वैज्ञानिक एवं खगोल सम्मत है भारतीय काल गणना
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विजय सिंह माली, प्रधानाचार्य रा.आ.उ.मा.वि. मगरतलाव (पाली)
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा (29 मार्च) से युगाब्द 5119, विक्रम संवत 2074 तथा शालिवाहन शक संवत 1939 का शुभारम्भ हुआ। अंग्रेजों के भारत में आने के पहले भारतीय जनसमुदाय इन्ही संवतो को मानता था। समाज की व्यवस्था थी ऐसी कि बिना किसी प्रचार के हर व्यक्ति को तिथि, मास व वर्ष का ज्ञान हो जाता था। समाज की सम्पूर्ण गतिविधियाँ भारतीय कालगणना अनुसार बिना किसी कठिनाई के सहज रूप से संचालित होती थीं। आज भी समाज का बड़ा हिस्सा भारतीय तिथि क्रम के अनुसार ही अपने कार्यकलाप चलाता है। भारतीय गुरुकुल परम्परा का संचालन इसी पद्धति पर निर्भर है। पाश्चात्य कालगणना अर्थात ग्रेगेरियन कैलेण्डर की व्यापक घुसपैठ के बाद भी भारतीय कैलेण्डर का महत्व कम नहीं हुआ है।
पाश्चात्य कालगणना मैकाले प्रणीत शिक्षा प्रणाली के कारण हमारी जुबान पर भले ही हो, पर यह न तो सटीक वैज्ञानिक है, न ही पाश्चात्य कालगणना का प्रकृति से कोई सम्बन्ध है। इसका प्रारम्भ रोम में हुआ। पाश्चात्य कालगणना के आधार पर वर्तमान प्रचलित कैलेण्डर में सब कुछ अनेक बार बदला जा चुका है। वहाँ पर कभी घडिय़ों को पीछे किया गया, तो कभी वर्ष के मास 10 से 12 किए गए। कभी 3 सितम्बर को 14 सितम्बर किया गया, तो कभी वर्ष को 304 दिन से बढ़ाकर 360 और 365 दिन किये गये। इतना ही नहीं उनके मास आज भी 28, 29, 30 व 31 दिन के होते हैं। इन सब विसंगतियों का कारण पाश्चात्य कालगणना का कोई वैज्ञानिक आधार न होना है। वे माह की गणना चन्द्र की गति से करते हैं और वर्ष की गणना का आधार है सूर्य की गति। इसलिए 1 जनवरी , 25 दिसम्बर या 31 दिन को हर वर्ष सूर्य व चन्द्र की स्थिति एक ही होगी यह तय नहीं हैं। पहले 10 माह, फिर जुलाई, बाद में अगस्त माह जोड़कर बारह माह करना, पहले अपै्रल से वर्ष प्रारम्भ करना, फिर 1 जनवरी से प्रारम्भ करना, फरवरी को चौथे वर्ष 29 दिन का मानना जैसे कई संशोधन करने के बाद भी इस काल गणना में आज भी त्रुटियां हैं। अब भी पृथ्वी के परिभ्रमण समय तथा ग्रेगेरी वर्ष में अन्तर आता रहता है, इसलिए घडिय़ों को कुछ सेकण्ड आगे या पीछे करना पडता है।
जबकि भारतीय कालगणना में सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक सेकण्ड के सौवें भाग का भी अन्तर नहीं आया है। भारत में प्राचीन काल से मुख्य रूप से सौर तथा चन्द्र कालगणना व्यवहार में लाई जाती है। इसका संबंध सूर्य और चन्द्रमा से है। ज्योतिष के प्राचीन ग्रन्थ सूर्य सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन 15 घटी, 31 पल, 31 विपल तथा 24 प्रतिविपल (365.258756484 दिन) का समय लेती है। यही वर्ष का कालमान है और भारतीय वैज्ञानिकों ने इसी क्रम में वर्ष, महीने, दिन के साथ समय की अन्य इकाइयों की खोज की।
गणना की वैज्ञानिकता
महर्षि भाकु के अनुसार 2 परमाणु = 1 अणु, 3 अणु = 1 त्रसरेणु , 3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि , 100 त्रुटि = 1 वेध , 3 वेध = 1 लव, 3 लव = 1 निमेष , 3 निमेष = 1 क्षण, 5 क्षण = 1 काष्ठ , 30 काष्ठ = 1 कला , 15 काष्ठ = 1 लघु , 15 लघु = 1 नाडिका , 2 नाडिका = 1 मुर्हूत , 30 मुर्हूत = एक दिन-रात, 7 दिन-रात = 1 सप्ताह , 2 सप्ताह = 1 पक्ष , 1 पक्ष = 1 मास , 2 मास = 1 ऋतु , 3 ऋतु = 1 अयन , 2 अयन = 1 वर्ष होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने आज से 1400 वर्ष पूर्व लिखे अपने ग्रंथ में समय की भारतीय इकाइयों का विशद विवेचन किया। ये इकाइयॉ इस प्रकार हैं-
