सर्दी, खांसी, ज्वरादि असंख्य रोगों की नाशक श्यामा तुलसी

सर्दी, खांसी, ज्वरादि असंख्य रोगों की नाशक श्यामा तुलसी

आचार्य बालकृष्ण

वानस्पतिक नाम : ocimum sanctum linn. (ओसीमम् सेंक्टम्) Syn-Ocimum tenuiflorum Linn.; Ocimum monachorum Linn. कुलनाम : lamiaceae (लेमिएसी); अंग्रेजी नाम : Holy basil (होली बेसिल); संस्कृत- तुलसी, सुरसा, देवदुन्दुभि, अपेतराक्षसी सुलभ, बहुमञ्जरी, गौरी, भूतघ्नी; हिन्दी- तुलसी, वृन्दा;  उडिय़ा- तुलसी (Tulasi); कन्नड़- एरेड तुलसी (Ared tulsi); कारीटुलसी (Karitulasi); गुजराती-तुलसी(Tulasi); तेलुगु- गग्गेर चेट्टु (Gagger chettu); तमिल- तुलशी (Tulashi); नेपाली- तुलसी (Tulasi); बंगाली- तुलसी (Tulasi); मराठी- तुलसी (Tulas); मलयालम- कृष्ण तुलसी Krishantulasi); तुलसी (Tulasi); अंग्रेज़ी- थाई बेसिल(Thai basil), सेके्रड बेसिल Sacred basil); अरबी- दोहश (Dohsh)

सर्वरोग निवारक जीवनीय शक्ति वर्धक, औषधि तुलसी सर्वत्र सुलभ, सुगन्धित, सुन्दर तथा सर्वव्याप्त है। तुलसी की कई प्रजातियां मिलती हैं। जिनमें श्वेत व कृष्ण प्रमुख हैं। कृष्ण तुलसी के पत्र तथा शाखायें कुछ बैंगनी तथा कृष्ण आभा लिये होते हैं। चरक संहिता में श्वासघ्न दशेमानि तथा शिरोविरेचन, कृमि व विष चिकित्सा के लिए अनेक स्थानों पर तुलसी का प्रयोग बताया गया है। 
श्याम तुलसी साधारणतया 30-60 सेमी ऊँचा, सीधा, बहुशाखित, सुगन्धित, मुलायम रोमश, बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसके काण्ड का अधो भाग कदाचित् काष्ठीय एवं शाखाएँ साधारणतया बैंगनी-रक्त वर्णी, लगभग चतुष्कोणीय, सीधी, आरोही अथवा फैली हुई होती हैं। इसके पत्र सरल, विपरीत, 2-5-6-3 सेमी लम्बे, चौड़ाई लगभग 1 से 3 सेमी तक, दीर्घवृत्ताकार-दीर्घायत दोनों पृष्ठ पर रोमश, सूक्ष्म ग्रन्थिमय होते हैं। इसके पुष्प छोटे, श्वेत अथवा बैंगनी अथवा रक्तवर्णी, सघन-चक्करदार होते हैं। फल सूक्ष्म, गोलाकार अथवा चौड़े दीर्घायत, नुकीले अण्डाकार, अल्प सम्पीडित होते हैं। इसका पुष्प एवं फलकाल जुलाई से अक्टूबर तक होता है।
श्यामा तुलसी के पौधे में सिट्रिक, टारटरिक एवं मैलिक अम्ल पाया जाता है।
इसके तैल में युजिनॉल, मेथिल ईथर, टर्पेन-4-ऑल, डेक्किलडीहाईड, γ-सेलीनीन, निरोल, कैरियोफाईलिन, टर्पीनीन, एल्डीहाईड, β-पिनीन, केम्फीन, तथा α-पिनीन पाया जाता है। जबकि पत्र में यूजीनॉल, मेथिल चेवीकॉल तथा अवाष्पशील तैल पाया जाता है। 
इसके पत्र तथा पुष्प में कैडीनीन, लिमोनीन, युजिनोल, β-केरोटीन, अर्सोलिक अम्ल, गैलिक अम्ल, प्रोटोकैटेचुईक अम्ल, वैनेलिक अम्ल, कैफीक अम्ल, क्लोरोजेनिक अम्ल तथा रेसमेरिनिक अम्ल पाया जाता है। 
तुलसी के मूल में β-सिटोस्टेरॉल, ट्राइटरपीन्स और बीज तैल में सिटोस्टेरॉल, पॉल्मिटिक, स्टेएरिक, ऑलिक, लिनोलीक, एवं लिनोलिनिक अम्ल पाया जाता है। जबकि पञ्चाङ्ग में एस्कॉर्बिक अम्ल, कैरोटीन, एल्केलाइड्स, ग्लाइकोसाइड्स सेपानिन एवं टैनिन पाया जाता है।
64
 
