वनौषधियों में स्वास्थ्य
त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक बकुची
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बाकुची के छोटे-छोटे पादप, वर्षा-ऋतु में समस्त भारतवर्ष में अपने आप उगते हैं तथा जगह-जगह इसकी खेती भी की जाती है। साधारणतया बाकुची के पौधे वर्षायु होते हैं, परन्तु उचित देखभाल करने से 4-5 वर्ष तक जीवित रह जाते हैं। औषधि कर्म में इसके बीज और बीजों से प्राप्त तैल का व्यवहार किया जाता है। इस पर शीतकाल में पुष्प लगते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में वे फलों में बदल जाते हैं। समस्त भारत में विशेषत: राजस्थान, कर्नाटक तथा पंजाब में कंकरीली भूमियों में एवं जंगली झाड़ियों में प्राप्त होती है या इसकी खेती की जाती है। चरक संहिता के तिक्त स्कन्ध एवं अर्शादि अनेक रोगों की चिकित्सा में इसका प्रयोग मिलता है। सुश्रुत संहिता के कटु वर्ग में अवल्गुज नाम से मेधायुष्यकामीय में बाकुची के नाम से इसका उल्लेख प्राप्त होता है। त्वचा सहित शरीर के विविध रोगों के निवारण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
यह सीधा, 60-120 सेमी. ऊँचा, वर्षायु, शाकीय पौधा अथवा क्षुप होता है। इसकी काण्ड एवं शाखाएँ झुर्रीदार, कोणीय, सिरायुक्त, स्पष्ट रक्ताभ ग्रंथियुक्त एवं किंचित् श्वेत रोमश होती हैं। इसके पत्र एकांतर, सरल, 2.5-7.5 सेमी. लम्बे एवं 2.5 सेमी. चौड़े, गोलाकार, दोनों पृष्ठ पर श्वेत रोमश तथा अनेक कृष्ण वर्ण के बिन्दुओं से युक्त होते हैं। इसके पुष्प छोटे, नीले एवं हल्के बैंगनी वर्ण के, 10-30 की संख्या में लगते हैं। इसकी फली 5 मिमी लम्बी, 3 मिमी. चौड़ी, छोटी, काली, गोल, चिकनी तथा एकबीजी होती है। कच्ची अवस्था में यह हरे रंग की तथा पकने पर काले रंग की हो जाती है। इसके बीज मसूर के दानों जैसे कड़े किन्तु कुछ बड़े, काले या गहरे भूरे रंग के, गोल, चपटे तथा आगे की तरफ नुकीले होते हैं। बीजों का ऊपरी छिलका मुलायम होता है तथा फलभित्ति से चिपका रहता है। बीज का भीतरी भाग श्वेत, स्वाद में तिक्त, चरपरा तथा गंधयुक्त होता है। इसका फलकाल सितम्बर से मार्च तक होता है।
औषधीय प्रयोग
मात्रा एवं विधि
त्वचा रोग
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कुष्ठ रोग- बाकुची के बीज चार भाग और तबकिया हरताल एक भाग, दोनों को चूर्ण कर गोमूत्र में घोंटकर श्वेत दागों पर लगाने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं।
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बाकुची और पवाड़ को समभाग लेकर सिरके में पीसकर सफेद दागों पर लगाने से दाग में लाभ होता है।
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बाकुची, गंधक व गुड्मार को बराबर मात्रा में लेकर तीनों का चूर्ण कर लें तथा 12 ग्राम चूर्ण को रात्रि में जल में भिगो दें। प्रात:काल निथरा हुआ जल सेवन कर लें तथा नीचे के तल में जमा पदार्थ श्वेत दागों पर लगाते रहने से श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।
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बाकुची तेल दो भाग, तुवरक तेल दो भाग तथा चंदन तेल एक भाग मिलाकर रख लें, इस तेल को लगाने से सामान्य त्वक् रोग तथा श्वेत कुष्ठ आदि रोग नष्ट होते हैं।
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10-20 ग्राम शुद्ध बाकुची चूर्ण में एक ग्राम आँवला मिलाकर खैर की छाल के 10-20 मिली क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वित्र रोग नष्ट हो जाता है।
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बाकुची को तीन दिन तक दही में भिगोकर फिर सुखाकर रख लें। इसका तेल शीशी में निकाल लें। इस तेल में नौसादर मिलाकर श्वेत दागों पर लेप करें।
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बाकुची, कलौंजी तथा धतूरे के बीजों को समभाग लेकर आक के पत्तों के रस में पीसकर श्वेत दागों पर लगाने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
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बाकुची, इमली, सुहागा और अंजीर मूल की छाल को समभाग लेकर जल में पीसकर सफेद दागों पर लेप करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।
