भोर का पहला नाम : ‘पूज्य स्वामी जी महाराज’
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वंदना बरनवाल
राज्य प्रभारी, महिला पतंजलि योग समिति, उ.प्र. मध्य
वर्ष 2020, एक ऐसा वर्ष जिसने ना जाने कितने प्रकार के अनुभव पूरे विश्व को दे डाले। वर्ष की शुरुआत में शायद ही किसी को ऐसा अनुमान रहा हो कि कोरोना जैसी महामारी पूरे वर्ष को ही अपने नाम करवा लेगी। इस वायरस की पहचान पहली बार 31 दिसंबर 2019 को चीन में हो गई थी और इसीलिए लोग इसे चाइनीज वायरस भी कहने लग गए पर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि डब्ल्यू.एच.ओ. ने फरवरी 2020 में इस वायरस का आधिकारिक नाम ‘कोविड-19’ घोषित किया। ‘कोविड-19’ में ‘को’ का मतलब ‘कोरोना’, ‘वि’का मतलब ‘वायरस’और ‘डी’का मतलब ‘डिसीज’अर्थात बीमारी था। कोरोना वायरस को इसका नाम लैटिन शब्द से मिला है जिसमें कोरोना का मतलब होता है क्राउन अर्थात ताज। दरअसल इस वायरस की सतह पर कांटे जैसी आकृति होती है जो देखने में ताज जैसी लगती है इसी वजह से इसे कोरोना नाम दिया गया। लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है पर देखते-देखते यह नयी बीमारी अनेकों आम और खास के सिर पर बीमारी का ताज बनकर सवार होने लगी। नयी होने के कारण यह नोवल कोरोना वायरस भी कहलाने लगी।
नोवेल कोरोनावायरस यानि कि यह वायरस इंसानों के शरीर के लिए नया है। इस नयी बीमारी के पीछे के कारण को संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों ने रेखांकित करते हुए बताया कि पिछले कुछ वर्षों में जानवरों और पक्षियों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियां लगातार बढ़ी हैं। विज्ञान की भाषा में इस तरह की बीमारियों को जूनोटिक डिजीज अर्थात प्राणीजन्य रोग कहा जाता हैयानि एक ऐसी बीमारी जो जानवरों में होती है और फिर उनसे इंसानों में फैलती है। संयुक्त राष्ट्र संघ की पर्यावरण से जुड़ी एक संस्था ने यह भी कहा कि अगर इंसानों ने जंगली जीवों को मारना और उनका उत्पीडऩ जारी रखा तो भविष्य में उसे कोरोना वायरस संक्रमण जैसी दूसरी अन्य बीमारियों का सामना भी करना पड़ सकता है। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक प्रोटीन की बढ़ती मांग के लिए जानवरों को मारा जा रहा है और इसका खामियाजा आखिरकार इंसान को ही भुगतना पड़ रहा है। ऐसे में सचमुच धन्यवाद देते हुए गर्व कीजिये अपने वेदों की ज्ञान परंपरा और वैदिक संस्कृति पर जिसने हमें मांसाहारी होने से दूर ही नहीं रखा बल्कि शाकाहारी भोजन में भी सात्विक, राजसिक और तामसिक भोजन के विभेद को भी समझाया।
चूँकि इस महामारी की प्रकृति तेजी से फैलने वाली और संक्रामक थी इसलिए देखते ही देखते चीन के वुहान शहर से निकलकर इसके वायरस ने दुनिया के अनेकों देशों में अपने पाँव पसारने शुरू किये और फिर भारत में भी मार्च के पहले सप्ताह यानि होली से पहले अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी और फिर धीरे-धीरे इसका स्वरुप भयावह होते हुए डराने लगा। अनजान बीमारी के खौफ और प्रकोप से बचने के लिए लोग होली के रंगों से ठीक प्रकार से भले ही नहीं खेल पाए पर होली से लेकर अब तक इस वायरस ने देश के लोगों को अनेकों रंग जरुर दिखा दिए। यद्यपि इससे संक्रमित व्यक्ति में शुरूआती लक्षण इतने सामान्य थे कि जब तक परेशानी ज्यादा नहीं बढ़ जाये तब तक पीडि़त व्यक्ति को स्वयं ही इसका अंदाज नहीं लग पा रहा था कि वह कोरोना से संक्रमित हो चुका है पर दुनिया भर से जो समाचार मिल रहे थे वो भयावह थे।
