भारतीय शिक्षा पद्धति के लिए पाठ्य पुस्तकों में अन्तर्वस्तु
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डॉ. चंद्र बहादुर थापा
वित्त एवं विधि सलाहकार- भारतीय शिक्षा बोर्ड एवं
विधि परामर्शदाता पतंजलि समूह
यथार्थ में, शिक्षा का मतलब ज्ञान अर्जन है। ज्ञान का प्रयोग व्यक्ति और समाज के माध्यम से राष्ट्र और समस्त विश्व सहित सृष्टि के चहुंमुखी विकास, संवर्धन और समृद्धि के लिए होता है। ज्ञान लोगों के भौतिक, बौद्धिक तथा सामाजिक क्रियाकलाप की उपज, संकेतों के रूप में जगत के वस्तुनिष्ठ गुणों और संबंधों, प्राकृतिक और मानवीय तत्वों के बारे में विचारों की अभिव्यक्ति है जो शिक्षा व्यवस्था के द्वारा बालक से वृद्धावस्था तक पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर हस्तांतरण, यथास्थिति अथवा परिशोधन एवं परिवर्धन सहित किया जाता है। जीवन में एक विकल्प या एक सोच रखकर प्रयास करने पर, चहुंमुखी विकास नहीं होता है। जीवन के विकास क्रम में, अनेक विकल्पों, या अनेक प्रकार की सोच को फलीभूत करने के लिए प्रयास करने पर, चहुंमुखी विकास के साथ साथ छोटे-बड़े अनगिनत खुशियां मिलती हैं, जिनको हम अपने सन्तान के भविष्य के लिए श्रुति, स्मृति, अथवा लिखित अलिखित साहित्य अथवा किसी पदार्थ या कागज में उकेर कर छोड़ जाते हैं। अमूमन संतति इनको धरोहर समझ कर संजोते हैं, अपने संतति को बताते हैं, इस प्रकार यह ज्ञान के हस्तांतरण के लिए शिक्षण पद्धति बन जाता है।
प्राचीनकाल में, शिक्षा व्यवस्था के कारण भारत विश्वगुरु कहा जाता था और तत्कालीन शिक्षा को प्रकाशस्रोत, अन्तर्दृष्टि, अन्तर्ज्योति, ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपमाओं से विभूषित किया गया है।
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम: ।।
अर्थात, जिसने अज्ञान रुप अंधकार से अंध लोगों की आँखें ज्ञानांजन रुप शलाका से खोली, उन गुरु को नमन (प्रणाम)। उस युग की यह मान्यता थी कि जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने का साधन प्रकाश है, उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयों और भ्रमों को दूर करने का साधन शिक्षा है। प्राचीन काल में इस बात पर बल दिया गया है कि, शिक्षा व्यक्ति को जीवन का यथार्थ दर्शन कराती है तथा इस योग्य बनाती है कि वह जन्म से मृत्युपर्यन्त धर्म के आधार पर, अर्थ के उपार्जन कर, काम के ऐश्वर्य भोगते हुए, भवसागर की बाधाओं को पार करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर सके, जो कि मानव जीवन का चरम लक्ष्य है।
शिक्षा और ज्ञान
शिक्षा एक संरचित औपचारिक प्रक्रिया है जो ज्ञान अर्जन पद्धति को औपचारिक संस्थानों जैसे स्कूलों और विश्वविद्यालयों, व्यक्ति-आबाल-वृद्ध, के आंतरिक गुणों व शक्तियों को प्रकाशित करती है। शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है, यह मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक निरंतर चलती रहती है । शिक्षा की क्रिया कभी स्थिर नहीं रहती है, क्योंकि यह एक गतिशील क्रिया है, जो लगातार चलती रहती है और मानव विकास में सहायक होती है।
जन्म के समय बालक का मन एक कोरे कागज के समान होता है, जैसे-जैसे बालक बाहरी वातावरण के संपर्क में आता है वैसे-वैसे संवेदना के रूप में वस्तुओं के चिन्ह मस्तिष्क में अंकित होने लगते हैं, इस प्रकार ज्ञान की सामग्री बाहरी वातावरण से आती है। सच्चे ज्ञान की उत्पत्ति बुद्धि से होती है, केवल बुद्धि के द्वारा ही निश्चित, सत्य और सार्वभौमिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, इस प्रकार ज्ञान का संबंध हमारे जन्म से है अर्थात जन्मजात हैं परन्तु ज्ञान की सत्यता या असत्यता की जांच प्रयोगों द्वारा की जाती है। इस प्रकार हमारे पास विचारों, तथ्यों, सिद्धांतों तथा ज्ञान का विस्तृत स्वरूप होता है। चेतन सामग्री की क्षमता को तर्क के द्वारा वास्तविक बनाया जाता है, अनुभव के साथ ज्ञान के उद्देश्य पूर्ण करने के लिए कार्य आरंभ तो कर सकते हैं, किंतु अनुभव स्वयं में ज्ञान नहीं देते हैं। ज्ञान को स्वरूप देने के लिए तर्क की आवश्यकता होती है।
