नेहरू जी ने बनाया चीन को भारत का पड़ोसी

नेहरू जी ने बनाया चीन को भारत का पड़ोसी

प्रो. कुसुमलता केडिया

तिब्बत में घट रही घटनाओं पर नेहरू मंत्रीमंडल की एक बैठक हुई जिसमें सरदार पटेल नहीं शामिल हो सके थे। बैठक में नरहरि विल गाडगिल ने नेहरू जी की बड़ी सौम्य भाषा में थोड़ी आलोचना की। इस पर नेहरू ने डपट कर कहा।क्या आपको पता नहीं कि वहाँ हिमालय है?’ इस पर गाडगिल ने कहा कि पहले भी हिमालय को पार कर आक्रमण के प्रयास होते रहे हैं। परंतु नेहरू ने उन्हें शांत कर दिया। मंत्रिमंडल की खबर पाकर सरदार पटेल ने भी नेहरू को तिब्बत में माओ की सेनाओं की आक्रमण पर चिन्ता जताते हुए पत्र लिखा जिसका नेहरू ने कोई उत्तर नहीं दिया। यह बात कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी ने भारतीय विद्या भवन से प्रकाशित अपनी पुस्तकपिलग्रिमेज टु फ्रीडमके खंड 1 के पृष्ठ 175 से 181 तक में बताई है।
सरदार पटेल ने यह भी लिखा था कि- ‘संयुक्त राष्ट्र संघ में माओ सरकार को सदस्यता दिलाने के प्रश्न पर रूसी शिविर के साथ हम अकेले ही हैं। फिर भी चीन हमारे बारे में असभ्यतापूर्ण झूठे आरोप लगाता रहता है। जिससे लगता है कि वह हमारा मित्र नहीं है, संभावित शत्रु है।उन्होंने इस विषय पर आवश्यक विषयों और उपायों की एक सूची तैयार कर नेहरू को पत्र लिखा परंतु उस पत्र का भी नेहरू ने कोई उत्तर नहीं दिया। इसकी जगह उन्होंने 18 नवंबर 1950 को एक लंबी चि_ विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को संबोधित कर लिखी और प्रसारित कराई। जिसमें लिखा था किहमने 1 नवंबर 1950 को चीनी सरकार को पत्र लिखा था किल्हासा में भारतीय राजनैतिक एजेंट तथा ग्यांतसे तथा यातुंग में व्यापार एजेंसिया और भारतीय डाक और तार अधिकारी तथा हमारी सैन्य पुलिस एवं व्यापार मार्ग पर हमारा नियंत्रण जैसा है वैसा ही बना रहेगा। इसका उत्तर माओ शासन की ओर से 16 नवंबर को आया है जिसमें उन्होंने हम पर यह आरोप लगाया है कि माओ सरकार अपनी प्रभुसत्ता तिब्बत में स्थापित कर रही है जिसमें रूकावट डालने का भारत सरकार को कोई अधिकार नहीं है और भारत द्वारा पहले तिब्बत पर हमारी प्रभुसत्ता मान ली गई है।इस तरह नेहरू जानबूझकर ऐसी चि_ लिखते थे जिसे माओ अपने पक्ष में और भारत के विरूद्ध इस्तेमान करते।
इसी पत्र में नेहरू ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को बताया किहमें यह ध्यान रखना चाहिये कि चीन हमारा पड़ोसी बनने वाला है और कम्युनिस्ट सरकार का पतन होने की कोई संभावना नहीं है। इसलिये हमें दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये। चीन संपूर्ण तिब्बत पर अपना कब्जा कर लेगा और इसे रोकने की कोई शक्ति तिब्बत में नहीं है तथा हम भी इसे नहीं रोक सकते और कोई अन्य शक्ति भी इसे नहीं रोक सकती।फिर भी उन्होंने यह दोहराना जारी रखा कि तिब्बत की स्वायत्ता अपरिहार्य है क्योंकि उसकी भौगोलिक तथा जलवायु संबंधी परिस्थितियां उसे स्वयत्त बनाये रखती हैं। यह कुटिलता भरी भाषा थी।
इसके बाद नेहरू ने अन्य अनेक वक्तव्यों द्वारा यह कहा कि ष्यह तिब्बत के ही हित में होगा कि हम उस पर चीन की विजय को चुपचाप स्वीकार कर लें। हम तिब्बत की रक्षा नहीं कर सकते, हम उसे बचाने की कोशिश करेंगे तो तिब्बत पर और गहरा संकट जायेगा। जो कि तिब्बत के साथ अन्याय होगा।
