महान बनाने वाले 'सात गुण’
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आचार्य बालकृष्ण
वैसे तो हर व्यक्ति ग्रेट (महान्) बनना चाहता है। ग्रेट, (महान्), सफल, आदर्श, आइकॉन, रोलमाडल, आइडियल या महानायक बनने के लिए यूं तो सभी को सामर्थ्य भी मिली है। क्योंकि ईश्वर या परमात्मा ने बिना किसी भेदभाव के सबको ज्ञान, शक्ति एवं सामर्थ्य समान रूप से प्रदान किया है। हर व्यक्ति में विश्व के किसी भी क्षेत्र का प्रथम व्यक्ति होने की शक्ति निहित है। जब हम ये बातें सुनते हैं तो एक बात सबके मन में आती ही होगी कि 'जब सबमें प्रथम होने की शक्ति है, तो सब प्रथम क्यों नहीं बन पाते?
इस सन्दर्भ में पूरे विश्व का खुली आँखों से दर्शन व मूल्यांकन करके हम एक बहुत बड़े निर्विवादित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि 'कुछ लोग तो जन्म से ही महान् पैदा होते हैं तथा कुछ कर्म, मेहनत, पुरुषार्थ या तप से महान् हो सकते हैं। क्योंकि हमारा यह वर्तमान जीवन प्रथम या अन्तिम नहीं है, अनादिकाल से जीवन का शाश्वत प्रवाह चलता आ रहा है तथा अनन्त काल तक जीवन का यही प्रवाह चलेगा। यह आत्मा अनादि व अनन्त का नित्य यात्री है।
जन्म से महान् होना प्रारब्ध है तथा कर्म से महान् बनना पुरुषार्थ है। इस विषय में एक बात बहुत महत्वपूर्ण है और वह यह कि 'ऊँचे श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माओं को महान् बनाना, उनको दिव्यता, देवत्व या ऋषित्व में दीक्षित करना, दिव्य-व्यक्तित्व युक्त महान् नेतृत्व देने वाले व्यक्तियों के रूप में उन्हें विकसित करना अपेक्षाकृत सरल है, जबकि सामान्य प्रारब्ध वाली आत्माओं को महान् बनाना असंभव तो नहीं लेकिन दुष्कर अवश्य है।‘ यह बात भी तथ्य पूर्ण है कि 'यदि मुनष्य के रूप में पैदा हुए समस्त जीवों का सामान्य प्रारब्ध नहीं होता, तो मनुष्य का जन्म ही नहीं मिलता। विशेष, श्रेष्ठ, ऊँचे या दिव्य प्रारब्ध वाली आत्माओं में यूँ तो बहुत से अतिरिक्त गुण होते हैं, लेकिन निष्कर्ष के रूप में श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माएं जो अनादिकाल से पुण्य कर्म कर रही हैं, उनमें जन्म से स्वभाव में ही सात विशेष गुण प्रचुर मात्रा में होते हैं, शेष आत्माओं में ये गुण सामान्य रूप से होते हैं। जन्म से ही धृति, स्मृति, प्रतिभा, पुरुषार्थ, पराक्रम, कृतज्ञता व सत्य निष्ठा इन सात गुणों का अत्यधिक मात्रा में होना श्रेष्ठ प्रारब्ध के कारण ही होता है और यही ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रमाण भी है।
हम सभी को महान् देखना चाहते हैं और हम कह भी चुके हैं कि पुरुषार्थ करके कोई भी व्यक्ति इन सात गुणों को बढ़ाकर पूर्ण धृति, प्रखर स्मृति, दिव्य प्रतिभा, पूर्ण पुरुषार्थ व पूरे पराक्रम द्वारा पूरे अस्तित्व के प्रति पूर्ण कृतज्ञता का भाव रखते हुए तथा पूर्ण सत्यनिष्ठ होकर जीने से महान् ऋषि, मुनि, महापुरुष, युग पुरुष, युगपुरोधा, महानायक नहीं भी बन पाये, तो श्रेष्ठ पुरुष व 100' एक अच्छा इंसान तो बन ही सकता है। सात गुणों से युक्त जो श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माएं हैं, उनका पूरा पुरुषार्थ जगाया जाए तो निश्चित रूप से ये महान् ऋषि, महामानव या महानायक बन सकते हैं।
हम इन सात गुणों से सम्पन्न श्रेष्ठ प्रारब्ध वाली आत्माओं का पूरे देश भर से चयन करना चाहते हैं। पाँच वर्ष से लेकर 25 वर्ष तक की आयु वर्ग के बच्चों व युवक-युवतियों को हम पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में आमन्त्रित करना चाहते हैं। उन पर विशेष कार्य करना चाहते हैं, उन्हें ऋषि-ऋषिकाओं के रूप में तैयार करके सर्व प्रथम भारत को ऋषियों का देश बनाना चाहते हैं। यहाँ राम व कृष्ण जैसा सबका चरित्र हो, महापुरुषों, महान् आत्माओं, ऋषि-ऋषिकाओं, वीर-वीराङ्गनाओं जैसा सबका जीवन हो तथा पूरे विश्व के लोगों का जीवन सुखी व समृद्ध हो। वे भी भीतर व बाहर से पूरी तरह विकसित हों, ऋषियों व वेद के मार्ग पर पूरा विश्व चले इसके लिए हम हजारों भाई-बहनों को इस कार्य हेतु तैयार करना चाहते हैं।
