वनौषधियों में स्वास्थ्य

विशिष्ट आयुर्वेदिक स्वास्थ्य वर्धक घटक गिलोय

वनौषधियों में स्वास्थ्य

आचार्य  बालकृष्ण

   अमृता, अमृतवल्ली अर्थात कभी न सूखने वाली गिलोय के पत्ते कोमल पान के आकार के तथा फल मटर के दाने जैसे होते हैं। यह जिस वृक्ष पर चढ़ती है उस वृक्ष के कुछ गुण भी अपने अन्दर समाहित कर लेती है, इसीलिए नीम वृक्ष पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ मानी जाती है। चरक के बय: स्थापन, दाहप्रशमन, तृष्णा निग्रहण, स्तन्यशोधन आदि गणों में तथा सुश्रुत के गुडूच्यादि, बल्लीपंचमूल आदि गणों में इसकी गणना की गई है।

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

खांसी, दौर्बल्य, प्रमेह, मधुमेह, त्वचा संबंधित रोगों में तथा कई प्रकार के ज्वर में गिलोय उत्तम कार्य करती है। आधुनिक चिकित्साशास्त्रियों के विचार से गिलोय सूक्ष्मतम विषाणु समूह से लेकर स्थूल कृमियों पर अपना प्रभाव दर्शाती है। क्षय रोग उत्पन्न करने वाले माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु की वृद्धि को यह सफलता पूर्वक रोकती है। शरीर के जिस भाग में भी ये जीवाणु शान्त अवस्था में पड़े हों, गिलोय वहीं पर पहूँचकर उनका नाश करती है। ई- कोलाई नामक रोगाणु को जो आंत और मूत्रवहसंस्थान के साथ-साथ पूरे शरीर को प्रभावित करता है, उसको गिलोय जड़ से उखाड़ती है। इसके जल निष्कर्ष में फंगोसिटिक इंडेक्स’ काफी अधिक मात्रा में पाये जाते हैं अर्थात रक्त  के जीवाणु भक्षी कोषों की तरह इसके सूक्ष्म घटक भी आयोनिक गति से रोगाणुओं पर आक्रमण कर उन्हें मार डालने की क्षमता रखते हैं। इसी प्रकार गिलोय का ग्लूकोज टालरेंस तथा एड्रीनेलिन जन्य हाइपर ग्लाइसीमिया में लाभकारी एवं त्वरित परिणामशील होता है। यह शरीर में इंसुलिन की उत्पत्ति व रक्त  में उसकी घुलनशीलता को बढ़ाती है। इससे रक्त शर्करा घटती है। गुडूची को घृत के साथ सेवन करने से यह वातशामक; गुड़ के साथ सेवन करने से-मलबद्धता नाशक; खाँड के साथ सेवन करने से-पित्तशामक; मधु के साथ सेवन करने से-कफशामक; सोंठ के साथ सेवन करने से-आमवातशामक; तथा एरण्ड तैल के साथ सेवन करने से वातशामक होती है। गुडूची का पत्र शाक कषाय, कटु, तिक्त, मधुर, उष्णवीर्य; लघु, त्रिदोषशामक, रसायन, अग्निदीपक, बलकारक, मलरोधक, चक्षुष्य तथा पथ्य होता है। यह वातरक्त, तृष्णा, दाह, प्रमेह, कुष्ठ, कामला तथा पाण्डुरोग में लाभप्रद होता है। गुडूची सत् मधुर, लघु, त्रिदोषशामक, पथ्य, दीपन, चक्षुष्य, धातुवर्धक, मेध्य व वय:स्थापक होता है। गिलोय का प्रयोग वातरक्त, पाण्डु, ज्वर, छर्दि, जीर्णज्वर, कामला, प्रमेह, अरुचि, श्वास, कास, हिक्का, अर्श, क्षय, दाह, मूत्रकृच्छ्र, प्रदर तथा सोमरोग की चिकित्सा में किया जाता है।
इस पौधे के सत्त में विषमज्वररोधी क्रिया पाई गई है एवं इनमें इन्सुलिन की भांति क्रिया भी होती है। काण्ड स्वरस तथा काण्ड चूर्ण शोथरोधी तथा मस्तिष्क उद्दीपनरोधी क्रियाओं को प्रदर्शित करता है। गिलोय व्याधिक्षमत्ववर्धक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय का काण्डसार ज्वरघ्न क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के काण्ड का जलीय सार प्रत्यूर्जता क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के काण्ड का जलीय सार एल्बीनों चूहों में शोथहर तथा वेदनाशामक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गिलोय के पमचाङ्ग का एल्कोहॉलिक-सार अस्थिमज्जा कोशिकाओं के प्रफलन को बढ़ाता है।
औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि
नेत्र रोग:
•    10 मिली गिलोय के स्वरस में शहद व सेंधानमक 1-1 ग्राम मिलाकर खूब अच्छी प्रकार से खरल करके नेत्रंजन करने से तिमिर, पिल्ल, अर्श, काच, कंडू, लिंगनाश एवं शुक्ल तथा कृष्ण पटल गत नेत्र रोग नष्ट होते हैं।
•    गिलोय रस में त्रिफला मिलाकर क्वाथ बना लें, इसमें पितपली चूर्ण व शहद मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करते रहने से नेत्रों की ज्योति बढ़ जाती है।
राजयक्ष्मा (टी.बी.) 
