शिक्षा से भौतिक व आंतरिक पूर्णता
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स्वामी आत्मदेव
आज के विश्व में मनुष्य जाति के विकास व उन्नति के लिए शिक्षा का जो स्वरूप है, वह इस प्रकार का है कि उसमें साइंस, टेक्रोलॉजी, रिसर्च, इनोवेशन, इन्वेंशन इत्यादि भौतिक विधाओं का पूर्ण प्रकर्ष देखा जा रहा है। इसकी सहायता से मनुष्य ने भौतिकता, सुख-सुविधा व आधुनिकता के शिखर छुए हैं। इस विद्या से हमने पूरे विश्व को एक-दूसरे के बहुत नज़दीक लाकर धरती को ग्लोबल विलेज बना दिया है। आज कोई भी व्यक्ति दुनिया के किसी छोर पर रहता हुआ दूसरे छोर के व्यक्ति से सीधा संपर्क कर सकता है। अंतरिक्ष में भी उपग्रहों द्वारा हमने संचार के क्षेत्र में भी खूब सफलता प्राप्त की है। डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट इत्यादि बनाने के लिए हम जितना पुरुषार्थ कर रहे हैं, वह पर्याप्त है।
लेकिन साथ में विद्या व शिक्षा का जो दूसरा प्रयोजन होता है, जिससे मनुष्य आंतरिक पूर्णता, दिव्यता, शांति, संतोष, मैत्री, करुणा, मुदिता इत्यादि अनेक महत्त्वपूर्ण गुणों व संस्कारों से युक्त होता है, उस पर हमारा ध्यान नहीं जा रहा है। भौतिक विकास, शिक्षा, विचारधारा तो विश्व में बहुत प्रचारित हो रही है किंतु जो ध्यान व महत्त्व व्यक्ति के विकास, शिक्षा और भावों की उन्नति के लिए दिया जाना चाहिए, वह नहीं दिया जा रहा है। व्यक्ति के अंदर कैसे उदारता आए? विनम्रता, परस्पर सहयोग की भावना, दु:खों के प्रतिकार की शक्ति, बाधाओं व संकटों से लडऩे का साहस कैसे आज के बच्चों से लेकर युवाओं में आए उसके लिए हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन करने की आवश्यकता है। उसमें भौतिक परिपूर्णता के साथ आंतरिक, आध्यात्मिक, धार्मिक व नैतिक पूर्णता भी हो। किंतु आज की शिक्षा, जॉब-सेन्ट्रिक व मनी-सेन्ट्रिक हो गई है। कोई भी शिक्षा का क्षेत्र उसके बाद व्यक्ति को क्या नौकरी मिलती है व कितने पैसे वह कमा सकता है, उसी के आधार पर चयन होता है। क्योंकि समाज में भी धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य व भौतिक प्रकर्ष को ही सब कुछ समझकर खूब महत्त्व दिया जा रहा है जिसकी वजह से व्यक्ति में जो दैवी सम्पद् होनी चाहिए जो श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने कही है। उससे वह वंचित सा हो रहा है। जबकि हमारी मूल सम्पत्ति, सच्ची सम्पत्ति जो हमें इस लोक में तथा परलोक में भी लाभ देगी, वह इस प्रकार है-
अभयं सत्त्वसंशुद्धिज्र्ञानयोगव्यवस्थिति:।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।
(गीता-१६.१-३)
