बाबा की योगशाला

बाबा की योगशाला

न्यूज चैनल आज तक के कार्यक्रम 'साहित्य के मंच पर पूज्य स्वामी जी महाराज का साक्षात्कार सुप्रसिद्ध एंकर बहन श्वेता सिंह के साथ हुआ। साक्षात्कार में विविध विषयों पर सवाल-जवाब हुए जिसमें ब्रिटिशकाल, सनातन, योग, संस्कृति, प्राचीन भारतीय इतिहास, युगधर्म आदि मुख्य बिन्दु रहे। साक्षात्कार के महत्वपूर्ण अंश हम आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं:
-सह-संपादक
प्रश्न: पता चला कि साहित्य के मंच तक आने से पहले आप योगी जी से मुलाकात कर आए!
उत्तर:  यह युग योग और राज योग का है। इस समय योग का साम्राज्य उत्तर प्रदेश से लेकर के पूरे देश तक फैला है। सनातन, भारत और भारतीयता को पहली बार एक बड़ा गौरव मिला है। हमारे देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री भी योगी हैं और देश के प्रधानमंत्री भी योगी हैं, और योगी, कर्मयोगी ही सच्चा राजयोगी हो सकता है। जिस तरह से हमारे भाई, महंत, संत ने अपने युगधर्म, हठधर्म के साथ-साथ राजधर्म निभाया वह काबिले तारीफ  है। जिस तरह से उत्तर प्रदेश जैसे एक बड़े राज्य में इसको तो उनके विरोधी भी मानते हैं कि अब यूपी में कोई अपराधी सिर उठा के नहीं चल सकता।
बड़े-बड़े अपराधियों के साम्राज्य उन्होंने ध्वस्त किये हैं और अपराध मुक्त उत्तर प्रदेश बनाने के साथ-साथ लोगों में एक आशा, एक जोश, एक जुनून, एक हौंसला है और दुनिया में कोई भी कार्य, शौर्य, वीरता और पराक्रम के साथ संपन्न होते हैं।
तो शौर्य, वीरता और पराक्रम की एक मिसाल बने हुए हैं योगी जी। आपने हमें उत्तर प्रदेश में आमंत्रित कर ही लिया था तो हम ऐसे ही जिसको अंग्रेजी में कर्टसी मुलाकात कहते हैं, वही करने गए थे।
प्रश्न :  स्वामी जी लेकिन यह बताइए कि एक अवधारणा रही है कि कोई योगी होगा, तो कैसा होगा? आपने जो अपराध का बड़ा अच्छा जिक्र किया तो इसीलिए पिछले कुछ वर्षों में क्या भारत की भारतीयता की परिभाषा, संपूर्ण समाज की अवधारणा यह सब चीजें बदली हैं और बहुत सारे लोग यह सोचेंगे कि साहित्य आज तक के मंच पर स्वामी रामदेव क्यों? पर साहित्य केवल वह लिखित शब्द नहीं, केवल बोला गया वह शब्द नहीं। साहित्य उससे कहीं अधिक है, कहीं बड़ा है।
उत्तर :  साहित्य समाज का एक सतत प्रवाह है जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, वैचारिक रूप से जो कुछ घटित हुआ है उसका एक सतत प्रवाह ही साहित्य है। कुछ लिखा है, कुछ अनलिखा है, कुछ देखा है, कुछ अनदेखा है और कुछ ऐसा भी लिखा है जो गलत है।
मैं तो यह कहूँगा कि इस देश में सबसे ज्यादा जिसके साथ इंजस्टिस हुआ है, अन्याय हुआ है, वह साहित्य ही है। हमारे साहित्य में मुगलों को महान बताया गया है जो अय्याशियां किया करते थे। 5-5 हजार भारत की मां, बहन, बेटियों को हरमों में रखा करते थे, वह मुगल महान हो गए और हमारे छत्रपति शिवाजी महाराज, हमारे महाराणा प्रताप जो उनसे लड़े, वह योद्धा गुमनाम हो गए और एक दो नहीं ऐसी तो अनगिनत कहानियां है।
इस देश में मुगल काल में भी साहित्य के साथ अन्याय हुआ है, अपराध हुआ है। यही अंग्रेजों के काल में भी हुआ है। चंद्रशेखर, राजगुरु, भगत सिंह जो क्रांतिवीर थे उनको तो अपराधी कहते थे और बहुत लंबे कालखंड तक भारत की एनसीईआरटी की किताबों तक में पढ़ाया जाता था। तो इस देश के जो खलनायक थे उनको नायक करके प्रस्तुत किया गया और जो इस देश के नायक थे उनको खलनायक करके लिखा गया। यह तो साहित्य का बहुत बड़ा अपराध घटित हुआ है ना। तो वह भी आज तक के मंच से जाना चाहिए और इतना ही नहीं मैं नहीं कहता कि इस देश के महान इतिहास को पुनर्लेखन की जरूरत है, उसकी पुनर्विवेचना की, पुनर्व्याख्या की तो जरूरत है।
