पतंजलि गुरुकुलीय वैदिक शिक्षा प्रणाली अभिनव विश्व का सृजन
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आशा सूर्यवंशी ‘मूळे', सेवासदन, हरिद्वार
वैदिक शिक्षा भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था है, जिसमें वेदों की शिक्षा को सर्वोपरि रखा गया था। इसका उद्देश्य नैतिकता एवं उच्च आचरण का निर्माण करके मानवीय गुणों का पूर्ण विकास करना था। वैदिक शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा था जो गुरुकुलों में गुरु के साथ ही रहकर ही प्राप्त की जाती थी। केवल ज्ञान ढूढऩे की प्रक्रिया का प्रश्रय नहीं था बल्कि संपूर्ण चारित्रिक विकास को मूल में रखकर ये शिक्षा प्रदान की जाती थी। ‘मनुर्भव:’ पवित्रता, नितिमत्ता शील का संवर्धन करने वाली ये गुरुकुलीय शिक्षा को उसके मनुष्यत्व का बोध कराते हुए ‘पूर्णत्व’के अंतिम गन्तव्य तक पहुँचाने का विशाल उद्देश्य रखती थी। शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं अध्यात्मिक आदि समस्त शक्तियों का राष्ट्रीय एकता का विकास कराने वाली गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था ‘मनुष्य निर्माण की’महान पाठशालाएं थीं।
पर दुर्भाग्यवश भारत की इतनी गरिमामय शिक्षा पद्धति मात्र परीक्षा पास करने तथा नौकरी प्राप्त करने के उद्देश्य तक सीमित होकर रह गई। शिक्षा बस ज्यादा से ज्यादा जानकारी एकत्र करना (Information collection) ही रह गयी। मातृभाषा त्याग कर दूसरी भाषा में उपलब्ध जानकारियों को बिना पढ़े बस रट लेना, उन जानकारियों से मात्र दो-चार डिग्रियां हासिल कर अर्थाजन का साधन हासिल करना, आज की शिक्षा व्यवस्था उस निम्न स्तर पर पहुँच गई है। मैकाले की शिक्षा पद्धति के अभिशाप से केवल जानकारी का कचरा बने युवा न चरित्रवान बन सकते हैं, न जीवन में पराक्रम का उद्दीपन कर सकते हैं और न ही मन को प्रशिक्षित कर सकते हैं। दिव्य मनुष्य का निर्माण करने वाली पाठशालाएं बस संवेदन शून्य यंत्रों के निर्माण की उद्योगशालाएं बनकर रह गयी हैं। स्वातंत्र्योत्तर भारत की शिक्षा व्यवस्था में भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की आत्मा धूमिल हो गयी और मात्र प्राणहीन व आत्माहीन ढांचा ही शेष रह गया है।
सच्चे अर्थों में आज भारत को न तो झूठी आस्था के नाम पर झूठ व पाखण्ड की आवश्यकता है और न ही मृदंगवीणा के गजर के साथ किए जाने वाले स्वार्थवादी संकीर्तन की आवश्यकता है, न ही उदासीन निष्क्रीय, कर्महीन पूजा-पाठ की आवश्यकता है, न ही धर्म व जाति के नाम पर सैकड़ों प्रकार के भिन्न-भिन्न आडम्बरों की आवश्यकता है। आज आवश्यकता है- प्रमुखत: तो भारत में जीवंत भगवान द्वारा प्राण प्रतिष्ठित बालकों के जीवन विकास की यशोगाथा रचाने वाले शिक्षा-मंदिरों की। यही सर्वोपरि प्राथमिकता व समय की मांग है। उदात्त वैदिक मंत्रघोष की गर्जना करते हुए उदासीन निष्क्रिय राष्ट्र में पुन: नवचैतन्य भरने वाले परम पूज्य प्रात: स्मरणीय स्वामी जी महाराज एवं परम श्रद्धेय आचार्य जी महाराज ने फिर से भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का प्राण सिंचन करते हुए गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था को पतंजलि योगपीठ से प्रारंभ करके शिक्षा क्रांति का बिगुल बजाया है। पतंजलि गुरुकुलीय वैदिक शिक्षा पूर्णरूप से मनुर्भव: के नींव पर खड़ी है। यहाँ पर बच्चों के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय विकास पर प्रकाश डालते हुए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है, जो शिक्षा का मूल उद्देश्य है। विचार, उद्गार, एवं आचार में सदा पवित्रता ही ब्रह्मचर्य है, जो दिव्य मानव जीवन के निर्माण की नींव है। पतंजलि गुरुकुलम् में इस पर अत्याधिक ध्यान दिया जाता है।