मस्तिष्क की प्रमुख विशेषता में से एक व्यग्रता के साथ-साथ अज्ञानता है, जो सभी प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक विचलनों की वास्तविक जड़ (मूल) है, और अधिकांशत: अच्छाई के बदले बुराई के तरफ प्रेरित करने लगता है, वितृष्णा बढ़ता है और जघन्य कार्यों को कराने लगता है। योग साधना द्वारा मानसिक चंचलता को नियंत्रित कर एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है और बुराइयों की जड़ अज्ञानता को समूल नाश करने की प्रयास किया जाता है। योग साधना में मन केंद्रित करने के लिए कुछ शारीरिक तथा कुछ मानसिक क्रियाएं करवाई जाती है जिससे कोई भी नकारात्मक विचार को शांत किया जा सके और सकारात्मकता की तरफ मोड़ा जा सके।
न्यायमत में ज्ञान दो प्रकार के होते हैं- ‘प्रमा और ‘अप्रमा’। संस्कार मात्र से उत्पन्न होने वाला ज्ञान ‘स्मृति, तथा स्मृति से भिन्न ज्ञान ‘अनुभव’कहा जाता हैं। यह ‘अनुभव’दो प्रकार के होते हैं- यथार्थ अनुभव तथा अयथार्थ अनुभव। जो वस्तु जैसी हो उसका उसी रूप में अनुभव होना यथार्थ अनुभव है (यथाभूतोऽर्थो यस्मिन् स:)। घट का घट रूप में अनुभव होना यथार्थ कहलाएगा। यथार्थ अनुभव की ही दूसरा नाम ‘प्रमा’ हैं। तद्वति तत्प्रकारकानुभव: प्रमा (अर्थात् जो वस्तु जैसी हो उसको उसी प्रकार की ही जानना प्रमा है।) तथा प्रमा से विपरीत अनुभव को ‘अप्रमा’कहते हैं अर्थात् किसी वस्तु में किसी गुण का अनुभव जिसमें वह गुण विद्यमान ही नहीं रहता। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द, प्रमा के अन्तर्गत आते हैं, जबकि स्मृति, संशय, भ्रम तथा तर्क अप्रमा के अन्तर्गत।
मुफ्त शिक्षा का अधिकार
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 16 दिसंबर 1966 को संकल्पित (General Assembly resolution 2200A (XXI), और 3 जनवरी 1976 से लागू प्रस्ताव आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार अंतर्राष्ट्रीय समझौता (International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights), (जिसमें श्रम अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार शामिल है), को जुलाई 2020 तक, भारत सहित 171 देशों ने हस्ताक्षर किये हैं, जिस के अनुच्छेद 13 मुफ्त शिक्षा के लिए सभी के अधिकार को मान्यता देता है (Resolution Article 13 (2) (a) and (b)- प्राथमिक स्तर के लिए मुफ्त, और माध्यमिक और उच्च स्तर के लिए ‘मुफ्त शिक्षा के तरफ कदम बढ़ाने की प्रयास)।
उपरोक्त संकल्प के अनुच्छेद 13.2 में शिक्षा के अधिकार को प्राप्त करने के लिए कई विशिष्ट कदमों की सूची दी गई है, जिनका पालन करने के लिए सहभागी राष्ट्रों में विभिन्न सरकारी गैरसरकारी संस्थाएं, इत्यादि की आवश्यकता होती है। इनमें मुफ्त, सार्वभौमिक और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, विभिन्न रूपों में ‘आमतौर पर उपलब्ध और सुलभ, माध्यमिक शिक्षा (तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण सहित) और समान रूप से सुलभ उच्च शिक्षा का प्रावधान शामिल है । ये सभी बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए उपलब्ध होने चाहिए। सहभागी राष्ट्रों को ऐसे स्कूल प्रणाली विकसित करनी चाहिए (हालांकि यह