विश्व को जरूरत है नारी के श्रद्धासिक्त अभिसिंचन की माता ही यदि हो अज्ञान, बच्चे कैसे बनें महान
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डॉ. विजय कुमार मिश्र
यहाँ माता का आशय राष्ट्र की नारी शक्ति से है और बच्चों का संबंध देश की प्रजा, जनता व जनसंख्या से। भारतीय ऋषियों ने नारी को राष्ट्र लक्ष्मी एवं विश्व की निर्मात्री शक्ति कहा है, वह राष्ट्ररूपी परिवार की रीढ़ है, धुरी है। उसकी उत्कृष्टता-विकृष्टता पर राष्ट्र की उत्कृष्टता, उत्थान एवं पतन निर्भर करता है। समुन्नत नारी ही विश्व को धरती का स्वर्ग बना पाती है। शास्त्रों में उसे ब्रह्मविद्या, श्रद्धा, शक्ति, पवित्रता, ममता, प्रशिक्षिका की गरिमा से नवाजा गया है। यहां तक कि 'संसार में जो कुछ भी सर्वोत्कृष्ट है, उसमें नारीत्व प्रवाहमान बताया है।
इन्हीं विभूतियों के समुच्चय के कारण नारी जहां कदम रखती है, नव सृजन का प्रवाह फूट पड़ता है। सतत सक्रियता उमड़ पड़ती है। घर देवालय बन जाता है, समाज नवसृजन से महक उठता है। जनमानस अभाव व दरिद्रता से मुक्त हो उठता है, राष्ट्र दृढ़ संकल्पशीलता का पुंज बनकर खड़ा होता है और विश्व से वसुधैव कुटुम्बकम की प्रतिध्वनि गूंज उठती है।
ना री एक होकर भी अनेक आयामों से कार्य करती है। संबंधों में वह माता, भगिनी, पत्नी, कन्या सभी दायित्व एक ही साथ पूर्ण करती है, तो सामाजिक क्षेत्र में कर्मठता, निष्ठा, संवेदनशीलता, निष्पक्षता की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी होती है। वहीं राष्ट्रीय व वैश्विक परिपे्रक्ष्य में असीम धैर्य, नि:श्रेयस के साथ निर्माण व अभ्युदय का दायित्व निभाती है।
वह अनेक बार नैपथ्य में डाली गयी पर दिव्य सामर्थ्यबोध से पुन:-पुन: विश्वास रूपी नेतृत्व का आधार बनकर खड़ी हुई। वृहत्संहिता में 'पुरुषाणां सहस्रं च सती नारी समुद्धरेत्’ का वर्णन है अर्थात् सती स्त्री अपने पति का ही नहीं, अपने उत्कृष्ट आचरण की सामर्थ्य से सहस्रों पुरुषों का कल्याण करती है (यहां सती का आशय नारी की उत्कृष्टता से है। दूसरे शब्दों में कहें तो 'नारी को स्वस्थ, प्रसन्न, समुन्नत, शिक्षित, उत्कृष्ट, स्वावलम्बी बनाये रखने का दायित्व समाज का है। उसकी क्षमता को विकसित करने में लगाया धन, श्रम, मनोयोग एवं समय समाज एवं राष्ट्र को असंख्यों गुना होकर लौटता है। नारी जितना समर्थ बनेगी राष्ट्र की संतानें उतना ही सशक्तव समृद्ध होंगी क्योंकि वह निर्मात्री जो है।
सीमाओं से परे होती है मां:
