प्रतिशोध व विरोध की आग व हिंसा कैसे रूकेगी?

प्रतिशोध व विरोध की आग व हिंसा कैसे रूकेगी?

आचार्य बालकृष्ण

        यदि हम एक श्रेष्ठतम जीवन एवं श्रेष्ठतम समाज राष्ट्र विश्व बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें शिक्षा अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा सकारात्मक, गुणात्मक, सात्त्विक, न्यायपूर्ण वैज्ञानिक परिवर्तन करना ही होगा, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
  विचारों, भावनाओं एवं कर्मों की एकता, समानता, पवित्रता एवं प्रीति से समाज में सुख, समृद्धि, शान्ति एवं सर्वविध न्याय की प्रतिष्ठा होती है और इसके विपरीत होने से दु:, दरिद्रता, अशान्ति एवं अन्याय बढ़ता है। विचार, संवेदना एवं कर्मों की विविधता समाज एवं समष्टि की आवश्यकता एवं स्वभाविक प्रक्रिया है। परन्तु यह विविधता यदि वैर, विरोध, घृणा, हिंसा, क्रूरता आतंक एवं अराजकता का रूप ले ले तो विध्वंसक या विनाशकारी हो जाती है। किसी भी संदर्भ में समर्थन या विरोध का मूल आधार विचार होता है। यह विचार ही विचारधारा में बदल जाता है। यही विचारधारा की धारा या प्रवाह क्रान्ति, आन्दोलन, युद्ध और कई बार विनाश का कारण बन जाती है। इस विचार या विचारधारा की विविधता के क्षेत्रों को हम यदि विभाजित करते हैं तो इसके सभी पहलुओं की अच्छाई तक पहुँच पायेंगे।
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक विचारधारा के ये प्रमुख पांच मूल घटक पहलु या क्षेत्र हैं। विचारधारा की विविधता का विस्तार है यह सारा संसार। दुर्भाग्य से सभी तरह का धार्मिक राजनैतिक बंटवारा ध्रुवीकरण इस विभाजन का नेतृत्व करता है। इसलिए किसी भी समाज राष्ट्र में धर्मसत्ता एवं राजसत्ता की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण होती है उसकी प्रगति या दुर्गति में अपनी सुविधा, स्वार्थ, लाभ-हानि, सत्ता, साम्राज्य, हठ, दुराग्रह, अज्ञान एवं अहंकार आदि का त्याग करके यदि तर्क, तथ्य, युक्ति, प्रमाण, आदि की वैज्ञानिक सोच तथा अहिंसा, सत्य, न्याय, समानता, एकत्व, सहअस्तित्व, विश्वबन्धुत्व आदि मानवीय मूल्यों एवं सत्य, स्वाधीनता (आजादी) न्यायपूर्ण आदर्शों सिद्धान्तों को हम अपना लें तो संसार से सभी प्रकार के अज्ञान, दु:, दरिद्रता, हिंसा, वैर, विरोध, विभाजन, भेदभाव, घृणा, नफरत, क्रूरता अन्याय का अन्त हो सकता है।

धार्मिक एकता एवं संघर्ष

यद्यपि पूरा विश्व आस्तिक नास्तिक के नाम से दो खेमों या भागों में बंटा है। लेकिन मैं इसे बंटवारा नहीं मानता क्योंकि धर्म या ईश्वर पर विश्वास, परम्परा, प्रशिक्षण, वातावरण शिक्षा तथा समाज राष्ट्र की राजनैतिक व्यवस्था पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। मेरा स्पष्ट रूप से प्रमाण अनुभव के आधार पर ये मानना है कि आस्तिकता नास्तिकता के दर्शन से कोई बहुत बड़ी व्यवहारिक समस्या नहीं है। क्योंकि दोनों