सार्वजनिक, निजी या मिश्रित हो सकती है), जो वंचित समूहों के लिए छात्रवृत्ति को प्रोत्साहित या प्रदान करते हुए, तत्काल या उत्तरोत्तर सभी स्तरों पर शिक्षा मुफ्त बनाने की आवश्यकता को प्राथमिकता दे, जहाँ ‘प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य और सभी के लिए मुफ्त उपलब्ध होगी, माध्यमिक शिक्षा ‘हर उपयुक्त माध्यम से सभी के लिए आमतौर पर उपलब्ध और सुलभ होगी, और विशेष रूप से मुफ्त शिक्षा के तरफ क्रमश: कदम बढ़ाये और उच्च शिक्षा को सभी के लिए समान रूप से सुलभ बनाया जाएगा (क्षमता के आधार पर, हर उचित माध्यम से, और विशेष रूप से मुफ्त शिक्षा के तरफ क्रमश: कदम बढ़ाते हुए)’।
इसी संकल्प के अनुपालन में भारत सरकार ने भारत की संसद में 4 अगस्त 2009 को शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (Right to Education Act 2009: RTE-2009) को अधिनियमित किया, जो 1 अप्रैल, 2010 को लागू हुआ, और यह 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी देता है।
पुस्तक और पाठ्य पुस्तक
पुस्तक या किताब लिखित या मुद्रित पन्नों के संग्रह को कहते हैं। डिजिटल पुस्तकों को ई-पुस्तक (ई-बुक) कहते हैं जबकि हस्तलिखित पुस्तकों को पांडुलिपियां कहते हैं। एक स्थूल पदार्थ के रूप में पुस्तक सामान्यत: आयताकार पृष्ठों का एक पुलिंदा है जिसे कागज़, पेपिरस, चर्मपत्र या भोजपत्र से निर्मित किया जाता है और जिसे एक ओर से बाँधकर (दायीं या बायीं ओर से) या सीं कर या फिर किसी अन्य माध्यम से एक साथ इस प्रकार से दृढ़ कर दिया जाता है कि उसे सरलता से पढ़ा जा सके। आज पुस्तकें केवल स्थूल रूप में ही उपलब्ध नहीं हैं, बल्कि संचार क्रांति के फलस्वरूप वह ई-पुस्तकों और दूसरे रूपों में भी उपलब्ध हैं। जिस स्थान पर बहुत सी पुस्तकों को व्यवस्थित और क्रमबद्ध ढंग से रखा जाता है, उसे पुस्तकालय कहते हैं।
किसी विषय के ज्ञान को जब एक स्थान पर पुस्तक के रूप में संगठित ढंग से प्रस्तुत किया जाता है तो उसे पाठ्य-पुस्तक की संज्ञा प्रदान की जाती है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में पाठ्यपुस्तक को एक शिक्षण अधिगम सामग्री के पैकेज का भाग माना है एवं कहा है ‘‘पाठ्यपुस्तक एक मार्गदर्शिका के रूप में प्रयोग की जाने वाली सहायक सामग्री है जिससे विद्यार्थी सक्रिय रूप से पाठ, विचारों, वस्तुओं, वातावरण और लोगों से जुड़ता है एवं उनके अन्दर अपनी समझ का निर्माण करता है यह ऐसी चीज नहीं जो ज्ञान को अंतिम उत्पाद के रूप में बच्चों के दिमाग में भरने का काम करें’’।
शिक्षा प्रणाली में पाठ्यपुस्तकों को वही स्थान हासिल है जो कि हमारे धर्मों में पवित्र पुस्तकों का है। यह कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया का प्रारंभ एवं अंत पाठ्य पुस्तक से ही होता है यहाँ तक की विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों का आयोजन शिक्षक विद्यार्थी के बीच अंत क्रिया परीक्षा इत्यादि सभी पाठ्य पुस्तक केन्द्रित है। इसके जरूरत से ज्यादा महत्व के कारण पाठ्य पुस्तक ने एक गौरवशाली और मानक रूपरेखा को अपना लिया है। पाठ्य पुस्तक एक प्रभुत्व का प्रतीक बन गई है जिसे अवमानित करना कठिन है।
शिक्षण विधि
भारतीय परंपरागत शिक्षण प्रक्रिया में पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम को मौखिक विधि का प्रयोग करके मनोरंजक विधि से शिक्षा दी जाती थी। उसके बाद चिन्तन-मनन के लिये कहा जाता था। गुरुजन प्रश्नोत्तर, वाद-विवाद तथा शास्त्रार्थ विधि का भी प्रयोग करते थे। इसके माध्यम से चिन्तन-मनन, निर्णय तथा व्यक्तित्व आदि गुणों का विकास किया जाता था। इस काल में मॉनिटोरियल व्यवस्था भी प्रचलित थी। उच्च कक्षा के छात्र निम्न कक्षा के छात्रों को पढ़ाते थे। इस काल में सरल से कठिन की ओर, ज्ञात से अज्ञात की ओर तथा आगमन एवं निगमन विधियों का भी प्रयोग किया जाता था।
