जीवन की पूर्णता के लिए ढीला करना पड़ता है अपने अहम का खूंट
On
आचार्य प्रद्युम्रजी महाराज
जीवन का अर्थ है- खाना-पीना, सोना, उठना, जागना, कृषि- व्यापार आदि करना, पढ़ना-लिखना, खेलना-कूदना, बातें करना, युद्ध करना, संग्रह करना, त्याग करना, सोचना-विचारना, उपदेशादि करना, शास्त्रों को समझना, इन्द्रिय भोगों को भोगना, सन्तान का पालन-पोषण करना, घर-परिवार-समाज-राष्ट्र या वैश्व संस्था का संचालन करना, दान देना, दान लेना, अच्छा-बुरा अनुभव करना, मन को शान्त करना, ध्यान करना, साधना करना, नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना, लूटना, चोरी करना, छल-कपट करना, धोखा देना, विश्वासघात करना, सहयोग लेना, उदासीन रहना, एक शब्द में, मनुष्य जो कुछ भी जीवित रहता हुआ कर रहा है- उत्कृष्ट या निकृष्ट, प्रवृत्ति या निवृत्ति,धर्म या अधर्म, पुण्य या पाप, साधु या असाधु, भोग या त्याग सभी कुछ जीवन का रूप है।
इसमें इतना विशेष रूप से समझाना चाहिए कि जीवन के कुछ क्रिया-कलाप ऐसे होते हैं, जिनके द्वारा स्वयं तथा दूसरों को भी सुख मिलता है, और कुछ के द्वारा केवल दु:ख मिलता है। कुछ मनोभाव ऐसे होते हैं जिनसे व्यक्ति अपने आप को भारी, बोझिल, तनाव-युक्त अनुभव करने लगता है और किन्हीं के द्वारा हल्का। इसी प्रकार मन की ऐसी अवस्था भी आती है कि व्यक्ति अपने को अत्यन्त फँसा हुआ, पराधीन व चारों ओर से भय के द्वारा घिरा हुआ पाता है, तो दूसरे समय एकदम मुक्त, स्वतन्त्र व अभय की स्थिति का अनुभव करता है। विद्वानों ने इन दोनों स्थितियों को शुभ-अशुभ अथवा सत्य-असत्य के रूप में विभाजन किया है ।
व्यक्ति के मन की चाल या तो बाहर की तरफ होती है या भीतर की तरफ। व्यक्ति जब बाहर देखता है तो उसके 'मैं’ का तादात्म्य बाह्य वस्तु, व्यक्ति या विचार के साथ हो जाता है और उसे ही वह अपना स्वरूप समझने लगता है। ऐसे में जो वस्तु-व्यक्ति-विचार सुखदायी प्रतीत होते हैं- उन्हें 'अपना’, 'मेरा’, 'हमारा’ नाम दे दिया जाता है तथा जिनसे दु:ख मिलता है या सुख नहीं मिल रहा होता, उन्हें 'पराया’, 'दूसरा’, 'तुम्हारा’। यह हम सबका ही प्रतिदिन का अनुभव है। व्यक्ति कभी 'मेरा मन’ तो कभी 'मन को ही अपना स्वरूप’ समझता है। कभी हम शरीर को 'मैं’ कहते हैं तो कभी 'मेरा शरीर’।
कभी उनके वियोग या विनाश में कहते-सुनते देखा जाता है कि मैं तो मर ही गया और उनकी वृद्धि से अपनी वृद्धि आँकते हैं। कभी 'प्रतिष्ठा’ मेरी होती है और कभी मैं प्रतिष्ठा रूप होता हूं। अप्रतिष्ठा होने से अपनी मौत और प्रतिष्ठा वृद्धि से अपनी वृद्धि का सिलसिला चालू रहता है। इसी प्रकार किसी विचार को व्यक्ति अपना कह कर पुकारता है और जब उस विचार पर कोई चोट पहुँचाता है, तो विचार के साथ एकीभूत हुआ वह व्यक्ति उस चोट को अपने पर ही पड़ती हुई समझता है। उसकी प्रशंसा या समर्थन से अपने को ही प्रशंसित या समर्थित हुआ मानता है। मेरा सिद्धान्त, मेरा घर, मेरा समाज, मेरा भाई इत्यादि में भी यही होता है। कहीं विदेश में अपने देश का कोई व्यक्ति मिलने पर 'मेरे देश का’, 'मेरा मित्र’,'मेरा सम्बन्धी’ इत्यादि विविध क्षेत्रों में 'मेरा’ शब्द का व्यवहार होता रहता है।
