दूसरों के लिए चादर फैलाने वाले दो संत, जो परमात्मा से पाते हैं परम आशीर्वाद व ऐश्वर्य
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स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज
शैव हो, शाक्त हो, जैनी हो, बौद्ध हो, स्वामी रामदेव के बिना काम चलने वाला नहीं है, इसलिए सब लोग इनके मार्गदर्शन में अपने जीवन को स्वस्थ बनायें। ये दोनों निष्काम सेवा की प्रतिमूर्ति हैं। पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज की एक बड़ी विशेषता है, जो दुनिया के लोग नहीं जानते कि इतना करोड़ों का काम होने के बाद, इतना उदय होने के बाद भी स्वामी जी महाराज की चैरिटी है, वो 100 प्रतिशत है। जो कुछ बचता है, वह पूरा 100 प्रतिशत गरीबों को बाँटते हैं। एक विद्यालय में जाकर उन्होनें 1 करोड़ रूपये दे दिए। जहाँ जाते हैं, वो केवल देखते नहीं, देते हैं। ये बड़ी अच्छी बात है।
मैं एक विशेष बात कहना चाहता हूँ कि हम लोगों के पास पैसा क्यों कम आता है? क्योंकि हमारे पास जेब है। और जिसके पास जेब होती है, उनके पास पैसा कम आता है, जिसके पास चादर होती है, उसके पास पैसा ज्यादा आता है। स्वामी रामदेव जी जेब मुक्त हैं। अर्थात् ये दोनों अपनी चादर चौबीसों घंटे दूसरों की सेवा के लिए फैलाकर रखते हैं और परमात्मा इन्हें देता चला जाता है। भगवान करे कि टाटा, बिरला आदि जितने धनपति लोग हैं, ये सब लोग इस संन्यासी के सामने प्रण करें कि हमनें आपकी औषधियाँ खाई, आपका यश सुना, आपसे योगासन सीखा फिर भी व्यापार में हम हार गये, क्योंकि हमारी मुठ्ठी बंद है। अत: अब लोक के लिए, राष्ट्र के लिए, विश्व के हित के लिए हम अपनी मुट्ठी खोल कर रखेंगे।
मैं एक बात अपने संदर्भ में कहता हूँ कि मेरा यह 501 कुण्डीय महायज्ञ निश्चित रूप से गंगा माँ ने स्वयं कराया, उसमें जरा भी मेरा कोई श्रेय नहीं। क्योंकि मैं निरंतर दो महीनों से अस्वस्थ हूँं। पर मेरे संदर्भ में इन संतों द्वारा जितने गुणों का वर्णन किया गया है। ये सब इन महात्माओं के भीतर हैं, इसलिए वो गुण मेरे भीतर इनको दिखाई पड़ रहे हैं। मैंने जीवन भर श्रेष्ठ गुणों के विकास के लिए प्रयत्न किया, पर मैं 85 वर्ष की आयु में पुन: एक बार परमात्मा से प्रार्थना कर रहा हूँ कि इन महात्माओं ने जो गुण बताये हैं, उसमें मेरा अधिक विकास हो। मेरा केवल परमात्मा का स्मरण करते हुए शेष समय व्यतीत हो। मेरा आप सबसे भी निवेदन है कि अपने-अपने घरों में आप सब जाओ तो नित्य दो मिनट गंगा जी का ध्यान करना और देखना की उनकी लहरें आ रही हैं। और फिर अपने-अपने भगवान् का ध्यान करना, निश्चित ही आपका ध्यान परिपक्व हो जायेगा। संसार छूटेगा। स्वर्ग सोपान संगे, करल तरंगे देवी गंगे प्रसीद, उठे तरल तरंग गंगा माता, प्रसन्न हो का भाव जगेगा।
आप सब लोगों को एक बात और कहता हूँ कि मैं जीवन के जिस काल में पहुंचा हूँ, उसमें एक काम करते हुए पहुंचा हूँ, वह है प्रमाणिकता से निरंतर भगवान का नाम लेना और दूसरी बात भगवान का नाम लेने के साथ में संसार के जितने प्राणी हैं उन सबको प्रणाम करना। मैं नित्य आप जितने संत हैं उनको प्रणाम करता हूँ, आप जितने गृहस्थ हैं सबको प्रणाम करता हूँ, क्योंकि मेरे जीवन में केवल दो ही बातें शेष रही । एक भगवान का नाम और आप सबका प्रणाम, आपसे भी प्रार्थना करूँगा कि आप सभी गंगा को भगवान का स्वरूप मानना।
