व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के अनुष्ठान में पतंजलि की भूमिका

व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के अनुष्ठान में पतंजलि की भूमिका

आचार्य बालकृष्ण

पतंजलि योगपीठ की ओर से हम ग्यारह सूत्रीय कार्यक्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं और हमारा संकल्प है कि हम आने वाले 25 से 50 वर्षों में भारत को विश्व की सर्वोच्च आध्यात्मिक व आर्थिक महाशक्ति के रूप में खड़ा कर पायेंगे। इस राष्ट्र महायज्ञ में सभी देशभक्त, विवेकशील, निष्ठावान, पुरुषार्थी व पराक्रमी देशवासियों के सहयोग से हम निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं तथा सभी से आह्वान करते हैं कि जिस भी भाई-बहन के पास जितना समय, शक्ति व सामथ्र्य है, उसमें  से 10% तो सभी इस ईश्वरीय कार्य में सहयोग करें। 
1.    योग :
  तस्मात् योगी भवार्जुन (गीता) भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं-अर्जुन सहित हम सबको सबसे पहले योगी बनना है। योग हमारा स्वभाव बन जाए। स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते (गीता-८.१३) अर्थात् जिस दिन देश व दुनियां की सभी आत्माएं भोर में जल्दी उठकर योग करना प्रारम्भ कर देंगी, उसी दिन से उनका जीवन दिव्य होना प्रारंभ हो जायेगा। मात्र एक योग के अभ्यास से हमारे स्वास्थ्य, समृद्धि, सफलता, सुख, शान्ति व सब प्रकार के शुभ व सौभाग्य के द्वार खुल जाते हैं। योग से सब निरोग होते हैं, यह तो योग की प्रथम उपलब्धि है। योग से व्यक्ति की उत्पादकता, सृजनात्मकता, सकारात्मकता व आध्यात्मिकता का पूर्ण विकास होता है और मानव देवत्व व ऋषित्व को प्राप्त कर लेता हैं। 
मानव इस ब्रह्माण्ड की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है और मनुष्य के पूर्ण विकास का यदि एक मात्र निर्विवादित, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, पंथ निरपेक्ष व सर्वसमावेशी उपाय है, तो वह योग ही है। अत: पतंजलि के सभी निष्ठावान कार्यकर्ताओं व करोड़ों श्रद्धालु समर्थ समर्थकों से भी हम यह आह्वान करते हैं कि योग करें व कराएं और इस बात को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दें। प्रत्येक गांव, गली, मौहल्ला, कॉलोनी, छोटे-बड़े शहर में योग की नियमित कक्षाएं चलें, इस पर सबको पूरे सामथ्र्य से जुट जाना है। हमारे लाखों कार्यकर्ता, योग-प्रचारक, संस्था व संगठन इस योग सेवा में लगे हैं। वे ही पतंजलि की मूल शक्ति हैं। 
2.    आयुर्वेद : 
वेदों से लेकर महर्षि चरक, सुश्रुत व धन्वन्तरि आदि महापुरुषों ने जिस आयुर्वेद का दिव्य ज्ञान हमें दिया, पतंजलि योगपीठ उस ऋषि परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ा रहा है। विश्व भेषज संहिता से लेकर प्रामाणिक गंथों का प्रकाशन, आयुर्वेद अनुसंधान, पतंजलि चिकित्सालयों का विस्तार व विकास तथा कुशल आयुर्वेदिक चिकित्सा का निर्माण हमारी प्राथमिकता है। एक दिन वो भी आयेगा, जब देश व दुनियां में एलोपैथी से बड़ा आयुर्वेद बन जायेगा।
3.    स्वदेशी :
विदेशी कम्पनियों की लूट व गुलामी से मुक्ति का यह अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है। एक दौर था जब दुनियां के क्रूर देश राजनैतिक गुलामी व युद्ध के जरिए दुनियां को लूटते थे, लेकिन जब दुनियां मेें इस दुष्कृत्य, लूट, अत्याचार व अन्याय की निन्दा, तिरस्कार व प्रचण्ड विरोध होने लगा तो दुनियां की लूट की ताकतों ने व्यापार को हथियार बनाकर दुनियां को लूटना व गुलाम बनाना शुरु कर दिया। आज राजनैतिक आजादी होते हुए भी भारत की लगभग आधी अर्थव्यवस्था 50 लाख करोड़ से अधिक की अर्थसत्ता पर विदेशी कम्पनियों का कब्जा है। इस लूट, गुलामी या पराधीनता से मुक्ति दिलाना हमारे इस स्वदेशी अभियान का सर्वोपरि लक्ष्य है। इस अभियान से अर्जित अर्थ स्वार्थ नहीं परमार्थ के लिए है, क्योंकि हमारा लक्ष्य खुद का प्रोफिट व प्रोस्पेरिटी बढ़ाना नहीं, परोपकार करना है। इस स्वदेशी अभियान के वस्तु से लेकर विचार तक बहुत गम्भीर व व्यापक पहलू हैं। हम सभी बिन्दुओं पर कार्य कर रहे हैं और स्वदेशी को समग्रता के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
वेदों से लेकर महर्षि चरक, सुश्रुत व धन्वन्तरि आदि महापुरुषों ने जिस आयुर्वेद का दिव्या ज्ञान हमें दिया, पतंजलि योगपीठ उस ऋषि परम्परा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है...