तिब्बत पर चीनी आक्रमण के विरूद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव रखे जाने की बात चली और उसके लिये अपील का प्रारूप तैयार किया गया। समस्त विश्व यह मान रहा था कि इसमें भारत बढ़-चढक़र समर्थन करेगा परंतु नेहरू ने कहा कि हम इस अपील का समर्थन नहीं करेंगे। हमें ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिये। तिब्बत की जनता का हित इसी में है। हमारी कोशिश होगी कि इस अपील पर संयुक्त राष्ट्र संघ में कोई विचार विमर्श ही हो। संयुक्त राज्य अमेरिका या अन्य किसी भी शक्तिशाली राष्ट्र की रुचि माओ सरकार के लिये समस्यायें खड़ी करने में है। इसलिये हमें पूरा प्रयास करना है कि तिब्बत पर माओ सरकार के आक्रमण के विरूद्ध तैयार की गई अपील पर संयुक्त राष्ट्र संघ में विचार विमर्श ही हो। (नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 15, जिल्द 2, पृष्ठ 342 से 352) अंत में नेहरू ने वह अपील संयुक्त राष्ट्र संघ में विचारार्थ पेशगी नहीं होने दी।
जब संसद में इस विषय पर चर्चा हुई तो 6 दिसंबर 1950 को लोकसभा में नेहरू ने कहा किहम विश्व में शांति चाहते हैं, युद्ध नहीं। चीन (माओ) पहले से ही आंशकित है और वह अविवेकपूर्ण ढंग से काम कर रहा है। इसलिये हमें शांति बनाये रखने के भरपूर प्रयास करना चाहिये। तिब्बत के विषय में हमारी कोई राजनैतिक आकांक्षायें नहीं हैं। माओ तिब्बत को स्वतंत्र करने की बात कर रहे हैं परंतु वे यह नहीं स्पष्ट कर रहे हैं कि तिब्बत को वे किससे स्वतंत्र करना चाहते हैं। तिब्बत युद्ध करने की स्थिति में नहीं है और इसलिये तिब्बत और चीन में युद्ध नहीं होने वाला है।यह पूरी ढिठाई के साथ माओ द्वारा तिब्बत पर आक्रमण के पक्ष में नेहरू का कुतर्क है।
जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी, नरहरि रंगा तथा अन्य लोगों ने नेहरू के वक्तव्य के प्रति असंतोष व्यक्त किया तो नेहरू ने सबके उत्तर में एक लंबा भाषण दिया और कहा कि इतिहास की शक्तियां और इतिहास की प्रक्रिया अनंत कारकों द्वारा प्रभावित होती हैं। तिब्बत तीव्र गति से बदल रहा है और हम जो भी कदम उठा रहे हैं वो तिब्बत के हित में हैं। चीन जैसा महान देश (यहाँ उनका आशय माओ को महान शासक बताने से ही है, राष्ट्रवादी चीन के वे विरोध में थे) हमारी कोई भी सलाह नहीं सुनेगा। अत: उचित यही है कि हम तिब्बत पर चीन का अधिराज्य स्वीकार कर लें। (लोकसभा की बहसें, 7 दिसंबर 1950)
माओ की सेनाओं द्वारा हजारों तिब्बतियों की हत्यायें की गईं और बहुतों को बुरी तरह कुचला गया। ये खबरें अखबारों में आईं। इस पर नेहरू ने दिल्ली में एक पत्रकार सम्मेलन बुलाकर कहा कि वस्तुत: चीनी सेनाओं ने पूर्वी तिब्बत में थोड़ी ही दूरी तक प्रवेश किया है। एक अभागा चीनी सैनिक रास्ता भटक कर गलती से भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर गया जिसे अखबारो में बढ़ा-चढ़ा कर चीनी सेनाओं के भारतीय सीमा में प्रवेश की तरह छापा जा रहा है। यह गलत है। तिब्बत में उपस्थित चीनी सेना बहुत कम है। (नेहरू के विशेष कार्य खंड 16, जिल्द 1, पृष्ठ 443-444)
11 जून 1951 को उन्होंने फिर एक पत्रकार सम्मेलन बुलाया और कहा कि दलाई लामा ल्हासा से भागकर हमारी सीमा में आये थे परंतु हमने उन्हें सुझाव दिया कि चीन से ही अपनी स्वायत्ता सुरक्षित रखने का अनुरोध करें और प्रसन्नता की बात है कि दलाई लामा लौट गये। तिब्बत माओ की सेना के आक्रमण का सामना नहीं कर सकता और हमारे द्वारा अपर्याप्त प्रतिरोध से वे लोग तिब्बतियों का और दमन करेंगे। इसलिये हम केवल शांत प्रेक्षक ही रहने वाले हैं।
5 महीने बाद 2 नवम्बर 1951 को अगला पत्रकार सम्मेलन हुआ। जिसमें उन्होंने बताया कि चीन अपने नक्शों में भारत के बड़े भू-भाग को चीनी क्षेत्र बता रहा है। पर वे नक्शे बहुत प्राचीन हैं और इसलिये उनसे हमें कोई आशंका नहीं करनी चाहिये। (नेहरू के विशेष कार्य खंड 17, पृष्ठ 507)
इसके साथ ही नेहरू ने पणिक्कर को पश्चिमी यूरोप तथा अमेरिका की यात्रा पर भेजा कि वे जाकर सबको राजी करें कि चीन को अर्थात् माओ शासन को संयुक्त राष्ट्र संघ में सदस्यता दे दी जाए। क्योंकि राष्ट्रवादी चीन को तो संयुक्त राष्ट्र संघ में सदस्यता प्राप्त ही थी। परंतु नेहरू उसके अस्तित्व से ही इंकार कर रहे थे जो वस्तुत: राष्ट्रवादी चीन के अस्तित्व को ही अस्वीकार करना था। किसी एक प्रत्यक्ष उपस्थित राष्ट्र के अस्तित्व को खुलेआम अस्वीकार करना किसी कम्युनिस्ट के लिये ही संभव है। नेहरू का यह कदम विश्व शांति एवं पंचशील में उनकी किसी भी प्रकार की श्रद्धा नहीं होने का प्रमाण है।