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बाकुची, पवाड़ तथा गेरू को समभाग लेकर कूट पीसकर अदरक के रस में खरल कर सफेद दागों पर लगाकर धूप सेंकने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
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बाकुची, गेरू और गन्धक को समभाग लेकर, पीसकर अदरक के रस में खरल कर 10-10 ग्राम की टिकिया बनाकर, एक टिक्की रात्रि को 30 मिग्रा. जल में डाल दें। प्रात: ऊपर का स्वच्छ जल पी लें तथा नीचे की बची हुई औषधि को श्वेत दागों पर मालिश कर धूप सेंकने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।
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बाकुची, अजमोद, पवाड़ तथा कमल गट्टा को समान भाग लेकर कूट पीसकर मधु मिलाकर गोलियां बना लें। एक से दो गोली तक प्रात: सायं अंजीर मूल की छाल के क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
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1 ग्राम शुद्ध बाकुची तथा 3 ग्राम काले तिल के चूर्ण में 2 चम्मच मधु मिला, प्रात: सायं सेवन करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।
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शुद्ध बाकुची, अंजीर मूल की छाल, नीम छाल तथा पत्र को सम भाग लेकर कूट पीसकर खैर छाल के क्वाथ में खरल करके रख लें। दो से पाँच ग्राम तक की मात्रा को जल के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
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बाकुची पाँच ग्राम तथा केसर एक भाग लेकर दोनों को कूट पीसकर गोमूत्र में खरल कर गोली बना लें। इस गोली को जल में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।
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100 ग्राम बाकुची, 25 ग्राम गेरू तथा 50 ग्राम पवांड़ के बीज लेकर सबको कूट पीसकर वस्त्रपूत कर (कपड़े से छानकर) भांगरे के रस की 3 भावनाएं देकर रख लें। प्रात: सायं गोमूत्र में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभ होगा।
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बाकुची चूर्ण को अदरक के रस में घिस कर लेप करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।
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बाकुची दो भाग, नीलाथोथा तथा सुहागा एक-एक भाग लेकर कपड़छन चूर्ण कर एक सप्ताह भांगरे के रस में घोंटकर रख लें। इसको नींबू स्वरस में मिलाकर श्वित्र पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट होते हैं। यह प्रयोग तीक्ष्ण है, अत: इसके प्रयोग के फल स्वरूप छाले होने पर यह प्रयोग बन्द कर देें।
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शुद्ध बाकुची चूर्ण की एक ग्राम मात्रा को बहेड़े की छाल तथा जंगली अंजीर मूल की छाल के क्वाथ में मिलाकर निरन्तर सेवन करते रहने से श्वित्र तथा पुंडरीक में लाभ होता है।
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बाकुची, हल्दी तथा अर्कमूल की छाल को समान भाग लेकर महीन चूर्ण कर कपड़छन कर लें। इस चूर्ण को गोमूत्र या सिरका में पीसकर श्वित्र के दागों पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट हो जाते हैं। यदि लेप उतारने पर जलन हो तो तुबरकादि तेल लगायें।
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1 किग्रा. बाकुची को जल में भिगोकर, छिलके रहित करके पीसकर 8 ली. गोदुग्ध तथा 16 लीटर जल में पाक करें। दुग्ध मात्र शेष रहने पर उसे जमा दें। मक्खन निकालकर उसका घी बना लें। एक चम्मच घी में 2 चम्मच मधु मिलाकर चाटने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
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बाकुची तेल की 10 बूंदों को बताशे में डालकर प्रतिदिन कुछ दिनों तक सेवन करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।
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बाकुची को गोमूत्र में भिगोकर रखें तथा तीन-तीन दिन बाद गोमूत्र बदलते रहें, इस तरह कम से कम 7 बार करने के बाद उसको छाया में सुखाकर पीसकर रखें। उसमें से 1-1 ग्राम सुबह-शाम ताजे पानी से खाने से एक घंटा पहले सेवन करें, इससे श्वित्र (सफेद दाग) में निश्चित रूप से लाभ होता है, यह अनुभूत प्रयोग है।