जिस तरह से भारत का गौरवशाली अतीत रहा है, 18वीं शताब्दी तक विश्व की आर्थिक महाशक्ति रहा, सामाजिक सामरिक महाशक्ति रहा, भारत। ठीक है इसमें हमने कुछ संघर्ष झेले हैं। भारत कभी भी पूर्ण रूप से पराधीन राष्ट्र नहीं रहा लेकिन साहित्य में हमको पढ़ते-पढ़ते आज 200 साल हो गए, 1000 साल तक भारत गुलाम रहा। कब गुलाम रहा भाई! संघर्षरत रहा भारत, कभी भी हमने मुगलों की पराधीनता को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों की भी पराधीनता को समग्र देश ने कभी पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया और इसमें नैरेटिव यह घड़े जाते हैं कि हमारे सनातन में तो बहुत अन्याय था स्त्रियों के साथ, शूद्रों के साथ, बहुत छुआछूत था, बहुत भेदभाव था। अंग्रेजों ने हमें सभ्य बनाया। भेदभाव की दीवारें ढाने के लिए इस्लाम ने यहां पर काम किया।
अंग्रेजो ने लूटा, मुगलों ने भी लूटा और फिर खुद ही लुट गए। बहादुर शाह ज़फर के वंशज आज चाय की दुकान पर, दाने-दाने के लिए तरस रहे हैं, एक-एक पैसे के लिए तरस रहे हैं। पाप कहां कैसे खत्म हुआ? पाप आपके सामने ही खत्म हो जाता है। जिन मुगलों ने देश के ऊपर क्रूरता, अत्याचार किए, जुल्म-ज्यादतियाँ की। इसमें 5-5 हजार माँ, बहन, बेटियों को रखा, इस्लाम में दारु पीना निषेध है, उनके यहां पर दारू की, अफीम की और ना जाने किस-किस की महफिलें सजा करती थी। वह तो अपने कर्मों से नष्ट हो गए।
ब्रिटिशर्स भी नष्ट हो गए, जिनका डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में साम्राज्य हुआ करता था। श्वेता जी, कहते हैं, जिसके साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं हुआ करता था अब उस देश के अब तीन टुकड़े होने के कगार पर है। कहीं स्कॉटलैंड और आयरलैंड और इंग्लैंड कहीं अलग ना हो जाएँ। और अब वहां पर भी एक भारतवंशी राज तो कर रहा है- ऋषि सुनक, यह तो हो ही गया है। तो चीजें बदल रही हैं।
सबसे ज्यादा अन्याय साहित्य में ब्राह्मणों के साथ हुआ यद्यपि मैं जन्मना ब्राह्मण नहीं हूं और मैं जाति से किसी को मानता भी नहीं हूँ लेकिन सबसे ज्यादा अन्याय ब्राह्मणों के साथ, सबसे ज्यादा अन्याय भगवे के साथ, सबसे ज्यादा अन्याय साहित्य और सन्यासियों के साथ हुआ है। सन्यासियों को या तो ऐसा बोला जाता था कि भोले बाबा आएगा झोले में डाल के ले जाएगा। हमें चोर उचक्के लिखा जाता था।
जितने भी डॉक्यूमेंट्री देख लो आश्रम के नाम से कोई डॉक्यूमेंट्री बन रही है, सन्यासियों के नाम से, ब्राह्मणों के नाम से, भारत की पूरी व्यवस्था को सामंतवादी व्यवस्था कहा जबकि भारत की ऐसी व्यवस्था नहीं है।
हमने जन्म से जाति को माना ही नहीं, हमने तो कर्म से माना। हमने तो कहा जो अज्ञान को दूर करे वह ब्राह्मण, जो अन्याय को दूर करे वह क्षत्रिय, जो अभाव को दूर करें वह वैष्णव और जो अशुचिता को दूर करके सेवा और शुचिता के प्रतिमान स्थापित करें वह शूद्र।
इसमें कहां अछूत आ गया, इसमें कहां जाति आ गई और हम सभी फोर इन वन हैं। हमारा यह सर ब्राह्मण है, यह भुजा क्षत्रिय है, उदर वैश्य है और यह पैर सारे शरीर को ढोते हैं, सब को ताकत देते हैं यह शूद्र हैं। और अंग्रेजों ने भारतीय सनातन संस्कृति पर चालाकी से जितने प्रहार किये और हमारे शास्त्रों में भी मिलावट कर दी, यह भी हम आपको बताना चाहते हैं। हमारे वेदों को छोड़कर बाकी कोई साहित्य उनसे ऐसा नहीं छूटा है जिसमें उन्होंने मिलावट न की हो। रामायण, महाभारत से लेकर, पुराणों से लेकर, सारे शास्त्रों में मिलावट कर डाली। रामचरित मानस में तक मिलावट कर डाली।
प्रश्न :  क्या मिलावट हुई है रामचरित मानस में?