साक्षरता (literate) और शिक्षा (education) मूल अंतर समझते हुए बच्चों को केवल जानकारियों का ढेर न बनाते हुए वह प्रक्ष्य अपने अनुभवों से प्रकृति के सान्निध्य से सीखें इसकी ओर गुरुकुल में ध्यान दिया जाता है। श्री रविन्द्रनाथ टैगोर अपनी शिक्षा विषयक उद्देश्यों में भी लिखते हैं कि बच्चों का कलात्मक विकास जरूरी है, जिसमें संगीत, चित्रकला, साहित्य को प्रमुख रूप से शामिल किया जाना चाहिए। बस उन्हीं का अनुसरण करते हुए बच्चों को विशेष रूप से संगीत आदि के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। रविन्द्रनाथ टैगोर जी का कथन था कि बच्चों को शिक्षा औपचारिक रीति से क्लास रूप में ही दें, ऐसा नहीं उनको पेड़-पौधों के सृष्टि के सान्निध्य में सहज रूप से सिखा सकते हैं। ठीक वैसे ही पतंजलि गुरुकुलम् के सायंकाल में मंत्रोच्चारण के साथ पूरे परिसर में निसर्ग के सान्निध्य में बच्चे भ्रमण करते हैं और फिर शयन की ओर प्रस्थान करते हैं।
श्री अरविंद घोष जी के अनुसार सच्ची शिक्षा मशीन से बना हुआ सूत नहीं होना चाहिए, अपितु मानव के मस्तिष्क तथा आत्मा के शक्तियों का विकास, जीवन का उत्कर्ष होना चाहिए। वास्तविक शिक्षा वह है जो मानव की अंतर्निहीत समस्त शक्तियों को विकसित करके उसे सफल बनाने में सहायक होती है। शिक्षा व्यवहारिक होने के साथ-साथ प्रयोगात्मक भी हो।
मनुष्य में अतंर्निहीत समस्त शक्तियों के सर्वोच्च विकास की सम्भावना का द्वार यदि कोई शास्त्र खोलता है, तो वह ‘योग’ और पतंजलि गुरुकुलम् के बच्चों के जीवन पुष्प हैं। यहाँ के विद्यार्थी बस इसी योग गंगा के अमृतमयी गंगाजल से पुष्पित पल्लवित पोषित होते हैं।
स्वामी विवेकानन्द जी के मतानुसार शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है दिव्यत्व का प्रकटीकरण मनुष्य की भीतर छिपी हुई समस्त अन्भिव्यक्त सुप्त दिव्य शक्तियों का प्रकटीकरण है शिक्षा। बस यही ‘पूर्णत्व’ की प्राप्ति ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है, जो पतंजलि गुरुकुलम् का आधार स्तम्भ है। पूर्णत्व की, दिव्यता की, शिवत्व की प्राप्ति का राजमार्ग है- योग व प्राणायाम। जो यहाँ के बच्चों की आदर्श जीवनशैली है।
बच्चे दिव्य मानव जीवन को प्राप्त हों और दिव्य मानव समाज का स्वर्णिम निर्माण करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करें, ऐसा स्वप्र महामानव स्वामी रामदेव जी महाराज एवं आचार्य जी महाराज इस गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से देखते हैं। यह वटवृक्ष और विस्तारित पुष्पित, पल्लवित विशालकाय होकर अपनी कल्याणमयी काया तले सभी मानवता को लेकर मनुष्य को दिव्य मनुष्यत्व की यात्रा तक पहुँचाए इसके लिए दिन-रात कटिबद्ध हैं। स्वयं में स्थित समष्टि को समाधान के रूप में रखना होता है। स्वयं ही मूल से कटा व्यक्ति समष्टि के लिए समस्या बनकर ही खड़ा होता है। यही