ही दर्शनों को सच्चे या आदर्श रूप में मानने वाले, मानवीय मूल्यों, नैतिकता एवं उच्च सामाजिक आदर्शों वैश्विक प्राकृतिक विधान न्याय को मानते हैं। समस्या तथाकथित धार्मिक आस्तिक तथा झूठे, पाखंडी, अधार्मिक, नास्तिक, पंथनिरपेक्ष, अनीश्वरवादी अनैतिक अमानवीय आचरण व्यवहार करने वालों से है। यदि बाल्यकाल से धर्म एवं ईश्वर के सन्दर्भ, शिक्षा व्यवस्था में विज्ञान यथार्थ के आधार पर प्रशिक्षण दिया जाये तो धर्म एवं ईश्वर के नाम पर समाज, राष्ट्र विश्व में व्याप्त संघर्ष, घृणा, भय, हिंसा, आतंक, भेदभाव अन्य सभी समस्याओं का अन्त हो जायेगा। धर्म का अर्थ हिन्दू, इस्लाम, ईसाईयत, जैन, बौद्ध, सिक्ख या यहूदी आदि हैं ही नहीं, ये सब सम्प्रदाय, पंथ, गुरु परम्परा या सांस्कृतिक रीति-नीतियाँ या अलग-अलग कालखंड में विकसित सभ्यताएँ या जीवन शैली, आस्थाएँ, विश्वास पूर्वजों की विरासत हैं। इन सबका हमें सम्मान करना ही चाहिए या करना ही होगा, लेकिन इसमें किसी भी कारण से पंथ को ठीक से समझने या उसकी ठीक-ठीक व्याख्या करने के कारण जो यह विवाद, संघर्ष या संकीर्णता पैदा हुई है कि मेरा ही पंथ सर्वश्रेष्ठ है, सबको मेरे ही पंथ में आना चाहिए इसी से सब सभ्य सुखी होंगे, इसी से सब का कल्याण होगा, ये भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए। साथ ही पंथो के धार्मिक ग्रन्थों में यदि कोई अवैज्ञानिक, अतार्किक, न्याय, समानता, एकत्व, सहअस्तित्व, विश्वबन्धुत्व आदि सिद्धान्तों के विरुद्ध बात है तो उस पंथ के शीर्ष नेतृत्व को उस सन्दर्भ में उचित समाधान खोजना चाहिए। यद्यपि यह अत्यन्त साहसिक कार्य है लेकिन ये करना ही चाहिए, क्योंकि दूसरे यदि ये कमियां बताते हैं तो समाज राष्ट्र एवं विश्व में बैर, विरोध, हिंसा, तनाव संघर्षादि पैदा होने की पूरी संभावना है, धर्म का यथार्थ अर्थ है- श्रेष्ठ आचरण, सबके साथ पूर्णप्रीति, समानता, एकता, न्याय, एकत्व, सहअस्तित्व विश्वबन्धुत्वादि उच्च आदर्श, नैतिक मूल्य एवं श्रेष्ठ सिद्धान्त मानवीय मूल्य आदि जो भी आज सभ्य समाज, विश्वशान्ति के लिए मानता है ये सभी धर्म की ही श्रेणी में आते हैं।
   धर्म एक शाश्वत, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वहितकारी, नैसर्गिक, व्यवहारिक पारमार्थिक सत्य है। भिन्न-भिन्न प्रतीक उपासना पद्धतियाँ- ये साम्प्रदायिक परम्पराएँ हैं। इस विविधता को हमें सृष्टि के सौन्दर्य अपने महान् पूर्वजों के प्रति गौरव कृतज्ञता के रूप में देखना चाहिए। धर्म एवं पंथ या सम्प्रदाय की ठीक-ठीक समझ तथा साथ ही स्वधर्मनिष्ठा, परधर्म प्रीति, सहिष्णुता एवं सह-अस्तित्व के अनुरूप हमें जीना चाहिए।
धर्म एक शाश्वत, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वहितकारी, नैसर्गिक, व्यवहारिक पारमार्थिक सत्य है। भिन्न-भिन्न प्रतीक उपासना पद्धतियाँ- ये साम्प्रदायिक परम्पराएँ हैं। इस विविधता को हमें सृष्टि के सौन्दर्य अपने महान् पूर्वजों के प्रति गौरव कृतज्ञता के रूप में देखना चाहिए। धर्म एवं पंथ या सम्प्रदाय की ठीक-ठीक समझ तथा साथ ही स्वधर्मनिष्ठा, परधर्म प्रीति, सहिष्णुता एवं सह-अस्तित्व के अनुरूप हमें जीना चाहिए।