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1 ग्राम बाकुची और 3 ग्राम काले तिल को मिलाकर एक वर्ष तक दिन में दो बार सेवन करने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
कर्ण रोग
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बाधिर्य- प्रतिदिन मूसली औैर बाकुची चूर्ण को 1-3 ग्राम की मात्र में सेवन करने से बधिरता में लाभ होता है।
मुख रोग
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दंतकृमि- बाकुची की जड़ को पीसकर उसमें अल्प मात्रा में भुनी हुई फिटकरी मिला लें। सुबह-शाम इससे मंजन करने से दाँत के कीड़े नष्ट हो जायेंगे।
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दन्तरोग- बिजौरा नीम्बू की जड़ तथा बाकुची की जड़ को पीसकर वर्ति बना कर दाँतों के बीच में दबा कर रखने से कृमिदन्त और दंतवेदना का शमन होता है।
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दन्तसंक्रमण- बाकुची मूल को पीसकर इसमें अल्प मात्रा में शोधित फिटकरी मिलाकर प्रत्येक सुबह शाम इसका मंजन के रूप में प्रयोग करने से दन्त संक्रमण में लाभ हो जाता है।
वक्ष रोग
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श्वास-आधा ग्राम बाकुची बीज चूर्ण को अदरक के रस के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से श्वास-कास में आराम मिलता है। कफ ढीला होकर निकल जाता है।
उदर रोग
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अतिसार-बाकुची के पत्तों का साग सुबह-शाम नियमित रूप से कुछ हफ्ते खिलाते रहने से अतिसार में बहुत लाभ होता है।
गुदा रोग
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अर्श-2 ग्राम हरड़, 2 ग्राम सोंठ और 1 ग्राम बाकुची के बीज लेकर पीस लें, आधी चम्मच की मात्रा में गुड़ के साथ सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलेगा।
यकृत्प्लीहा रोग
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पीलिया-10 मिली. पुनर्नवा के रस में आधा ग्राम पीसी हुई बाकुची के बीजों का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करने से पीलिया रोग में लाभ होता है (बाकुची का अधिक सेवन वमन पैदा करता है)।
प्रजनन संस्थान रोग
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मासिक धर्म से शुद्ध होने के पश्चात् बाकुची के बीजों को तैल में पीसकर योनि में रखने से गर्भधारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
शाखा रोग
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शलीपद-बाकुची स्वरस का लेप श्लीपद प्रभावित अंग पर करने से लाभ होता है।
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बाकुची तैल तथा कल्क का लेप करने से श्लीपद में लाभ होता है।
साधारण वनौषधि होने के बावजूद आरोग्य में असाधारण भूमिका निभाने वाली बाकुची को हम सब पहचानें और त्वचा, उदर सहित शरीर के अनेक रोगों से मुक्ति हेतु लाभ उठायें।
रासायनिक संघटन
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इसके बीज में वाष्पशील तैल, स्थिर तैल, बाकुचीओल, सोरालेन, आईसोरालेन, सेरालीडिन, आईसोसोरालीडिन, कॉरिलीफोलीन, सोरालोन,आईसोसोगलोन, कॉरिलीडिन, ट्राईएकॉन्टेन, β-सिटोस्टीरॉल, β-ष्ठ-ग्लुकोसाईड, रेफ्फीनोस, कॉरीलीफोलीन, कॉरीफोलीन, कॉरीटीफोलीनीन, बवाचीन, आईसोवाचीन, वाचीनीन, स्टीग्मास्टीरॉल, फेनॉल एवं कामेरिन पाया जाता है।
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इसके बीज तैल में लीमोनीन, -एलीमिन, β-केरयोफीलेनोक्साईड, 4-टर्पीनीओल, लीनालूल, जीरेनील एसीटेट, एनजेलीसीन, सोरालीन एवं बाकुचीओल पाया जाता है। इसके पत्र में रेफिनोस, सोरालेन, आइसोसोरालेन एवं एन्जेलीसीन पाया जाता है।
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इसके फल में कोरिलिनॉल, सोरालिनॉल एवं बावक्रोमानॉल पाया जाता है।
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इसकी मूल में कूमेस्ट्रोल, सिटोस्टीरॉल, सोरालेन एवं आइसोसोरालेन पाया जाता है।
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