स्वर्णिम भारत की राह
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आचार्य बालकृष्ण
2050 तक एकमात्र भारत ही ऐसा देश दिखता है जो पुन: पूरे विश्व को आध्यात्मिक, आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से मार्गदर्शन व नेतृत्व दे सकता है।
भारत करोड़ों वर्ष पुराना ज्ञान-विज्ञान अपराविद्या-पराविद्या, भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से विश्व के सर्वोच्च शिखर पर था। उस राष्ट्र के नागरिकों को अपनी महान् मातृभूमि तथा महान् पूर्वजों की तरह आचरण करना होगा, तभी हम स्वयं का तथा अपने राष्ट्र सहित समूची मानवता का हित कर पायेंगे।
महादेवी वर्मा का यह कथन कि 'बिना वर्तमान के अतीत गतिहीन है और बिना अतीत के वर्तमान दिशाहीन है आज भी प्रासङ्गिक है। जिस व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को अपने गरिमामय अतीत, सामथ्र्य भरे वर्तमान तथा स्वर्णिम भविष्य का बोध नहीं होता, वह इस विश्व में अपना अस्तित्व ही खो देता है। अतीत के गौरव-गरिमा के साथ वर्तमान के अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ से आशा, उत्साह व उपलब्धियों भरा भविष्य हमें तभी उपलब्ध होगा, जब हम अतीत की कुप्रथाओं, रूढिय़ों, अन्धविश्वासों एवं सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक गलत परम्पराओं से मुक्त होंगे। वर्तमान की चुनौतियों, संकटों व समस्याओं को आग्रह युक्त होकर समग्रता पूर्वक समझते हुए उनके समग्र, स्थाई एवं न्यायपूर्ण तात्कालिक व दीर्घकालिक समाधान खोजकर उनको साहस पूर्वक क्रियान्वित करने हेतु घनघोर पुरुषार्थ करेंगे। भविष्य के प्रति आशान्वित हुए बिना हम एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा सकते, अत: तथाकथित भविष्य वक्ताओं की अनहोनी का डर, खराब किस्मत तथा झूठ, पाखण्ड भरे मिथ्या उपायों से बचकर अपने कर्म को अपना धर्म मानकर अपनी प्रखर ऊर्जा से हमें आगे बढऩा होगा।
अतीत:
दुनियां के कुछ धूर्त व चालाक लोगों ने कुछ सामथ्र्यवान एवं महान् देशों को आगे बढऩे से रोकने के लिए प्रायोजित तरीके से इतिहास व विकास के नाम पर ऐसे झूठ गढ़ें हैं, जिससे कि कोई भी दुनियां का गरीब या विकासशील देश इन तथाकथित विकसित, प्रगतिशील व महान् सभ्य देशों के मुकाबले आगे न बढ़े, अपितु उनकी राजनैतिक, आर्थिक व बौद्धिक गुलामी स्वीकार कर ले और वे जैसे उसे चलावें वैसे चले। भारत जैसे महान् राष्ट्र में भी पिछले लगभग २ हजार वर्षों से कुछ देशी व कुछ विदेशी लोगों के द्वारा हमारे गौरवपूर्ण इतिहास के स्थान पर हमें जंगली, सांपों व भूत प्रेतों की झूठी कहानियों में विश्वास रखने वाले असभ्य, बल-बुद्धि व कौशलहीन बताया तथा विनाशकारी एकाङ्गी विकास को महिमामण्डित करके मनुष्य के आध्यात्मिक विकास को भुलाकर केवल भौतिक विकास को ही सर्वस्व बताकर मानवता व भगवान् की सुन्दर सृष्टि के साथ क्रूर अत्याचार किया है।

