महिमा वैदिक साहित्य की

महिमा वैदिक साहित्य की

 राकेश कुमार- मुख्य केंद्रीय प्रभारी, पतंजलि योग समिति

विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदहैं। वैदिक परम्परा के अनुसार आज से लगभग 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार वर्ष पूर्व जब इस पृथ्वी पर मनुष्य की सर्वप्रथम उत्पत्ति हुई तब ईश्वर ने चार ऋषियों- 'अग्नि, वायु, आदित्यऔर 'अंगिराको क्रमश: 'ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेदतथा 'अथर्ववेदका ज्ञान प्रदान किया। इन्हीं ऋषियों ने अन्य मनुष्यों को वेदों का ज्ञान दिया और तब से आज तक गुरु परंपरा से इन वेदों का आदान-प्रदान चलता आ रहा है।
वैसे बहुत लंबे काल तक वेद श्रुति परम्परा से ही ग्रहण किए जाते रहे, इस कारण इनका एक नाम 'श्रुति भी है; बाद में इन्हें पुस्तक रूप में लिख लिया गया।इन वेदों की प्रमुख विशेषतायें कुछ इस प्रकार हैं-
  •  'ऋग्वेदका मुख्य विषय ज्ञान व पदार्थज्ञान है, अर्थात इसमें मुख्य रूप से संसार में विद्यमान पदार्थों का स्वरूप बताया गया है। 'यजुर्वेदमें कर्मों के अनुष्ठान, 'सामवेदमें ईश्वर की भक्ति व उपासना के स्वरूप तथा 'अथर्ववेदमें विभिन्न प्रकार के विज्ञान को मुख्य रूप से विश्लेषित किया गया है।
  •  'ऋग्वेदके मंत्रों की संख्या 10552, 'यजुर्वेदकी 1975, 'सामवेदकी 1875 तथा 'अथर्ववेदकी 5977 है, इस प्रकार चारों वेदों में कुल 20379 मंत्र है।
  •   इन वेदों का एक-एक 'उपवेदभी है। ऋग्वेद के उपवेद का नाम 'आयुर्वेदहै, जिसमें स्वस्थ रहने के उपाय, रोग, रोगों के कारण, औषधि तथा चिकित्सा का मुख्य रूप से वर्णन है। जबकि यजुर्वेद के उपवेद का नाम 'धनुर्वेदहै, जिसमें सेना, हथियार, युद्ध कला के विषय वर्णित हैं। सामवेद के उपवेद का नाम 'गन्धर्ववेदहै, जिसमें गायन, वादन, नर्तन आदि विषयों का वर्णन किया गया है और अथर्ववेद के उपवेद का नाम 'अर्थवेदहै, जिसमें व्यापार, अर्थव्यवस्था आदि विषयों का समायोजन है।
  •    ऋषियों ने वेदों के 'भाष्यव्याख्या रूप में जिन ग्रन्थों की रचना की उन ग्रन्थों को 'ब्राह्मण ग्रंथकहते हैं। जैसे ऋग्वेद का 'ऐतरेय’, यजुर्वेद का 'शतपथ’, सामवेद का 'ताण्ड्यतथा अथर्ववेद का 'गोपथनाम से ब्राह्मण ग्रंथ प्रसिद्ध है।
  •   जिन ग्रन्थों में ऋषियों ने वेदों में वर्णित ब्रह्मविद्या से संबन्धित आध्यात्मिक तत्वों जैसे कि ब्रह्म, जीव, मन, संस्कार, जप, स्वाध्याय, तपस्या, ध्यान, समाधि और विषयों का आलंकारिक कथाओं के साथ सरल रूप से वर्णन किया है, उन ग्रंथो को 'उपनिषद्नाम से जाना जाता है। इन उपनिषदों में ईशोपनिषद् आदि’ 10 उपनिषद् प्रमुख हैं
  •  ऋषियों ने जिन ग्रन्थों में वेदों के दार्शनिक तत्वों की विस्तार से शंका समाधान पूर्वक विवेचना की है, उनका नाम 'उपांगया दर्शन शास्त्रहैं। ये संख्या में 6 हैं, जिनके नाम मीमांसा, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग है।
  •   'जैमिनीऋषीकृत 'मीमांसा-दर्शनमें धर्म, कर्म यज्ञादि का वर्णन है; जबकि 'व्यास ऋषिकृत 'वेदान्त-दर्शनमें ब्रह्म (ईश्वर) का, 'गौतम ऋषिकृत 'न्याय-दर्शनमें तर्क, प्रमाण, व्यवहार व मुक्ति की विवेचना है, जबकि 'कणाद ऋषिकृत 'वैशेषिक-दर्शनमें ज्ञान-विज्ञान, 'कपिल ऋषिकृत 'सांख्य-दर्शनमें प्रकृति, पुरुष (ईश्वर व जीव) तथा 'ऋषि पतंजलिरचित 'योग-दर्शनमें योग-साधना, ध्यान, समाधि आदि विषयों का वर्णन है।
  •  वेद मंत्रों के गंभीर व सूक्ष्म अर्थों को स्पष्टता से समझने के लिए ऋषियों ने 6 अंगों की रचना की, जिन्हें 'वेदांगकहते हैं। ये हैं शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष।
  •   वेदांग के शिक्षा ग्रंथ में संस्कृत भाषा के अक्षरों का वर्णन उनकी संख्या, प्रकार, उच्चारण-स्थान-प्रयत्न आदि के उल्लेख सहित किया गया है। जबकि कल्प ग्रन्थ में व्यवहार, सुनीति, धर्माचार आदि बातों का वर्णन है। व्याकरण ग्रंथ में शब्दों की रचना, धातु, प्रत्यय तथा कौन-सा-शब्द किन-किन अर्थों में प्रयुक्त होता है आदि बातों का उल्लेख है। वेद मंत्रों के शब्दों का अर्थ किस विधि से किया जावे, इसका निर्देश निरुक्त ग्रंथ में मिलता है। छन्द ग्रंथ में श्लोकों की रचना तथा गान कला का वर्णन है, इसी प्रकार ज्योतिष ग्रंथ में गणित आदि विद्याओं, भूगोल-खगोल की स्थिति-गति का वर्णन है। इसके अलावा ऋषियों ने स्मृतिग्रंथ, ब्राहमण व आरण्यक, सूत्रग्रंथ आदि भी बनाए। इन ग्रन्थों की रचना मानव मात्र को कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराने के लिए की गयी। इनमें पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक तथा राजनैतिक नियमों का विधान है। समय-समय पर इन्हीं स्मृति ग्रंथो में स्वार्थी तत्वों द्वारा मिलावट होती रही है। वर्तमान में उपलब्ध 'मनुस्मृतिप्रमुख उदाहरण है, जिसमें अनेक मिलावटें हैं, वैदिक विद्वानों ने ढूंढकर इन्हें पृथक भी किया है।
  • वैदिक धर्म से सम्बंधित आरण्यक, प्रातिशाख्य, सूत्रग्रंथ, पुराण, महाभारत आदि अनेक अन्य ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। आइये हम भी इस परम्परा को जीवन में स्थान दें और धन्य कहलायें।

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