हमें पूरा विश्वास है इन सात गुणों से सम्पन्न श्रेष्ठ आत्माएं हमारे पास अवश्य आयेंगी और पूरे विश्व के मंगल के लिए अपने जीवन की आहुतियाँ अवश्य अर्पित करेंगी।
इन सात गुणों के सन्दर्भ में एक विशेष बात हमें यह कहनी है कि यद्यपि सामान्य रूप से तो सात गुण सभी में होते हैं, परन्तु ये गुण अत्यधिक मात्रा में स्वभाव में हों अर्थात् किसी भी काल में, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिस्थितियों में धैर्य एक क्षण के लिए भी मन: स्थिति में अधैर्य न आए अपितु अत्यंत धैर्य युक्त, किसी सन्दर्भ में कुछ भी तुरन्त याद हो जाए, फिर विस्मृत न हो, एक सन्दर्भ में बात कही जाए तो सैंकड़ों तरह से उसका विश्लेषण-मूल्यांकन करके सही निष्कर्ष पर सबसे पहले पहुँच सके और उसको सबसे पहले क्रियान्वित कर दे, इसी तरह जन्म से पुरुषार्थ करने की आदत, स्वभाव या अभ्यास हो। किसी की प्रेरणा के बिना ही या सामान्य प्रेरणा से अत्यन्त पुरुषार्थी हो, एक बार कहने के बाद किसी भी दिशा में पुरुषार्थ, मेहनत या हार्डवर्क करने के लिए जिनको दोबारा या बार-बार न कहना पड़े। जन्म से ही बड़े कार्य करने के लिए रिस्क उठाने के लिए जो तैयार हों, क्योंकि वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, आर्थिक या राजनैतिक जीवन में बिना बड़े रिस्क या जोखिम उठाये, इस असंभावना भरे भविष्य में कुछ भी बड़ा परिणाम घटित नहीं होता है। इस बड़े कार्य को करने के परिणाम की परवाह या चिन्ता किए बिना अपने स्वधर्म के लिए अपना सर्वस्व सदैव दांव पर लगाने में जिनका बचपन या जन्म से स्वभाव या अभ्यास है, यही पराक्रम है। बिना किसी की प्रेरणा के स्वभाव से ही जो अत्यन्त निष्ठा, प्रेम, करुणा, श्रद्धा, भक्ति वाले होते हैं तथा माता-पिता, गुरुजनों, स्वजनों के साथ, मनुष्य व मनुष्येतर समस्त जीव जगत् या सम्पूर्ण अस्तित्व के प्रति, भगवान् के सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रति जिनके हृदय में अत्यन्त कृतज्ञता का यह भाव है कि 'यह सम्पूर्ण अस्तित्व मेरे लिए कार्य कर रहा है, तो मेरा अस्तित्व भी सबके लिए ही है। यह विचार, संकल्प या भाव जिनमें स्वभाविक रूप से है, वह विशेष गुण की श्रेणी में आयेगा।
प्रेरणा, उपदेश या सत्संग आदि के माध्यम से तो सभी में विद्यमान ये भाव कुछ समय के लिए आ ही जाते हैं। इसी प्रकार जन्म से या बचपन से ही जो बच्चे झूठ नहीं बोलते अर्थात् जैसा देखते, सोचते व जानते हैं, वैसा ही बोलते हैं। भय, प्रलोभन या अहंकार आदि के कारण जो विचलित नहीं होते और सत्य ही बोलते हैं तथा केवल सत्य के ही मार्ग पर चलते हैं। जो लाभ-हानि, मान-अपमान, सुख-दु:ख यहाँ तक कि जीवन व मृत्यु का भी विचार किए बिना सत्य को केन्द्र में रखकर जीते हैं। यह गुण जिनमें स्वभाविक रूप से अखण्ड होता है, वे ही ऊँचे प्रारब्ध वाली आत्माएं हैं।
हम इन सात गुणों से सम्पन्न दिव्य आत्माओं का आह्वान करते हैं कि वे तुरन्त पतंजलि योगपीठ में सम्पर्क (फोन-०१३३४-२४०००८, २४४१०७, २४६७३७), ई-मेल (divyayoga@rediffmail.com) करके, सीधे हरिद्वार आकर वर्तमान शताब्दी के इस सबसे बड़े ईश्वरीय कार्य से अवश्य जुड़ें।
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01 Mar 2025 17:58:05
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