करें मार्निंग वाक इन 22 सावधानियों के साथ

करें मार्निंग वाक इन 22 सावधानियों के साथ

 डॉ. नागेन्द्र कुमार 'नीरज’, निदेशक-पतंजलि योगग्राम

आधुनिकतम शोध के अनुसार टहलने से मस्तिष्क तथा शरीर के अन्य हिस्सों में कुछ ऐसे जैव रसायन पैदा होते हैं, जो शरीर के दु:ख-दर्द, रोग एवं बेचैनी से राहत दिलाते हैं। टहलने से सारे शरीर में रक्त संचार तीव्र होने से समस्त अवयवों को भरपूर पोषण मिलता है। ऑक्सीजन धारण करने तथा कार्बन-डाई-ऑक्साइड निष्कासन तथा चयापचय की अन्य क्रियाएँ उन्नत होती हैं। पाचन, श्वसन, परिवहन, उत्सर्जन तथा स्नायु संस्थान सबल एवं स्वस्थ होते हैं। वास्तव में टहलने से मस्तिष्क से जादुई न्यूरोट्रान्समोटर्स एंडोर्फिन तथा फिनाइल इथाइन एमिन निकलता है, जो अपने शामक एवं मादक प्रभाव से तन, मन एवं आत्मा को आह्लाद, उल्लास एवं आनन्द के अवर्णनीय एहसास से भर देता है।  पर जिस दिन व्यक्ति नहीं टहलता, उस दिन उसे अधूरापन महसूस होता है।
खाली पेट ही टहलना ज्यादा फायदेमंद है। पेट भरा होने पर टहलना शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से उत्तम नहीं है। भोजन के बाद शरीर की अधिकांश शक्ति खून तथा ऑक्सीजन भोजन को पचाने के लिये पेट की तरफ दौडऩे लगते हैं। उस समय हृदय रोगियों में हृदय की धमनियां बन्द होने से हृदय को भरपूर पोषण तथा ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। साथ ही भोजन के बाद टहलने, किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक श्रम करने से अतिरिक्तऊर्जा तथा ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में दिल निर्णय नहीं कर पाता कि पचाने, टहलने या अन्य श्रम अथवा स्वयं के लिय किसे रक्त, ऑक्सीजन और ऊर्जा की आपूर्ति करें। फलत: वह संशयग्रस्त हो जाता है।
जिन्हें दिल का दौरा पड़ चुका है व मधुमेह की बीमारी है, उनके लिये टहलना एक बेहतरीन ईलाज है। टहलने से रक्त में हृदय को पोषण देने वाला मित्र कोलेस्ट्रॉल हाइडेन्सिटी लाइपोप्रोटीन (एच.डी.एल.) तथा एपोलियो प्रोटीन ए-1 बढ़ जाता है तथा हृदय एवं रक्त वाहिनियों को क्षतिग्रस्त करने वाले शत्रु कोलेस्ट्रॉल लोडेंसिटी लाइपाप्रोटीन (एल.डी.एल.) की मात्रा कम हो जाती है। हृदय की क्षमता बढ़ जाती है। रुकी हुई कोरोनरी धमनियों से हृदय को पोषण देने के लिये नई कोंपलों की तरह नई रक्त धमनियाँ तक फूटने लगती हैं तथा बन्द धमनियाँ धीरे-धीरे खुलने लगती हैं।
वास्तव में खुले, शान्त, प्रदूषण रहित वायु में सैर करना चुस्ती एवं तंदुरुस्ती दोनों के लिये अत्यन्त लाभदायक है। टहलने से शरीर की जैव रासायनिक प्रक्रियाएँ प्रभावित होती हैं, फेफड़े की जैव क्षमता, रक्त का शुद्धीकरण, शरीर की चयापचय क्रिया, रोग प्रतिरोधक क्षमता, सहन शक्ति तथा विष-निष्कासन की क्षमता बढ़ती है। टहलने का उत्तम लाभ पाने के लिए टहलने के समय निम्र बिन्दुओं पर अवश्य चिन्तन करें, सैर का लाभ कई गुना बढ़ जायेगा-