आयुर्वेदीय गुण-कर्म:
तुलसी पञ्चाङ्ग कफवात शामक, जन्तुघ्न, दुर्गन्ध नाशक, दीपन, पाचन, अनुलोमन, कृमिघ्न, कफघ्न, हृदयोत्तेजक, रक्तशोधक, स्वेदजनन, ज्वरघ्न व शोथहर होता है। तुलसी के बीज मूत्रल एवं बलकारक होते हैं।  पत्र प्रतिश्याय, वातश्लैष्मिक ज्वर एवं विषम ज्वर में लाभप्रद है। तुलसी का पञ्चाङ्ग श्वास, श्वसनी शोथ, कर्कटार्बुद (बड़ी आंत, यकृत, पित्ताशय), कवकरोग, हृदयविकार, प्रतिश्याय, विसूचिका, उदरशूल, विबन्ध, कास, ऐंठन, मानसिक अवसाद, त्वविकार, अतिसार, कष्टार्तव, अग्निमांद्य, श्वासकष्ट, कर्णशूल, मस्तिष्क रोग, आंत्ररोग, नासास्राव, ई- कोलाई संक्रमण, ज्वर, कवक संक्रमण, आमाशयिक रोग, सूजाक, अश्मरी, शिरोवेदना, ऊष्माघात, अद्र्धाङ्ग पक्षाघात, यकृत् विकार, हिक्का, उच्चरक्तचाप, अनिद्रा, श्वित्र, कटिशूल, मलेरिया, अक्षिरोग, कर्णरोग, पूतिनासा, आमवात, दद्रु, सर्पदंश, प्लीहारोग, शोथ, क्षय, आंत्रिकज्वर, व्रण, रतिज रोग, विषाणु संक्रमण, अधिमांस एवं कृमि रोग में लाभप्रद होता है।
  • श्याम तुलसी का नाइसीरिया गोनोरी (neisseria gonorrhoeae) की वृद्धि को रोकता है। काण्ड, काण्ड कैलस (Stem callus) व पत्र का ऐथेनॉल तथा क्लोरोफार्म सत्त ट्रान्सकार्नियल (Transcorreal) विद्युत् आघात प्रेरित टॉनिक आक्षेप (Tonic convulsion) की रोकथाम में प्रभावकारी है। यही नहीं सत्त चूहों पर मेध्य (Nootropic) एवं स्मृति भ्रंशरोधी (anti-amnesic) क्रिया दर्शाता है।
  • इसका एल्कोहॉलिक पत्र सत्त वेदनास्थापक क्रियाशीलता दर्शाता है।
  • इसके पत्र का बैमजीन सत्त प्रतिवर्तित (Reversible) जननक्षमतारोधी प्रभाव प्रदर्शित करता है।
औषधीय प्रयोग विधि
शिरो रोग
  • तुलसी की छाया शुष्क मंजरी के 1-2 ग्राम चूर्ण को मधु के साथ खाने से शिरो रोग में लाभ होता है।
  • तुलसी के 5 पत्रें को प्रतिदिन पानी के साथ निगलने से बुद्धि, मेधा तथा मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है।
  • तुलसी तेल को 1-2 बूंद नाक में टपकाने से पुराना सिर दर्द तथा अन्य सिर संबंधी रोग दूर होते हैं।
  • तुलसी के तेल को सिर में लगाने से जुएं व लीखें मर जाती हैं। तेल को मुंह पर मलने से चेहरे का रंग साफ  हो जाता है।
कर्ण रोग 
  • कर्णशूल- तुलसी पत्र स्वरस को गर्म करके 2-2 बूंद कान में टपकाने से कर्णशूल का शमन होता है।
  • तुलसी के पत्ते, एरंड की कोंपले और चुटकी भर नमक को पीसकर कान पर उसका गुनगुना लेप करने से कान के पीछे (कर्णशूल) की सूजन नष्ट होती है।
मुख रोग
  • दंतशूल- काली मिर्च और तुलसी के पत्तों की गोली बनाकर दांत के नीचे रखने से दंतशूल दूर होता है।
  • तुलसी के रस को हल्के गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से कंठ के रोगों में  लाभ होता है।
  • तुलसी रस युक्त जल में हल्दी और सेंधा नमक मिलाकर कुल्ला करने से मुख, दांत तथा गले के विकार दूर होते हैं।
60
वक्ष रोग
