प्राचीन भारत में ज्ञान परंपरा व शिक्षा का महत्व
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डॉ. साध्वी देवप्रिया
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षा- दर्शन विभाग, पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
वैदिक काल के प्रारम्भ से लेकर भारत में ज्ञान व विद्या प्राप्ति को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। ईसा पूर्व 4वीं शताब्दी में आये यूनानी राजदूत मैगस्थनीज से लेकर 7-8वीं शताब्दी के ह्वेन-सांग व इत्सिंग जैसे चीनी यात्रियों व दसवीं सदी में आये विद्वान् अलबरुनी तक सभी विदेशी यात्रियों ने स्वीकार किया है कि सभी हिन्दू अर्थात् भारतीय स्वभावत: विद्या प्रेमी होते हैं। बाद में आने वाले यूरोपीय यात्रियों व खुद अंग्रेजों के विभिन्न विद्वानों व सर्वेक्षण रिपोट्र्स के आधार पर यह तथ्य सिद्ध हो चुका है। आस्ट्रिया में जन्मे इरापावबिनो-दो बारथोलाम्यू ने सन् 1789 में अपने 14 वर्षों में भारत के रहने के अनुभव के आधार पर लिखा है कि 'भारतीय शिक्षा तथा लेखन प्रणाली का विकास ईसा पूर्व हो चुका था और वह अब तक भी प्रचलित है। शायद इस पृथ्वी पर ऐसा और कोई देश नहीं है जहाँ भारतीयों के समान प्राचीन पद्धति और व्यवस्था का अनुसरण इतनी लंबी कालावधि तक हों।’ एक और इतिहासकार ब्रिगेडियर जनरल अलेक्जेंडर वाकर ने भारत में 1780 से 1810 तक ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी की। उन्होंने कहा है कि 'किसी भी समाज में शिक्षा का शायद इतना महत्व नहीं है जितना हिंदुओं में है।’ उनके अनुसार, 'वे (हिंदू) अपने बच्चों को उत्तम विद्यार्जन कराने के लिए धन, कुल-गौरव और जाति-अभिमान सब कुछ न्यौछावर कर सकते हैं।’
मद्रास के कलक्टर एल.जी.के. मरे ने रिपोर्ट दी है कि 'प्रत्येक बच्चे को 5 वर्ष की आयु में पाठशाला में भेजने की प्रथा है। उसके आगे उच्च शिक्षा प्राप्त करते जाना अधिकांशत: स्वयं उनकी मानसिक वृत्ति पर अवलंबित है। परंतु प्राय: यह स्वीकार करना होगा कि 13 वर्ष की आयु प्राप्त करने से पहले-पहले विद्या के विविध क्षेत्रों में उनकी उपलब्धियाँ पर्याप्त प्रशंसनीय होती हैं। यह स्थिति हिंदू वर्णों की विशेषता है।’ लुडलो अपने 'ब्रिटिश इंडिया’ में कहते हैं कि 'प्रत्येक हिंदू ग्राम में, जिसने अपने स्वत्व को थोड़ा भी कायम रखा है, शिक्षा की प्रारंभिक व्यवस्था अवश्य रहती थी। एक भी बच्चा ऐसा नहीं होता, जो लिखना, पढऩा और हिसाब लगाना नहीं जानता हो, विशेषत: गणित में तो वे बहुत ही प्रवीण होते हैं।’
विश्व का पहला विश्वविद्यालय तक्षशिला आज से लगभग 2800 वर्ष पूर्व स्थापित हुआ। चौथी शताब्दी ई. पूर्व नालंदा विश्वविद्यालय स्थापित हुआ। इसके साथ ही प्राचीन भारत में विक्रमशिला विश्वविद्यालय, वल्लभी विश्वविद्यालय, उदांतपुरी विश्वविद्यालय, सोमपुरा विश्वविद्यालय, पुष्पगिरी विश्वविद्यालय आदि शिक्षा के विश्वस्तरीय केन्द्रों के खण्डहर भारत में विश्व में सर्वाधिक उन्नत शिक्षा के प्रमाण हैं।
एक विद्वान् की शिक्षा की परिभाषा
शिक्षा के व्यापक भाव को स्पष्ट करते हुए भारत के प्रसिद्ध चिंतक काका साहेब कालेकर ने वर्तमान संदर्भ में इसे स्पष्ट करते हुए व उसका मानवीकरण करते हुए उसके मुख से कहा, 'मैं सत्ता की दासी नहीं हूँ, कानून की किंकरी नहीं हूँ, विज्ञान की सखी नहीं हूँ, कला की प्रतिहारी नहीं हूँ, अर्थशास्त्र की बाँदी नहीं हूँ। मैं तो धर्म का पुनरागमन हूँ, मनुष्य की बुद्धि, रहस्य तथा इन्द्रियों की स्वामिनी हूँ। मानस शास्त्र एवं समाजशास्त्र मेरे दो चरण हैं, कला और कारीगरी मेरे दो हाथ हैं, विज्ञान मेरा मस्तिष्क है, धर्म मेरा हृदय, निरीक्षण और तर्क मेरी आँखे हैं, इतिहास मेरे कान हैं, स्वतंत्रता मेरी श्वास है, उत्साह और उद्योग मेरे फेफड़े हैं, धैर्य मेरा व्रत है तथा श्रद्धा मेरा चैतन्य है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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