जैसा कि देखा गया, जो मेरा होता है- वह निश्चित रूप से 'मैं’ का ही एक भाग होता है या दूसरे शब्दों में जिस अवधि तक व्यक्ति का 'मैं’ फैल जाता है वहाँ तक 'मेरा’ इसकी सीमा का अवधारण होता है। संक्षेप में मन-बुद्धि-विद्या-बल-प्राण-शरीर-पुस्तक-रुपये-पैसे-भूमिखण्ड-कार-कोठी-बँगला या झोंपड़ी-घर-परिवार-आश्रम-पुत्र-पौत्र-शिष्य-प्रशिष्य-माता-पिता-गुरु-सम्बन्धी-जाति-समाज-प्रान्त-देश-मित्रदेश-विश्व, ये सब ही विवक्षाभेद से कभी 'मैं’ होते हैं तो कभी मेरे । इस 'मैं’ और 'मेरे’ का खेल, मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी भी अपने-अपने स्तर पर खेल रहे हैं। इस प्रकार जीवन की यह नौका सदा 'मैं’ के खूँटे से बँधी रहती है। यही बहिर्मुखी जीवन का क्रम है।
अन्तर्मुखी जीवन के लिए सबसे पहले इस 'मैं’ के खूटे से अपनी जीवन-नौका को खोलना होता है; क्योंकि बहिर्मुखी जीवन का अर्थ है संसार तथा अन्तर्मुखी जीवन का उद्देश्य है भगवान्।
इस प्रकार देखा गया कि व्यक्ति जिस किसी को अपना आपा (मैं या मेरा) मान लेता है, निकटतम मन-बुद्धि या विद्या-बल-शरीर से लेकर दूरतम देश जाति तक, तो अपने ज्ञान व समझ के अनुसार उस माने हुए मैं या मेरे की सुख-अभिवृद्धि व उन्नति के लिए भरसक प्रयास करता है। उस अपने अङ्गीकृत 'मैं’ के विकास में जो वस्तु, व्यक्ति व विचार बाधक प्रतीत होते हैं, उनको दूर हटाता हुआ, उन्हें नष्ट करता हुआ या फिर वे अधिक बलवान् हों तो उनसे बचता हुआ जीवन जीता है।
यदि ज्ञान-शक्ति (विवेक) का विकास कम है तो उचित-अनुचित का ध्यान न रखते हुए जिस किसी उपाय से भी (Good or bad means) अपने उस स्वीकृत 'मैं’ को बढ़ाना ही जीवन का प्रमुख उद्देश्य होता है, पर यदि ज्ञान-शक्ति (विशेष समझ) का विकास हो गया है, सत्संग के द्वारा या स्वयं के अनुभव से या शास्त्र वचनों से, चाहे जिस उपाय से, तो अपने 'मैं’ को बढ़ाने के लिए या अपने 'मैं’ को सुखी करने के लिए और अपने उस 'मैं’ के दु:खों को कम करने के लिए दूसरों की बलि नहीं चढ़ाता। उसकी बढ़ी हुई संवेदन-शीलता उसको सोचने के लिए बाध्य कर देती है कि प्रत्येक का ही अपना-अपना 'मैं’ है, सो मुझे किसी के 'मैं’ को चोट (Hurt) नहीं पहुँचानी चाहिए। ज्ञान-शक्ति के विकास के तारतम्य के अनुसार ही व्यक्ति में इस संवेदन शीलता का विकास होता है।
किसी राष्ट्रवादी देश भक्त का मुख्य 'मैं’ देश-जाति इत्यादि होता है। इसलिए उसके लिए आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण, जो कि प्राय: सामान्य स्थिति में 'मैं’ के मुख्यतम भाग माने जाते हैं, उन्हें भी भेंट चढ़ाने में अत्यन्त आनन्द का अनुभव होता है। जिस महापुरुष ने सम्पूर्ण समष्टि को ही अपने 'मैं’ के द्वारा घेर लिया है, जीवमात्र को जो अपना कहकर पुकारता है, इतना ही नहीं बल्कि उन्हें प्रथम स्थान पर देखता है, वह उनकी सेवा में अपने समझे जाने वाले समय व शक्ति को सहर्ष अर्पित करता रहता है।
