आधुनिक युग मे विलुप्त होती स्वाद एवं भारतीय संस्कृति की एक पहचान
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डॉ. रुपेश शर्मा, योग संदेश विभाग
भारत में जहाँ एकता के साथ अनेक प्रकार के संस्कृति एवं रीति-रिवाजों में विषमता देखने को मिलती है उसी प्रकार भारत की भोजन व्यवस्था में भी अनेक विविधता मिलती हैं। अलग परिवेश एवं अलग-अलग भोजन को खाने की परम्परा और उसको परोसने की परम्परा भारतीय संस्कृति में शामिल हैं।
आईए! इन सब पहलूओं में से अनोखी पाक कला एवं भोजन को परोसना की कला को जानें, जो पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर देती है।
भारत का भोजन या भारतीय खाना अपने भीतर भारत के सभी क्षेत्रों, राज्य के अनेक भोजन के नाम से युक्त हैं। वैसे तो भारत में सब कुछ अनेक और विविध है। उसी प्रकार भारतीय भोजन भी विविध प्रकार का हैं। पूरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण भारत का आहार एक दूसरे से बहुत अलग है। भारतीय भोजन पर अनेक तत्त्वों का प्रभाव पड़ा है जैसे- उत्तर भारत में हम मुगलायी प्रभाव देखते हैं। हर क्षेत्र का भोजन एक दूसरे से बहुत भिन्न होता है। यही विभिन्नता भारतीय भोजन को एक अनोखा रूप प्रदान करती है। भारतीय भोजन अनेक प्रकार की पाक कलाओं का संगम हैं। इसमें पंजाबी खाना, मारवाड़ी खाना, दक्षिण भारतीय खाना आदि सभी अपने पाक कला में निपुणता को दर्शाते हैं।
भारतीय खाने या पाक कला को इतिहास लगभग 5,000 वर्ष से भी पुराना है। जिस प्रकार स्वादिष्ट खाना हर व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है उसी प्रकार इस स्वादिष्ट खाने को किस पात्र या पत्तल पर परोसा जाए, जिससे उसके स्वादिष्टता एवं पोषकता को बनायें रखें, यह भी पाक कला का अभिन्न अंग है।
आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि हमारे देश भारत में 2,000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से पत्तल तैयार किये जाते हैं और इन पत्तलों पर भोजन खाने से आपका पारम्परिक चिकित्सा (आयुर्वेद) के लाभ प्राप्त होते हैं।
वर्तमान समय में हम मुश्किल से पांच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम अपनी दैनिक भोजन ग्रहण करने की प्रक्रिया में करते हैं। शहरों में तो वह भी नहीं है।
आमतौर पर केले के पत्तों में खाना परोसा जाता है प्राचीन ग्रंथों मे केले के पत्तों पर परोसे गये भोजन को स्वास्थ्य के लिए लाभदायक बताया गया है।
कहा जाता है कि पलाश के पत्तल पर भोजन करने से स्वर्ण के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य प्राप्त होता हैं। केलों के पत्तलों में भोजन करने से चांदी के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता हैं।
केले के पत्ते पर भोजन करने का महत्त्व
आमतौर पर दक्षिण भारत मे केले के पत्ते पर भोजन परोसने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। इन पत्तलों में खाना खाने के चमत्कारी फायदे के बारे में लोग नहीं जानते है।
केले के पत्ते में भोजन करने के फायदे
आज के युग में हम लोग केवल 5 तरह की वनस्पतियों के पत्तलों का ही प्रयोग करते हैं, इसमें भी सबसे ज्यादा केलों के पत्ते का प्रयोग किया जाता है। यदि हम केले के पत्ते से बनें पत्तल में भोजन करते है, तो हमें चांदी से युक्त लाभ की प्राप्ति होती है। केले के पत्तलों पर भोजन करके पुण्य और आरोग्यता दोनों प्राप्त होती है। केले के पत्तों का महत्त्व हमारे जीवन में बहुत है। इसका प्रयोग हमारे घर में होने वाली पूजा-पाठ में अवश्य रूप से देखने को मिलता है।
पाचन क्रिया (डाइजेशन सिस्टम) के लिए भी उपयोग में आते है केले के पत्ते
केले का पत्ता प्लांड-बेस्ट कम्पाउंड, पॉलीफनॉल्स से पूर्ण होता है। पॉलीफेनॉल्स नेचुरल एंटीऑक्सीडेट्स होते हैं जोकि शरीर में मौजूद फ्री-रेडिकल्स और दूसरी बीमारी से सुरक्षा प्रदान करने का कार्य करते है। एक ओर जहाँ केले की पत्तियों को सीधे तौर पर पचाना संभव नहीं है, वहीं केले के पत्ते में रखे खाद्य पदार्थ इससे पॉलीफेनॉल्स को अवशोषित कर लेते हैं। इससे शरीर को इन ऑक्सीडेट्स का फायदा भी मिल जाता है।
