मातृ शक्ति

डॉ. विपिन कुमार द्विवेदी

पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार

भारत ऋषि संस्कृति वाला देश है, जहाँ नारियों का एक विशेष स्थान है एवं लोग नारी को देवी का स्थान देते हैं। वह स्त्री समाज में माँ, बहन, बेटी आदि महत्त्वपूर्ण सम्बन्धों में रहकर अपनी जीवन यात्रा करती हैं। दया, शील, नम्रता, सहिष्णुता, सौम्यता, परोपकार, वात्सल्य जैसे विशिष्ट गुणों के कारण वह समाज में आदर्श-स्वरूप प्रस्तुत करती है। इन्हीं गुणों के कारण अपाला मैत्रेयी, लोपामुद्रा, अनुसूया, अरुन्धती, सावित्री, सीता, द्रोपदी, कुन्ती, तारा, मन्दोदरी आदि नारियों ने अपना स्थान इतिहास के पन्नों में सुरक्षित कर लिया है। गार्गी ने तो महर्षि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ कर मानव समाज में स्त्री को शिक्षा के क्षेत्र में भी सम्मान दिलाया। पद्मावती ने पतिधर्म का पालन करते हुए स्वाभिमान और मर्यादा की सच्ची परिभाषा गढ़ी। कल्पना चावला आदि आधुनिक नारियों ने स्त्री को प्राचीन रूढि़वादिता से मुक्त होक उन्मुक्त गगन में उडऩे की प्रेरणा दी। आज देश की करोड़ों नारियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों जैसे सेना, स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, कला, विज्ञान, साहित्य आदि में विशिष्ट योगदान देकर देश की तकदीर बदल रही हैं। प्रबंधन, तकनीकि एवं राजनीति में भी सक्रिय होकर उत्तम जीवन शैली, भौतिक विकास एवं लोकतंत्र का एक नया स्वरूप गढ़ रही हैं। नारी सौन्दर्य-निधि है, वह दैहिक सौन्दर्य एवं भाव सौन्दर्य की अनुपम कृति है, यही कारण है कि भर्तृहरि विद्या का माहात्म्य बताते हुए उसकी समता स्वरूप स्वभाव दोनों से प्रकाशमान स्त्री से करते हुए कहते हैं कि विद्या तो उस कान्ता के समान है जो दूसरों के खेद-खिन्नता, दु: आदि को दूर करने में समर्थ है-
कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम् (नीतिशतक)
नारी के गुणों से अत्यन्त प्रभावित होकर जयशंकर प्रसाद ने तो उसे श्रद्धा ही बता डाला-
नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में।
पीयूष-स्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में।।
(कामायनी)
मनु ने मनुस्मृति में घर को नारी के बिना जंगल बताया है, वे लिखते हैं-
गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।
विना गृहिणी गेहमरण्यसदृशं मतम्।। (मनु.)
जीवन में नारी के महत्त्व को भर्तृहरि का यह श्लोकाँश और भी स्पष्ट कर देता है कि जीवन में दो मार्ग सामने आते हैं- या तो नारी का या फिर कोई गुफा का अर्थात् किसी स्त्री के साथ विवाह करके गृहस्थ में चले जाना या फिर सब छोडक़र संन्यस्त होकर किसी गुफा का आश्रय लेकर तपश्चरण करना-
एका नारी दरी वा गृही वा
(नीतिश. श्लोकाँश)
नारी मनुष्यों के लिए ही नहीं अपितु देवताओं के लिए भी आदर सम्मान का पात्र रही हैं। नारियों के सम्मान उनके आदर से देवों की कृपा प्राप्त होती है जैसा निम्रांकित श्लोक में कहा गया है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रैतास्तु पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।
इसमें नारी के सम्मान होने की स्थिति में किसी भी स्थान पर होने वाली क्रियाओं को विफल बताया गया है- अर्थात् किसी भी क्रिया का फल होता ही है, लेकिन उसमें जो सुखद सन्तोषमय अनुभूति है- वह कदाचित् उस क्रियाफल में नहीं होती, इसलिए उस सन्तोषात्मक सुखोपलब्धि हेतु नारियों में सम्मान का भाव रखना आवश्यक है। नारी में एक सबसे बड़ा गुण होता है- सेवा का। सेवा कार्य अत्यन्त कठिन है। इसमें सेवक को सेवा करते समय अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। मान-अपमान, सुख-दु:, प्राप्ति-अप्राप्ति में सम रहते हुए स्वामी के संकेतों पर चलना पड़ता है- यही कारण है कि भर्तृहरि ने भी सेवा को योगियों के लिए भी अगम्य बताया है-