पूर्ण आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए महाराज कहते हैं कि या तो इस 'मैं’ को इतना बढ़ाना चाहिए कि सब कुछ 'मैं’ बन जाए। या तो 'मैं’ को इतना हटाओ कि किसी भी दूसरी संज्ञा का 'मैं’ के रूप में आभास ही न हो या 'मैं’ को इतना फैलाओ कि सर्वभूत-सृष्टि अपना आप (मैं) ही लगने लगे। दोनों ही अवस्थाओं में जीवन-नौका 'अहम्’ के खूँटे से खुल जाती है। जो अनन्त की उस महायात्रा के लिए प्रस्थान करना चाह रहे हैं, उनके मन की उपर्युक्त भाव-दशा होनी चाहिए। जो केवल नैतिक जीवन जीना चाहते हैं, उनसे केवल इतनी ही माँग की जाती है कि उन्होंने जो भी अपने 'मैं’ का स्वरूप गढ़ा है, अपना मन-बुद्धि-प्राण-स्त्री-पुत्र-परिवार इत्यादि जो कुछ है, वे अपने 'मैं’ को सुख देने के चक्कर में दूसरे के 'मैं’ को कष्ट न दें। एक परिवार में भी पति अपने 'मैं’ के लिए पत्नी के 'मैं’ को क्लेश न पहुँचाए। इसी प्रकार पुत्र अपने 'मैं’ के लिए पिता के 'मैं’ को पीड़ा न दे। जितना बन सके अपने 'मैं’ से दूसरे के 'मैं’ का सहयोग करें। अपने 'मैं’ की प्रसन्नता के लिए दूसरे के 'मैं’ की अपेक्षा रखें, उपेक्षा न करें । इस प्रकार करते-करते काल-क्रम में 'मैं’ का यह बन्धन ढीला पड़ जायेगा। यदि इस नैतिक दृष्टि का भी आलम्बन नहीं लिया जाता, तो व्यक्ति जो भी करेगा, 'अहम्’ की ग्रन्थि दृढ़ से दृढ़तर होती जायेगी और उसकी जीवन-यात्रा का वही हाल होता है, जैसे कोई भाँग के नशे में सायंकाल नौका में बैठकर मथुरा से वृन्दावन के लिए प्रस्थान करे, पर खूँटे से बँधे हुए नौका के लंगर को खोले ही नहीं। रात-भर चप्पू चलाता रहे। प्रात: काल जब देखते हैं तो नौका वहीं खड़ी है। एक इंच भी यात्रा तय नहीं हुई।
श्री महाराज इसे कदम ताल (Standing Running) कहा करते हैं कि यों तो व्यक्ति देखने में पसीना-पसीना हो जाते हैं, पर खड़े वहीं के वहीं रहते हैं। यही मनुष्य के जीवन का भी हाल है। अध्यात्म के नाम पर व्यक्ति सत्संग-भजन-कीर्त्तन-रामायण पाठ-यज्ञ-हवन-तीर्थाटन-गुरुधारण,मौन-उपवास-दान-दक्षिणा आदि बड़े-बड़े पुरुषार्थ करता है, पर यात्रा एक इंच भी तय नहीं होती।
जहाँ कल खड़ा था वहीं आज खड़ा है। कल जितना क्रोध, जितना लोभ, जितना मोह, जितना इन्द्रिय असंयम, जितना असत्य, जितना मद, जितनी ईर्ष्या, जितना द्वेष, जितनी आसक्ति, जितना आलस्य-प्रमाद, जितनी मन की अशुचिता, राग-द्वेष थे, उतने ही आज भी हैं और आने वाले कल में भी कुछ सुधार की आशा नहीं दिखाई पड़ रही। इस सबका एक ही कारण है- जिस 'अहम्’ के खूटे से अपनी जीवन-नौका को मनुष्य ने बाँधा हुआ है, उसको खोलने का या कुछ ढीला करने के लिए कुछ भी उपक्रम नहीं किया।