विकट परिस्थिति में गुरु द्वारा शिष्य को सबल और संशय रहित हो कर सही कार्य करने के लिए कैसे शिक्षित-प्रशिक्षित किया जाता था, इसका सजीव उदाहरण श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसमें मानव जीवन के लक्ष्य, अच्छे (दैवी) और बुरे (आसुरी) विपरीत प्रवृत्तियाँ तथा उनके सूचक व्यवहार, दोनों प्रवृत्तियों के प्रभाव और प्रतिफल, शास्त्रविहित ग्राह्य और त्याज्य व्यवहार, इत्यादि (जो आबाल-बृद्ध पर लागु होता है), को अत्यंत सुरम्य और सरल तरीके से वर्णन किया है। पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम में क्या निहित होना चाहिए? ताकि एक मानव को सही मायने में स्वावलम्बी, विश्वोपयोगी और परमात्मा समर्पित बनाया जा सके, अवांछनीय आसुरी प्रवृत्ति विहीन हो, उसके संकेत श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में मिलते हैं।
वास्तव में मनुष्य के जीवन के लक्ष काम, क्रोध, लोभ, मोह से परे धर्म पूर्वक अर्थोपार्जन कर उसके सुरक्षा सहित अपने समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हुए परमात्मा में समाहित होना है और इस प्रयोजन के लिए श्रीमद्भगवद गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी प्रवृत्ति क्या है, उनके प्रभाव से क्या मिलता है? और व्यक्ति की कोशिश किस तरफ होना चाहिए और क्या-क्या त्यागना चाहिए?, यथा निम्न अर्ध-श्लोक में दो प्रकार की मानव प्रवृत्ति वर्णित है-
द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।।16.6।। (मानव समाज में दैवी सम्पदा के प्रवृत्ति वाले और आसुरी सम्पदा के प्रवृत्ति वाले अर्थात् जनमानस के अच्छे और बुरे प्रकार के लोग होते हैं)। निम्न 3 श्लोकों में दैवी सम्पदा के 25 लक्षण दिए हैं, यथा
अभयं सत्त्वसंशुद्धिज्र्ञानयोगव्यवस्थिति:।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥16.1॥
(1) भय का सर्वथा अभाव, (2) अन्त:करण की पूर्ण निर्मलता, (3) तत्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति, (4) सात्विक दान, (5) इन्द्रिय लालसाओं का दमन, (6) यज्ञ (भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण), (7) वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन स्वाध्याय, (8) स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहन और (9) शरीर तथा इन्द्रियों सहित अन्त:करण की सरलता।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्तवं मार्दवं ह्रीरचापलम् ।।16.२।।
(10) अहिंसा (मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना), (11) सत्य (यथार्थ और प्रिय भाषण- अन्त:करण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम ‘सत्यभाषण’ है), (12) अक्रोध (अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना), (13) त्याग (कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग),(14) शान्ति (अन्त:करण की उपरति अर्थात् चित्त की चञ्चलता का अभाव), (15) अपैशुन (किसी की भी निन्दादि, चोरी या छल-कपट न करने वाला), (16) सब भूत प्राणियों में किसी लोभ अथवा हेतु रहित दया, (17) मार्दव (मृदुता-हृदय की कोमलता और सरसता), (18) ह्री (वह मनोभाव जो स्वभावत: अथवा संकोच, दोष आदि के कारण दूसरों के सामने सिर उठाने या बोलने नहीं देता, लज्जा), (19) अचपल (जो अस्थिर, चंचल, नहीं है - इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव)।।
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ।।16.3।।