4.    नेचुरोपैथी :
प्राकृतिक चिकित्सा पर भी योगग्राम एवं निरामयम् के माध्यम से हमनें बड़ा अभियान प्रारम्भ किया है। इसका देश के प्रत्येक प्रान्त में तथा धीरे-धीरे विश्वव्यापी विस्तार हमारा लक्ष्य है। सब ओर से निराश रोगियों व स्वास्थ्य साधकों के लिए योग एवं नेचुरोपैथी एक संजीवनी है।
5.    वैदिक परम्पराओं की पुन: प्रतिष्ठा :
भारत मूलत: स्वभाव से ऋषि परम्परा का देश है। पंच महायज्ञ, चतुर्वर्णाश्रम धर्म, सोलह संस्कार, एकत्व, सहअस्तित्व व विश्व बन्धुत्व की हमारी सनातन परम्परा, संस्कृति व सभ्यता को राष्ट्र में पुन: प्रतिष्ठित करके भारत को प्रामाणिक रूप से पुन: ऋषियों का देश बनाना एक अन्तिम ध्येय है। हमारे सारे प्रयास व सेवाएं इस सत्य के चारों ओर हैं।
6.    शिक्षा :
आधुनिक शिक्षा एवं वैदिक संस्कारों के समन्वय से सर्वाङ्गीण, वैज्ञानिक व प्रगतिशील शिक्षा व्यवस्था को हम आगे बढ़ा रहे हैं। बहुत शीघ्र ही मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का अन्त होगा। भारतीय शिक्षा बोर्ड की स्थापना के साथ ही शिक्षा के स्वदेशीकरण व आध्यात्मिकीकरण का कार्य पूरी ताकत से हम शुरु करने जा रहे हैं। दिव्य व्यक्तित्व युक्त नेतृत्व इस देश में तैयार किए बिना हम देश व दुनियां में कोई बड़ा कार्य नहीं कर सकते। संपूर्ण कार्यों को यदि हमें सही दिशा में ले जाना है तो उसकी सबसे पहली शर्त है हमारे पास एक श्रेष्ठ इंसान का होना नितान्त आवश्यक है और एक श्रेष्ठ, सभ्य, आदर्शभाव के निर्माण की एकमात्र आधारशिला शिक्षा ही है। देश में लाखों, करोड़ों श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण हम इस प्रक्रिया से करेंगे।
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7.    स्वास्थ्य :
स्वास्थ्य एक बहुत ही व्यापक विषय है। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक आरोग्य के लिए हमारी सेवाएं निरन्तर आगे बढ़ रही हैं। हम सभी दिशाओं से इस सन्दर्भ में कार्य कर रहे हैं और अन्तत: हमारा लक्ष्य है कि विश्व के स्वास्थ्य की नीतियां भारत से बनें, ऐसा समर्थ भारत राष्ट्र हम बनाना चाहते हैं। वह दिन भी आयेगा जब WHO का मुख्यालय भारत में बन जायेगा। वैसे तो हमारा ये पुराना सपना है वल्र्ड बैंक, IMF, UNO, WHO तथा WTO का मुख्यालय एक दिन भारत में बनेगा। पूरे विश्व की श्रेष्ठ व न्याय पूर्ण नीतियां भारत में बनेंगी।
8.    अनुसंधान : 
दुनियां का नेतृत्व वही देश कर रहा है जो अनुसंधान में आगे है। हमने पतंजलि अनुसंधान संस्थान में लगभग 500 करोड़ रुपये खर्च किये हैं तथा आगे भी योग, आयुर्वेद, जड़ी-बूटियों, खेती व वेदों के अनेक विषयों पर व्यापक अनुसंधान की हमारी योजना है। इस दिशा में हम पूरी प्राथमिकता, गम्भीरता व व्यापकता के साथ कार्य कर रहे हैं।
9.    गो-अनुसंधान व संवर्धन : 
गोहत्या के कलंक से भारत माता मुक्त हो। गोवंश की रक्षा तथा गो-आधारित कृषि से भारत समृद्ध हो, यह सपना प्रत्येक भारतीय का है। जब हमारे देश की देशी गाय ब्राजील में 50-60 लीटर दूध देती है, तो हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं। हम भारत के लगभग 13 करोड़ गोवंश को कैसे उन्नत बनाएं और उसे कत्लखानों में जाने से बचाएं, इसके लिए गो-आधारित अनुसंधान, उद्योग, कृषि एवं अन्य पहलुओं पर हम गंभीरता से कार्य कर रहे हैं। इसके शीघ्र ही व्यापक परिणाम देश को देखने को मिलेंगे।