  • सर्दी, खांसी, प्रतिश्याय एवं जुकाम- तुलसी पत्र (मंजरी सहित) 50 ग्राम, अदरक 25 ग्राम तथा  कालीमिर्च 15 ग्राम को 500 मिली जल में मिलाकर क्वााथ करें, चौथाई शेष रहने पर छाने तथा इसमें 10 ग्राम छोटी इलायची के बीजों को महीन चूर्ण डालें व 200 ग्राम चीनी डालकर पकायें और एक तार की चाशनी हो जाने पर छानकर रख लें।
  • इस शर्बत का आधे से डेढ़ चम्मच की मात्र में बच्चों को तथा 2 से चार चम्मच तक बड़ों को सेवन कराने से, खांसी, श्वास, काली खांसी, कुक्कुर खांसी, गले की खराश आदि में फायदा होता है।
  • इस शर्बत में गर्म पानी मिलाकर लेने से जुकाम तथा दमा में बहुत लाभ होता है।
  • तुलसी की मंजरी, सोंठ, प्याज का रस और शहद मिलाकर चटाने से सूखी खांसी और बच्चे के दमे में लाभ होता है।
उदर रोग
  • वमन- 10 मिली तुलसी पत्र स्वरस में समभाग अदरक स्वरस तथा 500 मिग्रा इलायची चूर्ण मिलाकर लेने से छर्दि बंद हो जाती है।
  • अग्निमांद्य- तुलसी पत्र के स्वरस अथवा फाण्ट को दिन में तीन बार भोजन से पहले पिलाने से अजीर्ण, अग्निमांद्य, बालकों की यकृत् प्लीहा की विकृतियों में लाभ होता है।
  • अपच- तुलसी की 2 ग्राम मंजरी को पीसकर काले नमक के साथ दिन में 3 से 4 बार देने से लाभ होता है।
प्रजनन संस्थान संबंधी रोग
  • स्तम्भन- 2 से 4 ग्राम तुलसी मूल चूर्ण और जमीकन्द चूर्ण को मिलाकर 125-250 मिग्रा की मात्र में पान में रखकर खाने से स्तम्भन दोष मिटता है।
  • प्रसवोत्तर शूल- तुलसी पत्र स्वरस में पुराना गुड़ तथा खाँड मिलाकर प्रसव होने के बाद तुरन्त पिलाने से प्रसव के बाद का शूल नष्ट होता है
  • नपुंसकता- समभाग तुलसी बीज चूर्ण अथवा मूल चूर्ण में बराबर की मात्र में गुड़ मिलाकर 1 से 3 ग्राम की मात्र में, गाय के दूध के साथ लगातार लेते रहने से एक माह या छ: सप्ताह में लाभ होता है।
अस्थिसंधि रोग 
  • वातव्याधि- 2 से 4 ग्राम तुलसी पञ्चाङ्ग चूर्ण का सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से संधिशोथ एवं गठिया के दर्द में लाभ होता है।
त्वचा रोग
  • कुष्ठ रोग- 10-20 मिली तुलसी पत्र स्वरस को प्रतिदिन प्रात: काल पीने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
  • तुलसी के पत्रें को नींबू के रस में पीसकर, दाद, वात रक्त, कुष्ठ आदि पर लेप करने से लाभ होता है।
  • सफेद दाग झांई- तुलसी पत्रस्वरस, नींबू रस, कंसौदी पत्र स्वरस तीनों को बराबर-बराबर लेकर उसे तांबे के बरतन में डालकर चौबीस घंटे के लिये धूप में रख दें। गाढ़ा हो जाने पर रोगी को लेप करने से दाग तथा अन्य चर्म विकार साफ  होते हैं, इसे चेहरे पर भी लगाया जाता है।
  • नाड़ीव्रण- तुलसी बीजों को पीसकर लेप करने से दाह तथा नाड़ीव्रण का शमन होता है।
  • शीतपित्त- शरीर पर तुलसी स्वरस का लेप करने से शीतपित्त तथा उदर्द का शमन होता है।
  • शक्ति वृद्धि के लिये- 20 ग्राम तुलसी बीज चूर्ण में 40 ग्राम मिश्री मिलाकर महीन-महीन पीस लें, इस मिश्रण को 1 ग्राम की मात्र में शीत ऋतु में कुछ दिन सेवन करने से वात-कफ  रोगों से बचाव होता है। दुर्बलता दूर होती है। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है व स्नायु मंडल सशक्त होता है।