हर राष्ट्र के नागरिक नारी शक्तिके रक्त, रस से निर्मित होते हैं। उनमें विद्यमान चेतना का अभिसिंचन, परिपोषण, संस्कारों का विकास मां रूपी नारी द्वारा ही संभव बनता है। ऐसे में यदि नारी का रक्तव रस परिपोषित होगा, तो नारी पोषित होगी। तभी नारी की संतानें स्वस्थ-समुन्नत पैदा होंगी और राष्ट्र व विश्व प्रखर पीढ़ी से भर उठेगा। यदि मां ही दुर्बल होगी, तो विश्व से अनीति-अत्याचार मिटाने वाले सूरमा कहां से आयेंगे। ये सूरमा वैज्ञानिक, कलाकार, विद्वान, दार्शनिक, समाज सेवक, प्रशासक, राजनेता, मनीषी, उद्योगपति, महापुरुष के रूप में हों या देश की सीमा रक्षा करने वाले वीर सिपाही। वे सभी मां की गोद में खेल-खेल कर ही धरती मां को पुष्पित-पल्लवित करते हैं। इसीलिए नारी किसी एक व्यक्तिकी जननी नहीं हुई, अपितु उसे राष्ट्र मां, विश्व माता की गरिमा देना भी कम है। वास्तव में एक-एक नारी, वह किसी भी देश की सीमा में निवास क्यों न करती हो, है वह जगदजननी ही। क्योंकि मातृत्व शक्तिके कारण वह सदा सीमाओं से परे होती है। अत: उसे उचित सम्मान मिलना ही चाहिए।
वह देवी है:
नारी देवी कही गयी है, देवता उसके अनुचर। इसलिए कि वह अल्प में ही संतुष्ट होती है, जबकि अनुदान-वरदान वृहद स्तर पर लुटाती है। संसार में कबीर, सूर, तुलसी, समर्थ गुरु रामदास, संत रविदार, वंदा वैरागी, संत तुकाराम, आचार्य चाणक्य, राम-कृष्ण, महर्षि रमण, महर्षि अरविंद, सरदार भगतसिंह, असफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, स्वामी विवेकानंद, सुभाष, गांधी, पं० श्री राम शर्मा आचार्य, से लेकर वर्तमान राष्ट्रसंत योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, ऋषिकल्प श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण महाराज जैसे अनेक युग दृष्टा हैं जिन्होंने देवत्व की दिव्य धाराओं को साधिकार धरा पर उतारने में समर्थ हुए। वह सभी किसी न किसी मां की कोख से ही जन्में। इन दिव्य पुत्रों में देवत्व से परिपूरित संस्कार उनकी माताओं ने ही भरे हैं। इससे स्वत: सिद्ध होता है कि जो जीवन में देवत्व जागृत करे उसे देवी नहीं तो और क्या कहें?
यही है आत्मबोध का समय:
बड़े दुख का विषय है कि इतनी दिव्यता से ओतप्रोत नारी शक्तिके लिए 'संयुक्तराष्ट्र संघ’ को 'एक दिवस’ घोषित करके उसके उत्थान की सोचना पड़ा। नारी जाति की यह दुर्बलता-दयनीयता, परावलम्बी, पददलित जिंदगी का कारण कहीं अलग नहीं हो सकते। इसी समाज, इसी विश्व की उसकी ही संतानों ने उसे उपेक्षा एवं पिछड़ेपन का न केवल शिकार बना दिया, अपितु, उसके अंत: की गहराई तक अबला होने का भाव भरकर नारी वर्ग को हीनता के स्तर तक पहुँचाया। यद्यपि उसकी मौलिकता आज भी दिव्य है, जरूरत है नारी को आत्मबोध कराने की। उसकी भावना को समुचित सम्मान, स्नेह, प्रोत्साहन, शिक्षण, उत्कृ ष्ट संकल्पना से भरा जा सका, तो नारी के व्यक्तित्व पर जमी राख हटेगी और वह पुन: अभ्युदय प्राप्त करेगी। जैसे अंगारे पर यदि राख की परत अंगारे की ज्वलनशीलता, ताप की प्रचंडता को प्रकट नहीं होने देती, ठीक वैसे ही आज की नारी भी कोयले के ढेर में उपेक्षित पड़े हीरे की तरह हो गई है। अब व्यक्तिगत स्तर से संगठनात्मक, संवैधानिक, सरकारी व वैश्विक सहकार भाव से नारी को पुन: उसकी गरिमा दिलाना ही होगा। इसके लिए हर स्तर पर प्रयास जरूरी है।
नारी का सम्मान जहां है:
प्रथम जरूरत है घर-परिवार की चहरदीवारी के बीच ही उसे अपनों के बीच समुचित सम्मान मिले। पर्दा से कसी दासीभाव से हटकर उसे देखा जाय, लड़का-लड़की के बीच भेदनीति बदली जाय, उसे भावनात्मक पोषण एवं तर्क-तथ्यों के सहारे मौलिकता से जोड़ें। नारी की भावुक मानसिकता के दोहन एवं शोषण से उसे बचाया जाय। घर में पिता, भाई, पति, देवर सभी उसे प्रसन्नता प्रदान करें और उसे पारिवारिक दायित्वों के निर्णयों में भागीदार बनायें।
इस प्रकार वह अप्रत्यक्ष रूप से लोहे की जंजीरों में जकड़ी दासी मानसिकता से मुक्तहोगी। इसी के साथ उसे सोने के जंजीरों से भी मुक्तकरना पड़ेगा।
रमणी नहीं कर्मणी है:
वैदिक युग के अवसान का सबसे बड़ा दंड नारी जाति को मिला। उसकी न केवल प्रतिष्ठा, गरिमा खोई, अपितु उसे भोग की वस्तु के रूप में परोसा जाने लगा। राजतंत्र से लेकर समाज तंत्र ने उसका दोहन ही किया। दोहन के पराकाष्ठा की परिणति उसे दास जैसी हीनता भरे जीवन के रूप में चुकाना पड़ा। आज वह परिस्थितियां बदलीं, आज हरम नहीं हैं, पर नारी आज भी छली जा रही है। उसे सोने-चांदी से लादकर रूप-लावण्य की गुड़िया बनाई जा रही है। आश्चर्य कि इसमें वह नारी भी खुश है। यह दूसरे प्रकार का नारी जाति के प्रति धोखा है। जरूरत है नारी को ऐसी विसंगतियों से बचाने की।
नारी शक्ति को बढ़ावा:
यद्यपि आज वह उच्च शिक्षा में भी पारंगत हो रही है, लेकिन जरूरत है उसकी गरिमा अनुसार बौद्धिक एवं व्यवहारिक प्रशिक्षण की। कभी वह युद्ध संचालन में कुशल थी। कैकई और दशरथ का उदाहरण सामने है। अत: उसे हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है।
नारी में ऐसे कौशल भरे जाएं कि वह अपने जीवन के कुशल संचालन के साथ-साथ आवश्यकतानुसार उपार्जन भी कर सके। तथा यथा अवसर दूसरों को भी आश्रय व सहयोग दे सके। क्योंकि जिस समाज व देश में स्वाभिमानी, श्रमशील, सुसंस्कृत नारी समूह है वह समाज प्रगति करेगा ही।
जरूरी है श्रमशक्ति का निखार:
अनेक देशों में पुरुषों द्वारा भोजन पकाने आदि घरेलू कार्यों में नारी का हाथ बटाने की श्रेष्ठ परम्परा है, इससे उसे घर की सुव्यवस्था, स्वच्छता में मदद मिलती ही है, अपितु स्वयं के सुविकसित, सुसंस्कृत एवं सुयोग्य बनने का समय भी मिलता है। पर विश्व की आधी आबादी, आज भी अपनी श्रम शक्तिको उपेक्षित रखने के लिए विवश है। आवश्यकता है नारी की श्रम शक्तिको जागृत करके उसे सुनियोजित करने की। तभी विश्व का समुचित निर्माण संभव होगा। युग परिवर्तन के द्वार तभी खुलेंगे जब युग के साथ नारी कदम से कदम मिलाकर बढ़ेगी। मानव में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग लाने के लिए पहले नारी शक्तिको निखारना होगा। पर पहल इसके लिए पुरुष समाज को ही करनी पड़ेगी। स्वस्थ शरीर, सुसंस्कारी जीवन शैली, संतुलित मनोबल, अनुभव और कौशल जागरण से गढ़ी गयी नारी ही राष्ट्रीय-वैश्विक दायित्व निभाने योग्य बन सकती है।