माओ और चाऊ एन लाई से नेहरू की ऐसी प्रगाढ़ आत्मीयता विकसित हो गई कि चाऊ और माओ उनसे तिब्बत में नृशंस नरसंहार कर रही अपनी सेनाओं के लिये चावल तथा अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति का आग्रह करने लगे और नेहरू ने उनके आग्रह को स्वीकार कर भारी मात्रा में उन्हें भारत से चावल भेजा ताकि तिब्बतियों का नरसंहार माओ के सैनिक पूरी शक्ति से करते रहें। इतना ही नहीं उनके सैनिक वाहनों के लिये पेट्रोल की भी आपूर्ति भारत से की गई।
5 अप्रैल 1952 को चाउ एन लाई ने नेहरू जी के राजदूत (भारत सरकार के) से कहा कि हमें तिब्बत में अपनी सेनाओं के लिये खाद्यान की आपूर्ति के लिये भारत पर निर्भर रहना पड़ेगा। हम चाहते हैं कि भारत इस मामले में हमारी सहायता करे।  
पणिक्कर ने नेहरू को यह बताया और यह कहा कि हमें यह आपूर्ति कर देनी चाहिये। नेहरू ने कहा किहम जानते हैं कि यह खाद्यान आपूर्ति तिब्बत में मौजूद चीनी सेना के लिये की जा रही है जिन्हें सभी दृष्टियों से इसकी अत्यन्त आवश्यकता है।
मई 1952 में नेहरू जी ने चीनी सेनाओं के लिये 500 टन अनाज भेजने का आदेश दे दिया। साथ ही यह जोड़ दिया कि हमारे बीच तिब्बत में हमारे हितों के विषय में सामान्य समझौते की आवश्यकता है। 21 जून 1952 को एक पत्रकार सम्मेलन में जब यह पूछा गया कि क्या भारत से चीनी सेनाओं के लिये तिब्बत में चावल भेजा जा रहा है? नेहरू जी ने उत्तर दिया- ‘बहुत अधिक मात्रा में नहीं। सकरे रास्ते और सघन पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण खाद्यान की आपूर्ति अधिक मात्रा में नहीं की जा सकती। उनकी सेना को खाद्यान की अत्यधिक आवश्यकता है। हम उन्हें तिब्बत से बाहर देखना चाहते हैं और इसके लिये बातचीत का वातावरण बने रहना आवश्यक है तथा चीनी सैनिकों को तिब्बत में जीवित रहने में हमारी सहायता इस दृष्टि से ठीक ही है।(नेहरू के विशिष्ट कार्यए खंड 18, पृष्ठ 473 से 477)
जब माननीय सांसदों ने चीन में पणिक्कर की भूमिका को लेकर कुछ शंकायें व्यक्त कीं तो नेहरू जी ने उनकी जगह एन. राघवन को राजदूत बनाकर भेजा। एन. राघवन ने रिपोर्ट दी कि चीन का हमारे प्रति व्यवहार बहुत उदासीनता का है। नेहरू जी ने उत्तर दिया- ‘वे हमारे मित्रवत् हैं।फिर एक अन्य पत्र में उन्होंने लिखा- ‘चीन से हमें प्राप्त एक लाख टन चावल की आपूर्ति हम तिब्बत में उनकी सेनाओं के लिये करेंगे। इसके लिये हम परिवहन व्यवस्था बना रहे हैं। अन्य सामग्रियों के विषय में भी हम विचार विमर्श करेंगे।शीघ्र ही नेहरू जी ने चीनी सेना के लिये खाद्यान के साथ ही पेट्रोल और डीजल भी तिब्बत भेजे। (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 23, पृष्ठ 354-355 एवं खंड 26 पृष्ठ 43) इतना तो रिकार्ड में है। अनुमान है कि उन्होंने माओ के सैनिकों को तिब्बत पर कब्जा करने के लिए शस्त्रास्थ भी सुलभ कराए।
28 फरवरी 1952 को जब पत्रकार सम्मेलन में नेहरू जी से पूछा गया था कि क्या तिब्बत में चीनी सेनाओं ने कोई घुसपैठ की है, तो उनका उत्तर था- ‘मुझे इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है।(नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 17, पृष्ठ 510)
12 अप्रैल 1952 को उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि चाउ एन लाई तिब्बत में हमारे हितों की समस्या पर विचार-विमर्श नहीं करना चाहते। एक अन्य पत्राचार में उन्होंने कहा किभारत तिब्बत में किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं चाहता क्योंकि ये विशेषाधिकार ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा लादी गई संधियों का परिणाम है।
