उस प्रभु की महिमा

उस प्रभु की महिमा

साध्वी देवमेधा 

वैदिक कन्या गुरुकुलम्

इस संसार के ज्यादा से ज्यादा मनुष्य प्रतिदिन अपना अनमोल समय ऐसे ही जाने देते है, बेहोशी में जीते रहते हैं। अपने परिवार के साथ, अपने मित्रों के साथ, सगे-सम्बन्धियों के साथ समाज में रहने वाले तमाम व्यक्तियों के साथ, लेकिन कभी थोड़ी देर के लिए, केवल कुछ पल के लिए हम ध्यान दें कि इस प्रकृति तथा संसार में जो चल रहा है, वह पूर्ण व्यवस्थित, पूर्ण सामञ्जस्य को स्थापित किए हुए है।
कौन हे इसका चालक, नियन्ता, उत्पत्तिकर्ता और अन्त में  सब कुछ अपने में समाहित करने वाला, प्रलय करने वाला, प्रत्येक जीवों को देख-रेख हर प्रहर कर रहा है। मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी जो ग्रह, नक्षत्र , जाने कितने सूर्य चन्द्र को थामे रखा है, हमारे लिए जिसने विश्राम के लिए रात्रि बनाया, परन्तु स्वयं वह क्षण जागता रहता है, सबको देखता रहता है, निहरता रहता है। उसका कोई बालक गिरने लगे, उसको अपने अदृश्य शक्ति से उठा लेता है। उसका कोई साधक अपने लक्ष्य से भटके तो अदृश्य होते हुए भी उसका मार्ग स्वयं बना देता है। कितना नि:स्वार्थ साथी, सखा, मित्र है ये कौन है? ये यही तो है सबका परम सखा परमात्मा हमारे समस्त आर्ष ग्रन्थों में कहीं कहीं उसकी महिमा का वर्णन वेदों से लेकर अन्य दर्शन, पुराण आदि सभी में ईश्वर की चर्चा निहित है।
तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु़ सर्वस्यास्य बाह्यत:।। (ईशा०५)
वह चलता है, वह नहीं चलता है, वह दूर है, वह निकट भी है, वह इस सबके अन्तर मे है, वहीं इस सबके बाहर वर्तमान है।
वह परमेश्वर ही एकमात्र साधको की साधना है। प्रत्येक साधक उसी की उपासना करते है। भीड़ में भी साधक अपने प्रिय सखा परमेश्वर को ही ढूँढता है क्योंकि उसको पता हैं, हर स्थान में प्रभु का वास है उसको महसूस करने का बस एक काम है। जो साधक अपने स्थूल इन्द्रियों से उसका दर्शन करना चाहे तो नहीं हो सकता। उसके लिए सूक्ष्म बुद्धि ही एक साधन है।
एष सर्वेषु भूतेषु गुढात्मा प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:।।
                                                                          (कठो० /१२)
गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण जी अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते है कि -
मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:।।
                                                                     (गीता /)
कई साधक उसको जानने में लगे रहते है पर वह प्रभु जिसका वरण करता है उसे ही अपना तत्वत: स्वरूप का दर्शन कराता है।
प्रभु ने दयावशात् प्रत्येक प्राणियों पर असीम कृपा किए है, लेकिन फिर भी संसार के 90 प्रतिशत लोग इस गुढात्मक रहस्य को जानने का तो प्रयत्न ही नहीं करते, केवल भौतिक साधन प्राप्त करने में ही लगे रहते हैं। जबकि मनुष्य को केवल में नहीं अपितु समग्रता में जीना चाहिए।वैशेषिकदर्शनमें धर्म की व्याख्या करते हुएमहर्षि कणादकहते है-
यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: धर्म:
                                                             (वैशेषिक दर्शन //)
हम यदि किसी भी क्षेत्र में लगते है, तो लगभग लोगों की यही समस्या होती है कि हम फिर एक पक्ष को विशेष महत्त्व देते हैं। दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष जो हमारे जीवन का लक्ष्य उसे गौण कर देते है, चाहे हम विद्या अर्जन कर रहे हैं, चाहे कोई व्यापार कर रहे हो, या फिर कोई अन्य क्रिया में प्रवृत्त हो रहे हो। लेकिन ये सभी कार्य करते हुए भी हमें थोड़ा जागरुक रहना चाहिए। कार्यों को करते हुए प्रभु में अपने चित्त के लगाए रखना, प्रभु में स्मरण बना रहे ऐसे अनुशासित होकर कार्य करना। क्योंकि यदि एक पक्ष को लेकर चलेंगे तो विशेष सन्तुष्टि नहीं मिलेगी, सब कार्यों को समय से पूरा तो करेंगे लेकिन सुख, प्रेम, शान्ति, प्रसन्नता, करुणा, दया, निष्कामता, उदारता आदि तत्वों से अपने को वंचित ही पाएँगे। इसलिए कोई भी कार्य करते हुए यह भाव रखना है प्रभु मैं तेरे लिए कर रहा हूँ, तूने जो कार्य मुझे सौंपा वो तेरा होकर कर रहा हूँ, तुझमें अर्पण करके करुँ, कि तुझसे विमुख पृथक होकर, बल्कि तुझमें अर्पित होकर करुँ।
पराच: कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रवम ध्रुवेष्विह प्रार्थयन्ते।। (कठो० /)
 
प्रभु तुमको ढूढंता हर एक मन है तेरे मिलन की चाह
अब तमन्ना कुछ शेष है,
तु समुन्दर है प्रभु मैं उसकी एक बूंद बन जाऊँ
जैसे सागर में बूंद का पृथक् अस्तित्व है,
मैं मिल जाऊँ तुझमें ऐसे ही यहि चाहता बस यह मन है।
अनचाहे, अदृश्य पथ पर थाम ले अब इस साधक को
जाने कब मुड जाए अविद्या के मोह धाम को,
प्रकाश दे दो इसको,
कहीं चला जाए भीषण अंधकार में।
थाम लें इस बार नहीं, गवां देगा पल इस बार भी।
करूणा कर अपना लेगा नहीं, भटक जाएगा इस बार भी।
पुकार इसकी सुन लो, नहीं तो डूब जायेगा इस बार भी।
साथ अपना दे दो प्रभु, नहीं तो बेसहारा होगा इस बार भी।
कृपा कर दो प्रभु, नहीं तो हारा जायेगा इस बार भी।
बचा ले भीषण आग से (काम, क्रोध, लोभ, मोह),
नहीं तो जल जायेगा इस बार भी।
अब कर दो दया प्रभु, नहीं तो निराश होगा इस बार भी।
अब कर दो दया प्रभु, नहीं तो निराश होगा इस बार भी।

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