अपने अपने सम्प्रदाय, मत, पंथ या गुरु परम्परा के प्रचार-प्रसार विस्तार में अन्यों के प्रति घृणा या नफरत, भेदभाव, निकृष्टता का भाव नहीं होना चाहिए। मैं तथा मेरा पंथ ही सर्वश्रेष्ठ है, शेष सभी निकृष्ट या हीन हैं। यह विचार तथ्य या बात ठीक नहीं है। मैं भी श्रेष्ठ या सर्वश्रेष्ठ हूँ तथा सभी श्रेष्ठ या सर्वश्रेष्ठ हैं यह विचार या सिद्धान्त ही वैज्ञानिक व्यवहारिक यथार्थ सत्य है। पंथ के आधार पर व्यक्ति की श्रेष्ठता, योग्यता, महानता, मुक्ति, सफलता या अन्य किसी भी प्रकार के मूल्यांकन को हम न्यायोचित नहीं ठहरा सकते। धर्म, आध्यात्मिकता या आध्यात्मिक मूल्य सभी पंथों में एक समान हैं, या सभी पंथों की एकता प्रेम का आधार है तथा इनकी विविधता सौन्दर्य, सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक तथ्य है। सभी धर्म या पंथों के मूलतत्व लगभग एक हैं, मूल प्रमाण भी लगभग एक जैसे हैं, व्याख्याएँ दार्शनिक मान्यताएँ भिन्न होते हुए भी अथवा सिद्धान्तों में भिन्नता होते हुए भी साधन एक जैसा है।

राजनैतिक पक्ष-विपक्ष के संदर्भ में निष्पक्ष चिन्तन

जैसे धार्मिक आध्यात्मिक या साम्प्रदायिक क्षेत्र में विभिन्न सम्प्रदाय परम्परा या पंथ है और लगभग कुछ दार्शनिक भिन्नता या सिद्धान्त भेद होते हुए भी साधन की भिन्नता नहीं है। वैसे ही राजनैतिक दलों की भी दार्शनिक या वैचारिक मान्यताओं विचारधाराओं या सिद्धान्तों के भेद होते हुए भी सबके साधन या साध्य लगभग एक जैसे हैं, जैसे धार्मिक जीवन का साधन साध्य, जीवन या आचरण की पवित्रता तथा दृष्ट अदृष्ट सत्यों में समान विश्वास, निष्ठा अपने से ऊपर एक महान् अदृश्य सत्ता व्यवस्था की स्वीकार्यता है। वैसे ही राजनीति का भी साधन-साध्य, लक्ष्य, ध्येय या मुख्य प्रयोजन समाज राष्ट्र का सर्वविध विकास, सबकी सुख, समृद्धि, खुशहाली, सबकी राष्ट्र की सुरक्षा, मूलभूत सुविधाएँ संसाधन- रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, सडक़, यातायात, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि बिना भेदभाव के उपलब्ध कराना, सार्वजनिक लोक कल्याण के कार्य करना, सबको न्याय, सबको न्यायपूर्ण आजादी, राष्ट्रीय संसाधनो का न्यायपूर्ण उपयोग, वितरण, सबकी साझेदारी भागीदारी से देश चलाना।