225 त्रुटि = 1 प्रतिविपल
60 प्रतिविपल = 1 विपल (0.4 सेकण्ड)
60 विपल = 1 पल (24 सेकण्ड)
60 पल = 1 घटी (24 मिनट)
2.5 घटी = 1 होरा (1 घंटा)
5 घटी या 2 होरा = 1 लग्न (2 घंटे)
60 घटी = 24 होरा = 12 लग्न = 1 दिन (24 घंटे)
स्पष्ट है कि एक विपल आज के 0.4 सेकण्ड के बराबर है तथा त्रुटि का मान सेकण्ड का 33,750 वां भाग है। इसी तरह लग्न का आधा भाग जो होरा कहलाता है , एक घंटे के बराबर है। इसी होरा से अंग्रेजी में हॉवर बना।
इसी तरह एक दिन में 24 होरा हुए। सृष्टि का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल 1 रविवार के दिन हुआ। इस दिन से पहले होरा का स्वामी सूर्य था, उसके बाद के दिन के होरा का स्वामी चन्द्रमा था, इसलिए रविवार के बाद सोमवार आया। इसी तरह सातों वारों के नाम सात ग्रहों पर पड़े। पूरी दुनिया में सप्ताह के सात वारों के नाम समान रूप से प्रचलित हैं। हमारे यहाँ समय की सबसे बडी इकाई कल्प को माना गया। एक कल्प में 432 करोड़ वर्ष होते हैं।
1 कल्प = 1000 चतुर्युग या 14 मन्वन्तर
1 मन्वन्तर = 71 चतुर्युगी
1 चतुर्युग = 43,20,000 वर्ष
कलयुग की अवधि 4,32,000 वर्ष , द्वापर युग की अवधि 8,64,000 वर्ष, त्रैतायुग की अवधि 12,96,000 तथा सतयुग की अवधि 17,28,000 वर्ष है। इस समय श्वेत वाराह कल्प चल रहा है , जिसका 7 वां मन्वन्तर वैवस्वत के 71 चतुर्युगी में से 27 बीत चुके हैं तथा 28 वीं चतुर्युगी के भी सतयुग, त्रेता तथा द्वापर बीत कर कलयुग का 5119 वां वर्ष प्रतिपदा को शुरू हो चुकी है अर्थात श्वेतवराह कल्प में 1,97,29,49,118 वर्ष बीत चुके है अर्थात सृष्टि का प्रारंभ हुए लगभग 2 अरब वर्ष हो गए हैं। आज के वैज्ञानिक भी पृथ्वी की आयु 2 अरब वर्ष बताते हैं। दूसरे कुछ विद्वानों की काल गणना के अनुसार सृष्टि के 01 अरब 96 लाख 53 हजार 117 वर्ष बीत चुके और अभी 118 वां वर्ष प्रारम्भ होने जा रहा है।
सूर्य और चन्द्र महत्त्वपूर्ण क्यों?
भारतीय कालगणना खगोल सम्मत व वैज्ञानिक है। आकाश में 27 नक्षत्र हैं, इनके 108 पाद होते हैं। विभिन्न अवसरों पर 9-9 पाद मिलकर 12 राशियों की आवृति बनाते हैं। इन राशियों के नाम मेष , वृष , मिथुन , कर्क , सिह , कन्या , तुला, वृश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ और मीन हैं। सूर्य जिस समय जिस राशि में स्थित होता है, वही कालखंड सौर मास कहलाता है। वर्ष भर में सूर्य प्रत्येक राशि में एक माह तक रहता है, अत: सौर वर्ष के 12 महिनों के नाम उपरोक्त राशियों के अनुसार होते हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, वह दिन उस राशि का संक्रान्ति दिन माना जाता है। इसी प्रकार चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर जितने समय में लगा लेता है वह चन्द्र मास कहलाता हैं। चन्द्रमा की गति के अनुसार तय किए गए महीनों की अवधि नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार कम या अधिक भी होती है। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा बढ़ते-बढ़ते पूर्णता को प्राप्त होता है, उस नक्षत्र के नाम पर चन्द्र वर्ष के महिनों का नाम करण किया गया है। एक वर्ष में चन्द्रमा चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, आषाढ, श्रवण, भाद्रपदा, आश्विन, कृतिका, मृगशिरा, पुष्य, मघा और फाल्गुनी नक्षत्रों में पूर्णता को प्राप्त होता है, इसलिए चन्द्र वर्ष के महिनों का नाम चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन रखे गए हैं। मास के जिस हिस्से में चन्द्रमा घटता है, उसे कृष्ण पक्ष व बढऩे वाले को शुक्ल पक्ष कहा जाता है। चन्द्रमा के 12 महीनों