सितंबर 1952 में भारत के शिष्ट मंडल ने ल्हासा से रिपोर्ट भेजी कि चीनी आक्रमण के विरूद्ध देशभक्त तिब्बतियों के कई दल सक्रिय हैं और उनमें से एक दल हमारे संपर्क में है जो हमसे केवल दो लाख रुपए की सहायता मांग रहा है। इस पर नेहरू जी भडक़ गये और उन्होंने कहा कि यह व्यवहारिक रूप से भी गलत होगा और नैतिक रूप से भी। हमें तिब्बत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये और तिब्बतियों को अपनी समस्यायें चीनियों के साथ बैठकर सुलझाना चाहिये।
उल्लेखनीय है कि तिब्बत में नृशंस नरसंहार कर रही माओ की सेनाओं को चावल तथा अन्य खाद्यान और पेट्रोल तथा डीजल की आपूर्ति को जवाहरलाल नेहरू जो कुछ ही दिनों पहले तक स्वतंत्र तिब्बत राष्ट्र के प्रतिनिधि मंडल को दिल्ली में एशियाई सम्मेलन में बुला चुके थे, आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं मानते। परंतु देशभक्त तिब्बतियों के एक समूह को माओ की सेनाओं द्वारा किये जा रहे नरसंहार को रोकने के लिये केवल दो लाख रूपये की सहायता को तिब्बत के मामले में आंतरिक हस्तक्षेप मानते हैं। डॉ. राममनोहर लोहिया ने ऐसे ही कार्यों के कारण जवाहरलाल नेहरू के ऐसे कामों को देशद्रोह की संज्ञा दी थी।
जब अनेक लोगों ने यह बात उठाई कि तिब्बत पर तो भारत का अधिराजत्व रहा है तो नेहरू ने उसे साम्राज्यवादी अंग्रेजों का काम बताया और कहा कि अब साम्राज्यवाद समाप्त हो चुका है।
जुलाई 1956 में कोलंबो में राष्ट्र मंडल के प्रधानमंत्रियों का सम्मेलन हुआ। जिसमें कई देशों ने राष्ट्रवादी चीनी सरकार का मुद्दा उठाया। इस पर श्री नेहरू ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन का प्रतिनिधित्व राष्ट्रवादी सरकार द्वारा किया जाना तथ्यत: एक निरर्थक बात है और ऐसा होना संपूर्ण एशिया के लिये शर्म की बात है। (नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 25, पृष्ठ 423 से 426)
फिर उन्होंने राघवन के द्वारा चाउ एन लाई को यह संदेश भी भिजवाया कि हमने कोलंबो सम्मेलन में चीन की स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 28, पृष्ठ 167-168)
कुछ समय बात उन्होंने पुन: राघवन से कहा कि आप चाउ एन लाई के समक्ष यह स्पष्ट कर दें कि हम हर जगह उनकी स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन का प्रतिनिधित्व उनकी सरकार को मिले, यह प्रयास कर रहे हैं। हमने स्वयं अमेरिकी राजदूत से इस विषय में बात की है और कृष्णमेनन को लंदन, ओटावा और वाशिंगटन (इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका) में ऐसा ही करने का निर्देश दिया है।
माओ ने नेहरू से मिलीभगत कर दिखावे के लिए उन्हेंब्रिटिश अमेरिकी साम्राज्यवाद का चापलूस अनुयायीकहा और आरोप लगाया कि नेहरू तिब्बत को अपने साथ मिलाने के लिये इंग्लैंड और अमेरिका की शह पर षडय़ंत्र रच रहे हैं।
समाचार एजेंसी रायटर ने चीनी सेनाओं के विमानों की तिब्बत में बढ़ती संख्या पर समाचार छापा। भारत में नागरिकों और नेताओं ने अगस्त 1953 में इसके विरोध मेंतिब्बत दिवसमनाने का निर्णय लिया। इस पर जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव को लिखा किकोई भी कांग्रेसी तो तिब्बत दिवस के समारोह में भाग लेगा और ही ऐसी किसी समिति में शामिल होगा
अगले महीने नेहरू जी ने चाउ एन लाई को एक संदेश भेजा किहमारे देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सहयोग का बढऩा गहरे संतोष का विषय है। श्रीमान ने हमारे राजदूत से कहा था कि तिब्बत के विषय में भारत और चीन के दृष्टिकोण में कोई अंतर नहीं है। भारत सरकार लंबित मामलों के संदर्भ में एक निर्णायक समझौते पर पहुंचना चाहती है।(नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 23, पृष्ठ 485-486)