सेवाधर्म: परमगहनो योगिनामप्यगम्य:
इसके साथ ही उन्होंनेमौनान्मूक:’ कहकर सेवक की सेवा कार्य में अडिगता को बड़े ही गम्भीरता से बताया है। एक ध्वनिवादी आचार्य-आनन्दवर्धन का मत है कि पृथ्वी का भोग तीन प्रकार के लोग ही कर सकते हैं- एक पराक्रमी, दूसरा बुद्धिमान एवं तीसरा सेवक, उन्होंने लिखा है-
सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रय:
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम्।।
अर्थात् सेवा भाव से यही नारी भौतिक उपलब्धियों को प्राप्त करते हुए आध्यात्मिक जगत् में भी प्रविष्ट होकर पूर्ण सफल होती हुई बताई गई है। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। जब किसी प्रश्न के उत्तर के लिए कुछ ऋषिगण व्यास जी के पास पहुँचते हैं किन्तु व्यास जी एक नदी में स्नान करते हुए उन्हें दिखाई पड़ते हैं। उनके जल में डुबकी लगाने के बाद उपर आने पर यह कहा गया, नारी तुम श्रेष्ठ हो, यह सुनकर ऋषिगण ने नारी की श्रेष्ठता के विषय में पूछा- तो उन्होंने बताया कि स्त्री में सेवा धर्म है और सेवाधर्म ही उन्हें अगम पद पर पहुँचा देता है, इसलिए वह श्रेष्ठ है।
कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य में दिलीप द्वारा गो-सेेवा के प्रसंग में उनकी रानी सुदक्षिणा का सेवा-भाव चित्त को द्रवित कर देता है। पुत्र के लिए पति के साथ वन की यात्रा, वहाँ जाकर गुरु वशिष्ठ उनकी पत्नी अरुन्धती की सेवा, पुन: नन्दिनी नामक गाय की सविध सेवा, गौ के वन से आने जाने तक उसकी सम्पूर्ण व्यवस्था करना आदि प्रमुख हैं। पुत्र प्राप्ति अभियान में वह अपने महारानी-भाव के विस्मृत कर सामान्य सेविका की तरह गाय की सज्जा कैसे कर रही है। उसका एक दृश्य इस प्रकार किया है- जायाप्रतिग्राहिगन्धमाल्यां वनाय पीतप्रतिबद्धवत्साम्। अर्थात् वह गाय को वन की ओर भेजने से पहले धूप-गन्ध देकर एवं माला पहनाकर उसकी पूजा करती है। सुदक्षिणा अभी माँ नहीं है किन्तु उसे मातृत्व का एहसास है, इसलिए वह गाय के जाने से पहले बछड़े को उसका दूध पिलाकर उसे बांध देती है। तब उसे विदा करती है।
नारी का स्वभाव-सौन्दर्य महाकवि कालिदास की शकुन्तला में सुलभ होता है। वन के वृक्ष-लताओं के प्रति उसका प्रेम तो किसी भी सहृदय के चित्त को करुणा से मग्र कर सकता है जैसे-
पातुं प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या,
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।
आदौ : कुसुम-प्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सव:,
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्।।
कालिदास ने प्रकृति प्रेम का सारा सौन्दर्य लगता है इसी श्लोक में भर रखा है। शकुन्तला की प्रकृति के प्रति अनन्य भक्ति कितनी निराली है कि वह दैहिक-मूल आवश्यकताओं की पूर्ति से पहले वह प्रकृति के विषय में सोचती है। जल पीने से पहले, वृक्ष-लताओं से स्नेह, उनमें आये हुए पुष्पों को देखकर उत्सव मनाना, उन्हें नहीं तोडऩा आदि, वृक्ष-लताओं के प्रति उसका प्रेम। आश्चर्य तो तब होता है कि वह हिरणी के बच्चे को हिरणी के उपरत होने के बाद उसे पालती है। जब वह बड़ा हो जाता है तो वह शकुन्तला को हस्तिनापुर जाने से रोकता है तो शकुन्तला आगे बढ़ते हुए कहती है कि ये कौन मुझे रोक रहा है। तब महर्षि कण्व उससे कहते हैं कि बेटी वह वही हिरण है, जिसकी माँ उसे छोडक़र जब चली गयी थी तब तुमने इसका पालन किया था। कभी दर्भों के चरने से इसके मुख में घाव हो जाते थे, तो तुम उन घावों में इंगुदी के तैल का सेक करती थी। मुट्ठी भर नीवार उसे खिलाती थी, इसकी माँ के उपरत होने के बाद तुमने ही इसे अपना पुत्र बना लिया था। ऐसा यह हिरण वही है। शकुन्तला का ऐसा प्रकृति प्रेम ऐसी संवेदनशीलता, ऐसा समर्पण वन्य प्राणियों के प्रति है। इसलिए तो शकुन्तला के भर्तृगृह जाने के समय पूरा वन रोता है। कालिदास ने निम्रलिखित श्लोक में यह भाव स्पष्ट किया है-
