परम पूज्य योगऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य ...
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१. ईश्वर के होने का प्रमाण : पूरी दुनियां, विचारधारा या सिद्धान्त के आधार पर दो भागों में बटी है, एक आस्तिक-दूसरा नास्तिक। आस्तिकों की भी मुख्य रूप से दो श्रेणियां हैं, एक ईश्वर को मानना तथा ईश्वर के विधान, वेदाज्ञा या ईश्वरीय प्ररेणा के अनुरुप ही आचरण करना या जीना। दूसरे ऐसे लोग हैं जो ईश्वर को पारिवारिक पृष्ठभूमि, प्रशिक्षण, किसी विशेष वातावरण, किसी विशेष घटना, स्वार्थ, अनुभूति और कई बार तो देखा-देखी के कारण मानते तो हैं लेकिन आचरण या जीवन में कोई दिव्यता, प्रामाणिकता या विशेषता नहीं होती है, ऐसे लोगों को हम मनमानी करने वाले, मनमौजी या सुविधा भोगी या अवसरवादी कह सकते हैं। भगवान्, ईश्वर, खुदा, अल्लाह, गोड या ऑलमाइटी को मानने वालो का एक ऐसा समूह भी होता है, जो भगवान् व धर्म के नाम पर कई प्रकार की हिंसा, क्रूरता, युद्ध, धर्मान्तरण एवं आतंकवाद जैसे घृणित काम भी करता है। इसी प्रकार भगवान् को न मानने वालों की भी मुख्य दो शाखाएँ या श्रेणियां हैं एक नास्तिकों को वह वर्ग है जिसमें बहुत से वैज्ञानिक, प्रकृतिवादी, नैतिकतावादी, मानवतावादी यहाँ तक की कुछ राष्ट्रवादी भी लोग होते हैं जो एक अतीन्द्रिय सत्ता के रूप में भगवान् को तो नहीं मानते परन्तु एक वैश्विक विधान (यूनिवर्सल लॉ) को मानते हैं, पूर्ण संयमी, सदाचारी, अहिंसा, सत्य, न्याय, पुरुषार्थ एवं पवित्रादि सत्य सिद्धान्तों को मानते हैं तथा पूरी ईमानदारी से जीवन को सुखपूर्वक जीते हैं तथा सबकी समृद्धि, खुशहाली, सुख, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सभ्यता आदि की चिन्ता करते हैं। दूसरे ऐसे लोग हैं जो भगवान् को न मानने के साथ-साथ किसी भी मर्यादा, मूल्य, सिद्धान्त या आदर्श आदि को नहीं मानते, पूर्णत: स्वार्थपरता, नशा, हिंसा, क्रूरता, झूठ, बेईमानी, दुराचार, व्यभिचार और कई बार तो पशुओं से भी बत्तर व्यवहार करते हैं, पूर्णत: स्वयं पर केन्द्रित होते हैं समष्टि के प्रति अपने उत्तरदायित्व के प्रति गंभीर नहीं होते है, अज्ञान एवं अहंकार के इतने शिकार या ग्रस्त होते हैं कि किसी सत्य या परम सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार ही नहीं होते। स्वयं के सुख, सुविधा, आजादी के अविवेकपूर्ण दुराग्रह, दुर्विचार, दुर्भावना,दुर्गुण, दोषों, दुर्बलताओं से इतने पीडि़त, बीमार या लाचार होते हैं कि अन्यों के सुख, सुविधा, अधिकार या आजादी की परवाह ही नहीं करते, पूर्ण अराजकतावादी विकृत सोच के शिकार हो जाते हैं।
निष्कर्ष के रुप में सच्चे आस्तिक या अध्यात्मवादी तथा सच्चे नास्तिक लेकिन पूर्णत: मानवतावादी, विवेकशील आदर्श जीवन न जीने वालों से कोई समस्या नहीं है। सारे अपराध, फसाद या नर्क का कारण दोनों ही विचारधाराओं में ये दूसरा गैंग है। इनका नास्तिक रूप से किसी भी विचारधारा, सिद्धान्त या आदर्शों से कोई लेना-देना नहीं, व्यवहारिक रूप से एक बार हम सोच भी लें कि भाई ईश्वर को मानना या न मानना एक बात है, सत्य को तो मानो, मानवता को तो मानो। एकता, समानता, न्याय, प्रेम, करुणा, सेवा, सद्भावना, एकत्व, सहअस्तित्व, विश्व बन्धुत्व, विश्व शांति, विश्व एकता, वैयक्तिक एवं वैश्विक उत्तरदायित्व को मानना ही पड़ेगा, चाहे तो मान लें नहीं तो देश एवं दुनियां में न्याय के नाम पर बने कानूनों को मानना पड़ेगा, नहीं तो सजा या दण्ड भोगना पड़ेगा। कर्मफल व्यवस्था या न्याय व्यवस्था से तो कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह आस्तिक हो या फिर नास्तिक।
आस्तिकता इस अस्तित्व का एक अकाट्य सत्य है, यद्यपि यह विषय बहुत ही गंभीर एवं बहुत बड़ा है फिर भी संक्षेप में शरीर की एक-एक कोशिका एवं हमारा पूरा व्यक्तित्व साथ ही पिण्ड की तरह ही ब्रह्मांड का एक-एक परमाणु व सम्पूर्ण अस्तित्व, एक सर्वोच्च विराट् महान् व्यवस्था, रचना एवं उसका संचालन एक रचयिता, संचालक या व्यवस्थापक स्वत: प्रमाण है। दूसरा मनुष्य में यद्यपि असीम ज्ञान, संवेदना, सामर्थ्य एवं रचना धर्मिता है फिर भी शरीर की एक कोशिका से लेकर ब्रह्माण्ड का एक अतिसूक्ष्म क्वार्क या एक भी एटम, बीज या कोई भी नई रचना मनुष्य नहीं कर सकता, इसका मतलब ही है इंसान के ऊपर भगवान् नाम की एक महान् सत्ता है। तीसरी बात आत्मा, मस्तिष्क या हृदय में स्वाभाविक रूप से उठने वालो ज्ञान, प्रेरणाएं, संदेश, निर्देश या अतीन्द्रिय संवेदनाएं भगवान् की दिव्य सत्ता या उपस्थिति का प्रमाण हैं।
२. स्वकर्म, स्वधर्म, राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म, मानव धर्म अर्थात् कर्म एवं धर्म के नाम पर भी बहुत भ्रम है इस सन्दर्भ में।
३. छोटे-छोटे व्रतों एवं संकल्पों से जीवन एवं जगत् में कैसा एक महान् क्रान्तिकारी दिव्य रूपान्तरण या परिवर्तन हो सकता है ये योग संदेश के अगले अंक में लिखेंगे।
स्वामी रामदेव
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01 Mar 2025 17:58:05
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