उत्तर :   हमारे सारे शास्त्र एकतत्व, सहअस्तित्व व विश्व बंधुत्व का उपदेश देते हैं, सारे वेद गीत गाते हैं- एकत्व मनुपश्यत:, यत्र विश्वम् भवति एक नीडम्, ओम सर्वंखल्विदं ब्रह्म। फिर उसमें भेदभाव कैसे पनप सकता है। स्त्रियों के नाम पर, शूद्रों के नाम पर, जातियों के नाम पर, कोई भेदभाव भारतीय संस्कृति में, साहित्य में हमारे सनातन परंपरा में था ही नहीं। यह सारे लानत जो हम पर लगाए गए हैं, यह कुछ चंद पैसे देकर के।
प्रश्न :  एक तरफ  से बात निकली तारण का मतलब पीटना नहीं ताड़ण का मतलब शिक्षा है क्या? आप इस तरफ  इशारा कर रहें हैं कि शब्द का अर्थ अलग निकाला गया।
उत्तर :   मैं एक चौपाई की बात नहीं कर रहा हूँ। एक सूत्र, एक मन्त्र की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं कहता हूँ महाभारत पाँच हजार श्लोक का ग्रंथ था, इसके हमारे यहां प्रमाण हैं। पाँच हजार महाभारत का जो एक महाकाव्य है वो एक लाख का कैसे हो गया? तो कुछ तो उसमें मिलावट की गई है, कुछ वाक्य के साथ उसमें जोड़ा गया। व्यास जी नें पाँच हजार का जय नाम का ग्रंथ लिखा, उनके शिष्यों ने पूरा कर दिया दस हजार में। अब दस हजार से एक लाख कैसे हो गया?
तो यह प्रक्षेप तो है ना, तो ऐसे जो भी इल्लॉजिकल है, जो तार्किक नहीं हैं, जो सार्वभौमिक नहीं है, जो वैज्ञानिक नहीं है, वह भारतीय संस्कृति का अंश नहीं हैं और उसके नाम पर भारत और भारतीयता को हमारी सारी सनातन संस्कृति को बदनाम किया गया।
एक और शब्द सुन लो। हिंदू शब्द हमारे किसी सनातन साहित्य में नहीं हैं, हमारे यहां सनातन है। हिंदू जिनको कहते हैं, वो भी सनातनी हैं। जैन हैं, वो भी सनातनी हैं। बौद्ध हैं, वो भी सनातनी हैं, सिख हैं, वो भी सनातनी हैं जो शाश्वत मूल्यों, परंपराओं को मानते हैं, जो एटर्नल ट्रूथ को मानते हैं, जो यूनिवर्सल लॉ को मानते हैं, वह सब सनातनी हैं। ये आपस में ही झगड़ा दिया हमको।
प्रश्न :  तो हिंदू राष्ट्र कैसे बनाएंगे फिर आप लोग?
उत्तर :  इसलिए हिन्दू राष्ट्र जो शब्द है यह अव्यवहारिक शब्द है।
भारत एक सनातन परंपरा वाला देश है इसलिए सनातन धर्म की जय भारत में भी होगी और सनातन परंपराओं को, योग को, आयुर्वेद को, अध्यात्म को, सनातन मूल्यों का लोग अनुसरण करेंगे।
प्रश्न सनातन मूल्य क्या हैं? अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह उनको पंचशील कहो, उनको पंतव्रत कहो, उनको यम-नियम कहो, जो भी हो, पूरी दुनिया सनातन के रास्ते पर ही चलेगी।
 
प्रश्न :  तो यह हिन्दू राष्ट्र ना सही सनातन राष्ट्र ही सही, क्या सनातन राष्ट्र की एक परिकल्पना जो है वह समावेशी है 
उत्तर :  सनातन का अर्थ ही है समावेशी the meaning of sanatan is eternal universal and integrated approach from all side तो यह तो सनातन का मतलब ही है। सत्य की सब दिशाओं से स्वीकारिता, यही सनातन है। इसमें कोई जाति का, कोई पंथ का, कोई ऊंच-नीच का, कोई भेदभाव का, कोई इसमें लेश मात्र भी स्थान शेष नहीं।
प्रश्न :  क्या मुगलों का साहित्य में कोई कंट्रीब्यूशन नहीं रहा?