भारत जैसे देश अति जनसँख्या वाले देश में जनसँख्या इतनी बड़ी चुनौती है कि अच्छे स्वास्थ्य और चिकित्सा की सुविधा हर व्यक्ति तक पहुंचा पाना आसान नहीं। शोध एजेंसी लैंसेटके ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज के एक अध्ययन के अनुसार भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है। शायद इसीलिए हमारे देश में सामान्य मानसिकता है कि हम शरीर में हो रहे बदलाव तथा सामान्य बीमारियों के प्रति तभी गंभीर होते हैं जब लक्षण गंभीर परिणाम देने लग जाएँ। अत: कोरोना के कारण बुखार, सूखी खांसी, सूंघने की शक्ति का खोना, सरदर्द और जुबान से स्वाद का गायब होना जैसे लक्षणों के प्रति लोगों में गंभीरता नहीं दिखी। लोगों को संक्रमण से बचने के लिए अचानक ही सरकार ने विशेष दिशा निर्देशों के साथ देश भर में लॉकडाउन घोषित कर दिया। उद्देश्य यही था कि लोगों में शारीरिक दूरी बनी रहे और वे अति आवश्यक होने पर ही घर से निकलें ताकि संक्रमित लोगों के संपर्क में आने से बच सकें क्योंकि इस महामारी की कोई दवा नहीं थी।
लोगों के लिए लॉकडाउन, सामाजिक और शारीरिक दूरी, होम आइसोलेशन, वर्क फ्रॉम होम जैसे शब्द भले ही नए नहीं थे परन्तु अपने होश में बहुत कम लोगों को ही शायद कभी ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा हो। एक तो महामारी उस पर से ढेरों प्रतिबन्ध, पहले तो किसी के कुछ समझ में ही नहीं आया यहाँ तक कि व्यवस्था सँभालने वाले भी शायद नहीं समझ पा रहे थे कि सब कुछ कैसे व्यवस्थित रखा जाये। इसलिए समय बीतने के साथ नयी-नयी परेशानियाँ भी आती रहीं। कभी मजदूरों का पलायन तो कभी खाने-पीने के वस्तुओं की मारा-मारी। चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े लोगों के समक्ष लोगों की जिन्दगी बचाने की चुनौती थी तो शासन और प्रशासन के लिए भी व्यवस्था को बनाये रखने की चुनौती। आपदा का यह दौर लोगों के संयम और इच्छाशक्ति की परीक्षा ले रहा था और शुरुआत में ही कई मौकों पर ऐसा लगा जैसे बीमारी से पहले ही किसी अन्य कारण से लोग न हार जायें।
जिस तरह की जिन्दगी और जिस तरह की भाग-दौड़ की आदतों के साथ लोग जीने के आदी हो चुके थे लॉकडाउन ने उन सबको लॉक कर दिया। कुछ लोगों के लिए परिवार संग चौबीस घंटों का समय मिलना वरदान साबित हुआ तो वहीं कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्हें स्वयं का घर ही जेलखाना लगने लगा। किसी को परिवार का सुख भाने लगा था तो कोई तनाव और अवसाद से ग्रस्त होने लग गया। व्यापारी को अपने मुनाफे की चिंता सता रही थी और दिहाड़ी मजदूर को रोजी रोटी की चिंता हो रही थी। सकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोगों के लिए इस लॉकडाउन ने कुछ नए दरवाजे खोले तो नकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोग हर पल सोचते और डरते रहे कि कल क्या होगा।
क्यूँ डरते रहें कि जिंदगी में क्या होगा
हर पल ऐसा क्यों सोचें कि बुरा ही होगा
चुनौतियों में भी हिम्मत के साथ
यदि बढ़ाते रहें मंजिल की तरफ कदम
