श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
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हम शाश्वत सत्ता के सच्चे प्रतिनिधि बनें अपना कत्र्तव्य निभाएं
दिव्यता का बीज:
सभी माता-पिता, गुरुजनों व बड़ों को बचपन से ही सभी बच्चों के मन-मस्तिष्क में कुछ बातों का तर्क, तथ्य, युक्ति, प्रमाण व उदाहरण आदि के साथ स्थापित करने की आवश्यकता है। उसमें सबसे पहली बात यह है कि जैसे बीज में वृक्ष होने का सामथ्र्य है, वैसे ही हम सब मनुष्यों में चाहे हम कितसी भी जाति, मत, पंथ, सम्प्रदाय या देश में पैदास हुए हों, हम सब मनुष्यों में मानव से महामानव बनने की शक्ति सामथ्र्य है। हाँ बीज को उपजाऊ भूमि में, उचित खाद, पानी, प्रकाश व सुरक्षित वातावरण देना पड़ता है। उसकी निरन्तर देखभाल करनी पड़ती है तो वह बीज एक दिन पूरा विकसित हो जाता है, फल-फूलों से सजा हुआ, एक बहुत सुन्दर विराट रूप ले लेता है और अपने फल, फूल, औषधीय गुणों, छाया, आक्सीजन व अन्त में लकड़ी आदि के रूप में संसार की सेवा व सबको सुख पहुंचाता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में अपने श्रेष्ठ प्रारब्ध को आधार बनाकर श्रेष्ठ पुरुषार्थ, श्रेष्ठ वातावरण, श्रेष्ठ प्रशिक्षण व श्रेष्ठ प्रशिक्षकों- इन पाँच साधनों से अपना सर्वांगीण विकास करके खुद सुखी रहते हुए सबको सुख पहुंचाना है, सबकी सेवा करनी है। यद्यपि गुरुकुलम् या आचार्यकुलम् जैसे श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों में इन उपरोक्त पांच साधनों की बहुत अधिक अनुकूलता रहती है फिर भी देश के करोड़ों विद्यार्थियों का पतंजलि के शिक्षा संस्थनों में शिक्षा पाना संभव नहीं है। वैसे भगवान् की दिव्य प्रेरणा से हमारा यह भी ध्येय है कि हम एक दिन भारत की समूची शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाना चाहते हैं और सभी बच्चों को उनके श्रेष्ठ प्रारब्ध के आधार का अनुभव कराते हुए उनके पुरुषार्थ को पूरा जगाएं, उनकी सभी प्रकार की क्षमता, प्रतिभा एवं कुशलताओं को पूर्ण रूप से विकसित होने का अवसर व दिव्यताओं से भरा एक श्रेष्ठतम सुन्दर वातावरण उपलब्ध करना चाहते हैं। ज्ञान-विज्ञान युक्त प्राचीन व आधुनिकतम शिक्षण-प्रशिक्षण तथा ऐसे श्रेष्ठ प्रशिक्षक उपलब्ध हों जो विभिन्न विद्याओं में पूर्ण निष्णात होने के साथ-साथ एक दिव्यतायुक्तआचरण करते हों। आंशिक तौर पर तो हम ऐसा प्रयास हरिद्वार तथा धीरे-धीरे देश भर में करेंगे परन्तु जब तक यह प्रक्रिया पूरे देश में हम लेकर अयें तब तक सभी माता-पिता व राष्ट्र के जिम्मेदार बड़े महापुरुषों को इस दिशा में सबसे अधिक पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है।
मनुष्य की महिमा:
यह सम्पूर्ण सृष्टि भगवान् का दिव्य विधान है। सबका मूलकत्र्ता, नियन्ता व संहर्ता एकमात्र ईश्वर ही है। भगवान् के ज्ञान, कृत्ति एवं विधान व्यवस्था में यद्यपि सब प्रकार की पूर्णता व दिव्यता है। भगवान् की सम्पूर्ण रचना ही अपने आप में रहस्यपूर्ण, वैज्ञानिक, सार्थक व महान् है, परन्तु समस्त रचनाओं में मनुष्य भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना है क्योंकि भगवान् द्वारा रची गई इस दिव्य सृष्टि की महान् रचना का प्रत्यक्ष रूप से संचालन, नियन्त्रण, व्यवस्था, संरक्षण एवं निरन्तर विकास का भी दायित्व भगवान् के प्रतिनिधि के तौर पर मनुष्य को ही करना होता है। अत: भगवान् में अपने प्रतिनिधि के रूप में ही मनुष्य का निर्माण किया है। अत: हम शाश्वत सत्ता भगवान् के सच्चे प्रतिनिधि, प्रतिरूप, मूर्तरूप होकर ईश्वर की सच्ची सन्तान के रूप में अपना कर्त्तव्य पूर्ण प्रामाणिकता के साथ निभाएं। ईश्वर प्रदत्त दिव्य ज्ञान, दिव्य संवेदनाओं एवं दिव्य कर्मों से युक्त दिव्य आचरण करें, यही भगवान् की सच्ची भक्ति, सच्ची आध्यात्मिकता व जीवन मुक्ति है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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