संन्यासी की निर्भयता
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श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज
प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार मानव जीवन के विकास के चार सोपान सुनिश्चित किये गये, उनमें से जो अन्तिम सोपान है उसका नाम रखा गया- 'संन्यास’ अर्थात् सर्वस्व त्याग। त्याग किसका? जो किसी भी उपाय से हमारा 'स्व’ हो गया है, किसी ने हमको दे दिया है, हमने अपने पुरुषार्थ से अर्जित किया है, जिसको हम अपना कह रहे हैं या मान रहे हैं और आगे चलते-चलते जो हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गया है और अब 'मैं’ ही बन गया है। |
इस प्रक्रिया में कुछ चीजें तो ऐसी होती हैं जो जन्म के साथ ही हमें मिलती हैं- माता-पिता व अन्य सम्बन्धी जन, मन-बुद्धि-प्राण-इन्द्रियों का संघात यह शरीर, रूप-रंग, माता-पिता के द्वारा अर्जित की हुई सम्पत्ति, साधन-सामग्री इत्यादि। इन सबके अलावा कुछ ऐसी चीजें भी होती हैं जो समाज, परिवेश, विद्यालय, साथियों और गुरुजनों के सम्पर्क में आने पर हमें प्राप्त होती हैं जैसे मातृ-भाषा के अतिरिक्त दूसरी-दूसरी भाषाओं का ज्ञान, विविध विद्याओं, अनेक प्रकार की योग्यताओं व क्षमताओं का विकास, शिल्पकलाओं में प्रवीणता, वक्तृता व लेखनकला में निपुणता इत्यादि। इस विकास क्रम में अनेकानेक नैतिक गुणों, सद्गुणों की भी प्राप्ति होती रहती है, सेवा आदि से सामाजिक यश-कीर्ति भी मिलती है। जीवन के उपर्युक्त सभी घटकों का कुलयोग ही हमारा 'व्यक्तित्व’ होता है। दूसरों के मन-मस्तिष्क पर हमारे उस व्यक्तित्व की एक-एक छवि बन जाती है। इस छवि के अच्छे-बुरे दोनों रूप हो सकते हैं। उसमें से दूसरों के द्वारा निर्मित हमारी बुरी छवि को तो हम छोड़ देते हैं, वह हमें पूर्णत: स्वीकार नहीं होती किन्तु अच्छी छवि को हम स्वीकार कर लेते हैं, अर्थात् हमारे बारे में दूसरों की मान्यता के अनुसार हम भी अपने को वैसा ही मानने लगते हैं। यह हम सबके जीवन का एक सामान्य क्रम है। साधकों की भाषा में इसे हम 'अहम्’ या योगदर्शन में उपवर्णित पाँच क्लेशों में से एक प्रमुख क्लेश 'अस्मिता’ के रूप में जानते हैं।
संन्यास आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को 'एके साधे सब सधे’ इस नियम के अनुसार इस 'अहम्’ की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि संन्यास अर्थात् त्याग, फिर वही प्रश्न कि त्याग किसका? तो ऋषियों ने कहा अपने 'अहम्’ का अर्थात् अपने 'मैं’ का या 'मेरे’ का। हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त तो करें पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें, सतर्क रहें साधन ही कहीं साध्य न बन जाये। उन वस्तुओं के साथ मेरेपन का घनिष्ठ सम्बन्ध न बना बैठें। जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। 'अहम्’ या 'अस्मिता’ की अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें ताकि प्रिय से प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें, साक्षी या उदासीन या तटस्थ द्रष्टा बने रहें।
अथर्ववेद के एक मन्त्र में कहा गया है- 'स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयु: प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्’। (१९.७१.१)
इस मन्त्र में 'मया’ और 'मह्यम्’ के द्वारा एक ही सत्य का संकेत हुआ है। आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, द्रविण (धन), ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान) ये सब व्यक्ति के द्वारा जीवन में पाने की चीजें हैं। वेदमाता ने प्राप्तव्य चीजों की सूची हमारे समक्ष रखी है और साथ में यह भी कह दिया कि ये सब चीजें अपने पास नहीं रखनी, यहाँ तक कि ब्रह्मवर्चस भी। अपने पास रखने का अर्थ है- अपने अहं को पुष्ट करना। अर्पित कर देने का अर्थ है- निरहं (निरहंकार व निर्मम) हो जाना। इसके अतिरिक्त ब्रह्मलोक में जाने का कोई रास्ता नहीं है। सो संन्यास धर्म में दीक्षित होता हुआ संन्यासी अपने ऊपर ओढ़े हुए सभी लिबासों को उतार रहा है।