यकीन मानिये कुछ हो न हो
पर कम से कम तजुर्बा तो नया होगा।
यद्यपि कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है पर लॉकडाउन हटने से जन-जीवन और अर्थ व्यवस्था दोनों ही पटरी पर लौट रहे हैं। पर सडक़ों भीड़ और बढ़ते प्रदूषण को देखकर ऐसा लगता है जैसे लॉकडाउन के दौरान बिताये वो पल सचमुच सुकून भरे थे। भले ही कुछ लोगों के लिए वो समय मुश्किलों भरा था परन्तु आज जब लॉकडाउन के साथ बिताये हुए पलों के बारे में सोचिये तो सब कुछ एक स्वप्न सा लगता है क्योंकि इस दौरान जिन्दगी के साथ ही प्रकृति को भी बहुत करीब से महसूस करने का मौका मिला। अलसाई सी सुबह ताजगी से भरी हुई थी, आकाश सचमुच आसमानी हो गया था, हवा इतनी शुद्ध कि प्रदूषण के कारण आँखों की लालिमा और जलन न जाने कब गायब हो गयी। पूरी की पूरी प्रकृति मुस्कुरा रही थी, कहीं कोई विषैलापन नहीं था। न फैक्ट्री का धुंआ, न विमानों की गडगड़ाहट, न वाहनों का शोरगुल और न ही रेल की खटर-पटर। अगर कुछ था तो सुबह होते ही चिडिय़ों के चहचहाने और मंद-मंद हवाओं के झोंके के साथ प्रकृति का संगीत और शाम के बाद आसमान में चंदा मामा और टिमटिमाते तारे। न सुबह किसी को ऑफिस जाने की जल्दी थी और न बच्चों को स्कूल और होम वर्क की चिंता।
रोजगार की तलाश में जो गाँव छूट गए थे दुबारा वही जीने का सहारा बने। जो संयुक्त परिवार सिकुड़ कर एकल परिवार में तब्दील हो गए थे वे वापस संयुक्त परिवार में बदलने लगे। निश्चित रूप से परिवार के सदस्य कभी भी भावनात्मक तौर पर इतने करीब नहीं हुए थे। भागदौड़ भरी जिंदगी में जिन रिश्तों की दौड़ फोन पर यह पूछने में कि क्या हालचाल है और फिर यह बताने में कि सब ठीक है तक सीमित हो चुकी थी उन रिश्तों में अपनेपन के नए समीकरण जुडऩे लगे। शिकायतें खत्म होने लगीं घर के बुजुर्गों की सुनी जाने लगी और रिश्तों में आई कड़वाहट मिटने लग गई। खाना बनाने की शौकीनों ने जब रसोई की पिच पर बल्ला घुमाया तो भारतीय पकवानों के स्वाद ने फास्ट फूड को ऐसा बाहर का रास्ता दिखाया कि बच्चे आज भी उनको याद नहीं कर रहे। मोबाइल गेम ने थकाया तो लूडो और कैरम बोर्ड के साथ ही शतरंज की बाजियां बिछने लगीं, ऑनलाइन टीवी सीरिज से थक गए तो रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिक लुभाने लग गए। अत: यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि सामाजिक परिभाषा बदलने के साथ ही अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला कोरोना वायरस परिवार और पर्यावरण के नजरिये से संजीवनी बनकर आया क्योंकि इसी दौरान पर्यावरण को लेकर कई सुकून देने वाली खबरें भी सामने आयीं। प्रदूषण का स्तर अपने आप कम होने लगा और कार्बन, नाइट्रोजन उत्सर्जन में कमी के कारण ओजोन परत ठीक होने लगी। कहाँ तो गंगा की गंदगी से निपटने के लिए अलग से मंत्रालय बनाया गया था और सफाई के लिए नमामि गंगे परियोजना शुरू की गयी थी जिसके लिए हजारों करोड़ के बजट को मंजूरी भी दी गई थी। पर महज कुछ ही दिनों में लॉकडाउन ने गंगा के प्रदूषण में पचास प्रतिशत तक की कमी ला दी।