  • चुस्ती तथा तेजी से सैर करें, रोगियों जैसी सुस्त चाल से टहलने पर सैर से पूरा लाभ नहीं मिलता।
  • निश्चित समय पर निश्चित गति से टहलें, 10 से 15 मिनट प्रति किलोमीटर की आदत डालें। यह गति निरन्तर रखे।
  • अशक्तमरीज गति सीमा को धीरे-धीरे बढ़ायें, उस गति की निरन्तरता बनायें।
  • गति बढ़ाने के लिये सैर करते समय मौन रखें, बातचीत न करें। साथ ही अपनी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों व विचारों का निरीक्षण एवं अवलोकन करते हुए टहलें। कौन टहल रहा है, आप या आपका शरीर? इस प्रश्न का उत्तर अन्दर से आने दें। तब आप महसूस करेंगे कि शरीर का अंग-प्रत्यंग अन्तरतम चेतना चला रही है। अपूर्व साक्षीभाव का उदय होगा। सैर की यह गति सम्यक् एवं स्वास्थ्यप्रद होगी।
  • सैर के समय बोलने से ऊर्जा व्यर्थ में नष्ट होती है। सैर करने वाला स्वास्थ्य साधक जल्दी थक जाता है। जबकि मौन के साथ टहलने से आपका स्वास्थ्य ऊर्जा एवं स्वास्थ्य के स्रोत से जुड़ा रहता है।
  • गति बढ़ाने के लिये कोहनियों को 90 डिग्री कोण से मोड़कर कदम के साथ आगे-पीछे स्विंग करते हुए टहलें। प्रारम्भ मेें अटपटा महसूस होगा, अभ्यस्त हो जाने पर सुखानुभूति होती है।
  • बाँहों को मोड़कर टहलने से शरीर की बायेमैक्नेक्स रिद्म में टहलने में गतिशीलता पैदा होती है, पैर तथा हाथों के मध्य एक ऐसा संतुलन बनता है, जिससे शरीर चुस्ती से आगे फिसलता, प्रवाहित होता चलता है और थकान महसूस नहीं होती।
  • टहलते समय साँस का निरीक्षण करें। आते-जाते साँस की संवेदना को महसूस करें, क्योंकि टहलते समय जल्दी-जल्दी साँस लेने से जल्दी थकान महसूस होती है। साँस को लयबद्ध, गहरी तथा नियंत्रित रखें। जितनी देर में श्वास लें, उसके दुगुने समय में श्वास निकालते हुए टहलें।
  • टहलते समय कमर, रीढ़ एवं गर्दन सीधी, छाती आगे, चेहरा किंचित निम्राभिमुख तथा कदम गरिमा युक्त एवं गति तेज रखें। कदम की लम्बाई न तो ज्यादा हो और न कम। पैरों को जोर से जमीन पर पटकते हुए सैर न करे। चाल एक लय-ताल में एवं आरामदेह होनी चाहिये।
  • टहलते समय महसूस करें कि नाभि से पैर गतिशील हो रहे हैं। ऊपर की माँसपेशियाँ कदम चाल के साथ गतिशील हैं। सैर के समय पैर की गति, शरीर तथा मन में किसी प्रकार का तनाव न रखें।
  • आड़े, तिरछे कूबड़ निकालकर टहलने से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण, हृदय, फेफड़े तथा रीढ़ के स्नायुओं पर व्यर्थ का दबाव पड़ता है और तनाव तथा थकान पैदा होती है।
  • टहलते समय थकने पर बीच-बीच में कुछ देर के लिये विश्राम करें, फिर टहलना प्रारम्भ करें।
  • सैर के समय साँस फूलने लगे व अन्य कोई परेशानी हो, शरीर पूर्णतया थक गया हो, उस अवस्था में टहलना बन्द करके पूर्ण विश्राम करें।
