जरूरत है शरीर में जठराग्रि, जीवन में प्राणाग्रि की
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उष्मणोऽल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितम्।
दुष्टमामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते।।
अन्ये दोषेभ्य एवातिदुष्टेभ्योऽन्योन्यमूर्च्छनात्।
कोद्रवेभ्यो विषस्येव वदन्त्यामस्य सम्भवम्।।
आमेन तेन सम्पृक्ता दोषा दूष्याश्च दूषिता:।
सामा इत्युपदिश्यन्ते ये च रोगास्तदुद्भवा:।।
अन्वय- उष्मण: अल्पबलत्वेन अपाचितम् आमाशयगतं दुष्टं रसम् आद्यं धातुम् आमम् प्रचक्षते, अन्ये अतिदुष्टेभय: दोषेभ्य: अन्योन्यमूर्च्छनात् एव आमस्य सम्भवं कोद्रवेभ्य: विषस्य इव वदन्ति। तेन आमेन संपृक्ता: दूषिता: दोषा: दूष्या: एव तदुद्भवा: ये रोगा: 'सामा’ इति उपदिश्यन्ते।
शब्दार्थ- उष्मण: = जठराग्रि की, अल्पबलत्वेन = दुर्बलता से, अपाचितम् = अपक्व, आमाशयगतम् = आमाशय में प्राप्त, दुष्टम् = (वातादि दोषों में) दूषित, रसम् = रस, आद्यम् = प्रथम, धातुम् = धातु को, आमम् = आम, प्रचक्षते = कहते हैं। अन्ये = कुछ आचार्य, अतिदुष्टेभ्य: दोषेभ्य: = अतिदूषित (वातादि) दोषों से, अन्योन्यमूर्च्छनात् एव = परस्पर सम्मूर्छित होने के कारण, आमस्य सम्भवम् = आम की उत्पत्ति, कोद्रवेभ्य: विषस्य इव = कोदो से विष की उत्पत्ति की भाँति, वदन्ति = कहते हैं, तेन आमेन संपक्ता: = उस आम से संयुक्तहए, दूषिता: = दूषित, दोषा: = वातादिदोष, दूष्या: च = तथा दूष्य (रसादि), तदुद्भवा: = उनसे उत्पन्न, ये रोगा: = जो रोग हैं, (वे), 'सामा’ इति उपदिश्यन्ते = 'साम’ इस नाम से कहे जाते हैं।
भावार्थ- जठराग्रि की दुर्बलता से रस (प्रथम धातु) का ठीक ढंग से पाचन नहीं हो पाता। आमाशय में जाकर वही अपक्व (दूषित) रस धातु 'आम’ कहलाती है। अन्य आचार्यों के अनुसार जिस प्रकार कोद्रव (कुधान्य) में देश-काल के कारण विष उत्पन्न हो जाता है, ठीक उसी प्रकार अत्यधिक दूषित वातादि दोषों के परस्पर सम्मूर्च्छित (एक रूप) होने से आम दोष की उत्पत्ति होती है। इस आम से मिले हुए दूष्यों (वातादि दोष, रसादि, धातु एवं पुरीष आदि मल) को 'साम’ कहते हैं तथा इनसे उत्पन्न रोगों को 'सामरोग’ कहते हैं।
कुर्यान्न तेषु त्वरया देहाग्रिबलवित् क्रियाम्।
शमयेत्तान् प्रयोगेण सुखं वा कोष्ठमानयेत्।।
ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नांश्च यथासन्नं विनिर्हरेत्।
अन्वय- तिर्यग्गता: दोषा: प्राय: आतुरान् चिरं क्लेशयन्ति, देह-अग्रि-बलवित् तेषु त्वरया क्रियां न कुर्यात्, प्रयोगेण तान् शमयेत् सुखं वा कोष्ठम् आनयेत्, कोष्ठप्रपन्नान् च ज्ञात्वा यथासन्नं विनिर्हरेत्।
शब्दार्थ- तिर्यग्गता: = तिरछे मार्ग में गये हुये, दोषा: = दोष, प्राय: = प्राय:, आतुरान् = रोगियों को, चिरम् = लम्बे समय तक, क्लेशयन्ति = पीड़ित करते हैं। देह-अग्रि-बलवित् = देह, अग्रि तथा बल को जानने वाला (वैद्य), तेषु = उनमें (दोषों के सन्दर्भ में), त्वरया = जल्दबाजी से, क्रियां न कुर्यात् = चिकित्सा न करें, प्रयोगेण = (वैद्यक शास्त्रोक्त-विधि के) प्रयोग से, तान् = उन दोषों को, शमयेत् = शान्त करें, सुखं वा = अथवा सुखपूर्वक, कोष्ठम् = कोष्ठ में, आनयेत् = ले आयें। कोष्ठप्रपन्नान् च = तथा कोष्ठ में प्राप्त हुये (उन दोषों) को, ज्ञात्वा = जान करके, यथासन्नम् = निकटस्थ क्रम से, विनिर्हरेत् = निर्हरण करें।
भावार्थ- तिर्यग्गत (अर्थात् शोधन मार्ग के बाहर शाखादि में गये) दोष प्राय: रोगी को दीर्घकाल तक पीड़ित करते हैं, अत: देह, अग्रि एवं बल को जानने वाले वैद्य इनकी शीघ्रतापूर्वक चिकित्सा न करें, बल्कि शास्त्रानुसार इनका शमन करें अथवा शरीर को बिना पीड़ा पहुँचाए ही दोषों को सुखपूर्वक कोष्ठ में लाकर वमन, विरेचन एवं शिरोविरेचन (विरेचन नस्य) आदि के द्वारा बाहर निकालें।
('अष्टाङ्ग हृदयम्’ से साभार)
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01 Mar 2025 17:58:05
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