उत्तर : देखिये, मैं उसको गलत नहीं कह रहा हूँ। मुगलों से इंपोर्टेंस कितनी देनी चाहिए। साहित्य में 5-10 परसेंट ज्यादा से ज्यादा कोई बहुत बड़ा उनका किसी ने कोई बहुत बड़ा बहादुरी का काम किया तो कहीं अपवाद रूप में 20 प्रतिशत। 80 प्रतिशत भारत के महान योद्धाओं को, वीर-वीरांगनाओं को ही जगह देनी चाहिए और ऐसा ही आगे इतिहास पढ़ाया जाएगा, भारत ऐसा ही होगा।
 
प्रश्न : स्वामी जी इस पाठ्यक्रम के लिए आपने भी बहुत समय से एक तरह से पहले आंदोलन किया था और बाद में आप सलाह देने लगे।
उत्तर : अभी हम भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से पाठ्यक्रम की और जो हमारा पढ़ाया जाने वाला कंटेंट है पाठ्य पुस्तकों की और उसकी पेडोलॉजी की पुन: संरचना कर रहे हैं कि भारत में भारतीय मानस का निर्माण कैसा हो, उसका पूरा अनुष्ठान हमारा चल रहा है ऐसा व्यक्तित्व, ऐसा चरित्र, ऐसा नेतृत्व हम भारत में गढ़ेंगे जहां पर भेदभाव की सारी दीवारें ढहेंगी और भारत के युवा भारत ही नहीं, पूरे विश्व का नेतृत्व कर सकें। ऐसा सामर्थ्य युवा नेतृत्व हम भारत से तैयार करेंगे, यही तो हमारी संकल्पना है।
 प्रश्न :  ये हो पाएगा?
उत्तर :  क्यों नहीं हो पाएगा, इसकी आवश्यकता है।
 
प्रश्न :  जब होता है उस पर एक विवाद छिड़ता है, ऐसा लगता है कि कुछ समय के लिए फिर शांत हो जाते हैं।
उत्तर : नहीं, देखिए जो शिक्षा पर भगवाकरण का आरोप लगाए उसके क्या कारण थे? हम उसकी जड़ में नहीं जाना चाहते लेकिन इतनी बात मैं जरूर कहना चाहता हूँ। मुझे 30 सालों से सार्वजनिक रूप से पूरा देश जानता है, लगभग 20 साल तो मुझे आप लोगों से ही बात करते हो गए। मैंने कभी भी कोई अव्यवहारिक बात नहीं की। मैं हमेशा लॉजिकल बात करता हूँ, साइंटिफिक बात करता हूँ, यूनिवर्सल बात करता हूँ और यही हमारा सनातन धर्म है, यही हमारा वेद धर्म, ऋषि धर्म है, यही हमारा भारत और भारतीयता है।
 
भारत और भारतीयता के नाम पर इस समय जो एक कुछ बौद्धिक आतंकवाद है, साहित्यिक आतंकवाद है, इंटेलेक्चुअल टेररिरिस्ट हैं, वह यह सब बखेड़ा करते हैं। 
कोई उसमें अलग-अलग थॉट्स, प्रोसेस से अलग-अलग, आइडियोलॉजी से अलग-अलग, वहां से कुछ लोग आ जाते हैं और भारत को तोड़ने की बात करते हैं, लेकिन अब यह चलने वाला नहीं है।
 
प्रश्न : आपको लगता है कि पिछले कुछ समय में आपको लेकर के आत्मविश्वास आया है कि अपनी भाषा का प्रयोग/मातृ भाषा का प्रयोग आराम से सार्वजनिक जीवन में लोग कर पा रहे हैं। अब यह नहीं है की लोग अंग्रेजी नहीं कही तो लोग अनपढ़ ना समझ लें, क्या यह बदलाव आ रहा है?
उत्तर :  यह आया है देखो! इसमें बहुत बड़ा योगदान राजनैतिक तौर पर मोदी जी का भी है। इस बात पर वह अभिनन्दन के पात्र हैं। उन्होंने राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मंचों से हिंदी का प्रयोग किया है। जापान का प्रधानमन्त्री हो, रूस का प्रधानमन्त्री हो, चाइना का प्रधानमंत्री, वह अपनी भाषा में बात करते हैं, चाइनीज में, रुस्सियन में, जापानीज में। पूरा यूरोप अपनी भाषा में बात करता है। तो भारत के प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्तर पर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसको गौरव दिया और चारों तरफ  से जो इस मातृभाषा से जिनका उद्धभव हुआ है ऐसी कॉर्पोंरेट वर्ल्ड में हो, एजुकेशन वर्ल्ड में हो, हेल्थ में हो, मीडिया में हो, उन लोगों ने अपनी मातृभाषा को जैसे गौरव देना शुरू किया। अरे! हम गुरुकुलों के पढ़े हुए हमको आज तक के बड़े चाहे वह एजेंडा हो या साहित्य, आस्था कहो या उसमें आपने भी कंट्रीब्यूशन दिया एक एजेंडा रहा, चाहे वो आपकी सीधी बात हो, राष्ट्र में कम से कम एक हजार से ज्यादा इंटरव्यू दिए मैंने, किसके कारण से? गुरुकुल में जो हमें शिक्षा और संस्कार मिले उसके कारण से। हमने अपनी संस्कृति और राष्ट्र भाषा को गौरव दिया उसके कारण से और वह कर्म करके दिखाया आज हमने 40-50 हजार करोड़ का कैपिटल मार्किट खड़ा कर दिया है। आने वाले 5 सालों में जब लोगों को लगता है, अरे! यह गुरुकुल का पढ़ा हुआ हिंदी में बात करने वाला, यह संस्कृत का पढ़ने वाला, यह भी आर्थिक क्षेत्र में, सामजिक क्षेत्र में, राजनैतिक क्षेत्र में झण्डे गाड़ सकता है, तो इससे गौरव पैदा होता है देश के अंदर।
 
प्रश्न :  एक बार फिर मैं यहाँ पर तुलना करुँगी, कि योगी जी जब मुख्यमंत्री बने तो सबको यह संशय था कि एक भगवाधारी यह कैसा काम करेगा।? इतने बड़े प्रदेश को यह कैसे संभालेगा?
