारी शिक्षा क्रान्ति की त्रिवेणी है तथा हमारी संस्कृति,साझी विरासत, ज्ञान परम्परा इस पूरे आन्दोलन, अभियान, अनुष्ठान क्रान्ति का प्राणतत्त्व है। 2045 तक योग, आयुर्वेद, स्वदेशी क्रान्ति एवं शिक्षा क्रान्ति से कैसे देश बदलेगा, यह हम आगामी लेखों में कुछ सार व कुछ विस्तर रूप से लिखेंगे।
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01 Mar 2025 17:58:05
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