परम पूज्य योगऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य ...

परम पूज्य योगऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य ...

हमारे जीवन के वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, व्यवसायिक एवं आध्यात्मिक ये पाँच बड़े सत्य हैं। इन पाँच सत्यों को जो व्यक्ति ठीक-ठीक जीता है, उसके जीवन में सब प्रकार का स्वास्थ्य, समृद्धि, सफलता, विजय, सुख, शान्ति एवं संतुष्टि का वास होता है।
वैयक्तिक जीवन का सबसे बड़ा सत्य है आत्मनिष्ठा, जिसके जीवन में आत्मनिष्ठा की प्रतिष्ठा होती है वह सहजता, संयम, सदाचार, समता, मितव्ययता, प्रसन्नता, विनय, वीरता, धीरता, यज्ञशीलता एवं सत्यादि जीवन मूल्यों को अपने स्वभाव में जीता है। व्यक्ति प्रमाद, आत्मग्लानि एवं अनुत्पादकता से मुक्त रहता है। अहंकार, क्रोध, चिन्ता, तनाव एवं क्रोधादि के वशीभूत नहीं होता आत्मनिष्ठ व्यक्ति। आत्मनिष्ठ वही होगा जो योगनिष्ठ होगा, अत: योगनिष्ठा हमारे जीवन का मूल स्वभाव है।
पारिवारिक जीवन का सबसे बड़ा सत्य है सम्बन्ध निष्ठा चाहिए। परिवार धर्म का आदर्श रूप से निर्वहन होता है। सबके यथायोग्य सम्मान, सबको उन्नति के समान अवसर देने से, सबके आदर सत्कार, सबकी पूर्ण स्वाधीनता एवं पूर्ण समर्पण अनन्य प्रीति एकात्मता से। ज्ञान, कुशलता, अनुभव, प्रतिभा सामर्थ्य के अनुरूप परिवारजनों में कार्यों का विभाजन करके परस्परता में पूरकता के आधार पर सबको संगठित पुरुषार्थ करते हुए आगे बढऩा चाहिए। रूठना, संवदहीनता, वाणी, व्यवहार से दोष करना किसी भी प्रकार से किसी का अनादर कभी भी नहीं करना चाहिए। सामाजिक जीवन का सबसे बड़ा सत्य है समाज हित सर्वोपरि। एकत्व, सहअस्तित्व, बन्धुत्व एवं धर्म में दृढ़ता सबके प्रति उदारता- ये सामाजिक जीवन के श्रेष्ठ आदर्श हैं। मनुष्य का पूरा जीवन सामाजिक समरसता पर ही टिका हुआ है। बिना समाज हम अस्तित्व विहीन हैं। व्यवसायिक जीवन का सबसे बड़ा सत्य है अर्थनिष्ठा। अर्थ को अर्जित करने का साधन एवं अर्जित अर्थ का उपयोग जिस साध्य के लिए कर रहे हैं दोनों ही पवित्र हो चाहिए। संगठित श्रम एवं संगठित सामूहिक समृद्धि आर्थिक प्रगति के दो मूल आधार हैं। अपने ज्ञान, विज्ञान, अविष्कार, तकनीक पुरुषार्थ का इस प्रकार उपयोग करना कि वह ऐश्वर्य में रूपान्तरित हो सके, यही आर्थिक कुशलता का मूल मन्त्र है। आध्यात्मिक जीवन का मूल मन्त्र है गुरु भगवान् की पूर्ण शरणागति में रहकर भगवान् के नाते सब सम्बन्धों को निभाते हुए प्रत्येक कर्म को भगवान् की पूजा मानकर करना; अज्ञान, अश्रद्धा, अकर्मण्यता अशुभ से सदा मुक्त दिव्यता से सदा युक्त रहना|

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