उत्तर माने प्रशासनिक तौर पर भी, राजनैतिक तौर पर भी, आर्थिक तौर पर भी और जो सामाजिक ताना-बाना है देश कावह बहुत विविधतापूर्ण है, उसमें सामंजस्य बना करके रखा।
प्रश्न : आपको लेकर भी लोगों को यह संशय होता था। एक भगवाधारी बिजनेस कैसे संभालेगा? और लोग सवाल भी पूछते रहे हैं, अभी भी पूछते हैं आपसे कि आपका एक संत बिजनेस में होना चाहिए की नहीं होना चाहिए?
उत्तर: एक संन्यासी पुरुषार्थ करके अर्थ को परमार्थ में समायोजित करता हुआ बहुत बड़ा आर्थिक साम्राज्य देश के लिए खड़ा कर सकता है, उसका हमने कीर्तिमान बनाया।
मैंने कहा स्वामी रामदेव का टाइम एक दिन टाटा, बिरला, अड़ानी, एलन मस्क, जुकरबर्ग, बिल गेट्स उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है वो अपने लिए जीते हैं, सन्यासी सबसे लिए जीता है।
इसलिए सन्यासी का समय, शक्ति, ऊर्जा, ज्ञान वो सबके कल्याण के लिए होता है एलन मस्क ने बताओं क्या किया? उसने कहा कि मैं ऐसी कार बना दूंगा, आसमान में तुम्हारे लिए जगह बना दूंगा, आरक्षित कर दूंगा। वो टेक्नोलॉजी की बात करता है। स्वामी रामदेव ने लोगों का लीवर फेल होने से बचा लिया। जो ज्ञान मुझे अपने वेदों से प्राप्त हुआ- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद से, ईश, केन, कठ, माण्डूक्य आदि उपनिषदों से, रामायण, महाभारत से, भगवद्गीता, पुराणों से, चरक, सुश्रुत व धन्वंतरि से, जो मुझे अपने पूर्वजों से ज्ञान प्राप्त हुआ, उसमें जो हमने अनुसंधान किया और उसको जमीन पर जो उतारा, आज मैं कहता हूँ सबसे बड़ी जो इंटेलेक्चुअल जो प्रोपर्टी है और यदि मैं उसको पेटेंट कराता तो एलम मस्क से ज्यादा अमीर स्वामी रामदेव होता, लेकिन हमने विश्व कल्याण के लिए वो ज्ञान दिया है।
पूरे वर्ल्ड में, पूरा एक तरफ  जिसको मैं मेडिकल माफिया कहता हूँ वो एक तरफ  सारे के सारे चारों तरफ  माफिया गिरि तो चल ही रही है ना लेकिन हम सत्य के लिए लड़ते हैं। पूरा मेडिकल सिस्टम ङ्ख॥ह्र से लेकर के पूरी दुनिया के डॉक्टर, लाखों साइंटिस्ट जो मिलकर के नहीं कर पाए, हमने पूरे डंके की चोट पर करके दिखाया है
सब के सब मोर्चों पर हमने यह करके दिखाया। मॉडर्न मेडिकल साइंस कहता है डायबिटीज के पेशेंट नॉन-डायबिटीज नहीं हो सकते। हमारे सुप्रीयो भाई साहब आए है। आप भी गए हंै खुद। मैं तो कहता हूँ हमारे यहां तो ओपन सीक्रेट है सब कोई भी आकर के देखो। हमने डायबिटीज के पेशेंट को नॉन-डायबिटीज किया। वर्ल्ड में पहला एक सनातन धर्म का सन्यासी है जो कहता है कि मैं सौ से दो सौ यूनिट इन्सुलिन ले रहे व्यक्ति की इंसुलीन छुड़वा सकता हूँ। सामने यह प्रदीप भाई बैठे हैं, यह बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं। अभी हजारों करोड़ों का साम्राज्य है, इनको भी हमने नॉन-डायबिटीज किया। एक नहीं मैं आपको हजार प्रमाण दे सकता हूँ। डायबिटीज के पेशेंट को नॉन-डायबिटीज किया, बीपी को क्योर, थायराइड हमने क्योर किया, अर्थराइटिस, अस्थमा क्योर किया। लोगों को लंग्स ट्रांसप्लांट से बचाया, लिवर, किडनी ट्रांसप्लांट से बचाया और कैंसर को भी 1 से 2 महीने में ठीक करके दिखाया। अब यह उद्घोषणा नहीं है यह हकीकत है और पूरी दुनिया योग-आयुर्वेद और सनातन को फॉलो करेगी। जीवन जीने का कोई दूसरा तरीका ही नहीं है।
प्रश्न : आज मुझे लगता है साहित्य आज तक के मंच पर आज हम सब स्वामी रामदेव से भजन सुनें, भगवान भी साथ दे रहे हैं यह बादल भी आ गए हैं, ठंडी हवा लग गई है चिलचिल्लाती धूप के बाद।