सही नीयत से सही नीतियाँ बनानासही नेतृत्व देश को देना, देश के बारे में 100-200-500 वर्षों के भविष्य के बारे में सोचकर नीतियाँ बनाना बड़े निर्णय करना आदि राजनीति के बड़े साधन साध्य हैं। ईमानदारी से देश को सही दिशा में सर्वांगीण प्रगतिशीलता के मार्ग पर ले जाने के लिए पुरुषार्थ की पराकाष्ठा के साथ जीना। राजनैतिक दलों में जो मुख्य भेद मुझे देश पूरी दुनियाँ में दिखता है, वह कुछ तो सामान्य रूप से दार्शनिक तौर पर तथा कुछ प्राथमिकताओं के तौर पर दिखता है। मैंने यू.के., यूरोप, यू.एस.., आस्ट्रेलिया, जापान इजराइल आदि अनेक दुनिया के देशों भारत की जो राजनैतिक व्यवस्था देखी है उसमें यही बात दिखती है। कोई थोड़े उदारवादी हैं, तो कुछ थोड़े संकीर्ण हैं। कुछ कॉरपोरेट को प्राथमिकता देते हैं तो कुछ लेबर को, कुछ खेती, व्यापार को, कुछ शिक्षा को, स्वास्थ्य को तो कुछ अनुसंधान को, कुछ सरकारी नियंत्रण को, तो कुछ सार्वजनिक नियंत्रण को अर्थात् बाजारवादी अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देते हैं। प्राथमिकताओं के निर्धारण का आधार मुख्य रूप से उस देश की आबादी की संख्या, आवश्यकता जन भावनाएँ, वैश्विक परिप्रेक्ष्य, व्यापक जनमानस की सामूहिक चेतना जागरूकता आदि पर निर्भर करता है।
अत: राजनैतिक दलों को एक दूसरे दलों के प्रति वैर, विरोध, हिंसा, घृणा, क्रूरता विनाश की भावना का त्याग करके अमेरिका, यूरोप, यू.के. आस्टे्रलिया जैसे देशों की तरह अपनी नीतियाँ, प्राथमिकताएँ एवं उनके पूरी ईमानदारी पूरे पूरुषार्थ के साथ उनके क्रियान्वयन की बात करनी चाहिए।
धार्मिक वैर-विरोध की तरह ही राजनैतिक वैर विरोध हिंसा आदि, किसी भी राष्ट्र के लिए किसी भी प्रकार से उचित नहीं हैं। ऐसी आदर्श राजनीति ही होनी चाहिए। राजसत्ता धर्मसत्ता यदि इन उच्च आदर्शों, मूल्यों या सिद्धान्तों का निर्वहन करें तो समाज, राष्ट्र विश्व बहुत ही सुखी, समृद्ध, शांत रहेगा। ऐसी अहिंसक, सात्त्विक, वैज्ञानिक, तार्किक, व्यवहारिक, सार्वभौमिक, न्यायपूर्ण, दिव्य राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक आदि व्यवस्था समाज, राष्ट्र संसार में हो जाएँ तो यह दुनिया बहुत सुन्दर, सुखी सच्चे अर्थों में परमवैभवशाली स्वस्थ, समृद्ध स्वर्ग जैसी होगी। ऐसा ही होगा, लेकिन कुछ बुरे लोग हैं। राजसत्ता धर्म सत्ताएँ विविध प्रकार के षड्यन्त्र, भय, भ्रम, भ्रांतियाँ अफवाहें आदि फैलाकर समाज को बांटकर, उनमें घृणा भरकर एक गुप्त रहस्यमय स्वार्थपूर्ण घटिया एजेन्डा के तहत अभी समाज, राष्ट्र विश्व के लिए एक बड़ी विकट समस्या, चुनौती संकट बने हुए हैं।
निष्कर्ष के रूप में हम कुछ बड़े निर्णयों पर पहुँचते हैं कि हम राष्ट्रवादी, अध्यात्मवादी, सत्यवादी, सिद्धान्तवादी मानवतावादी बनें। उग्रवादी, आतंकवादी, हिंसावादी, मिथ्यावादी आदि नहीं बनें। समग्रता, संतुलन, न्याय, अभ्युदय, नि:श्रेयस, प्रकृतिधर्म अन्तत: भागवत धर्म को प्रामाणिकता के साथ निभाने वाले बनें। स्वयं से समष्टि तक हमारी दृष्टि एवं कृति में दिव्यता हो। मनुष्य के लिए विकास तो होना ही चाहिए साथ ही मनुष्य का भी विकास हो। सम्यकमति, सम्यकभक्ति, सम्यककृति प्रकृति से दिव्य संस्कृति सात्त्विक अहिंसक प्रगति के सोपान चढ़े, शिखर आरोहण पाएँ और व्यष्टि समष्टि को दुर्गति से