प्राण वायु चिकित्सा पर नावेल पुरस्कार

प्राण वायु चिकित्सा पर नावेल पुरस्कार

सर्वप्रथम प्राणवायु ऑक्सीजन के सम्बन्ध में वैज्ञानिक धारणा वैदिक ऋषियों ने वेदों तथा अन्य वैदिक वाङ्गमय में विस्तार से किया है। जानकारी के लिए लेखक की जल चिकित्सा चमत्कार एवं व्यवहार पृष्ठ 337 पढें।
माते प्राण उपदसन्मो अपानोऽपि धायि ते।
                                   सूर्यस्त्वाधिपतिमृत्योरूदायच्छतु रश्मिभि:।।  (अथर्व वेद 5-30/13)
आ वात वाहि भेषजं विवात वाहि यद्रप:।
त्वं हि विश्वभेषजं देवानां दूत ईयसे।।
                                                                                         (अथर्व वेद 4.13-3 व ऋग्वेद 10/137/2)
द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावत:।
                               दक्षं ते अन्य अवातु परान्योवातु यद्रप:।। (ऋग्वेद 10/137/3)
अर्थात् सूर्योदय के साथ प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायु आक्सीजन से संयुक्त होकर प्राण वायु बन जाती है, इसी सत्य को उद्घाटित करते हुए वैदिक ऋषि कहते हैं कि सब देवों के देव मुखिया सूर्य अपनी किरणों से आविष्ट प्राण-वायु समस्त प्राणियों को जीवन प्रदान करें तथा रोग एवं मृत्यु से मुक्त करें। प्राण-वायु गतिशील होकर जीवन पोषण एवं ऊर्जा दे तथा अपान वायु दुषित विजातीय दोषों को दूर करें। वेद एवं उपनिषद के मंत्र विज्ञान के सूत्रें जैसे (E=mc2) की तरह प्रभावशाली एवं गहरे अर्थ के सूचक होते हैं। जिनसे कॉस्मिक एवं सुपर कन्ससनेस परब्रह्म तत्त्वम् सोऽहम तथा शिवोऽहम का उद्घाटन होता है।
सर्वप्रथम प्राण-वायु ऑक्सीजन की खोज सन् 1772 ई. में ब्रिटिश वैज्ञानिक फिलोस्फर जोसेफ प्रीस्टले ने की। सन् 1774 ई. में शोध पत्र प्रकाशित किया। प्राण-वायु को प्रथम बार पृथक करने का श्रेय स्वीडिश फार्मेसिस्ट कार्ल विल्हेल्म शीले तथा फ्रेन्च केमिस्ट आँत्वान लौराँ द लाव्वाज्ये ने 1778 ई- में प्राण-वायु का ऑक्सीजन नाम करण किया। लाव्वाज्ये ने 1783 में हाइड्रोजन की खोज कर प्रमाणित किया जल हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का यौगिक H2O है, इसके पूर्व जल को तत्त्व ही माना जाता था।
सन् 1916 ई. में डॉ. वारबर्ग ने ऑक्सीजन के जैविक महत्त्व पर सर्वप्रथम समुद्री जीव साहिल अर्चिन पर प्रयोग के दौरान पाया कि फर्टिलाइजेशन के पश्चात् प्रर्याप्त ऑक्सीजन आपूर्ति हेतु उनमें श्वसन की गति छ: गुना बढ़ जाती है। उन्होंने श्वसन तथा मेटाबोलिज्म पर कई परीक्षण किये। उन्होंने पता लगाया कि कैंसर का मुख्य कारण कोशिकाओं में ऑक्सीजन का अभाव हो जाना है। बेकरी तथा ब्रेवरी में माइक्रो आर्गेनिज्म जाइमोलॉजी प्रक्रिया से ग्लूकोज के फर्मेन्टेशन द्वारा एडिनोसाइन ट्राई फ़ास्फेट (ए.टी.पी.) से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। ग्लूकोज के फर्मेन्टेशन के दौरान प्रचुर मात्रा में लैक्टिक एसिड पैदा होता है। आक्सीजन के अभाव में कैंसर कोशिकाए इसी से ऊर्जा प्राप्त करती है।