खाने का स्वाद भी बढ़ाता है केले का पत्ता
केले की पत्तियों पर मोम के जैसी एक ऊपरी परत होती है। हालांकि ये परत बहुत पतली होती है, लेकिन इसका स्वाद बहुत अलग होता है। जब गर्म खाना केले के पत्ते पर परोसा जाता है, तो ये मोम पिघलकर खाने में मिल जाता है। जिससे खाने का स्वाद और बढ़ जाता है।
इंको फे्रडली भी है केले के पत्तों पर भोजन करना
केले के पत्ते पर खाना खाना पर्यावरण के लिहाज से एक सार्थक पहल है। आमतौर पर लोग भोज या फिर किसी समारोह में प्लास्टिक या स्टीरोफोम के प्लेट्स का इस्तेमाल करते हैं। इस्तेमाल के बाद इन्हे यूं ही फेक दिया जाता है, जबकि केले के पत्तों को डिकंपोज करना बहुत ही आसन होता है।
पूरी तरह से स्वच्छ होता है केले पर किया भोजन
केले की पत्तियों को बहुत अधिक साफ करने की जरुरत नहीं होती है। ये खुद ही बहुत हाईजैनिक होती है। इन्हें सिर्फ थोड़े से पानी से साफ करके इस्तेमाल में लाया जा सकता है। प्लास्टिक की प्लेट में भोजन करना स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होता है।

केमिकल फ्री आहार
केले के पत्ते में खाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारे शरीर में किसी भी प्रकार का कोई रासायनिक पदार्थ प्रवेश नहीं कर पाता है। जबकि प्लास्टिक की प्लेट में भोजन करने से भोजन की गर्महाट से प्लास्टिक के कुछ अंश पिघलने लगते है और यह अंश हमारे शरीर में जाकर कैंसर जैसी भयानक बीमारी को उत्पन्न करते हैं। ऐसे में केले के पत्ते पर खाना स्वास्थ्य के लिहाज़ से बहुत फायदेमंद है।
पलाश की पत्तल में भोजन करने से स्वर्ण पात्र में भोजन करने का लाभ प्राप्त होता है। पलाश के पत्तों का इस्तेमाल भोजन के साथ-साथ दवा के रूप में भी किया जाता है। अगर किसी के रक्त में अशुद्धता आ जाती है, तब पलाश के पत्ते के सेवन करने से काफी लाभ प्राप्त होता है। साथ ही यह पाचन तंत्र जैसी बीमारियों में भी काफी कारगर साबित होता है।
पलाश के पत्तों से बनी प्लेट जिस पर आज भी मंगल कार्यों और विवाह आदि में इन पत्तलों में खाना खाने व खिलाने की परम्परा चली आ रही हैं, पर अब वक्त के साथ-साथ यह चलन कम हो गया है। पत्तल पर खाना खाना न केवल सुविधा की दृष्टि से लाभप्रद है बल्कि सेहत के लिए भी फायदेमंद है।
आज भी पत्तल पर खाना खाने से आप लकवा, बवासीर एवं पाचन संबंधी रोगों से बचने में सहायक हैं एवं इस समस्याओं में काफी लाभदायक भी है। इसके अलावा जोड़ों के दर्द की समस्या भी इससे कम हो जाती है।
पलाश के पत्तों की थाली में खाना खाने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। कृमि, कफ, खांसी, अपच व पेट संबंधी व रक्त संबंधी अन्य बीमारियां होने की सम्भावना भी कम होती हैं।
पत्तल पर खाने की आदत न केवल पैसों की बचत करती है बल्कि जल के संरक्षण में भी काफी उपयोगी साबित होती है, क्योंकि आपको पत्तलों को धोने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आप पत्तलों को जमीन में डालकर उसकी खाद बना सकते है।
पत्तल पर खाना खाने से आपको भोजन के साथ ही संबंधित वृक्षों के औषधीय गुण भी प्राप्त होते हैं ओर मानसिक शांति भी प्राप्त होती है।
यदि समाज पुन: अपनी संस्कृति की ओर मुडक़र पत्तलों को अपने जीवन की दिनचर्या में स्थान देता है तो इंसान पत्तलों की मांग के अनुसार अधिक से अधिक वृक्षारोपण के कार्य को करेगा, जिससे वातावरण में अधिक ऑक्सीजन की प्राप्ति होगी।
दूसरी तरफ पत्तलों की अधिक मांग से नये-नये रोजगार का भी सृजन होगा। लोग इस उद्योग से जुडक़र लोगों को रोजगार देंगे।
पत्तलों पर भोजन करने का मुख्य लाभ आप नदियों को दूषित होने से बचाते हैं। जैसा कि आप जानते है जो पानी आप बर्तन धोने में उपयोग में लाते है, वह केमिकल वाला पानी होता है। वह पानी गन्दे नाले में जाता है फिर उसके बाद वहीं पानी नदियों में चला जाता है और अन्तत: जल प्रदूषणयुक्त हो जाता है।
पत्तलों का स्थान लेते हानिकारक थर्माकोल एवं प्लास्टिक के पत्तल