का वर्ष सौर वर्ष से 11 दिन, 3 घटी व 48 पल छोटा होता है। सामंजस्य बनायें रखने के लिए 32 महिने, 16 दिन, 4 घटी के बाद एक चन्द्र मास की वृद्वि मानी जाती है, यहीं अधिक मास है। तीन साल में एक साल ऐसा अवश्य होता है कि दो अमावस्या के बीच में सूर्य की कोई संक्रान्ति नहीं पड़ती, वही मास बढ़ा हुआ माना जाता है। इसी प्रकार 140 से 190 वर्षों में एक ही चन्द्र मास में 2 संक्रान्ति आती हैं, वह महीना कम हुआ माना जाता है। सौर वर्ष में इस प्रकार सामंजस्य बनता है। जबकि पाश्चात्य कालगणना में इसका अभाव है।
भारतीय त्यौहार परम्परा:
प्रत्येक भारतीय त्यौहार चन्द्र या सूर्य की गति का अवलोकन व गणना कर के निर्धारित होता है। जैसे राखी और होली पूर्णिमा को आएगी और पूरा चन्द्रमा दिखेगा। कृष्ण जन्म अष्टमी को, तो राम जन्म नवमी को मनेगा और दीपावली अमावस्या को ही होगी। मकर संक्रमण पर अयन का परिवर्तन होता है। किस वर्ष में कुम्भ कहाँ होगा, सूर्य और चन्द्र ग्रहण कब आएंगे, होली-दीपावली का वार किस वर्ष में कौन सा होगा। यह भारतीय कालगणना के आधार पर सहज ही जाना जा सकता है। ऐसे में सचमुच हमारी कालगणना ग्रहों-नक्षत्रों की गति पर आधारित होने से वैज्ञानिक एवं खगोल सम्मत है। जबकि पाश्चात्य कालगणना में इसका पूर्णतया अभाव है।
भारतीय विद्वान रचित हिमाद्रि ग्रंथ के अनुसार -
चैत्र मासे जगद ब्रह्य संसर्ज प्रथमेऽह्वि
शुक्ल पक्षे समग्रन्तु , तदा सूर्योदये सति।
अर्थात् चैत्र मास शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय ब्रह्माजी ने जगत् की रचना की। सृष्टि इसी दिन से शुरू हुई। यह सृष्टि के प्रारंभ का दिन है। कलयुग संवत ईसा से 3102 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ। महान् खगोलविद् आर्यभट्ट ने कहा जब वे 23 वर्ष के थे, तब कलयुग के 3600 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। उन्होने शुद्ध कालगणना कर सिद्ध किया कि चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को ही सृष्टि व कलयुग का प्रारम्भ हुआ। भास्कराचार्य ने भी अपने ब्रह्मस्फुट सिद्धांत ग्रंथ में सृष्टि प्रारंभ का दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही माना है। अत: वर्ष प्रतिपदा सम्पूर्ण विश्व व मानवीय सृष्टि का संवत्सर है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्री राम का राज्याभिषेक, वरूण अवतार प्रभु झुलेलाल का जन्म दिन, महाराजा युधिष्ठिर द्वारा प्रारंभ संवत् का प्रथम दिन, वीर विक्रमादित्य की विजय की स्मृति स्वरूप प्रारंभ विक्रम संवत् का प्रथम दिन, पराक्रमी सम्राट शालिवाहन की स्मृति में प्रारंभ शक शालिवाहन संवत् का प्रथम दिन, स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा आर्यसमाज की स्थापना का दिन, विश्व के सबसे बडे स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिन है। न्यायशास्त्र के प्रणेता महर्षि गौतम की जयन्ती भी इसी दिन है। आइये समस्त राष्ट्रवासी योगाभ्यास करके नव वर्ष का स्वागत करें।
सचमुच भारतीय कालगणना हमारी महान् ऐतिहासिक गौरवशाली विरासत का परिचायक है। हमें वर्ष प्रतिपदा को भव्य रूप में मनाकर भारतीय कालगणना के प्रति अपनी आस्था और श्रद्धा प्रकट करनी चाहिए। भारतीय काल गणना को वैश्विक विरासत का दर्जा दिलाने के लिए सयुक्त राष्ट्रसंघ तथा यूनेस्को जैसे मंचो से आह्वान भी करना चाहिए। जिससे भारत की वैज्ञानिकता वैश्विक बने और भारत देश को विश्वगुरु होने का मार्ग प्रशस्त हो सके।
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01 Mar 2025 17:58:05
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