(20) तेज (श्रेष्ठ पुरुषों की वह जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्राय: अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं), (21) क्षमा, (22) धैर्य, (23) शौच (शरीर की बाहर की शुद्धि), (24) अद्रोह (किसी में भी शत्रुभाव का न होना), (25) न अति मानिता (अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव)- दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए के लक्षण हैं । और, निम्न श्लोक में आसुरी सम्पदा के 6 लक्षण दिए हैं, यथा
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ।।16.4।।
(1) दम्भ (महत्व दिखाने या प्रयोजन सिद्ध करने के लिये झूठा आडंबर, धोखे में डालने के लिये ऊपरी दिखावट, पाखंड), (2) घमण्ड (अपने आपको औरों से बहुत अधिक योग्य, समर्थ या बढक़र समझने का भाव), (3) अभिमान (अपनी प्रतिष्ठा या मर्यादा एवं सत्ता की अनुचित धारणा), (4) क्रोध, (5) पारुष्य (कठोरता; बात का कड़वापन; रुखाई), (6) अज्ञान (ज्ञान न होने की अवस्था या भाव) - ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए के लक्षण हैं।
फिर निम्न अर्ध-श्लोक में, दोनों सम्पदा के प्रतिफल बताये गए हैं, यथा दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।, अर्थात, दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है।
अंत में निम्न 4 श्लोकों में काम, क्रोध और लोभ रूपी, आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् उसको अधोगति में ले जाने वाले, तीन प्रकार के नरक के द्वार रूपी त्याज्य आचरण, इन को त्यागने से उपलब्धि, न त्यागने से अधोगति और शास्त्रविहित कार्य ही करने की अनुशंसा की गयी है। यथा,
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥16.21॥
काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार है (सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु है), आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं, अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर:।
आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥16.22॥
इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है, श्रेयता में प्राप्त होता है और इससे वह परमगति को जाता है।
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥16.23॥
जो कोई भी शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी कामना से आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥16.24॥
कार्य और अकार्य (कर्तव्य और अकर्तव्य) के व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, इसलिए शास्त्र विधान में कहे अनुसार ही कर्म किये जाने चाहिए।
पाठ्य पुस्तक के अंतर्वस्तु कैसे हो?
पाठ्य पुस्तक का अतीत में भी अधिक महत्व था तथा आज भी है, तथा जनसामान्य की भी लोकप्रियता प्राप्त होती है, क्योंकि पाठ्य-पुस्तक विद्यालय या कक्षा में छात्रों तथा शिक्षकों के लिए विशेष रूप से तैयार की जाती है जो किसी एक विषय या सम्बन्धित विषयों की पाठ्य वस्तु का प्रस्तुतीकरण करती है। आधुनिक युग वैश्वीकरण की युग है। विभिन्न संचार और यात्रा-साधनों विशेषकर इंटरनेट, क्लाउड-कंप्यूटिंग, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस, सहित उत्तरोत्तर नए-नए संसाधनों के आविष्कार और विकास से समस्त भूमण्डल वास्तव में एक सुगम्य-सुप्राप्य गंतव्य बन चुका है तथा Covid-19 महामारी से विश्व को एक राष्ट्र जैसे माहौल में प्रमाणित किया है। ऐसी परिस्थिति में भारत को अपने प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए पुराने ढर्रें विशेषकर पिछले 1000 वर्षों के पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन कर सतर्कता पूर्वक शिक्षा व्यवस्था को सर्वतोमुखी के साथ साथ सर्व-समावेशी बनाना होगा।