एनोऐरोबिक माइक्रोआर्गेनिज्म हाइड्रोलाइसिस, एसिडोजेनेसिस, एसिटोजेनेसिस, मिथेजेनोसिस तथा नन ऑक्सीडेटिव पाचन द्वारा मिथेन, ष्टश२, न्यूनमात्र में भाप तथा अन्य गैस पैदा करते हैं। वारबर्ग को प्रयोग आधारित अटूट विश्वास था कि कैंसर सेल में एनर्जी की आपूर्ति एनाऐरोबिक-मेटाबॉलिक ग्लाइकोलाइसिस द्वारा होता है। इसे वारबर्ग इफेक्ट कहा जाता है।
मनुष्य से लेकर सभी स्तनधारी प्राणियों में मैक्रोन्यूट्रिएन्ट कार्बोहाइडे्रट मेटाबॉलिज्म से ऊर्जा प्राप्त होती है। कार्बोहाइडे्रट ग्लूकोज के आक्सीडेशन से ्रञ्जक्क पैदा होता है और उससे कोशिकाएं ऊर्जा प्राप्त करती है। अन्तिम उत्पाद लैक्टेट हो सकता है अथवा कोशिकाओं के माइट्रोकोण्ड्रिया में श्वसन द्वारा पूर्ण ऑक्सीडेशन से कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का निर्माण होता है।
ओटो वारवर्ग के रिसर्च के अनुसार सामान्य कोशिकाएं ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज के मेटाबॉलिक दहन द्वारा ्रञ्जक्क ऊर्जा प्राप्त करती है। कैंसर कोशिकाएं एनाऐरोबिक सूक्ष्म जीवों की तरह ग्लूकोज को नन-ऑक्सीडेटिव फर्मेन्ट करके ऊर्जा प्राप्त करती है। इस प्रक्रिया के दौरान प्रारम्भ में ही प्रचुर मात्रा में लैक्टिक एसिड पैदा होता है, जिससे शरीर में एसिडोजेनेसिस के कारण शरीर में अम्लता बढ़ती है। सामान्य कोशिकाओं को 48 घंटे के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति कम कर दी जाये, तो कैंसर कोशिकाओं में परिवर्तित हो जाती है। यदि कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे तो कैंसर हो ही नहीं सकता है। इस कार्य के लिए आटोवारबर्ग को सन् 1931 में नोवेल पुरस्कार मिला। वारबर्ग के अनुसार सेल्स में ऑक्सीजन को पहुचाने के लिए सल्फर युक्त प्रोटीन और एक विशेष प्रकार के फैट की आवश्यकता होती है। वारबर्ग कैंसर कोशिकाओं में ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए कई परीक्षण किये परन्तु असफल रहे। कैंसर कोशिकाओं को यदि ऐरोबिक ग्लाइकोलाइसिस की तरह ऑक्सीडाइज्ड पाथवे के द्वारा ऑक्सीजन पहुँचा दिया जाये, तो कैंसर पर विजय प्राप्त की जा सकती है। ऐरोबिक ग्लाइकोलाइसिस के अन्तर्गत ऑक्सीजन की प्रचुरता के कारण उच्च स्तरीय ऊर्जा प्राप्त होती है। कैंसर कोशिकाओं में ऑक्सीजन फ्री एनाऐरोबिक फर्मेन्टेशन को रोकने के लिए वैज्ञानिको ने आहार, यौगिक, व्यायाम एवं प्रणायाम पर कार्य करना प्रारम्भ किया।
सल्फर युक्त प्रोटीन का तो पता था, किन्तु उस समय उस अज्ञात फैट का पता नहीं था। सर्वप्रथम जोहाना वुडविग ने डॉ. कोफमैन के साथ मिलकर पहली बार प्राणियों के जीवित कोशिकाओं में उस विशिष्ठ फैट का पता लगाने के लिए पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीक का उपयोग किया। इससे साफ हो गया कि इलेक्ट्रोन संयुक्त खास एवं अज्ञात फैट पॉलीअनसेचुरेटेड अल्फा लिनोलेनिक एसिड (ALA) या ओमेगा-3 फैटी एसिड तथा लिनोलिक एसिड (LA) या ओमेगा-6 फैटी एसिड है। LA शरीर में गामा लिनोलेनिक एसिड (GLA) में बदल जाता है। इन सभी का बेहतरीन मुख्य स्रोत अलसी है। डॉ. जोहाना स्वयं बायोकमेस्ट्री एवं भेेषज विशेषज्ञ थी। इलेक्ट्रान युक्त अल्फा लिनोलेनिक तथा लिनोलिक एसिड कोशिकाओं के स्वस्थ भित्तियों का सृजन करके उनमें आक्सीजन को आकर्षित करते हुए नयी ऊर्जा का संचार करते हैं। विभिन्न मिश्रणों के अवयवों को पृथककरण एवं शुद्धिकरण कर पता लगाने वाली तकनीक पेपर क्रोमेटोग्राफी से यह भी प्रमाणित हो गया कि ट्रान्सफैट या गर्म करके या फिल्टर या रिफाइन्ड तेलों में ऊर्जावान इलेक्ट्रोन का अभाव था। श्वसन क्रिया में वे विषाक्त प्रमाणित हो चुके थे। 