बचाएँ। सबके धर्म, अर्थ, काम मोक्ष की सिद्धि का यही एकमात्र उपाय है। मोक्ष का तात्पर्य दुर्विचार, दुर्भावना, दुष्कर्म, दुर्गुण, दोष, समस्त दुर्बलताओं एवं समस्त प्रकार के दु:खों से मुक्त तथा समस्त प्रकार की दिव्यताओं से युक्त होना है। जीवन के सभी क्षेत्रों, पहलुओं एवं घटकों में स्थूल एवं सूक्ष्म बहुत प्रकार का अज्ञान एवं अज्ञानजनित दोषों एवं दुर्बलताओं से ही संसार में विविध प्रकार के दु:, दरिद्रता, हिंसा, संघर्ष, युद्ध, विध्वंस एवं अन्याय आदि है। अत: एक विवेकशील एवं  प्रगतिशील व्यक्ति, समाज, राष्ट्र विश्व के निर्माण हेतु आदर्श शिक्षा व्यवस्था तथा अज्ञान, अंधकार, पाखंड, अंधविश्वास एवं भ्रान्ति से मुक्त समाज का निर्माण नितान्त आवश्यक है।
  अर्थ का अध्यात्मिक दर्शन- हमारा ज्ञान, कुशलता एवं सम्पूर्ण सामर्थ्य सेवा के लिए है। भौतिक रूप से अर्थ, पूंजी, सम्पत्ति समृद्धि एवं विकास के कई मॉडल देश दुनिया में हैं। अध्यात्मवाद (अर्थ से परमार्थ), समाजवाद, साम्यवाद एवं पूंजीवाद- ये चार प्रमुख दर्शन हैं। सात्त्विक, राजसिक तामसिक- ये तीन प्रकार की वृत्तियाँ हैं, अर्थ व्यवस्था में अहिसंक हिंसक ये दो विकास की मुख्यधाराएँ हैं।

अर्थ शिक्षा व्यवस्था

अर्थ का अध्यात्मिक दर्शन है- हमारा ज्ञान, कुशलता एवं सम्पूर्ण सामर्थ्य सेवा के लिए है। भौतिक रूप से अर्थ, पूंजी, सम्पत्ति समृद्धि एवं विकास के कई मॉडल देश दुनिया में हैं। अध्यात्मवाद (अर्थ से परमार्थ), समाजवाद, साम्यवाद एवं पूंजीवाद- ये चार प्रमुख दर्शन हैं। सात्त्विक, राजसिक तामसिक- ये तीन प्रकार की वृत्तियाँ हैं, अर्थ व्यवस्था में अहिसंक हिंसक ये दो विकास की मुख्यधाराएँ हैं। हिंसक खेती, जिसमें विविध जहरीले पदार्थों का प्रयोग है, अहिंसक खेती जो कुदरती या नैसर्गिक है। हिंसक व्यापार, व्यवसाय जिसमें नशा, मांसाहार, हथियार एवं किसी भी जड़-चेतन जीवमात्र के साथ क्रूरता, अन्यायादि किया जाता है तथा अहिंसक व्यापार या समृद्धि, जिसमें मनुष्य एवं मनुष्येतर जड़-चेतन जीव जगत् किसी के भी साथ, किसी भी प्रकार का अन्याय, हिंसा, क्रूरता दु:खादि देने का व्यवहार नहीं होता है, अपितु सबकी सर्वाधिक सुख समृद्धि होती है। ऐसे समग्र, स्थाई, सात्त्विक, बाह्य आन्तरिक विकास को अहिंसक विकास कहते हैं। इसी प्रकार शिक्षा में आहार, विचार, वाणी, व्यवहार स्वभाव के स्तर पर जैसा सिखाया जाता है, समाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, वैयक्तिक, पारिवारिक वैश्विक सन्दर्भों या विषयों के बारे में जो पढ़ाया जाता है अथवा बौद्धिक व्यवहारिक रूप से जो प्रशिक्षण दिया जाता है, जैसा वातावरण प्रशिक्षक होता है, वैसे ही सभी विषयों में व्यक्ति की प्रारम्भिक समझ विकसित होती है। शिक्षा, चिकित्सा, भाषा, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, विज्ञान, तकनीकी, जीवन विज्ञान, कुशलताएँ, आजीविका, दृष्ट-अदृष्ट भौतिक आध्यात्मिक सत्य, जीवन का सामान्य-विशेष प्रयोजन उत्तरदायित्व, सामान्य सत्य, शाश्वत सत्य, भौतिक आध्यात्मिक समृद्धि आदि सभी विषयों में जैसा हमारा प्रशिक्षण होता है तथा जैसे वातावरण समाज के बीच हमारी परवरिश होती है, मनुष्य का सभी सन्दर्भों में वैसा ही विचार, चिंतन, विचारधारादि का निर्माण होता जाता है।