उत्तर :  तो भजन तो यहीं के हिसाब से सुना देते हैं-'अमृत है हरि नाम जगत में, इसे छोड़ विषय विष पीना क्या? हरि नाम नहीं तो जीना क्या? हरि नाम नहीं तो जीना क्यातो भगवान का नाम उसको छोड़कर के कोई कोल्डड्रिंक पिए जा रहा है, कोई सॉफ्ट ड्रिंक के नाम पर पूरा का पूरा ड्रिंक ही पिए जा रहा है और आदमी खोखला हुए जा रहा है। इसलिए सब साहित्य में तो हर तरह की बात है साहित्य में अश्लीलता भी है, और साहित्य में शालीनता की पराकाष्ठा है, ज्ञान की भी पराकाष्ठा है, सौंदर्य की भी पराकाष्ठा है, और उस सौंदर्य में सात्विकता भी है। लेकिन जो समाज अश्लीलता की ओर, कामुकता की ओर, विलासिता की ओर बढ़ा, ये इतिहास गवाह है इस बात का कि वह नष्ट हो गया। इसलिए एक बात मैं बस कहूँगा श्वेता जी, इस संदर्भ में कोई व्यक्ति आता है कोई साहित्य के नाम पर, कोई क्रिएशन के नाम पर, किसी फिल्म के नाम पर, आजकल बहुत सारी मूवीस बनती हैं, बहुत सारी अलग-अलग प्रकार के क्या-क्या बनाते हैं, हमें पता भी नहीं क्या-क्या होता है। हमने देखी भी नहीं कभी, लेकिन सुना है लोगों से और वह हमारी उत्तेजना को, वासनाओं को, जगा जाते हैं और वह कोई भी 7 साल की बेटी दुराचारियों, व्यापारियों की हवस का शिकार हो जाती है और यह जो आग लगाने वाले लोग कई भोगों की आग लगा रहे हैं, वासना की। कोई अलग-अलग प्रकार की देश को आग लगा रहे हैं, हिंदू और मुसलमान के नाम पर लड़ा रहा है, कोई बेईमानी की आग लगा रहा है, दूसरे लोग आग लगा कर के चले जाते हैं और जलता है समाज तो यह जलन और तपन को हम बचाना चाहते हैं और उसके लिए योग की अलख जगाएंगे।
प्रश्न :   लोगों को थोड़ा सा कन्यूजन हो जाएगा स्वामी जी की आप कह रहे हैं, कि जो हिंदू मुसलमान को बढ़ाता है। ऐसा मुझे लगा कि जब हिंदू राष्ट्र और सनातन राष्ट्र की बात करते हैं, कर रहे थे तो उसमें से एक समुदाय का नाम आपने नहीं लिया था।
उत्तर : उसमें मैंने यह कहा भारत का जो सनातन धर्म है वह भारत की मिट्टी से उपजे हुए मत, पंथ, संप्रदाय, गुरु परंपराओं के बारे में डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर जिनके नाम से यह बहुत बड़ा पार्क है उन्होंने भी कहा कि हमें आयातित पंथ संप्रदायों की जरूरत नहीं है, वो इस्लाम को भी तो कबूल कर सकते हैं। उन्होंने बुद्ध को क्यों स्वीकार किया? तो मुझे इस्लाम से आपत्ति नहीं है, मुझे ईसाइयों से आपत्ति नहीं है। उसमें भी शाश्वत मूल्य हैं, उनमें भी सनातन मूल्य हैं, लेकिन आंशिक तौर पर हैं। लेकिन भारत और भारतीयता के परिपेक्ष्य ताकि हम जब बात करते हैं और मैं तो कहता हूं जैसे मैं कह रहा हूं हिंदू भी सनातनी हैं, बौद्धिक सब सनातनी हैं, ऐसे हमारे मुसलमान भाई भी आ करके बोले हम भी सनातनी हैं, ईसाई बोले हम भी सनातनी हैं। हमें तो खुशी होगी लेकिन वहाँ पर भी वो श्रेष्ठ मूल्य हैं, वह सनातन मूल्य ही हैं क्योंकि यह जो बात है आदर्श और परंपराओं की है। यह बात सार्वभौमिक और वैज्ञानिक यूनिवर्सल जो ट्रूथ्स की है, जो इटरनल है वही तो शाश्वत है। 
 
प्रश्न :  लेकिन स्वामी जी आज जो टकराव है, आज जो टकराव चल रहा है, किसी दो समुदाय में नहीं एक ही समुदाय के अंदर से दो तरह को आवाजे उठ जाती हैं, एक तरफ बागेश्वर धाम के सबसे पॉप्युलर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जो आपको बहुत मानते हैं, वो हिन्दु राष्ट्र को लेकर एकदम कट्टर विचार सामने रखते हैं और दूसरा यहीं उत्तर प्रदेश से ही रामचरित मानस के खिलाफ जो बात उठी, वह एक हिन्दु की तरफ से ही उठाई गई, चर्चा प्रतिबंधित कर दो, पन्ने फाड़ दो, उस तरह की चीजें।