इलेक्ट्रोन संयुक्त ALA तथा LA को कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य  का सल्फर युक्त प्रोटीन आवश्यक है जो रक्त में भलिभांति घुला-मिलाकर कैंसर कोशिकाओं तक आसानी से पहुँचा देता है। इस दृष्टि से सल्फर एमिनो एसिड का महान् स्रोत मक्खन निकला दूध तथा दूध प्रोडक्ट दही एवं पनीर सर्वोत्तम स्रोत है। उन्होने कैंसर के रोगियों को कोल्ड कम्प्रेशर से निकले अलसी के तेल में पनीर या दही को खूब अच्छी तरह काफी देर तक बारीकी से मिलाकर देने के साथ अपक्व जैविक आहार देना प्रारम्भ किया जिससे सफलता मिलने लगी। रोगियों के रक्त में फॉस्फेटाइड और लाइपोप्रोटीन की मात्रा में वृद्धि हुई।
फॉस्फेटाइड को फॉस्फोलिपिड कहते हैं, ये दो प्रकारों के ग्लिसरोफॉस्फोलिपिडस तथा स्फिंगोफॉस्फोलिपिडस होते हैं, जो कोशिकाओं को पर्यावरणीय जहरीले एवं कैंसरकारी तत्त्वों से रक्षा करते है। माइट्रोकॉण्ड्रिया में इलेक्ट्रोन ट्रान्सपोर्ट चेन (ETC) भरपूर सहायक है। ये लिवर में फैट को जमा होने नहीं देते हैं। इनके प्रयोग से ऑक्सीजन वृद्धि के साथ स्वस्थ सशक्त लाल-रक्त एवं हिमोग्लोबिन में भी वृद्धि होने लगी। कैंसर की गाठें छोटी होने लगी, उनकी वृद्धि एवं विकास रूक गयी, रोगी धीरे-धीरे कैंसर से मुक्त होने लगे।
प्राणवायु ऑक्सीजन शरीर के प्रत्येक सेल की आवश्यकता है। आकार में सबसे लम्बी कोशिकाएं दिमाग की होती है जो सहज सक्षम होकर संवाद संचार करती है। हृदय को ज्यादा ऊर्जा चाहिए, इसलिए हृदय कोशिकाओं में अत्यधिक माइट्रोकोण्ड्रिया होती हैं। श्वसन संस्थान की कोशिकाएं ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन ग्रहण करने एवं कार्बन-डाईऑक्साइड मुक्त करने वाली होती है। हमारे शरीर में कुल दो सौ प्रकार की कोशिकाएं होती है। लाल रक्त कोशिकाएं, त्वचा की कोशिकाएं, न्यूरॉन्स, वसा कोशिकाएं विभिन्न आकार-प्रकार, कार्य एवं दूसरे अंगो से सम्पर्क साधने में सक्षम होती हैं, इस प्रकार एक सामान्य व्यक्ति में 30-40 ट्रिलियन कोशिकाएं होती है जिसमें 80 फीसदी आर.बी.सी. होती है। 147 मिलियन प्लेटलेट तथा 45 मिलियन डब्लू.बी.सी. हैं। 171 बिलियन मस्तिष्क की कोशिकाएं है, जिसमें 86 बिलियन न्यूरॉन्स तथा 85 बिलियन सेन्ट्रलनर्वस के न्यूरोग्लिया एस्ट्रोसाइटस, माइक्रोग्लियल एपेनडिमल सेल्स तथा ओलिगाडेन्ड्रोसाइटस, पेरफेरल नर्वस सिस्टम के स्क्वान तथा सैटलाइट सेल्स हैं तथा सभी कोशिकाएं ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए ऑक्सजीन का उपयोग करती हैं। रक्त संचार द्वारा सभी कोशिकाओं को ग्लूकोज की आपूर्ति होती है। माइट्रोकोण्ड्रिया ग्लूकोज के केमिकल बॉण्ड को तोड़कर उसमें संचित ऊर्जा को मुक्त करता