आधुनिकता की मार अब इन पत्तलों पर भी पडऩे लगी हैं। अब थर्माकोल और प्लास्टिक के पत्तल पत्तों से बने पत्तल को उसकी जगह से धीरे-धीरे बेदखल करते जा रहे है। वैसे तो भारत में सदियों से विभिन्न वनस्पतियों के पत्तों से बने पत्तल संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा रहे हैं। यह पत्तल अब भले विदेशों में लोकप्रिय हो रहे हैं परन्तु भारत में तो कोई भी सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक उत्सव इनके बिना पूरा नहीं हो सकता था। इन समारोहों में आने वाले अतिथियों को इन पत्तलों पर ही भोजन परोसा जाता था लेकिन अब यह पत्तल खत्म होने की कगार पर हैं।
असंगठित क्षेत्र के पत्तल उद्योग से लाखों मजदूरों की अजीविका जुड़ी है। बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों में भी अब पत्तों से बने पत्तलों का चलन धीरे-धीरे कम होने लगा है। यह शायद अकेला ऐसा उद्योग है जिस पर आधुनिकता की मार पड़ी है। ग्रामीण इलाकों में तो पत्तलों पर भोजन की परम्परा अब भी कुछ हद तक बरकरार है, लेकिन शहरों में इसकी जगह कांच या चीनी मिट्टी की प्लेटों ने ले ली हैं। विभिन्न सामारोह में बुफे पार्टी का प्रचलन बढऩे की वजह से भी पत्तों से बनें पत्तल अप्रासांगिक होते जा रहे है।
भारत में पत्तल बनाने और इस पर भोजन करने की परम्परा कब शुरु हुई, इसका कोई प्रमाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। यह जानकर किसी को भी हैरत हो सकती है कि देश में किसी दौर में 20 हजार से ज्यादा किस्म की वनस्पतियों की पत्तियों से पत्तल बनते थे। लेकिन आधुनिकता की बढ़ती होड़ ने इस उद्योग को समेट दिया है। अब खासकर शहरी इलाकों में पत्तल पर भोजन की परम्परा दम तोड़ती जा रही है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी केले के पत्तल पर भोजन की परम्परा का जिक्र मिलता है। अब तो मंहगें होटलों और रेस्तरां में भी प्लेटों पर केलों के पत्ते रखकर भोजन करने की परम्परा बढ़ रही है। यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत में भले ही सदियों पुरानी यह परम्परा बदल रही हो, विदेशी इसे बड़े चाव से अपना रहे हैं। खासकर यूरोप के प्रमुख देश जर्मनी में तो पत्तलों पर भोजन की परम्परा काफी लोकप्रिय हो रही है। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए वहां इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है और अब उसकी देखा-देखी दूसरे यूरोपीय देश भी पत्तलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ पत्तल की जगह प्लास्टिक और थर्माकोल से बनी प्लेटों में भोजन को स्वास्थ्य के प्रति नुकसानदेह बताते है। उनका कहना है कि डिस्पोजल थर्माकोल की प्लेट में खाना खाने से उसमें मौजूद कैमिकल भोजन के साथ मिलकर पाचन क्रिया पर प्रभाव डालते है, इससे कैंसर की आशंका होती है। इसी तरह डिस्पोजल गिलास में मिलायें गए केमिकल का छोटी आंत पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
आज पश्चिम बंगाल में शाल के पत्तों से बनें पत्तल का कारोबार करने वालों ने सरकार से इस उद्योग को बचाने की मांग की है। उनकी दलील है कि पत्तल कीमत के लिहाज़ से सस्ते तो है ही। इन पर भोजन के अनगिनत फायदे भी है। भोजन के मामले में इसकी जगह वही है जो पैकेजिंग के मामले में जूट की है। इन कारोबारियों की दलील है कि जब सरकार जूट के इस्तेमाल का बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है तो उसे पत्तल उद्योग को भी बचाने और बढ़ावा देने की पहल करनी चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो आधुनिकता की मार से यह सदियों पुरानी परम्परा धीरे-धीरे दम तोड़ देगी। पत्तल के थोक व्यापारी कहते है कि सरकार और सामाजिक संगठनों को देश की इस सदियों पुरानी दुर्लभ परम्परा को बचाने की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। इनकी दलील है कि इसके फायदों को ध्यान में रखते हुए विदेशों में इनका प्रचलन तेजी से बढ़ रहा हैं, लेकिन यह परम्परा अपने घर में ही दम तोडऩे पर मजबूर है।
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