प्राचीन भाषा में आत्म-साक्षात्कार को 'कैवल्य’ इस अन्वर्थ नाम से जो अभिहित किया है वह भी इसी ओर संकेत कर रहा है। कैवल्य अर्थात् अकेला हो जाना, समस्त प्रपञ्च से अपने मन को हटा लेना, समस्त दृश्य से अचाह हो जाना, देहात्मभाव से रहित हो जाना, अपनी या अपने बारे में निर्मित हुई पूर्व छवियों का त्याग कर देना और आगे के लिये अपनी कोई भी छवि न बनाना। जो अकेला हो जाता है वही फिर सर्वगत सत्य के साथ एक हो सकता है। और जो साधक अकेला (केवल) होने की कला सीख लेता है वही निर्भय, सर्वथा निर्भय रह सकता है। अकेले को कौन डरा सकता है? डरने के लिए ऐसा कुछ पास में होना चाहिए (मनोवैज्ञानिक रूप से या भौतिक रूप से) जिसके छिन जाने की आशंका हो या फिर कुछ पाने की चाह हो और उसमें कोई बाधा उपस्थित होने की संभावना दिखाई देने लगे तो भी भय हो सकता है, किन्तु जिसने वस्तु, व्यक्ति, विचार और यहाँ तक कि अपने शरीर से भी तादात्म्य हटा लिया हो तो अब उससे कोई क्या छीनेगा? और वह क्यों किसी से बाधित होगा? बाधा के लिये द्वैत चाहिये क्योंकि द्वैत में ही किसी भी कामना का जन्म होता है और फिर उसे पूरा करने के लिये प्रयास होता है। लौकिक स्तर पर विशेष बनने के लिये किये गये प्रयास को कोई न कोई बाधित कर ही देता है। जो प्रयास अपने द्वारा अपने में किये जाते हैं, केवल वे ही किसी अन्य के द्वारा बाधित नहीं किये जा सकते।
इसी बात को दूसरी तरफ से कहें तो कहना होगा कि जो सर्वभूतात्मभाव रूप ज्ञान की ऐसी दृढ़ स्थिति में रहता है जिसका अपना पराया कुछ बचा ही नहीं, अब वह किससे डरेगा और क्यों डरेगा, श्रुति कहती है- द्वितीयाद् वै भयं भवति (बृह. १.४.२) अर्थात् दूसरे से ही भय होता है। मनु के द्वारा दिया गया सर्वभूतात्मभाव का संदेश भी यहाँ द्रष्टव्य है-
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति।।१२.९१।।
अर्थात् सब भूतों में आत्मा को और सब भूतों को आत्मा में समान रूप से देखता हुआ आत्मयाजी स्वराज्य अर्थात् अपने आन्तरिक राज्य को प्राप्त कर लेता है।
आचार्य चरक ने भय के कारणों पर विचार करते हुए सूत्ररूप में एक वचन बोला-'असमर्थता भयकराणाम् भयदायक जितने भी हेतु हो सकते हैं उनमें 'असामथ्र्य’ प्रकृष्टतम है। जो व्यक्ति ज्ञान में, बल में, धन में, जनसमर्थन में, विद्या में, वक्तृता में, गुणों में बढ़ा हुआ है वह किसी से क्यों डरेगा? दूसरी तरफ जो सर्वथा अकाम हो गया है, जिसको किसी से कुछ चाहिए ही नहीं तो निश्चित ही ऐसा व्यक्ति भी क्यों भयभीत होगा? क्योंकि कामना ही अपूर्णता को प्रकट करती है। अकाम व्यक्ति सदा ही अपने अन्दर से भरा-पूरा रहता है, वह क्यों किसी से भी किसी चीज की इच्छा करेगा? जैसा कि किसी ने कहा भी है- 'हम को कछु न चाहिए हम हैं शहंशाह’। सो ऐसा व्यक्ति किसीे से क्यों डरेगा? असमर्थ अवस्था में ही व्यक्ति अपने आपको भयभीत पाता है। डायबेटिक व्यक्ति ही मीठे से डरेगा, स्वस्थ व्यक्ति क्यों डरेगा। किसी व्यक्ति ने अभी-अभी अपना व्यसन छोड़ा है, वह व्यसन को जगाने वाले अनुकूल आलम्बन से अवश्य भयभीत होगा। किन्तु जिसके संस्कार दग्ध बीज हो गये वह क्यों भयभीत होगा। कारण उस विषय में उसकी कमजोरी समाप्त हो गयी है। किसी भी विषय में भय, कमजोरी को और निर्भयता मजबूती को प्रकट करती है। यदि निर्बल लोगों के समक्ष कोई बलवान् अपनी किसी प्रकार की शक्ति का प्रयोग करे- राजशक्ति, धनशक्ति, पदशक्ति, मन्त्रशक्ति, तर्कशक्ति, विद्याशक्ति, शारीरिक शक्ति, मन:शक्ति इत्यादि चाहे जो भी हो तो निर्बल व्यक्ति का भयभीत होना स्वाभाविक है कि यह मेरा कुछ छीन लेगा, मेरा शोषण करेगा, मुझे दबायेगा। पर संन्यासी का कोई क्या छीनेगा, जिसका अपना कहा जाने योग्य कुछ है ही नहीं, कुछ बचा ही नहीं। जो समस्त परिग्रह का त्यागकर सर्वथा 'अपरिग्रही’ हो गया है तथा आगे के लिये भी किसी भी वस्तु-व्यक्ति-विचार के संग्रह को स्थान नहीं देना चाहता।
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01 Mar 2025 17:58:05
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