•    असगन्धा, गिलोय, शतावर, दशमूल, बलामूल, अडूसा, पोहकरमूल तथा अतीस को  समभाग लेकर क्वाथ बनाएं, 20-30 मिली क्वाथ को सुबह-शाम सेवन करने से राजयक्ष्मा नष्ट होता है। इसमें पथ्य के रूप में केवल दूध को सेवन करें।
वमन
•    धूप में घूमने-फि रने से या पित्तप्रकोप से वमन हो तो गिलोय स्वरस (10-15 मिली) में 4-6 ग्राम तक मिश्री मिलाकर प्रात: सायं पीने से वमन शांत हो जाता है।
संग्रहणी 
•    सोंठ, मोथा, अतीस तथा गिलोय को समभाग लेकर जल में क्वाथ करें। इस क्वाथ को 20-30 मिली की मात्रा में सुबह-शाम पीने से मन्दाग्नि, आमदोष एवं साम ग्रहणी रोग ठीक होता है।
कामला
•    20-30 मिली अमृता क्वाथ  में 2 चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन-चार बार पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
•    गिलोय के 10-20 पत्तों को पीसकर एक गिलास छाछ में मिलाकर तथा छानकर प्रात: काल पीने से कामला में लाभ होता है।
पांडुरोग: 
•    पुनर्नवा, नीम की छाल, पटोलपत्र, सोंठ, कटुकी, गिलोय, दारुहल्दी, हरड़, प्रत्येक को 20 ग्राम लेकर 320 मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष क्वाथ बना लें, इस क्वाथ को 20 मिली सुबह-शाम पीने से सर्वांग शोथ, पेट के रोग, पार्श्वशूल, श्वास तथा खून की कमी में लाभ होता है।
•    खून की कमी व पीलिया में गिलोय रस एक ली, कांड कल्क 250 ग्राम, दूध 4 लीटर और घी एक किलो लेकर, मन्द अग्नि पर पकाकर घी मात्र शेष रहने पर छानकर रख लें। 10 ग्राम घी को चौगुने गाय के दूध में मिलाकर प्रात-सायं पीयें।
यकृत् विकार व मंदाग्नि 
•    यकृत् विकार व मंदाग्नि में-18 ग्राम ताजी गिलोय, 2 ग्राम अजमोद, 2 नग छोटी पीपल एवं 2 नग नीम की सीकें, इन सबको कुचलकर रात्रि को 250 मिली जल के साथ मिट्टी के बर्तन में रख दें। प्रात: पीसकर, छानकर पिला दें। 15 से 30 दिन तक सेवन करने से पेट के सब रोग दूर होते हैं।
मूत्रकृच्छ्र 
•    गुडूची के 10-20 मिली स्वरस में पाषाण भेद का 2 ग्राम चूर्ण और 1 चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन-चार बार सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
गठिया
•    2-5 ग्राम गिलोय चूर्ण को दूध के साथ दिन में दो-तीन बार देने से गठिया और मूत्रम्लता मिटती है।
•    गिलोय के 20-30 मिली क्वाथ को सुबह-शाम पीने से गठिया में लाभ होता है।
•    गिलोय के 5-10 मिली रस अथवा 3-6 ग्राम चूर्ण या 10-20 ग्राम कल्क अथवा 20-30 मिली क्वाथ को प्रतिदिन निरंतर कुछ समय तक सेवन करने से वातरक्त में अत्यन्त लाभ होता है।
कुष्ठ (कोढ़)
•    10-20 मिली गिलोय स्वरस को दिन में दो-तीन बार कुछ महीनों तक नियमित पिलाने से कुष्ठ में लाभ होता है।
ज्वर रोगों में
•    जीर्ण ज्वर (पुराना बुखार): जीर्ण ज्वर या छ: दिन से भी अधिक समय से चले आ रहे, न छूटने वाले ज्वरों में 40 ग्राम गिलोय को अच्छी तरह कुचलकर, मिट्टी के बर्तन में 250 मिली पानी मिलाकर रात भर ढक कर रखते हैं और प्रात: मसल-छानकर प्रयोग करते हैं। 20 मिली की मात्र दिन में तीन बार पीने से ज्वर का शमन हो जाता है।
•    20 मिली गिलोय स्वरस में 1 ग्राम पिपली तथा 1 चम्मच मधु का प्रक्षेप देकर प्रात:-सायं सेवन करने से जीर्णज्वर, कफ, प्लीहारोग, खांसी, अरुचि आदि रोग नष्ट होते हैं।
•    20 मिली गिलोय स्वरस में 1 ग्राम पिपली तथा 1 चम्मच मधु का प्रक्षेप देकर प्रात:-सायं सेवन करने से जीर्णज्वर, कफ, प्लीहारोग, खांसी, अरुचि आदि रोग नष्ट होते हैं।
•    वातज्वर: बिल्व, अरणी, गम्भारी, मिलाकर सेवन करने से पैत्तिक शूलजन्य छर्दि, बुखार, जलन तथा अत्यधिक पिपासा का शमन होता है।
•    वातज्वर: श्योनाक (सोनापाठा) तथा पाढ़ल की मूल छाल तथा गिलोय, आँवला, धनिया ये सब बराबर-बराबर लेकर इनका क्वाथ बनाएं, 20-30 मिली क्वाथ को दिन में दो बार वातज्वर में सेवन करना चाहिए। 
•    20-30 मिली गुडूची क्वाथ में पिपली चूर्ण मिलाकर या फिर छोटी कटेरी, सोंठ तथा गुडूची के क्वाथ (20-30 मिली) में पिपली चूर्ण मिलाकर पीने से वात कफज ज्वर, श्वास, खांसी तथा दर्द का निर्हरण होता है।
•    समभाग गुडूची, नीम तथा आँवला के 25-50 मिली क्वाथ में मधु मिलाकर पीने से विषम ज्वर का शमन होता है।

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