है। ऑक्सीजन के उपस्थिति में ही ऐरोबिक ग्लाइकोलाइसिस हो सकता है अत: प्रत्येक प्रकार की कोशिकाओं को ऑक्सीजन की नितान्त आवश्यकता होती है। इस सत्य को पहचानते हुए 21वीं सदी के महान् वैज्ञानिक योगी स्वामी रामदेव महाराज जी ने हर प्रकार के रोगियों खास करके कैंसर के रोगियों को प्रतिदिन एक से 4 घंटे तक अनुलोम-विलोम तथा कपालभति प्राणायाम द्वारा शरीर में ऑक्सीजन लेवल को बढ़ा कर नया जीवन दिया है। अब तो स्वामी जी द्वारा संरक्षित एवं संचालित योग-ग्राम, निरामयम्, पतंजलि योगपीठ, पतंजलि वेलनेस सेन्टर हरिद्वार के अलावा पूरे हिन्दुस्तान में दर्जनों पतंजलि निरामयम् सेन्टर द्वारा लाखों लोग योग, आसन, प्राणायाम, ध्यान, आयुर्वेद, नित्य नूतन बायोइकोफ्रेण्डली निरापद औषधियों एवं जड़ी-बूटियों के प्रयोग, नेचुरोपैथी, आहार-चिकित्सा, पंचकर्म, यज्ञ-चिकित्सा के अलावा परम्परागत शृंगी एवं लीच-थैरिपि द्वारा असाध्य से असाध्य रोगों का उपचार सफलता के साथ हो रहा है।
24 घंटे में प्राण-वायु ऑक्सीजन का अनन्त, असीम, अक्षय, अमृत कोष वेला ब्रह्म मुहूर्त्त है:
अरण्यवासी वेद-कालिन ऋषियों ने आत्मज्ञान द्वारा इस सत्य को उद्घाटित किया था कि ब्रह्म मुहूर्त्त में अमृततुल्य प्राणवायु प्रचुर मात्रा में होता है। इस सत्य को विज्ञान ने भी समर्थन किया है। प्राण-वायु की खोज एवं नामकरण तो 18वीं शताब्दी में हुई थी। प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त्त में ऑक्सीजन सर्वाधिक 41 प्रतिशत तक होती है जबकि बाकी समय इस की मात्रा मात्र 21 प्रतिशत होती है। वेद एवं आयुर्वेद के महान् वैज्ञानिकों ने ब्रह्म मुहूर्त्त की वैज्ञानिक व्याख्या निम्न मंत्रों द्वारा की है-
प्राता रत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रति गृह्मनिधत्तौ।
तेन प्रजां वर्धयमान आयुरायरूपोषेण सचेत सुवीर:।।
ऋग्वेद-1/125
उद्यन्त्सूर्य इव सुत्पानां द्विषतांवर्च आदते। अथर्व वेद- 7/16/2
उद्यन्नादित्य रश्मिभि: शीर्ष्णो रोगमनीनशोऽङ्गभेदमशीशम:।
                                 सं ते शीर्ष्ण: कपालनि हृदयस्य च यो विधु:।।                  अथर्व वेद-9/8/22
अनु सूर्यमुदयतां हृद्द्योतो हरिमा च ते।
                              गो रोहितास्य वर्णेन तेनत्वापरिद्ध्मसि।। अथर्व वेद- 1/22/1
यद्यसूरउदितोऽनागा मित्रेऽर्यमा। सुवाति सविता भग:।।
                                                                                                              सामवेद-35
वर्ण कीर्त्ति, मति यश लक्ष्मी, स्वास्थ्यम् आयुश्च विन्दति।
ब्रह्मे मुहूत्ते सजाग्राच्छिय वा पंकजं यथा।। भैषज्य सार
ब्रह्म मुहूत्ते बुध्येत धर्माथर चानु चिंतयेत।
कायाक्लेशामच तन्मूलान्वे दत वार्थमेव च।।
ब्रह्मे मुहूर्त उतिष्ठेत स्वस्थो रक्षार्थमायुष:।
तत्र सर्वाद्यशान्त्यर्थं स्मरेद्वि मधुसुदनम्।। अष्टांग हृदय। भाव प्रकाश
ब्राह्मे मुहूर्त्तो या निद्रा सा पुण्य क्षय कारिणी -मनुस्मृति