वर्तमान में भारत में शिक्षण हेतु पाठ्य पुस्तक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा 2005 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्य-चर्या और उस पर आधारित पाठ्यक्रम अनुरूप होना चहिये जो राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT- National Council of Educational Research and Training) द्वारा गहन परीक्षण के बाद स्वीकृत किया जाता है। पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम में कक्षा अनुसार विषय वस्तु के रूपरेखा अनुमोदित होता है जिसको सम्बंधित विषय के विशेषज्ञ अथवा विशेषज्ञों (अधिकांशत: शिक्षक) द्वारा निर्धारित कक्षा के लिए पाठ्यपुस्तक के रूप में पठन-पाठन के लिए तैयार किया जाता है। अत: पाठ्य पुस्तक की तैयारी में विषय विशेषज्ञों की विशेष भूमिका रहती है और अधिकांशत: उनके वैयक्तिक सोच के भी झलक मिलते हैं, जैसे इतिहास में किसी पंथ विशेष के लोगों के बुराइयों और दुराभाव को छुपाते हुए उनके महिमा मंडन करना, दूसरे पन्थों के अच्छाइयों को छुपाते हुए उनके काल्पनिक बुराइयां और पिछड़ापन दिखाना, अपने पूर्वजों के संघर्ष और वीरता को नकारते हुए आक्रमणकारी और दुर्दान्त शासकों को सुधारवादी बताना, किसी व्यक्ति विशेष परिवार विशेष के नेतृत्व को महिमा मंडित करते हुए सार्वजनिक और राष्ट्रीय महत्व के घटना और उनसे सम्बंधित महत्वपूर्ण जनमानस को या तो नकार देना अथवा गलत तरीके से दर्शाना, धर्मशास्त्र के उद्धरण आधा-अधूरा लेकर उन के अर्थ के अनर्थ करते हुए प्रस्तुत करना, इत्यादि।
अत: किसी भी पाठ्य पुस्तक के तैयारी में, इन की अंतर्वस्तु अत्यंत सावधानी पूर्वक, राष्ट्र और समाज के दीर्घकालीन भविष्य को ध्यान में रखकर विषय को समसामयिक के साथ-साथ पुरातन कृतियों को भी ध्यान में रखते हुए, विशेषज्ञों के निजी विचार से प्रभावित न होकर सत्य और तथ्य आधारित, शिशिक्षु के उम्र, कक्षा तथा अपेक्षित मानसिक क्षमता सहित देशकाल परिस्थिति के मांग को भी समाहित करते हुए तैयार किया जाना चाहिए। मुख्यत: निम्न बिन्दु को ध्यान में रखें तो विद्यार्थी पाठ्य पुस्तक पढक़र राष्ट्र के सही नागरिक बनकर तैयार होंगे और भारत को पुन: विश्वगुरु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
1. पाठ्य सामग्री और पाठ्य पुस्तक के अंतर्वस्तु इस तरीके से संयोजित हो की विद्यालय में प्रवेश लेने के प्रारम्भिक चरण से ही-शिशिक्षु बाल्यकाल से ही आलस्य रहित, माता-पिता गुरुजन को सम्मान करने वाले, सत्यभाषी और सत्यता पालन प्रति समर्पित, समाज राष्ट्र और सामूहिक कल्याण के प्रति समर्पित, दुष्ट प्रवृति के प्रतिकार के लिए तत्पर, अध्ययन-अध्यापन और स्वाद्ध्याय में रूचि, के साथ-साथ नया सोच और सृजनशीलता के प्रति सदा उत्कट इच्छा रखने वाले बने।
2. उम्र के हिसाब से विषय वस्तु तैयार हो जो पहली कक्षा तक शिक्षित होने पर यदि पढ़ाई छोडऩा पड़े तो कम से कम अपने मातृभाषा में लिख-पढ़ सके, साक्षर व्यक्ति के तरह दूसरे से व्यवहार कर सके; पांचवीं तक शिक्षित होने पर अपने से नीचे के कक्षा तक पढ़े लोगों को मार्गदर्शन कर सके, जरुरत पडऩे पर पांचवीं तक शिक्षित वयस्क अपने दिनचर्या चला सके, परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हो, आठवीं तक आते-आते पढ़ाई छोडऩा पड़ा तो भी कुछ शिल्प इत्यादि से स्वावलम्बन के जीवनयापन कर सके, आवश्यक पडऩे पर स्वयं और अपने भाई वहन की जिम्मेदारी उठाते हुए परिवार में माता-पिता को सहयोग कर सके, अपने मातृ-भाषा सहित हिंदी, संस्कृत तथा अंग्रेजी विदेशी भाषा में साधारण व्यवहार कर सके। अर्थात् प्री-प्राइमरी से आठवीं तक के शिक्षित व्यक्ति मूलत: जीवन के लिए आधारभूत आवश्यकताओं को जाने और समझे ताकि आवश्यक पडऩे पर किसी विपरीत परिस्थिति में उसको निरीह बनना न पड़े।
