भारत की शक्ति एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में प्रवेश
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राकेश कुमार
मुख्य केन्द्रीय प्रभारी, पतंजलि योग समिति
आज पूरे विश्व में 204 देश हैं। उसमें अमेरिका, चीन, जापान व भारत, ये विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था वाले देश हैं। अमेरिका की 1500 लाख करोड़ से अधिक की, चीन की 950 लाख करोड़ रुपये की तथा जापान की 360 लाख करोड़ व भारत की 205 लाख करोड़ रुपये की अर्थ-व्यवस्था है। यद्यपि अमेरिका दुनियाँ में सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था का केन्द्र है लेकिन 700 लाख करोड़ रुपये का विदेशी कर्ज, मात्र लगभग 2% की ही विकास दर, 8% का बजटीय घाटा, न्यूनतम सोना व विदेशी मुद्रा भण्डार, घटता हुआ निर्यात तथा टूटती हुई साख के कारण अमेरिका में फॉरेन इन्वेस्टमेन्ट के नाम पर जमा 4-3 ट्रिलियन डॉलर अर्थात लगभग 300 लाख करोड़ रुपये कभी भी उसकी अर्थ-व्यवस्था से बाहर हो सकता है, अमेरिका देश की बड़ी-बड़ी संस्थाएं भी अब स्वीकार कर रही हैं कि जो देश पूरी दुनियाँ को कर्ज देता था आज वह खुद बहुत बड़े कर्ज के नीचे दब गया है। जापान क्योंकि बहुत छोटा देश है, अत: उसके विकास की भी सीमाएं अधिक नहीं हो सकती। अब असली मुकाबला चीन व भारत के बीच ही होगा।
पूरा यूरोप अर्थात् यूरो जोन इटली व ग्रीस आदि धीरे-धीरे कर्ज के कारण दिवालिया हो रहे हैं, यूरोप व यूरो के पतन के बाद अमेरिका व डॉलर का भी पतन तय है, ब्रिटेन तथा पौंड तो पहले ही बहुत बुरी स्थिति में है। ब्रिटेन की कुल जी.डी.पी. है लगभग 192 लाख करोड़ तथा कर्ज है लगभग 172 लाख करोड़। अत: अब विश्व की महाशक्तियों के रूप में दो ही देश उभर कर सामने आ रहे हैं चीन व भारत।
हमें चीन का मूल्यांकन कम करके नहीं आंकना चाहिए। भारत से चीन की अर्थ-व्यवस्था तो लगभग पाँच गुना बड़ी है साथ ही चीन में बचत भी हमसे लगभग दो गुणा, सैन्य शक्ति व परमाणु शक्ति भी हमसे कम से कम दो गुणा अधिक है। सबसे बड़ी बात चीन का निर्यात तथा सोना व विदेशी मुद्रा का भण्डार भी हमसे लगभग दस गुणा अधिक है। औद्योगिक विकास में भी चीन भारत से कई गुणा आगे निकल चुका है। अमेरिका व अफ्रीका सहित पूरे विश्व की अर्थ-व्यवस्था में चीन का बहुत बड़ा दखल है। अन्त में सबसे बड़ी व खतरनाक बात यह है कि चीन भारत का मित्र राष्ट्र न होकर सदा बैर रखने वाला, भारत से युद्ध करने वाला देश रहा है। अत: आज हम यदि देश का ये 400 लाख करोड़ रुपये देश को दिलाकर इसे पूरी ईमानदारी से राष्ट्र के विकास में लगाते हैं तो भारत एक ही दिन में चीन से आगे निकल सकता है और विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन सकता है।
जब ये 400 लाख करोड़ रुपये कृषि, उद्योग व सेवाओं के विकास में लगेंगे तो देश में एक भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं होगा। गरीबी, मंहगाई व अन्य सब समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जायेंगी। भ्रष्टाचार के मिटने एवं अन्याय व पक्षपात पूर्ण भ्रष्ट-व्यवस्था के परिवर्तन होने से सब देशवासियों को न्याय मिलेगा। हम भी बचेंगे तथा देश भी बचेगा।
भारत भावी विश्व की आर्थिक व आध्यात्मिक महाशक्ति बनेगा। भारत के उदय से एक नए शान्ति व समृद्धि पूर्ण विश्व का उदय होगा। 2020 तक वल्र्ड बैंक, आई.एम.एफ., यू.एन.ओ., डब्लू.टी.ओ., डब्लू.एच.ओ. विश्व की ये पाँच शीर्ष संस्थाएं भारत के नेतृत्व में कार्य करेंगी।
अमेरिका की 1500 लाख करोड़़ से अधिक की, चीन की 950 लाख करोड़ रुपये की तथा जापान की 360 लाख करोड़ व भारत की 205 लाख करोड़ रुपये की अर्थ-व्यवस्था है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में प्रवेश
स्वदेशी को अपनाना है, देश को समृद्ध बनाना है। अब स्वदेश का एक भी पैसा, जाएगा न विदेश में।
भारत में विदेशी कम्पनियाँ तीन तरीके से काम कर रही है। पहले, सीधे अपनी शाखायें (Branch) स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कम्पनियों (Subsidiaries) के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कम्पनियों के साथ साझेदार कम्पनी (Colaboration) के रूप में।
आज 2020 तक 3376 ....... जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 3500 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कम्पनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं। औसतन 1000 से अधिक नये विदेशी समझौते प्रतिवर्ष देश में होते हैं।
सन् 1972 के अन्त तक देश में कुल 740 विदेशी कम्पनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कम्पनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कम्पनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कम्पनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कम्पनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कम्पनियों की संख्या 1136 हो गयी। आज सन् 2008 में 2500 से कुछ अधिक कम्पनियाँ भारत में काम कर रही हैं।
आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कम्पनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कम्पनियों के सीधे नियन्त्रण में 701 कम्पनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। ब्रिटेन की अन्य 32 कम्पनियाँ, भारतीय कम्पनियों के साथ किये गये समझौतों के तहत कार्यरत थीं। ये 8 विशालकाय ब्रिटिश कम्पनियाँ सन् 1853 से ही भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत लायी गयी ये कम्पनियाँ सन् 1860 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारतीय उपमहाद्वीप के शोषण के लिये धारदार हथियार बन चुकी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो जाने के बाद ये कम्पनियाँ दुनियाँ के अन्य दूसरे देशों में शोषण करने चली गयीं। ये 8 ब्रिटिश कम्पनियाँ निम्न थीं-
1. एन्ड्रयूल एण्ड कम्पनी
2. मेक्लाइड एण्ड कम्पनी
3. मार्टिन एण्ड कम्पनी
4. बर्न एण्ड कम्पनी
5. डंकन ब्रदर्स एण्ड कम्पनी
6. आक्टेवियस स्टील एण्ड कम्पनी
7. गिलैण्डर अर्बुदनाट एण्ड कम्पनी
8. शा वालेस एण्ड कम्पनी
भारत में जैसे-जैसे विदेशी पूँजी का निवेश बढ़ता गया वैसे-वैसे विदेशी कम्पनियों की संख्या बढ़ती गयी। इसके साथ जुड़ा हुआ एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन विदेशी कम्पनियों ने भारत में पूँजी निवेश किया उनमें से अधिकांश कम्पनियों ने अपने निवेश करने के अगले वर्षों में ही अपनी निवेश की हुयी पूँजी के बराबर या उससे अधिक पूँजी कमा ली। बाकी अन्य कम्पनियों ने अधिकतम 5 वर्षों में अपनी निवेश की हुई पूँजी को कमा लिया।
हर क्षेत्र में घुसी हैं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ
आज देश का छोटा-बड़ा प्रत्येक क्षेत्र इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में आने वाली कोई भी चीज ऐसी नहीं हैं, जिसे ये कम्पनियाँ न बनाती हों। दैनिक उपयोग के सामानों का उत्पादन करके ये विदेशी कम्पनियाँ घर-घर में घुसी हुयी हैं। खेती के काम में आने वाले जहरीले कीटनाशकों, खादों अन्य उपकरणों का उत्पादन करके इन विदेशी कम्पनियों ने हमारी आत्मनिर्भर खेती को अपना गुलाम बना लिया है। उद्योगों के क्षेत्र में रद्दी तकनीकी का इस्तेमाल करके वातावरण को विषैला कर दिया है। हवा, पानी और मिट्टी भी अब प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं।
नीचे उन क्षेत्रों की सूची दी गयी है जिनमें घुसकर इन विदेशी कम्पनियों में हमारी आर्थिक व्यवस्था को पंगु बना दिया है। कुछ प्रमुख उत्पादन के क्षेत्र, जिनमें विदेशी कम्पनियाँ घुसी हुई हैं-
1. दैनिक उपभोग की सामग्री के क्षेत्र में
2. दवा उद्योग के क्षेत्र में
3. खाद, कीटनाशक, दवायें व खेती उपकरणों के क्षेत्र में
4. रासायनिक पदार्थों के उत्पादन में
5. मोटर-गाडिय़ों के उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में
6. भारी इंजीनियरिंग सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
7. इलेक्ट्रानिकी व इलैक्ट्रीकल सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
8. सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में
9. फूड प्रोसेसिंग व प्लांटेशन (चाय, कॉफी, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, चॉकलेट)
10. वैज्ञानिक रक्षा अनुसंधान में
11. सीमेन्ट उद्योग में
12. तेल शोधन व उत्पादन के क्षेत्र में
13. धातुओं के खनन तथा निष्कर्षण क्षेत्र में,
14. जूट उद्योग में
15. सिले हुये (रेडीमेड) कपड़ों के उत्पादन क्षेत्र में
16. जूते व अन्य खेल सामानों के उत्पादन क्षेत्र में
17. रबर इन्डस्ट्रीज के क्षेत्र में
18. बच्चों के खिलौने व अन्य प्लास्टिक सामानों के उत्पादन में
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ताकत
भारत में इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कितनी ताकत है? इनकी ताकत का अंदाज इसी बात से लगया जा सकता है कि दुनियां की सबसे बड़ी विशालकाय (Giants) 100 बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत में काम कर रही हैं। जिनके बारे में ‘फारचून’पत्रिका के जुलाई 2008 के अंक में एक टिप्पणी छपी थी-
पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर चुनी गयी 500 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा है। जितनी तरल परिसम्पत्ति इन 500 कम्पनियों के पास हैं, उसमें जरा सी भी हेर-फेर कर देने पर पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। इन सभी कम्पनियों की शाखायें दुनियां के 125 से भी अधिक देशों में है। इन 500 कम्पनियों में से 100 कम्पनियाँ भारत में काम कर रही हैं। इन 500 कम्पनियों में से प्रत्येक का वार्षिक कारोबार भारत सरकार के वार्षिक बजट से अधिक है।
वर्ष 2008 में इन कम्पनियों की विश्व भर में बिक्री तथा भारत में ये कम्पनियाँ किस रूप में कार्य कर रहीं हैं, इसका विवरण नीचे दी गयी तालिका में दिखाया गया है-


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01 Mar 2025 17:58:05
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