10.    कुदरती खेती : 
योग आधारित विषमुक्त कुदरती खेती, पशुपालन, डेयरी, जड़ी-बूटी कृषि, लघु उद्योग एवं गृह उद्योग आदि के माध्यम से हम गांव, गरीब, मजदूर, किसान एवं समग्रता के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की दिशा में भी बहुत ही प्राथमिकता के साथ कार्य कर रहे हैं और आने वाले कुछ वर्षों में पतंजलि के विभिन्न सेवा प्रकल्पों के द्वारा इस दिशा में बहुत सी सेवाएं करने की योजना है।
11.    आध्यात्मिक राष्ट्र व विश्व का निर्माण : 
आध्यात्मिक व्यक्ति, आध्यात्मिक परिवार, समाज, राष्ट्र व अन्तत: आध्यात्मिक विश्व के निर्माण का मेरा अन्तिम लक्ष्य है। 
इन्द्रं वर्धनोऽप्तुर: कृष्णवन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तोऽराव्ण:।। वेद।। 
अर्थात् पूरे संसार में सब प्रकार का सुख, समृद्धि, शान्ति व दिव्यता हो, यही वेद का विधान है। यही धरती पर स्वर्ग का अवतरण है। सब मनुष्यों का ज्ञान, जीवन, चरित्र व आचरण पवित्र हो, सब ओर खुशहाली हो, कहीं पर भी अज्ञान, अभाव, अन्याय, क्रूरता, हिंसा, युद्ध व किसी प्रकार का अनाचार न हो, इसी लक्ष्य को केन्द्र में रखकर पतंजलि का समस्त पुरुषार्थ एवं निष्काम सेवाएं हैं। यह ईश्वरीय कार्य है और किसी भी एक व्यक्ति से यह सम्भव नहीं हो सकता। अत: अन्त में संक्षेप में हम यही कहेंगे कि सब पुण्यात्माओं को इस ईश्वरीय दिव्य कार्य में अपनी-अपनी छोटी या बड़ी भूमिका निभानी है। हम सभी योगी आध्यात्मिक अमृत सन्तानों, ऋषि-ऋषिकाओं के वंशजों से यही विनम्र प्रार्थना करते हैं कि आप जहाँ भी हैं, वहीं से इस महायज्ञ में अपने-अपने सामथ्र्य के अनुरूप पूर्ण सहयोग करें।
पूरे संसार में सब प्रकार का सुख, समृद्धि, शान्ति व दिव्यता हो, यही वेद का विधान है। यही धरती पर स्वर्ग का अवतरण है।
संस्था एवं संगठन की सेवाओं से जुड़कर निरन्तर इन सेवाओं में जब सब देशवासी सहयोग करेंगे, तो हम अपनी आँखों के सामने अपने हाथों से एक दिव्य व भव्य भारत तथा एक दिव्य व भव्य विश्व का सपना साकार होते हुए देखेंगे और इसी में हमारे जीवन की बड़ी उपलब्धियाँ व सफलतायें होंगी। मात्र छोटे-छोटे लक्ष्यों व उद्देश्यों के लिए जीवन जीना तो जीवन का अपमान है। हम सभी सात्विक पुण्यशील आत्माओं से आह्वान करते हैं कि वे स्वयं पतंजलि की इन संस्था व संगठनगत सेवाओं से जुड़ें तथा अन्यों को जुडऩे के लिए प्रेरित करें। वेदों में ईश्वर की भी यही आज्ञा है कि-
संगच्छध्वं संवदध्वम् (संगठन सूक्त ऋग्वेद) 
हम सब साथ मिलकर शुभ कार्यों को आगे बढ़ायें। वस्तुत: जब आसुरी शक्तियां संगठित होकर अशुभ, अधर्म व अन्याय में लगी हुई हैं, तो दैवी शक्तियां व योगी आत्माओं को भी पूर्ण रूप से संगठित होकर इस सेवा यज्ञ में एक महान् भूमिका अवश्य निभानी चाहिए। 

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