उत्तर : मैंने स्वीकार किया हमारे यहाँ मिलावट हुई हैं। पर क्या कुरान और इस्लाम में जो आयते हैं, वो सभी सही हैं। मैंने तो यह स्वीकार किया है आज तक के इस सबसे बड़े मंच से कि हमारे यहां प्रक्षेप हुआ है उस के सबसे बड़े सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक कारण रहे हैं कुछ को प्रलोभन देकर, कुछ के गर्दन पर तलवार रख कर और एक पूरे षड्यंत्र के तहत कुछ हमारे यहाँ प्रक्षेप हुए हैं, हम तो मानते हैं उनको स्वीकार करते हैं। क्या इस्लाम के अंदर जितने भी उनकी कुरान में आयते हैं क्या वो 100 प्रतिशत सही हैं। मूल कुरान को छोड़ दीजिये आप उनमें जो हदीसों के नाम पर खलीफाओं ने जो उसके अंदर मिलावट कर रखी हैं कोई आकर के किसी जैसे मैंने स्वीकार किया हमारे यहाँ मिलावट हुई हैं मैं मानता हूँ ऐसे ही ईसाईयों में जो बाईबिल के अंदर जो मिलावट हुई हैं क्या कोई आकर के मंच से ऐसे स्वीकार कर सकता हैं। महार्षि दयानन्द ने यह साहस किया था। मैं चाहता हूँ कोई सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर के देखे, पहले उन्होंने अपने यहाँ पर जो कुरुतियाँ थी ढोंग, आडंबर, पाखंड, अंधविश्वास था, उसकी जड़ें उखाड़ी और फिर उन्होंने सबको भी कहा अपने-अपने मत, पंथ, सम्प्रदाय को, अपने-अपने धर्म ग्रंथ को देखो और वहाँ पर जो कुरुतियाँ हैं उनको दूर करने के लिए साहस करो। तो यह तो मैं आह्वान कर रहा हूँ। मुझे लगता है कभी ना कभी तो कोई आवाज उठेगी और यह धर्म का शुद्धिकरण होगा।
प्रश्न : आज का जो आधुनिक साहित्य है उसे हम अलग-अलग रूप में, कविता, शेर, नज़्म, फिल्मी गीत, गाना, एक्टिंग, डायलॉग हर चीज में बांध सकते हैं लेकिन हमारा जो प्राचीन साहित्य रहा है, जो हमारे वेद, पुराण रहे हैं, आपको लगता है कि आज की पीढ़ियों को उनकी जानकारी है।
उत्तर इतना सौंदर्य है हमारे अलग-अलग प्रकार के छंदो में तो अलग-अलग प्रकार के हमारे यहाँ छंद हैं, मतलब गायन से लेकर,  नृत्य से लेकर जो हमारा भरतनाट्यम है, दरअसल हम थोड़े फकीरी अंदाज में ज्यादा पढ़े हैं। हमारे यहाँ पर संगीत, साहित्य, नृत्य की जितनी विधाएं हैं वो तक विश्व में कही नहीं हैं। उनको सही रूप में हमें सिखाया नहीं गया। हम भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से, पतंजलि विश्वविद्यालय के माध्यम से आपको लगभग आने वाले 3 से 5 वर्षों में विश्व का श्रेष्ठत्म संगीत, नृत्य, गायन सभी आपको हम प्रस्तुत करेंगे, आज तक के मंच से ही दिखाएंगे। हिंदी के साथ-साथ तमिल, तेलुगु, उड़ीया, मलयालम, बंगाली, मराठी, नेपाली आदि जितनी भी भारतीय भाषाएं हैं, उनका अपना एक सौन्दर्य है। और साहित्य में जो फुहड़ता लेकर के आये हैं ना वो भी साहित्य के अपराधी हैं। तो उनको भी मुझे लगता हैं आज तक के मंच पर आप बहुत सारी प्रतिभाओं को आमंत्रित कर रहे हैं तो उनको जो फुहड़ता फैलाने वाले लोग हैं उनको भी यहाँ से कुछ सिख जरूर मिलेगी। और एक नई दिशा में जो भारत बोध है, उधर हम आगे बढ़े।
  जैसे स्वामी प्रसाद मौर्य हैं उसमें स्वामी कहाँ से आया? उसमें मौर्य कहाँ से आया? यह जताता है कि वो हमारे सनातनी हैं। लेकिन उनको भी समाज को बाटना है कि मेरे साथ कुछ पिछड़े और दलित ज्यादा जुड़ जाए तो यह तो सभी चलता है। अब जैसे आपने बागेश्वर जी का कहा तो हमारी अध्यात्म की परम्पराओ में अदृश्य शक्तियाँ हैं भी, कुछ महात्मा उसको प्रकट कर देते हैं, कुछ नहीं भी करते। लेकिन यह कहना कि अदृष्ट होता ही नहीं हैं वो भी गलत है। और अदृष्ट, अमूर्त के नाम पर ढोंग, आडंबर, पाखंड, अंधविश्वास फैलाना वह भी गलत है। इसलिए इन सभी मामलों में मैं सम्यक दृष्टि को, वैज्ञानिक दृष्टि को ही अंतिम प्रमाण मानता हूँ।
 
प्रश्न :  स्वामी जी जो नए पाठ्यक्रम और नई शिक्षा की बात हम कर रहे हैं, नए बोर्ड की बात करते हैं उससे किस तरह के छात्रों के उत्तीर्ण होने का अनुमान है?