परम पूज्य योगऋषि के पावन सान्निध्य में
नारी जागरण :
परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के पावन सान्निध्य में पतंजलि योगपीठ नारी जागरण आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैसे तो पिछले दो दशकों से श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के बहुआयामी विराट् कर्तृत्व में महिलाओं की अहम् भूमिका रही है, लेकिन दिसम्बर 2008 में विधिवत् महिला पतंजलि योग समिति की स्थापना हुई। आज पूरे राष्ट्रभर में 20 से 25 लाख महिलाएँ अपने गुरुवर के सपनों का भारत बनाने में पूर्ण ईमानदारी, जिम्मेदारी व समझदारी से हर क्षेत्र में पूर्ण समर्पण भाव से अपनी सेवाएँ अर्पित कर रही हैं। चाहे योगक्रान्ति रही हो, चाहे सत्ता परिवर्तन, आयुर्वेद व स्वदेशी की क्रान्ति हो, या फिर वर्तमान में चल रही शिक्षा क्रान्ति हो, बहनों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। आज प्रतिदिन सुबह-सुबह लाखों की संख्या में बहनें नि:शुल्क योग कक्षाएं लगाकर अपने वतन को आरोग्य अर्पित कर रही हैं तथा पूज्य गुरुवर के स्वस्थ भारत के स्वप्न को साकार कर रही है। दिन में आयुर्वेद-स्वदेशी के प्रचार-प्रसार के माध्यम से अपने देश की अर्थव्यवस्था को सशक्तबनाते हुए समृद्ध भारत निर्माण में अपनी आहुति प्रदान कर रही हैं। वैदिक धर्मानुसार बाल संस्कार, वृक्षारोपण, आहारविद्या, कुटीर उद्योग आदि अनेक प्रयास करते हुए अपने वतन तथा अपने गुरुदेव के अरमानों को पूर्ण करने हेतु इस विराट् यज्ञ में एक आहुति का काम कर रही हैं।
आज देश भर में लगभग प्रत्येक जिले व तहसील स्तर पर महिला पतंजलि योग समिति गठित हो चुकी है तथा पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में 100 बहनें आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर राष्ट्रसेवा व भागवत सेवा की दीक्षा लेकर वेद, दर्शन व व्याकरण आदि का अध्ययन कर रही हैं। अपने माता-पिता के कुल, साथ-साथ ब्रह्मकुल या भागवत कुल को उत्कृष्टता की ओर ले जा रही है।
साथ ही विश्वस्तर पर योग-प्राणायाम, आयुर्वेद को आधार बनाकर तप पूर्ण जीवन से जोड़ा जा रहा है। लक्ष्य है दिव्य तपस्विनी, राष्ट्रनिष्ठ इन नारियों को वैश्विक नारी जागरण के लिए खड़ा करके विश्व को समुन्नत, समृद्ध, सशक्तबनाना, विश्व की आधी आबादी के रूप में नारी शक्ति को आगे लाना, उसके हाथ में पारिवारिक, सामाजिक, प्रशासनिक, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक आंदोलन का नेतृत्व सौंपना। तभी विश्व निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा। क्योंकि नारी निर्मात्री है, जो अपनी संतानों का निर्माण कर सकती है, उसके लिए विश्व निर्माण कठिन नहीं। वैदिक परम्परा में भी नर-नारी दोनों साथ मिलकर कदम उठाते थे। आज युग पुन: पुकार रहा है कि विश्व की मातायें सृजन में लगें।
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