3. अंतर्वस्तु सारगर्भित, सरल और जीवनोपयोगी के साथ-साथ रुचिकर हो ताकि शिशिक्षु स्वाध्याय के समय विषय को न केवल समझें परन्तु उसमे कुछ नयापन के साथ सम्वर्धन, संसोधन, इत्यादि पर भी बुद्धि लगाने के लिए उत्प्रेरित हो।
4. कोई भी उद्धरण आधा-अधूरा न हो और विशेषज्ञों द्वारा मूल सन्दर्भ से सत्यापन पश्चात सही अर्थ के साथ जीवन मूल्यों के विकास के लिए प्रयुक्त हो, अर्थ के अनर्थ के लिए न हो- जैसे गाँधी जी द्वारा प्रभावित, अधिकांशत: तथाकथित मूर्धन्य विद्वान भी, जिसमे गाँधीवादी सनातनी हिन्दू भी हैं, महाभारत के ‘अहिंसा परमो धर्म:’ उद्धृत कर पढ़ाते हैं की ‘सनातन तो अहिंसा वादी है, दूसरे ने एक गाल में थप्पड़ मारने पर दूसरा गाल भी देना चाहिए’, अर्थात् "धर्म रक्षण के लिए शस्त्र उठाना धर्म है" को, दूसरे के अत्याचार को सहन करना धर्म बताते हैं, परन्तु पूर्ण श्लोक तो ‘अहिंसा परमो धर्म:’ धर्म हिंसा तथैव च, धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित: । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्’ है, अर्थात्, अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है, मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले"। (इसी प्रकार तुलसी रामायण में सुन्दर कांड में ‘ढोल, गवार, शूद्र, पशु, नारी, ये ताडऩा के अधिकारी’ उद्धृत कर, हिन्दुओं को दलित, महिला और अशिक्षित विरोधी बताते हैं, जब की वास्तव में यह तो समुद्र ने भगवन श्रीराम के क्रोध से बचने के लिए अपने को छोटा और अज्ञानी सिद्ध कर क्षमा मांगने के लिए प्रयोग किया था।)
5. अंतर्वस्तु में निहित सामग्री में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर में शिक्षित व्यक्ति को व्यावसायिक के साथ-साथ व्यावहारिक और सैद्धांतिक विषयों के प्रति रूचि जगाने वाले हों, ताकि आवश्यक पडऩे पर किसी रोजगार मूलक कार्य में लग सके और अवसर आने पर आगे के पढ़ाई कर उच्च जिम्मेदारी के प्रतिस्पर्धा, शोध कार्य इत्यादि में भाग ले सके अथवा अच्छा शिक्षक/प्रशिक्षक/आचार्य/प्राचार्य, कुलपति, कुलानुशासक अथवा श्रेष्ठ नेतृत्व वहनकर्ता बन सके, विश्व को मार्गदर्शन देने वालों के पंक्ति में स्वयं को स्थापित करने लायक तैयारी हो।
6. अंतर्वस्तु विषय पर पूर्व लिखित पुस्तकों के कॉपी-पेस्ट न होकर, भारत के प्रत्येक राज्य के भौगोलिक और सामाजिक विशेषता, भाषा, शिल्प, राष्ट्र और सामाजिक उत्थान प्रति समर्पित निष्ठा के हुतात्मा परिचय, इत्यादि विषय वस्तु के यथोचित तथा समयानुकूल, कक्षानुकूल समावेश जिससे शिशिक्षु में आत्मगौरव बढ़े और आयु और अनुभव अनुरूप अन्य समाज तथा विदेशी संस्कृति भाषा-भाषी के साथ बेहिचक चर्चा-परिचर्चा करने के साथ-साथ अपने परंपरागत थाती को बेहिचक सगौरव प्रस्तुत कर सके, किसी भी हीनता की भावना कभी न आये।
7. अंतर्वस्तु ऐसे हो कि आठवीं तक आते-आते शिशिक्षु स्वयं स्वस्थ रहने के लिए योग, प्राणायाम और स्वास्थ्यकर खानपान तथा नियमित दिनचर्या के अनुपालन नियमित करें तथा बीमार पडऩे पर अथवा समाज में आवश्यकता पडऩे पर जड़ी-बूटी एवं आसन प्राणायाम से प्राथमिक चिकित्सा द्वारा रोग के नियंत्रण कर सकें। अत्यंत गंभीर स्थिति में अस्पताल ले जाने हेतु आवश्यक व्यवस्था करने की जानकारी हो। अस्तु।
लेखक
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01 Mar 2025 17:58:05
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