इस बीच नेहरू ने यह वक्तव्य देने शुरू कर दिये किहम तिब्बत में सामंतवादी तत्वों का समर्थन नहीं कर सकते और हम तिब्बत में कोई हस्तक्षेप भी नहीं कर सकते।उन्होंने इस बीच निर्णय लिया कि सीमा पर पुलिस चैकियां बनाई जानी चाहिये। इस पर सेना के एक प्रमुख अधिकारी ने कहा कि वस्तुत: उन चैकियों की सुरक्षा सेना द्वारा की जानी चाहिये अन्यथा उन्हें एक ही आक्रमण में नष्ट कर दिया जायेगा परंतु नेहरू पुलिस चैकी बनाने के निर्णय पर टिके रहे।
चाउ एन लाई और माओ ने नेहरू के स्वभाव और मन को अच्छी तरह समझ लिया था और वे उनसे अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर अक्सर चर्चायें करने लगे। चाउ एन लाई भारत आये और कई दिनों तक नेहरू के साथ वार्ताऐं और साथ-साथ घूमने का क्रम चलता रहा। दोनों ने एक साथ आगरा में फिल्म झांसी की रानी देखी। श्री अरूण शौरी ने अपनी पुस्तकभारत चीन संबंधमें पृष्ठ 94 पर बताया है कि चाउ ने फिल्म झांसी की रानी की प्रशंसा की। इस पर नेहरू ने तत्काल उत्तर दिया कि इसकी पटकथा उतनी अच्छी नहीं है। इस पर चाउ ने कहा कि यह विदेशियों के विरूद्ध प्रतिरोध का चित्रण करती है। नेहरू ने तपाक से कहायह तो सामन्तवादी तत्वों का प्रतिरोध था चाउ ने कहा- ‘प्रतिरोध तो सदैव उच्च वर्ग से ही आरंभ होता है।नेहरू चुप रहे।
इसी प्रकार श्री शौरी बताते हैं कि नेहरू चाउ से लगातार अमेरिकी संविधान और अमेरिकी शासन की निंदा करते रहे। जिससे चाउ प्रसन्न होते रहे। इसके बाद नेहरू ने चाऊ को यह सलाह भी दी कि आज जो संवाददाता सम्मेलन होने वाला है उसमें संवाददाताओं के जिन प्रश्नों के उत्तर देने से बचना हो उनमें आप विनोदपूर्ण हो जायें। नेहरू को नापकर चाउ लौट गये और उन्होंने और भी अधिक उत्साह के साथ तिब्बत में नरसंहार तेज कर दिया।
27 जून 1954 को नेहरू ने बर्मा के यू.नू. को लिखा- ‘चाउ एन लाई एक स्पष्ट वक्ता और निष्कपट व्यक्ति हैं। मैंने उन्हें बर्मा के बारे में जानकारियां भी दीं।अरूण शौरी लिखते हैं कि तथ्य यह है कि चाउ ने नेहरू से बर्मा के बारे में कुछ भी नहीं पूछा था। एक जुलाई 1954 को उन्होंने भारत के मुख्यमंत्रियों को बीस पृष्ठों का एक पत्र भेजा और उसमें लिखा कि चाउ एन लाई की भारत यात्रा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है। उल्लेखनीय है कि यह वह समय है जब चीन अक्साई चिन में सडक़ बनाने की तैयारियां कर रहा था।
उन्होंने यह भी लिखा किचीन तिब्बत पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर लेगा। तिब्बत में हमारी स्थिति साम्राज्यवादी ब्रिटेन का स्मृति चिन्ह थी। हमें ब्रिटेन की विस्तारवादी नीतियों से प्राप्त विशेषाधिकारों को बनाये रखना उचित नहीं होगा। व्यवहारिक राजनीति यह है कि तिब्बत में चीनी शक्ति का प्रतिरोध कर पाना संभव नहीं है। वैसे भी हम एक सामंतवादी व्यवस्था का समर्थन नहीं कर सकते। चीनियों ने सडक़ों और विमान क्षेत्रों का निर्माण तिब्बत में शुरू कर दिया है और यह स्वभाविक ही है। हमें तिब्बत में चल रही इन सैन्य गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। यद्यपि हम उन जानकारियों पर पूरा भरोसा नहीं कर सकते। तिब्बत एक दुर्गम क्षेत्र है और वहां की जलवायु चीन से भिन्न है अत: वहां बाहर से बड़ी संख्या में आकर रहना सहज बात नहीं है।मुख्यमंत्रियों को लिखे इस पत्र के अंश श्री अरूण शौरी ने अपनी पुस्तक में दिये हैं।
तिब्बत में माओ की सेनाओं के द्वारा किये जा रहे विनाश के विरूद्ध तिब्बतियों द्वारा तीव्र प्रतिरोध किया जाने लगा। यह प्रतिरोध भारत से लगी सीमा में भी हो रहा था। इसकी चर्चा भारत में हुई। इस पर श्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि हम अपने क्षेत्र में ऐसी गतिविधियों को प्रोत्साहित नहीं कर सकते। अगर ये गतिविधियां शांतिपूर्ण हों तो हम इन्हें सहन कर सकते हैं अन्यथा नहीं।