क्या आपने उन तथाकथित भक्तों को इस भाषा का प्रयोग करते हुए नहीं देखा कि 'मैं’ इतनी लम्बी सन्ध्या करता हूँ, दैनिक अग्निहोत्र करते हुए मुझे इतने वर्ष हो गये, मेरे गुरु इतने बड़े सिद्ध पुरुष हैं, मैंने इतना सत्संग किया है, इतनी बार मैंने पारायण यज्ञ किया है, इतनी दान-दक्षिणा दी है, इतने-इतने दिन तक मैंने मौन साधना व एकान्तवास किया है इत्यादि। इन स्थूल साधनों के अनुष्ठान से वे अपने आपको दूसरों की तुलना में कितना विशेष अनुभव करने लग जाते हैं। वस्तुत: साधना का लक्ष्य तो यह होना चाहिए कि निर्विशेष पूर्णता उपलब्ध हो जाए। नाम-रूप की उठती हुई लहरों के पीछे 'समं ब्रह्म’ के दर्शन से चित्त पूर्ण शान्त हो जाए। हीन भाव और अभिमान दोनों से ऊपर उठकर चित्त 'समता’ में प्रतिष्ठित हो जाए। कामनायें और तृष्णायें विलय को प्राप्त होकर सहज सन्तोष में स्थिर हो जाएँ।
महाराज ने निरहङ्कार स्थिति का स्वरूप दर्शाते हुए एक बार इंग्लिश कवि वर्ड्सवर्थ की घटना सुनायी। वर्ड्सवर्थ कहता है- पहाड़ की उस सुदूर उपत्यका में पहुँचना। वहाँ तुम्हें बहुत सारे पत्थर पड़े हुए मिलेंगे। उनमें से किसी एक पत्थर को उठाना, वही बहुतों में कोई एक मेरी मृत्यु के बाद प्रतीक रूप में मेरा स्मारक होगा। अर्थात् ये जो अनन्त आत्मायें हमारे समक्ष हैं, वे सब आत्मायें एक ही हैं- न कोई किसी से हीन है और न कोई विशेष। जो कुछ भेद है वह प्रकृति व उससे बने मन, बुद्धि व शरीर की संरचना में ही है या फिर संस्कारों में कहा जा सकता है। महाराज का कहना है- आज जिसके मन-बुद्धि व संस्कारों की विशेषता दिखाई दे रही है, वह सदा से वैसी नहीं है, कभी वे भी निश्चित रूप से इसी स्थिति में थे, जिसको आज हीन समझा जा रहा है। आज जो कछुए के रूप में है, वही किसी समय खरगोश रहा होगा तथा आज का खरगोश परिस्थितिवश कभी कछुए के रूप में बदल सकता है। इन परिवर्तनमान अवस्थाओं का सामने से गुजरता हुआ क्षणिक रूप पकड़कर विशेष या अविशेष कह देना ठीक नहीं है।
वास्तव में सतत परिवर्तन ही इस जगत् और जीवन का स्वभाव है। यदि वैसा है तो हम किस रूप को पकड़कर 'अच्छा’ या 'बुरा’ विशेषण दे रहे हैं?
जबकि सबसे प्रथम व आवश्यक काम यही करना है कि जो-जो हमने 'अहम्’ के खूँटे गाड़े हुए हैं- मैं विद्वान्, मैं मूर्ख, मैं अधर्मात्मा, मैं पापी, मैं महान्, मैं क्षुर्द्र उन सब खूँटों से अपनी नौकाओं को खोल देने में ही भलाई है।
अपने-अपने द्वारा निर्मित इन खूँटों के खुलते ही जीवन अनन्त से जुड़ जायेगा। ये 'अह्म’ के खूँटे ही मनुष्य को मर्त्य या सीमित या अल्पभाव से युक्त कर देते हैं। अल्प में कभी भी सुख नहीं होता; भूमा में ही सुख है। भूमा पूर्ण है, शान्त है, रस स्वरूप है, क्षोभरहित है, जबकि अल्प में संघर्ष है, क्षीयमाणता है। इसमें पुन: पुन: वृद्धि के लिए सतत प्रयास करना होता है, स्पर्द्धा है, भय है, विक्षोभ है। अत: क्यों न हम पूर्णता की ओर बढ़ें।
लेखक
Related Posts
Latest News
01 Mar 2025 17:58:05
With divine inspiration, I want to draw your attention towards 11 important facts. I am sure that you will


