नवजीवन प्रदान करने वाले परम सत्य को चरितार्थ करने में बाधाएं
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डॉ. सुमन, मुख्य कें द्रीय प्रभारी, महिला पतंजलि योग-समिति
अपनी प्रकृति में परिवर्तन करना कोई आसान कार्य नहीं है। इसके लिए गतिशील संकल्प को दृढ़ बनाना बहुत कठिन है। इस दुरूह कार्य को करने में निम्न प्राण व प्रकृति जो बाधाएँ डालते हैं उनका कुछ दिग्दर्शन करवाते हैं।
निम्नतर प्राण की वृत्ति अपने पुराने अभ्यासगत तरीके से चिपके रहना चाहती है:
वह अभी भी अपने पुराने स्वरूप से गठबन्धन किये हुए और परम प्रकाश के विरूद्ध विद्रोह करती है। निम्न प्राण हर बार जब उसे निरूत्साहित किया जाता है तो वह अपनी स्वतन्त्रता का अधिकार जताता है और अपने ही अनगढ़ और अहंकार पूर्ण विचारो, कामनाओं, तरंगों, आवेगों, या सुविधाओं का जब चाहे तब समर्थन और अनुसरण करने की स्वतन्त्रता का अधिकार जताता है। वह गुप्त रूप से या शब्दों में अपने मानव असंस्कृत स्वभाव का अनुसरण करने का दावा करता है।
अज्ञान और असंगति से युक्त जो उसका स्वरूप है वही बने रहने का अधिकार घोषित करता है ओर वह इन समस्त अशुद्ध तथा निम्न स्तर पदार्थो को वाणी, कर्म आचरण में अभिव्यक्त करने के अधिकार की मांग करता है। कभी-कभी सिद्धान्त रूप में उसकी मांग नहीं करता बल्कि व्यवहार में उसका दावा करता है। अपने बोलने, सोचने तथा अनुभव करने के पुराने अभ्यासगत तरीकों को समर्थन करता है तथा चरित्र में जो कुछ विकृत और विरूप हो गया उसे शाश्वत बनाने का प्रयत् न करता है।
मिथ्याभिमान तथा उग्र राजसिक भावना:
मिथ्याभिमान, घमण्ड तथा स्वाग्रही उग्र राजसिक भावना ये अपने-आपको भागवत शक्ति और उसके कार्य के बीच ला खड़ा करते हैं और विरोधी शक्तियों को बुलाते हैं छोटे पैमाने में मिथ्यामिभान, घमण्ड तथा राजसिक उग्रता के दोष प्राय: सभी मानव स्वभाओं में विद्यमान रहते हैं, ये भिन्न आकार ग्रहण कर लेते हैं ओर सच्चे आध्यात्मिक परिवर्तन के लिए बहुत बड़ी बाधा बन जाते हैं।
अनाज्ञाकारिता और अनुशासनहीनता यह तपस्या के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है:
निम्न प्रकृति का एक भाग हमेशा असंयत अनियमित तथा स्वाग्रही होता है और वह अपने आवेग तथा विचार से भिन्न किसी भी तरह के नियम कानून और अनुसशासन के आरोपण को स्वीकार करने में अनिच्छुक होता है इसका परिणाम होता है साधक अपने गुरू का आज्ञाकारी बनने का दावा व प्रतिज्ञा तो सतत करता है, लेकिन उसका क्रिया और व्यवहार उसके एकदम विपरित होता है। और जो हमसे पीछे वाले साधक हैं उनके लिए एक बुरा उदाहरण भी हम प्रस्तुत करते हैं।
कपटाचार और मिथ्याभाषण:
ये अपनी ही बनायी कीचड़ में साधक को फंसा देते हैं। जो लोग ऋजु और निष्कपट नहीं हैं वे गुरू या भगवान् की सहायता से लाभ नहीं उठा सकते हैं क्योकि वे स्वयं ही उससे मुंह मोड़ लेते हैं। इस मार्ग में वही आगे बढ़ पायेंगे जो ऋजु और सत्यवादी हैं।
निरन्तर अपने अहं का समर्थन करने की खतरनाक आदत:
मन अपने ही विचार को, पद-प्रतिष्ठा को समर्थन करने के लिए खड़ा रहता है। इसके लिए वह किसी भी प्रकार का तर्क करने के लिए तैयार रहता है। भले इसके लिए उसे किसी छल-छद्म ढ़ोग, आडम्बर का सहारा भी क्यों न लेना पड़े।
प्रकृति की इन कठिनाइयों पर विजय कैसे पायी जाये:
प्रकृति की चाहे जैसी भी कठिनाइयां क्यों न हों, उनके साथ जूझने की प्रक्रिया चाहे जितनी लंबी और कष्टकर क्यों न हो, वे परम सत्य के विरूद्ध अन्त तक नहीं ठहर सकती, बशर्ते कि सत्ता के इन भागों में सच्चा भाव सच्ची वृत्ति तथा सच्चा प्रयास हो या आ जाये। लेकिन अगर साधक आत्म-अहंकार स्वाग्रह या तामसिक जड़ता के कारण अपनी आँखे बन्द किये रखे या परम प्रकाश के विरूद्ध अपने हदय को कठोर बनाये रखे तो जब तक वह वैसा करता रहेगा कोई भी उसकी मदद नहीं कर सकेगा। दिव्य परिवर्तन के लिये समस्त सत्ता की स्वीकृति आवश्यक है और स्वीकृति की समग्रता तथा संपूर्णता ही सर्वागीण समर्पण को लाती है। लेकिन निम्न प्राण की यह स्वीकृति मात्र एक मानसिक स्वीकरण या कोई गुजरता हुआ भावनात्मक समर्थन नहीं होना चाहिये, इसे अपने-आपको एक स्थायी मनोभाव तथा सतत और संगत क्रिया में अनूदित करना चाहिये।