आज मुझे यहाँ बड़ा सुन्दर कलश दिया गया। मैंने सोचा इस कलश को लेकर मैं क्या करूंगा। मेरे आचार्य बालकृष्ण जी को खाली मानपत्र मिला। लेकिन मानपत्र तो टांग दिया जायेगा। इसलिए वो पूरा का पूरा कलश मैं पतंजलि पीठ को समर्पित करता हूँ, क्योंकि वहाँ सेवा में लगेगा।
एक बात याद रखिए कईं लोगों ने उत्तराधिकारी शब्द का प्रयोग किया। पूज्य स्वामी अवधेशानन्द मेरे सर्वाधिकारी हैं और अब मैं भी उनसें पूछ के काम करता हूँ। जब आप अपना दायित्व किसी को दें देते हैं, तो आपका अंहकार उसमें इतना गलित होना चाहिए कि उसमें आप बीच में न आयें। उस पर पूरा विश्वास करें, मुझे अपने सर्वाधिकारी जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द पर इसी स्तर का विश्वास है। ये मेरा इतना आदर करते हैं। मैं उनकी सेवा से अपने को अभिभूत अनुभव करता हूँ और सोचता हूँ कि मेरे ऊपर कहीं ये ऋण तो नहीं चढ़ रहा। मेरे पूर्व जन्म का यह पुण्य होगा, या मैंने बचपन से जो गंगा का स्नान किया और भगवान का नाम लिया, उसका प्रतिफल व परिणाम होगा। राम नाम कलि अभिमत दाता, हित परलोक लोक पित माता। मेरे जीवन में इस चौपाई की सिद्धि हुई। लोक में सब मिल रहा है, परलोक का निर्माण हो रहा है, क्योंकि अब वस्तु से आसक्ति कम होती जा रही है। भारत माता मन्दिर की व्यवस्था कभी देखने जाता नहीं हूँ, मेरे सर्वाधिकारी इतने योग्य हैं कि हम वहाँ आवें या न आवें, क्योंकि सूर्य हर जगह नहीं जाता सूर्य की किरणें हर जगह जाती हैं, मुझे विश्वास है उनका। उनका आत्मविश्वास मेरे लिए बड़े गौरव की बात है।
शायद मेरा नाम अब गिनीज बुक में आ जाये। क्योंकि अवधेशानन्द जी महाराज के 5 लाख शिष्य हैं वो सब मुझे दादा गुरू कहते हैं, तो दुनियाँ का सबसे बड़ा पितामह अगर कोई है तो वह सत्यामित्रानन्द हैं।
40 वर्ष पहले मैं सौराष्ट्र में गया, तो वहाँ हनुमान जी की एक मूर्ति देखी लंगड़े हनुमान। मैंने हनुमान जी से कहा महाराज रावण को लातें मारी, मेघनाथ को मारी, राक्षसों को मारी, पर आप लंगड़े हनुमान हो गये, मैंने प्रणाम तो किया, लेकिन अंत: आस्वस्ति कम थी। मन में ऐसा हुआ कि हनुमान जी भी लंगड़े हो गये हैं?
तब उन्होनें कहा कि बेटा जब 85 वर्ष का होगा तब तू भी लंगड़ा स्वामी होगा। आज हम बड़े मजे में लंगड़ेपन का आंनद ले रहे हैं।
आपसे निवेदन है कि घर जाकर के रोना नहीं उदास मत होना। अकेले बैठ के खूब हंसना। कोई न मिले तो अपना चेहरा मिरर में देख कर किसी अपने दोस्त का मिमिकरी करना, हंसी अपने आप आ जायेगी। हंसना तुम्हारा धर्म है, भगवान को भूलना नहीं, भारत को भुलाना नहीं। राष्ट्र को उन्नति की ओर ले जाना। हमारे आचार्य अवधेशानन्द जी महाराज, ये तो निरंतर आकाश में सूर्य की भांति आगे बढऩे वाले हैं, क्योंकि उनके मित्र आचार्य रामदेव जी महाराज और आचार्य बालकृष्ण जी जो हैं। मैं मानता हूँ कि पतंजलि ही भारत माता है और जो भारत माता है, वो पूरी पतंजलि है। अत: दोनों को एकाकार स्वरूप में देखना। ज्ञान, योग, भक्ति, कर्म का यह एकीकरण राष्ट्र व लोक दोनों को सशक्त बनायेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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