उत्तर : जब भी मैं मीडिया से मिलता हूँ तो वो बोलते हैं 15-20 वर्षों के बाद भारत का नेतृत्व कहाँ से गढ़ेंगे। वो राजनैतिक नेतृत्व के बारे में भी पूछते हैं, वो पूछते हैं कि 15-20 साल के बाद का मिडिया कैसा होगा? विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका कैसी होगी? और खासकर भारत का नेतृत्व कैसा होगा? तो मैं आज आपको एक आश्वासन देता हूँ यहाँ से 15-20 वर्ष के बाद का मिडिया, विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका, कोरपोरेट, सोशल लीडरशिप उसके बाद का साहित्य शिक्षा, चिकित्सा कैसी होंगी। वो नेतृत्व हम भारतीय शिक्षा बोर्ड से गढ़ेंगे। वो नेतृत्व हम पतंजलि विश्वविद्यालय से गढ़ेंगे। आने वाले १०-१५ सालों में हम इस पर हम करीब १ लाख करोड़ रुपए खर्च करेंगे, ऐसा नेतृत्व हम गढ़ेंगे। उसका ऐसा व्यक्तित्व, नेतृत्व, चरित्र, उसका मानस भारत और भारतीयता से ओतप्रोत होगा। आदमी जो कुछ करता है उसको उसका संस्कार, नोलेज, विश्वास ड्राइव करता है। हम ऐसे ब्रेन की प्रोग्रामिंग कर रहे हैं, ऐसा मानस गढ़ रहे हैं जिसका रोम-रोम भारत और भारतीयता से ओतप्रोत हो। और वह पूर्ण सात्विकता के साथ, किसी छल-छद्म के बिना, किसी स्वार्थ के बिना ऐसे आगे बढ़े कि उसके पीछे जमाना खड़ा होने में गौरव अनुभव करे। वो जहाँ खड़ा हो जाए, लोग कहें कि हमारा रोल मॉडल ये है, हमारा आइकॉन ये है। तो ऐसा सर्वविविध नेतृत्व आपको भारत में देखने को मिलेगा। पहले हम १ लाख विद्यालयों को भारतीय शिक्षा बोर्ड में जोड़ रहे हैं, आगे लगभग ५ लाख विद्यालयों को जोड़ने की हमारी योजना है। १ लाख विद्यार्थियों का रेजिडेंशियल और 5 लाख विद्यार्थियों का यह विश्वविद्यालय होगा। १० हजार का गुरुकुल होगा, हर देश से 50-100 बच्चे होंगे। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका से लेकर, पूरे यूरोप से लेकर, यूके्रन और रशिया से लेकर जापान, चाइना और साउथ कोरिया से तो हम ले ही आएंगे, किम जोन के यहाँ से भी कुछ बालक हम ले आएँगे। पूरी दुनिया से बच्चे सनातन के सांस्कृतिक राजदूत बनकर पूरी दुनिया में सनातन का झण्डा गाड़ेंगे। और चारों तरफ होगा- भारत माता की जय, वन्दे मातरम्। सब लोग इस धरती माता, भारत माता के प्रति कृतज्ञता अनुभव करेंगे, किम जोन का भी मोक्ष हो जाएगा, यूके्र न और रशिया के बीच की रस्साकशी भी समाप्त हो जाएगी, शी-जिनपिंग का भी पराभव हो जाएगा, एक नई दुनिया गढ़ेंगे लेकिन आप और हम रहेंगे, क्योंकि आप योगी हैं। और जो योगी हैं वे बूढ़े नहीं होंगे।

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