सिक्किम में भारत के राजनैतिक अधिकारी बी के कपूर ने माओ की कम्युनिस्ट पार्टी की आपत्तिजनक गतिविधियों के बारे में रिपोर्ट भेजी। इससे श्री नेहरू अप्रसन्न हुये और उन्होंने कहा कि श्री कपूर का चीन के कम्युनिस्टों के बारे में बात करना मुझे अच्छा नहीं लगा। उन्होंने यह भी कहा किहमें तिब्बत में शासक वर्ग माना जाता है और यह अपेक्षा की जाती है कि हम चीनी विस्तारवाद के मार्ग में बाधा डालेंगे। परंतु हम ऐसा नहीं कर सकते।
पूर्व में श्री नेहरू ने बारम्बार यह कहा था कि माओ और चाउ का कहना है कि हम जो मानचित्र छाप रहे हैं, जिसमें भारत के कुछ हिस्से चीनी सीमा के अंतर्गत दर्शायें जा रहे हैं (वस्तुत: ये तिब्बती सीमा के अंतर्गत प्राचीन नक्शे में कभी दर्शायें गये होंगे जब तिब्बत भारत का ही एक राज्य था और सीमायें घुली-मिली थीं), वे प्राचीन मानचित्र हैं और नये नक्शों में ऐसा कुछ नहीं होगा परंतु अब चाउ एन लाइ ने कहा कि हम उन नक्शों को सही मानते हैं। इस पर नेहरू कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सके। उन्होंने केवल यह कहा किमैं वास्तव में उन चीनी मानचित्रों के निरंतर प्रकाशन से थोड़ा चिंतित हूँ। जिनमें हमारे क्षेत्र को चीनी क्षेत्र बताया गया है।
इसी बीच सोवियत संघ ने भी इसी तरह के नक्शे प्रकाशित किये। इस पर नेहरू ने सफाई दी कि ऐसा लगता है कि सोवियत शासन चीनी नक्शों की ही प्रतिलिपि प्रकाशित कर रहा है। हमें सीमा पर पुलिस चैकियों को तैनात रखना चाहिये।
जब यह मांग की गई कि हमें अपनी वायु सेना अधिक सशक्त बनानी चाहिये और बमवर्षक विमानों की संख्या भी बढ़ानी चाहिये, तब नेहरू ने कहा किवे अत्यधिक महंगे हैं और उनमें धन लगाने से हमारा औद्योगिक विकास एक सीमा तक स्थगित हो जायेगा। साथ ही ऐसा करना हमारी सुरक्षा नीति के आधारभूत (शांतिवादी) दृष्टिकोण के विरूद्ध होगा।
जब सिक्किम और भूटान के हमारे राजनैतिक अधिकारियों की रिपोर्ट आयी कि तिब्बत में सवा लाख से अधिक माओ के सैनिक मौजूद हैं तो नेहरू ने कहा कि यह संख्या अविश्वसनीय है। मेनन ने मुझे बताया है कि वहां माओ के सैनिक लगभग 45 हजार ही हैं। (नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 28, पृष्ठ 477-478)
इसके कुछ ही दिनों बाद नेहरू ने राष्ट्रमंडल प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में चीन की जमकर बड़ाई की परंतु वे सम्मेलन से दिल्ली लौटे तब तक बर्मा पर माओ की सेना ने आक्रमण कर दिया और उसके हजारों वर्गमील क्षेत्र पर कब्जा कर वहीं बस गये। बर्मा की सरकार ने नेहरू के पास अनुरोध भेजा कि इसे रोकने के लिये कुछ किया जाये। नेहरू ने भारतीय विदेश अधिकारियों से कह कर एक स्मरण पत्र तैयार करवाया परंतु निर्देश दिया कि इसमें तिब्बत या चीन के साथ भारतीय सीमा के प्रश्न को प्रत्यक्ष रूप से नहीं उठाया जाना चाहिये। (नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 34, पृष्ठ 250 से 259) माओ ने घोषणा की कि हम पूर्ववर्ती संधियों और समझौतों से बंधे हुये नहीं हैं। इससे नेहरू कुछ परेशान दिखे। उधर चाउ एन लाई ने बर्मा के प्रधानमंत्री को वार्ता के लिए बीजिंग बुलाया। नेहरू ने अपने राजदूत के द्वारा सलाह दी कि बर्मा और चीन के बीच मैत्री पूर्ण और शांतिपूर्ण वार्ता होनी ही चाहिये।
इसी समय माओ की सेना ने लद्दाख के भी कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। इस पर संसद में चिंता व्यक्त की गई तो नेहरू ने कहा- ‘वहां घास का एक पत्ता भी नहीं उग सकता। उन दिनों अखबारों में यह छपा था कि इस पर श्री महावीर त्यागी ने नेहरू से कहा कि मेरे सिर पर भी घास का कोई पत्ता नहीं उग सकता (वे गंजे थे) तो क्या हम इस सिर को भी दूसरों के हवाले कर दें। इस पर नेहरू चुप रह गये।