  • सैर का श्रेष्ठतम समय प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त तथा सायंकाल है। नदी, झील, समुद्र के किनारे या पहाडिय़ों पर ओजोन, ऑक्सीजन तथा ऋणायनों की मात्रा अधिक होने से शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य में आशातीत लाभ होता है। ब्रह्ममुहूर्त के वातावरण में नव सृजन के नये विचार पल्लवित एवं प्रस्फुटित होते हैं। शरीर की कोशिकाओं का स्वस्थ नव सृजन होता हैदिव्य जीवनी शक्ति भी जाग्रत होकर रोगों का संहार करती है।
  • प्रात:काल सुविधानुसार 3-4 गिलास जल पीकर टहलने से कब्ज दूर होता है। टहलने के मध्य या बाद में प्यास लगने पर थोड़ा सा पानी पीयें, इससे कमजोरी महसूस नहीं होती।
  • सैर के 25 मिनट बाद दूध या फलों का एक गिलास रस लें तथा एक घंटे बाद भोजन करें।
  • सैर करने से शिराओं के मध्य रक्त संचार नियंत्रित एवं व्यवस्थित होता है। शिराओं में वाल्व होने से रक्त संचार सिर्फ हृदय की ओर ही होता है। सैर करने या अन्य व्यायाम करते समय पेशियों के सिकडुने से पास की शिराएँ दबती हैं तथा उठते समय दबाव कम हो जाता है, इस प्रकार टहलने से शिराओं के अन्दर रक्त-प्रवाह तेज होता है और रक्त का शुद्धीकरण बढ़ जाता है।
  • टहलने से मधुमेह रोगियों की कोशिकाएँ एवं ऊतक अतिरिक्त शर्करा का उपयोग करने में समर्थ हो जाते हैं और यकृत व अग्नाशय की क्रियाशीलता बढऩे से रक्त शर्करा पर नियंत्रण होने लगता है।
  • तेजी से टहलने से अतिरिक्त चर्बी (Calorie) भस्म होती है। अनियंत्रित अंत:स्रावी ग्रंथियां संतुलित स्राव छोडऩे लगती हैं, मोटापा कम होता है।
  • सैर करने से रक्त संचार एवं हृदयगति तथा निम्न रक्तचाप संतुलित होकर सामान्य होने लगता है।
  • टहलने के लिये सूती ट्रेक सूट पहनें अथवा मौसम के अनुसार कपड़े पहनें। कपड़े तथा जूते ऐसे हों जो सैर को चुस्त, दुरुस्त, स्फूर्त, गतिमान तथा आनन्दमयी बनायें। घुटने, कमर तथा पैरों में दर्द वाले रोगी चप्पल पहन कर कदापि न टहलें।
  • हृदय रोग, दमा, एम्फिसिमा, संधियों में सूजन तथा दर्द, पैरों में सूजन, गठिया, संधिवात तथा अन्य रोग जिसमें रोगी को टहलने में तकलीफ महसूस  होती है, उन्हें चिकित्सक की राय लेकर ही टहलना चाहिये।
अंतत: कहा जा सकता है कि ब्रह्ममुहूर्त में प्रात:काल सूर्योदय के आधे घंटे पूर्व एवं बाद तक सैर करने से वायुस्नान तथा धूपस्नान का भी लाभ मिलता है। प्रात:कालीन स्वास्थ्यदायिनी पराबैंगनी किरणें हृदय, अस्थि एवं अन्त:स्रावी संस्थान को सक्रियता प्रदान करती हैं। रक्त कोलेस्ट्रॉल कम होता है। दुर्गुणों को विनाश एवं सद्गुणों का विकास होता है। दिनभर चुस्ती एवं स्फूर्ति रहती है। स्वास्थ्य की खुशबू से जीवन महक उठता है। आइये हम सब ब्रह्ममुहूर्त में उठें, योगऋषि के संदेश को सुने और सैर पर जायें, जिससे राष्ट्र स्वस्थ, मजबूत हो तथा जीवन खुशहाली से भर उठे।

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