ज्वर रोग :
  • मलेरिया ज्वर- तुलसी का पौधा मलेरिया प्रतिरोधी है। मलेरिया में तुलसी पत्रें का क्वाथ तीन-तीन घंटे के अन्तर से सेवन करें। तुलसी मूल क्वाथ को आधा औंस की मात्रा में दिन में दो बार देने से ज्वर तथा विषम ज्वर उतर जाता है।
  • कफ प्रधान ज्वर- 21 नग तुलसी दल, 5 नग लवंग तथा अदरक रस 500 मिली को पीस छानकर गर्म करें, फिर इसमें 10 ग्राम मधु मिलाकर सेवन करें।
  • आंत्र ज्वर- 10 तुलसी पत्र तथा  ½ व 1 ग्राम जावित्री को पीसकर शहद के साथ चटाने से लाभ होता है।
  • साधारण ज्वर- तुलसी पत्र, श्वेत जीरा, छोटी पीपल तथा शक्कर, चारों को कूटकर प्रात:-सायं देने से लाभ होता है।
विष चिकित्सा :
  • सर्पविष- 5 से 10 मिली तुलसी पत्र स्वरस को पिलाने से और इसकी मंजरी और जड़ों को बार-बार दंशित स्थान पर लेप करने से सर्पदंश की पीड़ा में लाभ मिलता है। अगर रोगी बेहोश हो गया हो, तो इसके रस को नाक में टपकाते रहना चाहिये।
  • शिरोगत विष- विष का प्रभाव यदि शिर: प्रदेश में प्रतीत हो तो बन्धु, जीव, भारंगी तथा काली तुलसी मूल के स्वरस अथवा चूर्ण का नस्य देना च
परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का स्वानुभूत प्रयोग :
   7 तुलसी के पत्र तथा 5 लौंग लेकर एक गिलास पानी में पकायें। पानी पककर जब आधा शेष रह जाये, तब थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर गर्म-गर्म पी जायें। यह काढ़ा पीकर कुछ समय के लिए वस्त्र ओढ़कर पसीना ले लें। इससे ज्वर तुरन्त उतर जाता है तथा सर्दी, जुकाम व खांसी भी ठीक हो जाती है। इस काढ़े को दिन में दो बार दो तीन दिन तक ले सकते हैं। 
बाल रोग :
   छोटे बच्चों को सर्दी जुकाम होने पर तुलसी व 5-7 बूंद अदरक रस को शहद में मिलाकर चटाने से बच्चों का कफ, सर्दी, जुकाम ठीक हो जाता है। पर नवजात शिशु को यह मिश्रण अल्प मात्रा में ही दें।
विशेष: 
    हमारे ऋषियों को लाखों वर्ष पूर्व इसके औषधीय गुणों का ज्ञान हो गया था, इसलिए तुलसी को दैनिक जीवन में प्रयोग हेतु प्रमुख स्थान दिया गया। वानस्पतिक शास्त्र के अनुसार श्यामा और रामा तुलसी का एक ही नाम है, पर औषधीय गुणों में रामा तुलसी की तुलना में श्यामा तुलसी को महत्वपूर्ण माना जाता है। 
 

Related Posts

Advertisment

Latest News

Eternal wisdom Eternal wisdom
          With divine inspiration, I want to draw your attention towards 11 important facts. I am sure that you will
Patanjali's Yoga, Ayurveda and Swadeshi Movement
Address by Hon'ble Union Education Minister Shri Dharmendra Pradhan at the Annual function of Patanjali University "Abhyudaya 2024-25"
Realistic view of Life
Anti-aging, the modern science of staying young forever
Fevogrit
Who has the right over the fruits of actions?
Nasal disease Sinusitis
Patanjali Nutrela Collagenprash Skin Super Food for Taste and Beauty
Changing face of treatment of women in Europe