अत: भारत सहित दुनियां के गरीब, विकासशील तथा कमजोर समझे जाने वाले सभी राष्ट्रों को पूरे स्वाभिमान के साथ अपने-अपने राष्ट्रों के सच्चे इतिहास व सर्वांगीण विकास के दर्शन के साथ आगे बढऩे की आवश्यकता है। भारत करोड़ों वर्ष पुराना ज्ञान-विज्ञान, अपराविद्या-पराविद्या, भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से विश्व के सर्वोच्च शिखर पर था। उस राष्ट्र के नागरिकों को अपनी महान् मातृभूमि तथा महान् पूर्वजों की तरह आचरण करना होगा तभी हम स्वयं का तथा अपने राष्ट्र सहित समूची मानवता का हित कर पायेंगे।
वर्तमान:
अपने देश में अपार भू-संपदा, बौद्धिक सम्पदा, अपार मानव संसाधन एवं असीम कुशलताओं व संभावनाओं से भरा एक दिव्य वातावरण है। वहीं आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, गैर-बराबरी, असमानता, स्वार्थपरता तथा अभावों व अशिक्षा के साथ-साथ अनियन्त्रित आबादी का बोझ, कालाधन, भ्रष्टाचार तथा अधिकांश क्षेत्रों में एक अन्यायपूर्ण भ्रष्ट व्यवस्था हमारे देश के लिए बहुत बड़ा संकट, समस्या एवं चुनौति भी है तथा इन सभी विकट संकटों से बाहर निकलने का आज भी हममें पूरा सामथ्र्य है।
भविष्य:
वर्तमान में पूरे विश्व का जब हम निष्पक्ष मूल्याङ्कन करते हैं, तो २०५० तक एकमात्र भारत ही ऐसा देश दिखता है, जो पुन: पूरे विश्व को आध्यात्मिक, आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से मार्गदर्शन व नेतृत्व दे सकता है। सवा सौ करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले इस महान् राष्ट्र के महान् नागरिकों को जहाँ भी वे हैं, खेत-खलियान से लेकर शिक्षा, चिकित्सा, अनुसंधान, निर्माण, उद्योग, सुरक्षा आदि अपने-अपने क्षेत्रों में पूरे स्वाभिमान, शौर्य, पराक्रम, वीरता, साहस व प्रखर पुरुषार्थ के साथ सारी कुण्ठाओं एवं निराशाओं से बाहर निकलकर निरन्तर चरैवेति-चरैवेति के संकल्प के साथ आगे बढ़ते रहना है। जैसे एक बीज में वृक्ष होने का सामथ्र्य है, वैसे ही हम सब मनुष्यों में भगवान् ने बीज रूप में समस्त शक्तियां व दिव्यताएं दी हुई हैं। हमें प्रथम अपनी सामथ्र्य को जगाना व बढ़ाना है तथा फिर बिना किसी स्वार्थपरता व संकीर्णता के नि:स्वार्थ, निष्काम भाव से अनासक्त कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए निरन्तर विकास का इतिहास घडऩा है।
हमारी भूमिका:
जैसे मैंने तथा श्रद्धेय स्वामी जी ने सभी प्रकार की कुण्ठाओं, कुप्रथाओं व रूढि़वादी परम्पराओं से ऊपर उठकर या बाहर निकलकर योग, अध्यात्म, संन्यास, स्वदेशी एवं वैदिक सत्य सनातन संस्कृति को वैज्ञानिकता व समग्रता पूर्वक समझकर अपने पूर्ण पुरुषार्थ से आध्यात्मिकता व आधुनिकता को साथ लेकर सेवा व साधना करते हुए अपनी एक नि:स्वार्थ भूमिका का निश्चय करके उसमें अपने आपको पूरा समाहित किया हुआ है, वैसे ही जिस दिन भारत सहित सभी देशों के नागरिक अपने-अपने महान् देशों के लिए अपनी-अपनी एक छोटी या बड़ी भूमिका अपने-अपने सामथ्र्य के अनुसार तय कर लेंगे, उस दिन हमारा जीवन, समाज, राष्ट्र एवं यह संसार बहुत सुन्दर, सुखमय एवं दिव्य बन जायेगा। यही वेद का भी संदेश है।
इन्द्रंवर्धन्तोऽप्तुर:कृण्वन्तोविश्वमार्यम्।
अपघ्नन्तोऽराव्य: ।। वेद।।
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01 Mar 2025 17:58:05
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