शिक्षक और शिष्य की गुणवत्ता

शिक्षक और शिष्य की गुणवत्ता

वंदना बरनवाल,

महिला पतंजलि योग समिति - .प्र. (मध्य)

जिस प्रकार बिना प्राणशक्ति के शरीर किसी काम का नहीं उसी प्रकार शिक्षा के अभाव में हमारा जीवन और संस्कार के अभाव में हमारी शिक्षा का तो कोई मूल्य है और ही कोई महत्व संस्कार का सामान्य अर्थ ही है किसी को संस्कृत करना या शुद्ध करके उपयुक्त बनाना, ऐसे में संस्कार युक्त शिक्षा जब किसी को दी जाती है तो वह मानव को महामानव बना देने का सामर्थ्य रखती है और शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भी तो यही है।
जीवन का हर मोड़ हमेशा हमें कुछ कुछ सीखने और सिखाने का मौका देता ही रहता है। कभी प्रकृति, कभी परिवार, कभी समाज, कभी हमारा कार्य क्षेत्र और कभी-कभी तो हम स्वयं से ही सीखने और सिखाने के दौर से गुजरते हैं। सीखते समय हमारी भूमिका एक शिष्य की होती है तो उसी क्षण अगर हमसे कोई कुछ सीख रहा होता है तो हमारी भूमिका शिक्षक वाली हो जाती है, हर व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, वृद्ध हो या युवा, महिला हो या पुरुष अपने जीवनकाल में कहीं वो शिष्य होता है तो कहीं पर वह शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा होता है। सीखने और सिखाने की यह प्रक्रिया गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक हमारे साथ बनी रहती है और इसीलिए यूरोपियन शिक्षा पद्धति से अलग भारतीय शिक्षा पद्धति में जब कभी भी शिक्षा की चर्चा हुई तो वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों के साथ ही साथ संस्कारों की चर्चा के बिना वह पूरी नहीं हुई।

संस्कार से परिपूर्ण शिक्षा

जिस प्रकार बिना प्राणशक्ति के शरीर किसी काम का नहीं उसी प्रकार शिक्षा के अभाव में हमारा जीवन और संस्कार के अभाव में हमारी शिक्षा का तो कोई मूल्य है और ही कोई महत्व संस्कार का सामान्य अर्थ ही है किसी को संस्कृत करना या शुद्ध करके उपयुक्त बनाना, ऐसे में संस्कार युक्त शिक्षा जब किसी को दी जाती है तो वह मानव को महामानव बना देने का सामर्थ्य रखती है और शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भी तो यही है। शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना आवश्यक माना गया है और इन्हें ही संस्कार भी कहा गया। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से आरंभ होकर मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं। वेद, स्मृति और पुराणों में अनेकों संस्कार बताए गए हैं किंतु धर्मज्ञों के अनुसार उनमें से मुख्य सोलह संस्कारों में ही सारे संस्कार सिमट जाते हैं। इन संस्कारों के नाम हैं गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमन्तोन्नयन संस्कार, जातकर्म संस्कार, नामकरण संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, मुंडन संस्कार, कर्णवेधन संस्कार, विद्यारंभ संस्कार, उपनयन संस्कार, वेदारंभ संस्कार, केशांत संस्कार, सम्वर्तन संस्कार, विवाह संस्कार और अन्त्येष्टि संस्कार। दरअसल संस्कार संस्कृत भाषा का शब्द है जिससे मन, वचन, कर्म और शरीर सभी पवित्र हो जाते हैं। ऐसे में संस्कार के साथ जब शिक्षा जुड़ती है तो शिक्षार्थी ही नहीं अपितु शिक्षक का भी सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवन पुष्ट होता है। त्रासदी ये है कि वर्तमान में ये सभी संस्कार या तो पुस्तकों के पन्नों में और या फिर चुनिन्दा गुरुकुलों में पढ़ाये जाने तक ही सीमित हो गए हैं। नतीजतन एक तरफ गर्भाधान जैसा प्रथम और सबसे प्रमुख संस्कार आज मेडिकल साइंस का विषय बन चुका है तो वहीं विद्यारंभ जैसा संस्कार सरकारी शिक्षा बोर्ड के हवाले हो चुका है और इसीलिए आज ना तो आदर्श शिक्षक और ना ही आदर्श शिष्य मिलते हैं और ना ही उनको तैयार करने वाली आदर्श संस्थाओं का कुछ खास वजूद रह गया है।  