यही नहीं एक खबर और आई कि डॉक्टर के पास इलाज के लिए लाइन लगाने वालों की संख्या खत्म हो गई है और दवा व्यवसाय की भी कमर टूट रही है। सन्देश स्पष्ट था कि लोग जिन्दगी की भाग-दौड़ में दवाओं में ही स्वास्थ्य ढूंढने लग गए थे और उनकी इसी व्यस्तता का फायदा उठाकर अंग्रेजी दवाओं की कंपनियों ने बड़ी अर्थ व्यवस्था कायम कर ली थी। उत्तर प्रदेश के केमिस्ट एवं ड्रगिस्ट फेडरेशन ने तो बाकायदा एक वक्तव्य जारी किया कि लॉकडाउन के एक महीने में दवा कारोबार को 451 करोड़ यानि दो माह में 902 करोड़ का नुकसान हो चुका है। मतलब साफ था कि जिन्दगी की आपाधापी में लोग दवाओं और अस्पतालों पर कितने ज्यादा निर्भर थे अपने कीमती समय और मेहनत से कमाए धन को कैसे अस्पतालों के चक्कर में लुटा रहे थे। चूँकि लॉक डाउन ने जिन्दगी की भागम-भाग पर नियंत्रण किया, बाहर के खान-पान से दूर रहने पर मजबूर किया और साथ ही परिवार संग सुख-दु:ख बाँटने का मौका दिया तो इसने दवाओं का खर्च भी कम कर दिया।
यही नहीं, लोगों का आयुर्वेदिक दवाओं और काढ़े के साथ ही नियमित योगाभ्यास पर भरोसा बढऩे लगा क्योंकि इलाज के लिए जारी सरकारी दिशा निर्देशों में भी योगाभ्यास के फायदे गिनाते हुए काढ़े को शामिल कर दिया गया जिसने यह सिद्ध कर दिया कि जहाँ पश्चिमी विज्ञान मौन होने लगता है वहां भारत की परम्परागत और प्राचीन विद्या पुन: संदर्भित होकर पूरी विश्वसनीयता के साथ मजबूत आधार प्रदान करने में सक्षम है। इसलिए एक बार फिर से मौका आया प्राचीन भारतीय परम्परा और संस्कृति को धन्यवाद देने का क्योंकि हमारी इस दिव्य परंपरा ने हमें योग और आयुर्वेद का अनमोल खजाना जो दिया है। जो लोग योग करते चले आ रहे थे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता न सिर्फ उनके लिए कवच ही बनी बल्कि वो तनावग्रस्त होने से भी बचे रहे। इस तरह से कोरोना संक्रमण के दौर में जिन समस्याओं का तोड़ किसी के पास नहीं था और जो काम विश्व के बड़े-बड़े वैज्ञानिक नहीं कर पा रहे थे उस काम को पतंजलि योगपीठ के मूल में बसे अभियान ‘योग और आयुर्वेद’ने बहुत ही सलीके से, शांतिपूर्वक, पूरी प्रमाणिकता के साथ परदे के पीछे रहकर सम्पादित कर दिया और किसी को भनक भी नहीं लगने दी।
दुनिया माने या ना माने पर कोरोना संग जंग और उस पर विजय की गाथा में धन्यवाद के वास्तविक हकदार तो परम पूज्य योगऋषि स्वामी जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्यश्री ही रहेंगे जिनके प्रचंड पुरुषार्थ और दिन रात की कड़ी मेहनत ने योग और आयुर्वेद की इस विरासत को न सिर्फ संभाला और सहेजा बल्कि नए-नए अनुसंधानों के साथ देश ही नहीं विश्व के समक्ष भी पुनस्र्थापित कर दिया। योग न करने के ढेरों बहाने बनाने वाले लोग भी योग की महत्ता समझने लगे और ऑफ लाइन की जगह ऑनलाइन योग की कक्षाएं चल पड़ीं। इसी बीच जब 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने की बारी आई तो उसका थीम ‘घर में रहते हुए परिवार के साथ योग’रखा गया। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के ठीक दो दिनों बाद ही अपने गहन अध्ययन और अनुसन्धान के बल पर पतंजलि ने इस महामारी से निजात दिलाने के लिए लोगों को कोरोनिल, श्वासारी और अणु तेल के नाम से कोरोनिल किट अर्थात इम्यून बूस्टर भी उपलब्ध करवा दी। कतिपय कारणों से इसके विज्ञापन पर रोक और बाद में आयुष मंत्रालय से मिली राहत के पश्चात जून से लेकर अक्टूबर तक मात्र 4 महीने में ही 250 करोड़ रुपए की कोरोनिल किट बिक गयी। पतंजलि का यह आंकड़ा इतना साबित करने के लिए पर्याप्त है कि संकट के समय में परम पूज्य गुरुवर और श्रद्धेय आचार्यश्री पर लोगों का विश्वास कितना गहरा है।
