भारत की शिक्षा व्यवस्था का इंग्लैण्ड पर ऋण

अंग्रेजों को शिक्षित बनाने में भारतीय गुरुकु लीय शिक्षा व्यवस्था का अविस्मरणीय योगदान

भारत की शिक्षा व्यवस्था का इंग्लैण्ड पर ऋण

राकेश कु मार

मुय केन्द्रीय प्रभारी-भारत स्वाभिमान

श्चर्यजनक तथ्य है कि ब्रिटेन में वहाँ की सरकार ने 1833 से पहले कभी भी एक फूटी कौड़ी भी अपने सरकारी खजाने से अपने देश के लोगों की शिक्षा के लिए भी खर्च नहीं की। दूसरे शब्दों में कहें तो इंग्लैण्ड में अंग्रेजों की वरीयता सूची में शिक्षा का कोई महत्व व स्थान नहीं था। कुछ चर्च या उनके द्वारा संचालित स्कूलों में बाइबिल व बाइबिल को समझने लायक अंग्रेजी ग्रामर पढ़ाई जाती थी।18वीं सदी में जो औद्योगिक क्रान्ति हुई और बड़े-बड़े कारखाने लगे, उसी समय पहली बार 1802 में ब्रिटिश पार्लियामेन्ट ने शिक्षा का एक आदेश पारित किया, जिसमें इंग्लैण्ड के कपड़ा बुनने वाले कारखानों में जो गरीब लोग और छोटे-छोटे बच्चे मजदूरी करने के लिए दूर-दूर से आते थे, वह पूरी तरह से निरक्षर होते थे। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट ने एक ऐक्ट पास किया कि 7 साल की कच्ची नौकरी में कारखाना मालिक को पहले 4 सालों तक अपने मजदूरों को प्रत्येक रविवार एक-दो घंटे के लिए पढ़ाया जाये जिससे नागरिकों को सामान्य लिखने-पढऩे और हिसाब लगाने की योग्यता प्रदान की जाये। उसी कानून से इंग्लैण्ड में डे-स्कूलों का जन्म हुआ, अब समस्या यही थी कि इन स्कूलों को चलाने के लिए अध्यापक कहाँ से आयें? क्योंकि उस समय ब्रिटेन में भयंकर निरक्षरता थी, संयोग से मद्रास प्रेसीडेन्सी के चौपलेन एन्ड्र्यु बेल व अंग्रेज पादरियों की दृष्टि मद्रास प्रेसीडेन्सी की (दक्षिण भारत) गुरुकुलों में प्रचलित छात्र-अध्यापक पद्धति पर गयी, बेल 1789 से 1796 तक मद्रास के स्कूलों में सुप्रीटेन्डेन्ट के रूप में जुड़े और वहाँ देखा कि भारत में बड़ी कक्षा के छात्र छोटी कक्षाओं के छात्रों को 'मॉनीटर पद्धतिसे पढ़ाने का कार्य करते हैं। जिससे एक अध्यापक की देख-रेख में अनेक कक्षायें चल सकती थी, साथ ही अलग पूर्णकालिक अध्यापकों की अवश्यकता नहीं रहती थी तथा इससे व्यवस्थागत रूप से कक्षा में अनुशासन की समस्या भी अपने आप हल हो जाती थी। इंग्लैण्ड में 1798 में वापिस जाकर एन्ड्र्यु बेल ने इस पद्धति को 'मद्रास पद्धतिया 'बेल पद्धतिके नाम से प्रचारित किया और इंग्लैण्ड में राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों की शिक्षा के लिए इस शिक्षा पद्धति को अंगीकार कर लिया था और इसमें कोई संदेह नहीं कि इंग्लैण्ड में बेल द्वारा अंगीकृत 'मद्रास पद्धतिके प्रचलन ने शिक्षा प्रचार की दृष्टि से एक क्रान्ति ला दी थी।

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