संस्थाओं की महत्ता एवं गुणवत्ता

यद्यपि शिक्षा के आदान-प्रदान की जिम्मेदारी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की है परन्तु यह जिम्मेदारी केवल उन्हीं की हो यह कहना बिलकुल भी उचित नहीं है। इन संस्थाओं में तो गणित, विज्ञान, कला, वाणिज्य आदि विषयों की शिक्षा मात्र मिलती है, जबकि सीखने सिखाने का दौर तो जीवन के हर मोड़ पर, घर में, परिवार में, समाज में हर स्थान पर सतत ही चलता रहता है। यानि जिस प्रकार यह आवश्यक नहीं कि शिक्षक और शिष्य केवल किसी स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में ही होंगे बल्कि वे हमारे आसपास किसी भी रूप में हो सकते हैं उसी प्रकार यह भी आवश्यक नहीं कि शिक्षा प्रदान करने के लिए कोई स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय जैसी संस्था हो ही। सच पूछिये तो शिक्षा के आदान-प्रदान के लिए परिवार और समाज रूपी संस्था शायद बाकि की संस्थाओं से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शैक्षणिक संस्थानों में तो विषय विशेष की शिक्षा का ही प्रयोजन होता है जिसके कारण उनकी उपयोगिता का दायरा अंक और डिग्री हासिल कर जीविका का साधन जुटाने तक के लिए ही सीमित रह जाती है। इसके विपरीत पारिवारिक, सामाजिक और व्यवहारिक संस्थानों में जो शिक्षा हमें प्राप्त होती है या फिर जो शिक्षा हम प्रदान करते हैं वो शिक्षा और उससे मिली सीख जीवन पर्यन्त हमारा साथ देती है। जीविका का साधन जुटाने के लिए शिक्षा हासिल करना गलत नहीं परन्तु इन साधनों को जुटाते हुए संस्कार पीछे छूटने लगें तो फिर ऐसी शिक्षा और ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर प्रश्न तो खड़े ही होंगे। आज के समय में एक बच्चा शिक्षा अर्जित करके आसानी से चिकित्सक, इंजीनियर, अध्यापक, व्यापारी या उद्योगपति आदि तो बन जाता है पर प्रश्न उठता है कि क्या जीवन का उद्देश्य यहीं तक सीमित था और क्या शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण हुआ।

पारिवारिक संस्था की भूमिका सबसे अहम

हमारे वहां वेदों में माता को प्रथम और पिता को द्वितीय गुरु कहा गया है, अर्थात वेदों के अनुसार शिक्षक की भूमिका के लिए प्राथमिक जिम्मेदारी माता-पिता की ही तय की गई है। स्पष्ट है कि संस्कार युक्त शिक्षा को प्रदान करने के लिए पारिवारिक संस्था की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और स्कूल या कॉलेज जैसी संस्थाओं का नंबर परिवार के बाद आता है। ऐसे में आज यदि बच्चों से लेकर वयस्कों तक में संस्कार और उसके साथ ही अनुशासन की कमी महसूस की जा रही है तो उसकी प्रमुख वजह है घर-परिवार में दी जाने वाली शिक्षा और संस्कार में कमी। कभी सोचा है आपने कि खूब पढऩे-लिखने के पश्चात और देश की सर्वोच्च प्रतियोगी परीक्षा पास करने के बाद भी कोई प्रशासनिक अधिकारी आखिर क्यों भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाता है। कारण स्पष्ट है, उसकी शिक्षा में पारिवारिक संस्कार को मिश्रित ही नहीं किया गया। आज देश में इस प्रकार की अनेकों चुनौतियाँ हैं और उन सबका निदान सिर्फ एक ही है। बच्चे में शिक्षा के साथ संस्कार की भी नींव डाली जाये। आजकल ढाई-तीन वर्ष की उम्र से ही बच्चे को स्कूल भेजकर परिवार को लगता है कि जिम्मेदारी पूर्ण हुई, जबकि परिवार के लोग यह भूल जाते हैं कि स्कूलों में तो बच्चे को अक्षर ज्ञान तो मिल जायेगा परन्तु व्यावहारिक ज्ञान देने की जिम्मेदारी तो परिवार की ही है, इसलिए बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए हर परिवार को अपनी भूमिका के प्रति सजग होना पड़ेगा। माता-पिता भले ही अनपढ़ क्यों हों। शिक्षा और संस्कार देने की जो क्षमता उनमें है वो दुनियां के किसी भी स्कूल में नहीं।