योग और आयुर्वेद में लोगों के इस विश्वास से भारतीय संस्कृति और परम्परों की गूंज फिर से पूरे विश्व में छाई जिसका श्रेय पूज्य स्वामी जी को ही जाता है। क्योंकि तीन दशकों से भी अधिक समय से भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को संजोने वाले पूज्य गुरुवर भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में आदर्श स्वास्थ्य के प्रतीक और प्रेरणा हैं। महामारी के इस दौर ने लोगों को यह भी अहसास कराया कि पतंजलि योगपीठ और इसके प्रकल्पों का स्थापत्य किसी तीर्थ से कम नहीं और प्रयागराज में यदि गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है तो पतंजलि योगपीठ में योग, आयुर्वेद और स्वदेशी का संगम है जहाँ से संकट के समय स्वत: एक नयी धारा फूट पड़ती है। कोरोना काल में भी यही हुआ। भारतीय समयानुसार हर रोज सुबह ठीक 5 बजे आकाशीय सूर्य निकलने से पहले ही पतंजलि योगपीठ से पूरे उत्साह के साथ, सूर्य की भांति चेहरे पर तेज लिए श्रद्धेय स्वामी जी लोगों में अच्छे स्वास्थ्य की आशा और विश्वास के किरण का संचार करने लगे। जैसे सूर्य के उदय होते ही अँधेरा छटने लगता है उसी प्रकार सुबह 5 बजते ही महामारी के कारण छाया अँधेरा आस्था, संस्कार, इंडिया टीवी, दूरदर्शन, फेसबुक लाइव, ट्विटर लाइव आदि के माध्यम से छंटने लगा और हर दिन करोड़ों लोगों लाभान्वित होने लगे. देखते-देखते स्वामी जी संज्ञा के रूप में अच्छे स्वास्थ्य के नायकऔर विशेषण के रूप में लोगों के इच्छित आदर्श बनकर घर-घर में भोर का पहला नाम बन गए।
अब जब लॉकडाउन जब कमोबेश हटाया जा चुका है और जिंदगी वापस पहले की तरह पटरी पर लौटने लगी है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि हम सब फिर से उसी आपाधापी में शामिल हो ही जायेंगे। पर बीते महीनों ने इतना तो समझा ही दिया है कि जो सकारात्मक बदलाव हमने देखे और महसूस किए हैं अगर इसका कुछ हिस्सा भी आगे बरकरार रख पाए तो इसका फायदा हमें भविष्य में देखने को जरूर मिलेगा। हम सब इतना जरुर याद रखने कि स्वास्थ्य ना तो डॉक्टर के हाथ में है और न ही दवाओं में है, स्वास्थ्य हमारी दिनचर्या में है, स्वास्थ्य हमारी आदतों में है, विचारों में है एवं वाणी में है। इसके साथ ही उम्मीद है कि नयी पीढ़ी के लिए यह दौर खूबसूरत और सकारात्मक अनुभव भी लाया होगा जिसके कारण पारिवारिक स्तर पर हुए बदलाव से वे भविष्य में भी रिश्तों की अहमियत को समझते रहेंगे।
निश्चित रूप से रुपया-पैसा धन है पर यदि हम ये समझते हैं कि सिर्फ यही धन है तो यह हमारी अज्ञानता है फिर भी कई बार लोग धन इकठ्ठा करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि परिवार कितना बड़ा धन है वो समझ नहीं पाते। ये सच है कि आर्थिक अनुकूलता बहुत कुछ दे देती है पर दुनिया में उससे भी कीमती धन बहुत कुछ और भी है। हमारा समय भी धन है, हमारे विचार धन हैं, मित्र धन है, प्रकृति धन है और इन सबसे कीमती स्वास्थ्य धन है। अत: लॉकडाउन से मिली अनमोल सीख को भूलियेगा मत।
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