आज की जो शिक्षा प्रणाली है, क्या उसमें इन गुणों के ऊपर ध्यान दिलाया जाता है? आपकी संतान जिस स्कूल व कॉलेज में अध्ययन के लिए जा रही है, क्या उसमें नैतिक मूल्यों को सिखाया जाता है? क्या यह पढ़ाई पढ़कर बच्चे में निर्भयता, निर्मलता, ज्ञान, योग, तपस्या, सरलता, अहिंसा, सत्य, त्याग, शान्ति, तेज, क्षमा, धैर्य इत्यादि दिव्य गुणों का आधान हो रहा है? यह कुछ गहरे प्रश्न सभी माता-पिताओं के समक्ष हैं, इस पूरे समाज व विश्व के समक्ष हैं। इस पर चिंतन-मनन करने पर यही ज्ञात होगा कि आज की शिक्षा में मनुष्य के आंतरिक विकास और पूर्णता के लिए कोई मार्गदर्शन नहीं है। इसके लिए हमें अपनी दृष्टि डालनी पड़ेगी। एक ऐसी प्रणाली पर जिसमें भौतिक शिक्षा के साथ नैतिक, धार्मिक व आंतरिक शिक्षा भी हो और वह है भारतीय शिक्षा प्रणाली। जिसको हमारे ऋषियों ने हजारों-लाखों वर्षों से अपनाकर इसमें से एक पूर्ण विकसित, समग्र, संतुलित और सर्वसमावेशी शिक्षा परम्परा का जो निर्माण किया है, उसमें व्यक्ति के मन का विकास, भावों का विकास व नैतिकता का विकास समाविष्ट है।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में तो यह प्राय: देखा जाता है कि किसी ने बी.ए./एम.ए. कर लिया किंतु उसको न नौकरी मिलती है, न कोई व्यापार आदि की कुशलता होती है। इस कारण उस व्यक्ति में हताशा, निराशा, शोक, खिन्नता, खूब बढ़ जाती है और वह आत्मघात करने तक को तैयार हो जाता है। यह है वर्तमान शिक्षा प्रणाली की कमजोरी और अपूर्णता का परिणाम। व्यक्ति में सूचनाओं का संचार तो किया गया किंतु शांति, संतुष्टि व कुशलता का विकास नहीं हुआ। मनुष्य समुद्र में गोता लगाकर अमूल्य रत्नों तथा खनिज संपदाओं की खोज करे तो वह कितना हर्ष का विषय होगा। वह भौतिक उन्नति करके अभ्युदय के शिखरों को तो छू रही है किंतु यदि साथ में वह नि:स्वार्थता, निर्लोभता, निॢवकारता को प्राप्त कर नि:श्रेयस के मार्ग पर भी आगे बढ़े तो इस धरती पर भगवान् का राज्य फैलेगा। सभी तरफ सात्विकता, सत्यता व सौन्दर्य बिखेर कर ही हम अपना जीवन सार्थक बना सकते हैं व समष्टि में भी शुभ का आधान कर सकते हैं। वेदों का भी यही उद्घोष है-
विद्यां चाविद्यां च यस्तद् वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीत्त्र्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।।
जब अविद्या (अपरा विद्या) अर्थात् भौतिक विषयों की शिक्षा व विद्या अर्थात् दिव्यता, धार्मिकता व आंतरिक समृद्धि की शिक्षा- इन दोनों का समन्वय हमारे जीवन व समाज में होगा, तभी व्यष्टि और समष्टि में पूर्णता की प्राप्ति होगी। हम बुद्धि में ज्ञानशक्ति, हृदय में भावशक्ति व शरीर में बल बढ़ाकर कर्म की शक्ति का निरन्तर विकास करते रहें तथा समाज में विविध प्रौद्योगिकी, संचार सुविधाएँ, चिकित्सा की नवीनतम विधियों तथा विविध उपकरणों के माध्यम से समाज व व्यक्तिगत जीवन से दु:ख, अभाव, रोग का निवारण करने में सक्षम हो।
सा विद्या या विमुक्तये
इस प्राचीन ऋषि दर्शन का यही तात्पर्य है कि शिक्षा/विद्या इस प्रकार की हो कि जिससे मनुष्य आंतरिक दुर्बलता, अभाव, विकारों से तथा बाह्य दु:ख, अत्याचार व शोषण से मुक्त हो। हम अपने व अपने स्वजनों को ऐसी दिव्य, समग्र व सार्थक शिक्षा से युक्त करें और भगवान् की असीम कृपा का अनुभव करें।
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01 Mar 2025 17:58:05
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