अत: यदि हम एक श्रेष्ठतम जीवन एवं श्रेष्ठतम समाज राष्ट्र विश्व बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें शिक्षा अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा सकारात्मक, गुणात्मक, सात्त्विक, न्यायपूर्ण वैज्ञानिक परिवर्तन करना ही होगा, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है। सभी प्रकार की व्यवस्था में चार व्यवस्थाएँ सर्वोच्च हैं- एक राजनैतिक दूसरी धार्मिक या आध्यात्मिक, तीसरी शिक्षा व्यवस्था एवं चौथी अर्थ व्यवस्था।
इनमें ये आज के राष्ट्रीय वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, क्योंकि सब प्रकार की नीतियों के निर्धारण का सर्वोच्च केन्द्र राजनैतिक व्यवस्था है। राजसत्ता या व्यवस्था अथवा राजनैतिक नेतृत्व भी समाज राष्ट्र की सभी प्रकार की परिस्थितियों मन:स्थितियों की सामूहिक अभिव्यक्ति हैं। फिर भी राजसत्ता आज की व्यवस्था में सर्वोपरि है और यह सभी प्रकार की शक्ति का सर्वोच्च केन्द्र भी है, अत: राजसत्ता का सात्त्विक होना नितान्त आवश्यक है। तथापि धर्मसत्ता, अर्थव्यवस्था एवं शिक्षा व्यवस्था की ताकत को भी किसी भी प्रकार से न्यून करके नहीं आँका जा सकता है। जहाँ तक भारत की वर्तमान, स्थिति की बात है, सभी व्यवस्थाएँ काफी परिपक्व हो चुकी हैं। कोई भी राजनैतिक दल यहाँ की धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था के ताने-बाने या तन्त्र को बहुत अधिक हिला नहीं सकता, फिर भी किसी भी प्रकार का नीतिगत छोटा या बड़ा परिवर्तन माने रिफोर्म या चेंज करने का संवैधानिक अधिकार केवल राजसत्ता को ही है। फिर भी दीर्घकाल तक यदि धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में गंभीरता, प्रामाणिकता एवं दूरदर्शिता के साथ काम किया जाए तो बहुत बड़ा परिवर्तन सभी दिशाओं में किया जा सकता है और गैर राजनैतिक रह करके भी राजनीति पर एक बहुत बड़ा सात्त्विक अंकुश भी रखा जा सकता है तथा बड़े राजनैतिक परिवर्तन राजनैतिक नेतृत्व को तैयार किया जा सकता है। कोई भी बड़ा परिवर्तन कभी भी भीड़ के द्वारा नहीं होता अपितु एक बहुत बड़े व्यक्तित्व के द्वारा होता है। इसीलिए व्यक्ति निर्माण, चरित्र निर्माण राष्ट्र निर्माण एवं युग निर्माण का मूल आधार है एक श्रेष्ठ मानव का निर्माण और यह दुनिया का सबसे कठिन सबसे श्रेष्ठ कार्य है। आइए! हम सब मिलकर इस दिशा में कार्य करें और देश को अराजकता, हिंसा, घृणा, प्रतिशोध एवं विध्वंस से बचाएँ।

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