दिव्य व्यक्तित्व निर्माण
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स्वामी धर्मदेव वैदिक गुरुकुलम्
व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्णत: विकास तभी संभव है, जब उसको ज्ञान मिले। उस ज्ञान के आधार पर ही वह आत्मचिंतन मनन करता है। ज्ञान प्राप्ति का साधन स्वसंस्कार, माता-पिता, शास्त्र एवं गुरुजनों के माध्यम से उपलब्ध होता है। स्वसंस्कार और माता-पिता के प्राप्त ज्ञान से वह जीवन का प्रथम चरण पूरा करता है, किन्तु जीवन में पूर्णत: उन्नति के लिए उसको शास्त्र एवं गुरुजनों का सान्निध्य भी अत्यावश्यक है।
शास्त्रों में भी वैदिक प्राचीन ज्ञान परम्परा के अनुसार प्राचीन काल में जितना महत्त्व भौतिक विज्ञान पर दिया जाता था, उतना ही महत्त्व चरक द्वारा उल्लेखित अध्यायों के माध्यम से होता है। इस आयुर्वेद शास्त्र में जितना गहन वर्णन उनका शरीरादि में मिलता है, उतना ही आत्मादि गुणों का भी वर्णन किया गया है। प्राचीन ऋषि आत्म केन्द्रित होकर भी सभी संशोधनात्मक भौतिक कार्यों को निष्पन्न करते। आधुनिक ज्ञान परम्परा की इससे विपरीत स्थिति देखी जाती है। आज व्यक्ति पूर्णत: धन केन्द्रित होकर सारे वैज्ञानिक भौतिक कार्यों को निष्पन्न करता है और आत्मिक उन्नति के स्थान पर भौतिक उन्नति को अधिक ध्यान में रखता है। हमें आज आवश्यकता है उस ज्ञान परम्परा की जो आध्यात्मिक और भौतिक मूल्यों को समान रूप से संतुलित करें। इसका वर्णन भी प्राचीन ग्रन्थ में मिलता है, जैसे- ‘यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:’। महर्षि कणाद मुनि जी का वैशेषिक दर्शन में संदर्भ मिलता है, यहाँ अभ्युदय का अर्थ भौतिक उन्नति और नि:श्रेयस आध्यात्मिक जीवन में सिद्धि प्राप्त होना, इसको धर्म: कहा गया है। परम पूज्य स्वामी जी महाराज का भी इसी ऋषि ज्ञान परम्परा को भारत में लागु करने का संकल्प है, जिससे व्यक्ति यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके सुगम जीवन की सिद्धि और उस आनन्द की प्राप्ति कर सके। इसका एकमात्र उपाय गुरुकुलीय शिक्षा का देश में सर्वत्र प्रसार है।
आज की स्थिति में व्यक्ति लक्ष्य से विचलित दैनंदिन जीवन निर्विण्ण होकर व्यतीत कर रहा है। दूसरी ओर देखा जाए, यहाँ परम पूज्य स्वामी जी द्वारा प्रचलित पतंजलि गुरुकुलम् एवं वैदिक गुरुकुलम् में विद्यार्थी आधुनिक और प्राच्य वैदिक साहित्य का अध्ययन करके अपने जीवन को सार्थक बना रहे हैं।
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01 Mar 2025 17:58:05
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