माता-पिता की शिक्षा भी है आवश्यक

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बच्चे में जैसे ही थोड़ी सी समझ उत्पन्न होती है। माता-पिता द्वारा उसे प्ले स्कूल में डाल देने का चलन चल निकला है। अंग्रेजी माध्यम के मिशनरी स्कूल और उनकी देखा देखी अन्य स्कूल भी माता-पिता की इस मानसिकता का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। तमाम पापड़ बेलने और धन खर्च करने के पश्चात किसी प्रकार हम अपने बच्चों का प्रवेश ऐसे स्कूलों में करवा देते हैं बिना यह सोचे कि ऐसे संस्थान हमारे बच्चों को शिक्षा के नाम पर क्या प्रदान करने वाले हैं। कहने को इनके प्ले स्कूल, नर्सरी आदि कक्षाओं में बच्चों को खेल-खेल में पढऩा सिखाया जाता है परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है जिससे कोई भी अंजान नहीं। इन स्कूलों में पढक़र बच्चा सुबह उठने के साथ प्रणाम के स्थान पर जब गुड मॉर्निंग बोलने लगता है तो हम खुश होते हैं कि हमारा बच्चा स्मार्ट हो रहा है, इसी प्रकार जब वो मां को मॉम और पिता को डैड बुलाने के साथ घर में बुआ, मौसी, मामी, चाची, ताई के साथ ही साथ पास-पड़ोस की भी सभी महिलाओं को आंटी और साथ ही फूफा, मौसा, मामा, चाचा, ताऊ के साथ आस-पड़ोस के सभी पुरुषों को अंकल बुलाने लगता है तो हम उसकी इस तरक्की पर प्रफुल्लित होते हैं। जबकि अगर गौर कीजिये तो इतना सब कुछ खर्च करके प्ले स्कूल वाली ऐसी शिक्षा व्यवस्था ढेरों संबंधों के बदले में हमारे बच्चों को क्या सिखाया एक आंटी और दूसरा अंकल जबकि यदि हमारा बच्चा घर में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहा होता तो उसको ना जाने कितने संबंधों की जानकारी होती, इसलिए अगर ऐसी शिक्षा व्यवस्था को हम अपने बच्चों पर थोप कर प्रसन्न होते हैं तो शायद आज बच्चों से पहले शिक्षा की आवश्यकता आज के माता-पिता को ज्यादा है।