अर्थात् पूर्ण सूर्योदय के 72 से 90 मिनट पहले अर्थात् रात्रि के अन्तिम प्रहर का तीसरा भाग का यह काल ब्रह्म मुहूर्त्त कहलाता है। ब्रह्मा जी सृजन के देवता हैं अत: इस अमृत काल में व्यक्ति स्वास्थ्य एवं सुन्दर जीवन का नव सृजन करें। ब्रह्म मुहूर्त्त में वातावरण में आक्सीजन का लेवल बढ़ा होने के कारण मस्तिष्क में नयी ऊर्जा का संचरण होता है। न्यूरोबायोलॉजिकल इफेक्ट के चलते अवेयरनेस चेन्जिंग इफेक्ट होने से बुद्धिमत्ता, तार्किक कुशलता, वैचारिक स्पष्टता, विश्लेषणात्मक क्षमता, एकाग्रता, पढ़ने सीखने, योजना निर्माण एवं निर्णय लेने की क्षमता में कमाल की वृद्धि होती है। रेटिकुलर एक्टिवेंटिंग सिस्टम सक्रिय होने से किसी चीज पर फोकस करने की तथा विश्व के प्रति उत्तरदायित्व एवं समस्या एवं परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय एवं कार्य करने की क्षमता धैर्य सहिष्णुता मेमोरी एवं सजगता में वृद्धि होती है।
ब्रह्म-मुहूर्त्त में दैवी दिव्य शक्तियाँ पृथ्वी पर उतरती हैं, उनका स्नेह एवं प्रेमाशीष मिलता है। इस समय वातावरण अत्यन्त शान्त, निर्मल, पवित्र एवं पावन होता है। बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ में नहीं खोते हैं।
इस समय डोर्सल मेडियल न्यूरॉन्स सक्रिय होने के कारण एण्डोपेप्टाइड नेप्रिलाइसिन याददाश्त को नष्ट करने वाला बीटा एमिलॉयड प्रोटीन को नियंत्रित करके शार्ट टर्म मेमोरी तथा मिडलटर्म मेमोरी को लौंग टर्म मेमोरी में एकत्रीकरण (Consiladate) करके स्थायी याद्दाश्त की वृद्धि करता है। इम्यूनिटी की वृद्धि करता है। ब्रह्म मुहूर्त्त में उठने वाले व्यक्ति पर ग्रह-नक्षत्र एवं नकरात्मक ऊर्जा का प्रभाव नहीं होता है। मन, प्रसन्न एवं चित्तशान्त होता है। प्राय: मैंने पुस्तकों का लेखन एवं अध्ययन ब्रह्म-मुहूर्त्त में ही करता हूँ। इस समय अध्ययन की गई बातें स्मृति कोष में आसानी से संचित होती हैं। तन, चित्त तथा मन में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। ब्रह्म-मुहूर्त्त में उठने से सौन्दर्य, उत्साह, जोश, यौवन, सत्कार्य का जुनून, बल, विद्या, यश, लक्ष्मी, स्वास्थ्य, सुख, शान्ति, समृद्धि, सौभाग्य, स्मरण, मेधा तथा धृति-शक्ति, सुन्दर जज्बात-आयु एवं बुद्धि की वृद्धि होती है। इस समय उठने वाले का प्राण एवं अपान-वायु सम्यक होने से व्यक्ति स्वस्थ होता है। नकरात्मक विध्वंसक विचार विनष्ट हो जाते हैं।
सकरात्मक, सृजनात्मक एवं रचनात्मक विचार एवं कार्य का उदय होता है। ब्रह्म मुहूर्त्त में सोने वाले व्यक्ति का जीवन निस्तेज एवं प्रमादी हो जाता है। उसकी समस्त पुण्य कोष संग्रह भी नष्ट हो जाता है। ब्रह्म वेला में सूर्योदय की किरणें एवं प्राण-वायु से सारे शरीर पर आच्छादित करने से शिरोरोग, हृत दाह व पीड़ा, पीलिया, खून की कमी तथा विभिन्न अंगों की वेदना को शान्त एवं स्वस्थ कर देता है। अथर्व वेद 6/83/1, 2, 3 में स्पष्ट वर्णन है कि रक्त-मिश्रित श्वेत वर्ण वाली, अत्यन्त शुभ्र व्रण वाली, कृष्ण तथा दो लोहित रक्त वर्ग वाली गिल्टियां, गण्डमालाएं तथा कैंसर की गांठे, प्रात:कालीन एक घंटे से दो घंटे धूप स्नान प्राणवायु अनुलोम-विलोम तथा कपालभाति प्राणायाम करने से दूर होती हैं।
 

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