सितंबर 1956 में माओ की सेनायें हिमाचल का शिपकी-ला दर्रा पारकर भारतीय क्षेत्र में घुस आईं और शिमला तक गश्त करने की कोशिश करने लगीं। इस पर नेहरू ने केवल यह कहा कि यह एक गंभीर मामला है और हमारी पुलिस को अपनी चैकियों पर डटे रहना होगा। (नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 35, पृष्ठ 515-516)
दलाई लामा भारत आये और नेहरू ने 26 28 नवम्बर 1956 को उनसे भेंट की। दलाई लामा ने भी यही बताया कि माओ की सवा लाख सेनायें तिब्बत में तबाही मचा रही हैं। अत: भारत को सहायता करनी चाहिये। नेहरू ने उत्तर दिया- ‘ तो भारत और ही कोई अन्य देश तिब्बत को किसी प्रकार की प्रभावपूर्ण सहायता करने की स्थिति में है।(नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 35, पृष्ठ 520 से 522) जब दलाई लामा दिल्ली में थे तभी चाउ एन लाई दिल्ली आया और नेहरू ने स्वयं हवाईअड्डे पर जाकर उनका स्वागत किया। गुप्त वार्ताओं के बाद नेहरू ने आग्रह पूर्वक दलाई लामा को तिब्बत वापस भेज दिया। प्रकाशित अभिलेखों के अनुसार इस वार्ता में चाउ एन लाई ने स्वयं कहा कि तिब्बत अतीत में कभी भी चीन का प्रांत नहीं रहा था। इसीलिये हम उसकी स्वायत्ता को मान्यता देंगे। भारत को तिब्बत के विषय में अधिक जानकारी है। क्योंकि इतिहास में इन दोनों देशों का पुराना संबंध रहा है। इस पर श्री नेहरू ने कहा कि इतिहास बीत चुका है और मेरा मानना है कि सिद्धांत रूप से भले ही तिब्बत भारत का अंग रहा हो परंतु व्यावहारिक रूप से वह एक स्वायत्त क्षेत्र रहा है। अत: हम तिब्बत पर आपकी सरकार के अधिराजत्व को मान्यता देते हैं।
नेहरू ने चाउ से कहा कि तिब्बत में भारत की प्रमुख रुचि धर्म संबंधी है। कैलाश और मानसरोवर जैसे तीर्थस्थल वहाँ हैं। यहाँ उल्लेखनीय है कि नेहरू ने उन ऐतिहासिक तथ्यों का कोई उल्लेख नहीं किया, जिनका संकेत स्वयं चाउ अपनी वार्ता में कर रहा है कि आपको ऐतिहासिक रूप से तिब्बत की अधिक जानकारी है। तथ्य यह है कि हमारे पुराणों में सर्वत्र यह लिखा है किये वसंति कुरूक्षेत्रे, ते वसंति त्रिविष्टपे(जो लोग कुरूक्षेत्र में रहते हैं वे ही भरतवंशी लोग तिब्बत में भी रहते हैं) नेहरू ने इस सर्वविदित तथ्य का भी उल्लेख चाउ से नहीं किया कि तिब्बतियों ने सैकड़ों वर्षों तक चीन पर शासन किया और यह कि हूण, मंगोल, तुर्क शासन को तिब्बत के शासकों द्वारा जो वहाँ के सर्वोच्च धर्माचार्य भी होते रहे हैं, वैध मान्यता देने के बाद ही उनका राज्य वैध माना जाता था।
इस तरह माओ और चाउ के समक्ष समर्पणशील नेहरू ने पूरे होश हवास में और सब कुछ जानते हुये कम्युनिज्म को फैलाने के लिये माओ की सेनाओं द्वारा तिब्बत को हड़पने दिया और वहां भयंकर नरसंहार होने दिया। इस बीच वे चीन और सोवियत संघ का दौरा करते रहे तथा वहाँ की सरकारों की प्रशंसा करते रहे। अंत में मार्च 1959 में दलाई लामा को तिब्बत से निर्वासित होना पड़ा। रात के अंधेरे में वे भारत पहुंचे और तीन सप्ताह तक उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ी तक जवाहरलाल नेहरू ने उनसे भेंट की।
वस्तुत: इस बीच सोवियत संघ और माओ के बीच सीमा संबंधी प्रश्न पर तनाव हो गया और ऐसा लगता है कि सोवियत दौरे के समय वहां के नेताओं ने नेहरू को कुछ संकेत दिया जिसके कारण इस बार उन्होंने 1959 ईस्वी में दलाई लामा को धर्मशाला में स्थान दे दिया परंतु उन्हें यह स्पष्ट निर्देश दिया कि भारत की भूमि से माओ की सरकार के विरूद्ध किसी भी कार्यवाही की अनुमति भारत सरकार नहीं देगी। केवल शांतिपूर्ण ढंग से अपना पक्ष रखने की अनुमति होगी।