उद्गलितदर्भकवला मृग्यस्त्यक्तनर्तना मयूर्य:
अपसृतपाण्डुपत्रा मुञ्चन्त्यश्रूणीव लता:।।
शकुन्तला में सख्य भाव, मातृत्व, सेवाभाव, कत्र्तव्य का बोध एवं सभी प्राणियों के प्रति समभाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। उसका स्वभाव मुग्ध है।
ऐसे ही गुणों के दर्शन महाकवि भवभूति कृत उत्तररामचरितम्में सीता जी में होता है। आदर्श नारी के स्वरूप का चित्रांकन करते हुए महाकवि भवभूति ने भी सीता को भी प्रकृति के प्रति उत्कृष्ट भाव रखने वाली बताया है। उन्होंने लिखा है कि पंचवटी के प्रवास के दौरान सीता ने भी अनेक पौधे लगाए, पौधों को सींचा, वृक्षों की सेवा की। पशु-पक्षियों को पानी पिलाया, उन्हें नीवार के दाने खिलाए, हिरणों की सेवा की और एक विशेष सीता के विषय में उन्होंने और भी लिखा है जो महाकवि कालिदास की शकुन्तला से बिल्कुल मिलती है। सीता ने उसे शल्लकी लता का सेवन कराकर उसे पाला था। वे तो श्रीरामचन्द्र जी के पंचवटी आगमन पर वासन्ती के द्वारा सीता के गुणों का भूरिश: कथन कराते हैं। वासन्ती तो सीता जैसी भोली भाली नारी के त्याग पर उपालम्भ देती है, कहती है- हे रामचन्द्र जी! आपको यश अत्यन्त प्रिय है- इसलिए तो आपने ऐसा भयानक निर्णय लेकर उनको इस जंगल में अकेला छोड़ दिया। यहाँ तो हिंसक पशु हैं, अब बताओ, हरिणी के समान चंचल नेत्र वाली का इस जंगल में क्या हुआ होगा, जैसे-
अयि कठोर! यश: किल ते प्रियं किमयशो ननु घोरमत: परम्।
किमभवद् विपिने हरिणीदृश: कथय नाथ कथं बत मन्यसे?।।
इसी तरह स्वप्रवासवदत्तम्में भी महाकवि भास ने भी वासवदत्ता को आदर्श पत्नी के रूप में तथा पद्मावती को एक आदर्श बहन के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। राजा उदयन के वासवदत्ता में अत्यन्त आसक्त होने के कारण राज-व्यवस्था के शिथिल होने से आरुणि द्वारा उसका आधा राज्य छीन लिया जाता है जिससे उसके मन्त्री यौगन्धरायण को इसकी चिन्ता होती है, और वह वासवदत्ता से अग्रि में जल जाने का स्वांग रचने की बात कहता है, तो इस पर वह तुरन्त तैयार हो जाती है। उस पर भी एक विशेष बात वहाँ पर जो है- वह यह कि यौगन्धरायण- ज्योतिषियों की भविष्यवाणी में राजा उदयन के दूसरे विवाह की बात भी वासवदत्ता से कहता है, किन्तु सौत की भावना से रहित होकर वह पति-कल्याण हेतु अपने आप को तैयार कर लेती है जबकि इस अभियान में उसे बहुत कष्ट सहने पड़ते हैं, अपमान सहना पड़ता है किन्तु है किन्तु वह इसकी परवाह करते हुए आगे बढ़ती चली  जाती है। ऐसा है नारी का उत्कृष्ट समर्पण।
मनुष्य योनि से लेकर देव योनि तक सर्वत्र नारी की महिमा-मण्डन सर्वविदित है। माँ, बेटी, बहन, पत्नी का आदर्श प्रस्तुत किया है नारी ने। यह सृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण अंश है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे देव जिस राक्षस का सामना नहीं कर पाए, ऐसे महिषासुर का मर्दन करने वाली दुर्गा का माहात्म्य लोक-प्रसिद्ध है। जिनकी कृपा से देदीप्यमान होता है ऐसी लोक-कल्याणकारिणी देवी लक्ष्मी किसके लिए आराध्य नहीं हैं। जो शिव लोक की शोभा का आधार स्तम्भ है ऐसी जगज्जननी देवी पार्वती किसके लिए स्मरणीय नहीं है। ऐसा है अद्भुत नारी का स्वरूप। अपने मातृत्व गुण के कारण नारी सर्वत्र सम्मान का पात्र है, इसलिए सभी को कृतज्ञभाव से नारी में माता, बेटी, बहन के रूप को देखते हुए उनका आदर करना चाहिए, जिससे एक शान्तिमय, सुखमय आदर्श समाज का निर्माण हो सके।
 

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