व्यापक है शिक्षा का अर्थ

इतना तो स्पष्ट है कि शिक्षा का अर्थ अत्यंत व्यापक है यानि यह सिर्फ स्कूलों और पुस्तकों तक सीमित नहीं है। सही मायने में शिक्षा एक सतत सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें प्रयोग की असीमित संभावनाएं हैं क्योंकि इसमें समाज के सभी सदस्यों का योग और सहयोग होता है। बच्चों के मामले में माता-पिता और स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाओं का विशेष योगदान होता है जो ना सिर्फ उन्हें ज्ञानवान ही बनाते हैं बल्कि संस्कारवान भी बनाते हैं, इसीलिए शिक्षा के अर्थ को यदि व्यापक स्वरुप में देखा जाये तो शिक्षा और जीवन एक दूसरे से अलग ना होने वाली दो प्रक्रियाएं हैं जिसमें ज्ञान और संस्कार दोनों का समान मिश्रण होता है। शिक्षा शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में किया गया है। ऋग्वेद यानि की विश्व की प्रथम पुस्तक जिसमें यह बताया गया है कि आतंरिक और वाह्य अज्ञान को दूर करके ज्ञान की ओर अग्रसर होना ही शिक्षा है। ऋग्वेद में ही शिक्षा ग्रहण करने वाले व्यक्ति के लिए ब्रह्मचारिन शब्द का प्रयोग भी किया गया है जिसका अर्थ है शिक्षार्थी या विद्यार्थी। इसमें यह बताया गया है कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ  किताबी ज्ञान या रटंत विद्या ही नहीं है बल्कि शिक्षा का अर्थ बहुत ही व्यापक है। दरअसल शिक्षा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शिक्षा धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है जानना और शासन करना। इसे इस प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है कि ज्ञान के द्वारा स्वयं के जीवन पर शासन करने को शिक्षा कहते हैं, अर्थात केवल किताबी ज्ञान ही शिक्षा नहीं बल्कि इसका अर्थ व्यापक है। यह ज्ञान परंपरा के साथ ही संस्कार परंपरा की वाहक है और जब परम्पराओं की बात आये तो इसकी शुरुआत तो घर से ही होगी। इसलिए यदि आप अपने बच्चे को किसी स्कूल में प्रवेश दिलवाकर उसकी शिक्षा के प्रति निश्चिन्त हो जाना चाहते हैं तो आप ना सिर्फ स्वयं को भुलावे में रख रहे हैं बल्कि बच्चे के भविष्य के साथ भी छल कर रहे होते हैं।

शिक्षकों की गुणवत्ता

ये पंक्तियाँ लिखने और पढऩे में बहुत अच्छी लगती हैं कि स्कूल शिक्षा का वो मंदिर होता है, जिसमें बच्चा संस्कार, शिष्टाचार नैतिकता का पाठ पढ़ता हैं। शिक्षा के इस दरबार में विद्यार्थियों को किताबी शिक्षा के साथ-साथ एक जिम्मेदार नागरिक बनने के गुर भी सिखाए जाते हैं। पर क्या वास्तव में ऐसा है क्या? क्योंकि मेरा अनुभव तो यही कहता है कि वर्तमान में स्कूल की पढ़ाई का उद्देश्य किसी प्रकार से बच्चे को परीक्षा में अच्छे नंबरों से सफल करवा देना है। उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए किसी संस्थान में प्रवेश के लिए उसे तैयार करना है। आज परीक्षा में अच्छे नंबर की परिभाषा ने शिक्षा और शिक्षण के तौर तरीकों को और भी ज्यादा बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। पहले के जमाने में यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा में प्रथम श्रेणी अर्थात साठ प्रतिशत अंक प्राप्त कर लेता था तो मोहल्ले में मिठाइयाँ बांटी जाती थीं पर आज की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में यदि कोई बच्चा नब्बे प्रतिशत अंक लाता है तो भी वह मायूस रहता है, ऐसे में बच्चों के साथ ही साथ उनके शिक्षकों और स्कूलों पर भी अंकों के खेल को लेकर जबरदस्त दबाव है। सरकारी स्कूल के शिक्षकों को तो वेतन और वेतन में वृद्धि की कुछ ख़ास चिंता नहीं रहती किन्तु प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की रिपोर्ट और वेतन वृद्धि सब कुछ इन्हीं अंकों पर निर्भर होता है। ऐसी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में यदि हम और आप संस्कार ढूंढ रहे हैं तो निराशा तो हाथ लगेगी ही। पिछले कुछ वर्षों से सरकार ने केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा के माध्यम से भी शिक्षकों की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने का प्रयास किया है परन्तु कहना गलत नहीं होगा कि ये परीक्षाएं नौकरी में सफल होने के लिए ही सीमित होकर रह गई हैं। इसलिए इस पर भी बहुत कुछ कहने या लिखने की आवश्यकता नहीं। ऐसे में जब शिक्षक की गुणवत्ता ही सवालों के घेरे में हो तो शिक्षा और शिष्य की गुणवत्ता पर प्रश्न अपने आप ही खड़े होंगे।