30 मार्च 1959 को लोकसभा में तिब्बत के प्रश्न पर सांसदों ने प्रश्न उठाये जिसके उत्तर में नेहरू ने गोलमोल भाषा में कहा कि हमने तिब्बत के प्रति अपनी नीति को चीन का रूख ध्यान में रखे बिना काम किया और वहां से अपनी सेनाओं को हटा लिया। यह कहा जा रहा है कि हमने तिब्बत में अपने विशेषाधिकारों को त्याग दिया। परंतु हम उन विशेषाधिकारों को बनाए ही नहीं रखना चाहते थे। क्योंकि वे साम्राज्यवादी दौर के हैं। लोकसभा में नेहरू ने खुल कर स्वीकार किया कि मूल चीनी राज्य जितने क्षेत्र में थाए 1949 ईस्वी में उसने उससे तीन गुने बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। उन परिस्थितियों में हम कुछ नहीं कर सकते थे। चार दिन बाद 3 अप्रैल 1959 को नेहरू ने लोकसभा में सूचना दी कि दलाई लामा भारत गये हैं।
मई 1959 से अगस्त 1959 तक अनेक बार लोकसभा में आचार्य कृपालानी, अटल बिहारी वाजपेयी तथा अन्य अनेक सदस्यों ने इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया कि नेहरू ने तिब्बत पर चीन का कब्जा होने दिया। परंतु नेहरू अपने को सही ठहराते रहे। ऊपर से वे चंगेज खान और कुबलई खान आदि की निंदा करते रहे और माओ की प्रशंसा करते रहे। अंत में उन्होंने यह स्वीकार किया कि तिब्बतियों को अत्यधिक यातनायें सहनी पड़ी परंतु मैं उसमें कर भी क्या सकता हूँ। तिब्बत का सामंतवाद से निकलना आवश्यक था।
इस बीच चीन द्वारा भारतीय सीमा में घुसपैठ की खबरें आती रहीं जिस पर 8 मई 1959 को लोकसभा में बहस हुई और नेहरू ने कहा कि लद्दाख का पूर्वी तथा उत्तर पूर्वी क्षेत्र निर्जन है और पर्वतीय क्षेत्र है तथा वहां की घाटियां भी 13000 फीट से अधिक ऊँची हैं। अक्टूबर 1957 और फरवरी 1958 में चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुसे थे। जिस पर हमने माओ शासन को लिखा था। बाद में उन्होंने भारतीय सीमा में एक सैन्य शिविर स्थापित कर लिया जिस पर आपत्ति जताने पर उन्होंने इसे अपना ही क्षेत्र बताया। माओ सरकार तुर्कीस्तान की ओर जाती हुई एक सडक़ बना चुकी है जो हमारे लद्दाख के भीतर से गुजरती है। यह सीमा हजारों वर्गमील लंबी है और कई जगह सीमा की स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने नक्शों में हमारे कुछ क्षेत्रों को अपना दिखाया है। जिस पर हमने अपनी आपत्ति उन्हें भेजी है।
नेहरू ने जानबूझकर सीमा पर पुलिस चैकियां ही स्थापित की थीं। जिन्हें गश्त लगाते समय माओ के सैनिकों ने गिरफ्तार कर लिया। लोकसभा में इस पर प्रश्न उठाने पर नेहरू ने कहा कि अब उन सिपाहियों को रिहा कर दिया गया है। जब जसवंत सिंह ने पूछा कि क्या सीमा को लेकर कोई संदेह है तो नेहरू ने कहा कि हाँए वे लोग हमारे क्षेत्र को अपना बता रहे हैं और कुछ चीजें बिल्कुल स्पष्ट नहीं हैं।
इस प्रकार एक योजना के अंतर्गत नेहरू ने माओ की कम्युनिस्ट पार्टी का आधिपत्य फैलाने के लिये 1962 में छद्म युद्ध का दिखावा करते हुये भारत का भी बड़ा भू-भाग माओ को सौंप दिया। वस्तुत: नेहरू कश्मीर को भी उसी समय माओ के हवाले करने के इच्छुक थे, ऐसा लगता है। माओ अपनी ओर से भारत पर आक्रमण की कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था, यह चाउ और नेहरू की बातों से बारम्बार प्रमाणित होता है।
जब अक्टूबर 1962 में क्यूबा में मिसाईल युद्ध की स्थिति थी और सोवियत संघ तथा अमेरिका दोनों वहां टकराव की स्थिति में उलझे हुये थे, ठीक उसी समय मौका देखकर छद्म युद्ध का यह नाटक किया गया और जैसे ही क्यूबा संकट की समाप्ति हुई, संयुक्त राज्य अमेरिका के हिन्द महासागर की ओर बढऩे की बात हवा में आई और माओ की सेनायें एक तरफा युद्ध विराम का नाटक करते हुये वापस चली गईं। टकराव की उस अवधि में नेहरू ने भारत की सेनाओं को आवश्यक साधनों से वंचित रखा और थल सेना को एअर कवर भी नहीं दिया। इससे भी प्रमाणित है कि नेहरू ने यह छद्म युद्ध भारत की सैन्य महत्व की इस भूमि को माओ को सौंपने के लिये ही छेड़ा था। यह भारत की भूमि को सौंपने की साजिशन मिली भगत थी जिसका अधिकार भारत की संसद और भारत के प्रधानमंत्री को भी कदापि नहीं है और यह भारत की सार्वभौमता और अखंडता के विरूद्ध किया गया देशद्रोह का कार्य है।

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