श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
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जीवन की तीन मर्यादा
प्रत्येक मनुष्य सफल व सुखी जीवन जीना चाहता है और इसके लिए पूर्ण ज्ञान, पूर्ण निष्ठा व पूर्ण पुरुषार्थ करता हुआ वैयक्तिक व सामूहिक स्तर पर प्रवृत्त होता है। स्वयं की प्रज्ञा, समष्टि के सहयोग व भगवान के विधान के अनुरूप व्यक्ति कम या अधिक रूप से इस संन्दर्भ में सफल भी होता है। यदि हम भयमुक्त पूर्ण शान्त एवं पूर्ण सुखी जीना चाहते हैं तो हमें तीन मर्यादाओं या तीन प्रकार के विधानों का पूरी प्रामाणिकता के साथ पालन करना चाहिए।
1- भगवान का विधान या मर्यादा-
विष्णोः कर्माणिपष्यत यतोव्रतानि पस्पषे। इन्द्रस्ययुन्यःहरवा।। यजु. 6/4
यस्य विष्व उपसते प्रषिषं यस्यदेवाः।। ऋग्वे. 10/121/2
संम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान के विधान का वैश्विक कानून अथवा प्रकृति के नियमों का सहज रूप से पालन कर रहा है। यह सृष्टि चक्र, सृष्टि की व्यवस्था अथवा सृष्टि या सृष्टि के रचयिता भगवान् की कर्मफल व्यवस्था या न्याय व्यवस्था अकाट्य पूर्ण सत्य, अटल या अवष्यं भावी है। अतः वेद जो भगवान का विधान है तथा वेदानुकूल शास्त्र एवं आचार्यों के आदेशों, संदेश, आज्ञा या उपदेशों का हमें पूर्ण विश्वास के साथ पालन करना चाहिए। संभुतेन गमेमहिमा श्रुतेन विराधिणि।।
2- देश का विधान, संविधान, कानून या मर्यादा- प्रत्येक देश का राजनैतिक रूप से एक संविधान, कानून या मर्यादा होती है। यद्यपि ईश्वरीय विधान की तुलना में देश के कानून आदि में दोष या न्यूनताएं हो सकती हैं परन्तु जो कानून बने हुए होते हैं उनका पालन करना ही होता है। यदि उन संवैधानिक प्रावधानों या कानूनों को बदलने की क्षमता हमारे भीतर हो तो हम उनकी न्यूनताओं को भी हटा सकते हैं परन्तु जो है उस कानून का तो हमें किसी भी स्तर पर पालन करना ही होता है अन्यथा हम दुःख अपमान व संकटों से बच नहीं सकते। यदि हमने एक बार भी कानून तोड़ा तो उसका परिणाम कभी भी हमें भुगतना पड़ता ही है।
3- आत्मा का विधान कानून या मर्यादा- दृष्ट्वा रूपे व्याकरोत सत्यानृते प्रजापतिः। अक्षद्धाम-अन्तते दधात्-श्रद्धां सत्ये प्रजापतिः।। यजुर्वेद 19/66
परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य की रचना इस प्रकार से की है कि मानव मात्र की आत्मा में सत्य-असत्य-शुभ-अशुभ धर्म या अधर्म क्या है, इसका सामान्य रूप से बोध होता है। यही आत्म ज्ञान, आत्मबोध या आत्मा की आवाज या पुकार है। जब-जब हम आत्मा के लिए प्रतिकुल आचरण या व्यवहार करते हैं तब-तब हम दुःख, अशांति, भय या अपराध के शिकार हो जाते हैं। जिस कार्य को करते समय आत्मा में भय, शंका या लज्जा, ग्लानि का भाव पैदा हो तो समझ लेना यह मेरे आत्म की मर्यादा के विरूद्ध है। उस कार्य को कभी न करना चाहे तात्कालिक रूप से उसमें कितना ही लाभ प्रतीत हो रहा हो तथा जिस कार्य के करने में अन्तर आत्मा मे निर्भयता हो रहा हो उसे अवश्य करना चाहे वैसा करते समय कितना ही संकट, संघर्ष, प्रतिकुलता या तात्कालिक रूप से हानि प्रतीत हो रही हो।


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01 Mar 2025 17:58:05
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