हर किरदार की है प्रमुख भूमिका

शिक्षा, शिष्य, शिक्षक या संस्थान पर प्रश्न उठा देने भर से बात नहीं बनेगी क्योंकि शिक्षा के आदान-प्रदान में हर किरदार की भूमिका प्रमुख होती है। यदि शिक्षक और शिष्य की बात करनी है तो उसकी शुरुआत शतपथ ब्राह्मण की सूक्ति ‘‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्याम: मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेद:’’ से ही करनी होगी जिसका अर्थ है कि जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा। इस सूक्ति का अर्थ और इशारा बिलकुल स्पष्ट है कि शिक्षा और संस्कार का कार्य घर से ही प्रारंभ हो जाता है। कहते हैं फल वैसा ही मिलता है, जैसा बोया जाता है। यह बात शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रासंगिक है और यही बात बच्चों के लालन-पालन पर भी लागू होती है। गर्भावस्था से लेकर शिशुवस्था, बाल्यावस्था, किशोरवस्था आदि से गुजर कर बच्चे युवा होते हैं। इस दौरान माता-पिता द्वारा किस प्रकार से बच्चों का लालन-पालन किया जाना चाहिए, इस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इस विषय में आचार्य चाणक्य कहते हैं ‘‘पाँच वर्ष लौं लालिये, दस लौं ताडऩ देइ, सुतहीं सोलह बरस में, मित्र सरसि गनि लेइ" इन पंक्तियों के माध्यम से वे बच्चों को पाँच वर्ष की उम्र प्राप्त करने तक दुलारने और उसके साथ प्रेम भरा बर्ताव करने का उपदेश देते हैं। यह वैसी अवस्था होती है जब बच्चे अबोध होते हैं। किसी चीज का बोध होने के कारण वह कुछ भी ऐसा कर सकता है जिसे गलती की संज्ञा कदापि नहीं दी जा सकती। यह समय सबसे उपयुक्त होता है एक बच्चे के भीतर संस्कार के बीज को रोपने और उसे अंकुरित कराने के लिए। कल तक संयुक्त परिवारों का प्रचलन था, जिनमें माँ-बाप के द्वारा बच्चों को दिए गए संस्कारों में कमी होने पर घर के बड़े-बुजुर्ग उस कमी को पूरा कर देते थे। उस वक्त छोटी-छोटी बातों के माध्यम से बच्चों को संस्कारों का पाठ पढ़ाया जाता था, पर आज चुनौती अलग प्रकार की है। परिवार का आकार घट गया है और माता-पिता के पास बच्चों के साथ बिताने के लिए अतिरिक्त समय नहीं है। जो समय वे देते हैं उसमें तो बच्चे के स्कूल का होमवर्क पूरा हो जाये वही बहुत है। ऐसे में परिवार के हर किरदार को अपनी भूमिका तलाशनी होगी, क्योंकि प्रश्न सिर्फ किसी बच्चे के संस्कार का नहीं बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी से तीसरी पीढ़ी अर्थात् पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कारों को हस्तांतरित करने का भी है। चलते-चलते इतना और कि आपकी शिक्षा आपको कभी किसी के सामने झुकने नहीं देगी और आपके संस्कार आपको कभी किसी की नजरों में गिरने नहीं देंगे। इसलिए जीवन में जब शिक्षा और संस्कार दोनों का समावेश बराबर से होता है तभी जिन्दगी सफल होती है और यही जि़ंदगी का मूल मंत्र भी है।

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