कारण है कि गुरुकलों के बच्चों को स्वयं शिक्षा पर भी ज्यादा से ज्यादा ज़ोर देते हैं। शक्ति का सर्वोच्च विकास संयम है। जिसके पाठ गुरुकुलम् में बचपन से ही दिये जा रहे हैं। स्वार्थ के कारण ही मन बहिर्गामी बनता है और इसकी अनमोल शक्तियां जिस तरह बिखरकर क्षीण हो जाती हैं उसी प्रकार मन को संपूर्ण एकाग्र कराते हुए बच्चों को ज्यादा से ज्यादा नि:स्वार्थ, निष्काम, अकाम, अचाह होकर इस लोक और परलोक दोनों में फल लाभ की वासना छोड़ जीना, इस पर ही विशेष ध्यान दिया है। इसे अपने आचरण से संस्कार देने वाले दो बुद्धपुरुष श्रद्धेय स्वामी जी महाराज और श्रद्धेय आचार्य जी महाराज सदा बच्चों के सामने जीवंत उदाहरण के रूप में विद्यमान हैं।
गिरते हुए फल को निमित्त बनाकर न्यूटन ने अपने मन की खोज की। खुद के मन में चल रहे विचार को नये सिरे से विस्तारबद्ध करने के बाद जो हाथ लगा, उसी का नाम ‘गुरुत्वाकर्षण नियम’ रख दिया। वह नियम न उस फल में था, न ही पृथ्वी के केन्द्र में छुपा था। उस नियम का अवचेतन मन में पहुंचना, मन की असीम शक्तियों का समझना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। जो केवल और केवल गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था का केन्द्र है। राई से अतिसूक्ष्म बीज में एकन्द से एकन्द भूमि नापने वाला वटवृक्ष है, जिसका प्रकृतिकरण करने का सामथ्र्य केवल वेद और उपनिषदों में है। वेद व उपनिषदों का अध्ययन करने वाले एक प्रज्ञा संम्पन्न निर्भय जीवन के अधिकारी बनेंगे, जहाँ आजीविका चलाना तो गौण प्राप्ति है।
जीवन समरांगण में सभी जगह आत्मनिर्भरता प्रदान करने वाली वैदिक गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था तथा मात्र दो-चार डिग्रीयां हाथ में थमाकर पग-पग पराधीनता का बोध करने वाली मैकाले प्रणीत शिक्षा व्यवस्था, कहीं भी दोनों की तुलना करना व्यर्थ है।
अर्थार्जन से लेकर मृत्युजयी होने तथा आत्मनिर्भरता देने वाली वैदिक शिक्षा का अमृतप्राशन समय की पुकार है।
पूरी समष्टि एक ही ध्येय की तरफ अग्रसारित हो रही है। हर क्षण वह ध्येय है ‘पूर्णत्व’। भारत की धरा पर ऐसे कुछ स्त्री-पुरुषों ने जन्म लिया जिनको अखिल मानवजाति के पूर्ण प्रगति की पूर्वकल्पना हो गयी थी। जिसको योगी अरविन्द अति मानव चेतना शब्द का उपयोग करते हैं।
युगों-युगों के प्रवास के बाद अखिल मानव जाति जिस पूर्णावस्था तक पहुँचेगी उस पूर्णावस्था को आज, अभी एक ही जीवन में प्राप्त करने वाली आत्मा को नहीं बुद्ध पुरुष-मुक्त पुरुष-जीवन मुक्त पुरुष अवतारी पुरुष कहते हैं। जो हम सबके सामने उपस्थित हैं। परम पूज्य स्वामी महाराज एवं पूज्य आचार्यश्री। हमारा सौभाग्य है कि हम अपनी आँखों से इनका दर्शन कर पा रहे हैं। इन दो बुद्धपुरुषों ने संपूर्ण मानव जाति का जीवन एक ही जीवन में जीया है। इसलिए तो ये हमें ऐसा संदेश निरन्तर देते रहते हैं कि हम सभी को पानी में बहते जाने वाली लकड़ी की तरह जड़ प्रकृति के हाथ का खिलौना बनकर नहीं जीना है। मन के पार चेतना के द्वार ‘पूर्णत्व’ का जीवन प्राप्त करो, ऐसा संदेश इन दोनों बुद्धपुरुषों ने हमें दिया है तथा ‘पूर्णत्व’ प्रदान करने वाली शिक्षा प्रणाली का भी निर्माण किया है। पतंजलि गुरुकुलीय वैदिक शिक्षक एक दिव्य शिक्षा प्रणाली है।
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