आवश्यक उद्यम, द्विविध जीवन नहीं:
इस योग को केवल वे ही अन्त तक कर सकते हैं जो इसके बारे में पूरी तरह सच्चे हैं और अपने-आपको भगवान् में पाने के लिये अपने तुच्छ मानवीय अहंकार तथा उसकी मांगों को समाप्त करने के लिए तैयार हैं। इसे चंचलता या शिथिलता की भावना से नहीं किया जा सकता, कार्य बहुत ऊँचा और कठिन है, निम्न प्रकृति में विरोधी शक्तियाँ न्यूनतम अनुमति या लघुतम उद्घाटन का लाभ उठाने के लिये एकदम से तत्पर रहती हैं, इसके लिए बहुत सतत तथा तीव्र अभीप्सा और तपस्या की आवश्यकता होती है। यदि मानव-मन के विचार धृष्टतापूर्वक अपने-आपको प्रस्थापित करें या सत्ता के निम्नतम भाग अपनी मांगों, सहजवृत्तियों और दावों की मनमानी तुष्टि करना चाहें-सामान्यत: जिनका समर्थन मानव स्वभाव के नाम से किया जाता है तो यह योग नहीं किया जा सकता। अगर तुम अज्ञान की इन निम्नतम वस्तुओं को भागवत परम सत्य या सत्य पथ पर स्वीकार्य किसी निम्र कोटि के सत्य के साथ तादाम्य करने का हठ करो तो यह योग नहीं किया जा सकता। अगर तुम अपने पुराने रूप या उसकी पुरानी, मानसिक, प्राणिक या भौतिक रचनाओं व आदतों से चिपके रहो तो यह योग नहीं किया जा सकता। तुम्हे निरन्त अपने पुराने रूपों को पीछे छोड़ना पड़ता है और हमेशा उच्च से उच्चतर सचेतन स्तर से देखना और जीना होता है। अगर तुम अपने मानव मन या प्राणिक अहंकार की स्वतन्त्रता के लिए आग्रह करो तो यह योग नहीं किया जा सकता। जब तक मनुष्य साधारण जीवन बिताना चाहता है तब तक अगर वह ऐसा करना पसंद करे तो उसकी सत्ता के सभी अंगों को यह अधिकार है कि वे अपने निजी तरीके से, अपने ही खतरों तथा संकटों का सामना करते हुए स्वयं को अभिव्यक्त और संतुष्ट करें। लेकिन योग पथ पर प्रवेश करने की बात दूसरी है, जिस पथ का सम्पर्ण उद्देश्य है इन मानवीय वस्तुओं के स्थान पर अधिक महान् सत्य के विधान तथा शक्ति को लाना और जिस की पद्धति का मर्म है-भागवत शक्ति के प्रति आत्म-समर्पण करना और फिर भी इस तथाकथित स्वतंत्रता जो अमुक अज्ञानमय वैश्व शक्तियों की अधीनता से बढ़कर और कुछ नहीं है-की मांग करने का अर्थ है विवेक शून्य विरोध में रस लेना द्विविधि जीवन बिताने के अधिकार की मांग करना।
दो चुनाव:
जो इस योग के साधक होने की घोषणा करते हैं आगर वे अपने-आपको हमेशा अज्ञान की उन शक्तियों के केन्द्र, यंत्र या प्रवक्ता बनायें रखें जो इसके सिद्धांत तथा उद्देश्य का विरोध करती, इन्हें अस्वीकार करती है और उनका उपहास करती हैं तो उनके लिये यह योग करने की और भी कम संभावना होती है।
समस्त विरोधों के बावजूद यह अतिमानसिक शक्ति भौतिक चेतना तथा जड़-भौतिक जीवन में अभिव्यक्ति होने के लिए नीचे की ओर दबाव डाल रही है। दूसरी ओर है, अपने समस्त झूठे दम्भ, अज्ञान, अंधकार, मन्दता या अक्षम उग्रता के साथ यह निम्नतर प्राणिक प्रकृति जो अपने-आपको बनाये रखने के लिये डटी हुई है, अवतरण के मार्ग में बाधक है, अतिमानसिक या अतिमानवीय चेतना और सृजन की किसी भी सच्ची वास्तविकता या सच्ची संभावना में विश्वास करना अस्वीकार करती है।
वह भगवान् की उपस्थिति को अस्वीकार करती है क्योंकि वह जानती है कि उस उपस्थिति के बिना कार्य असंभव है वह जोर-जोर से अपने ही विचारों, निर्णयों, कामनाओं, सहज वृत्तियों को प्रस्थापित करती है और अगर इनका खण्डन किया जाये तो वह संदेह, अस्वीकृति, निन्दात्मक आलोचना, विद्रोह तथा अस्त-व्यस्तता को फैला कर प्रतिकार करती है। आज हमारे सम्मुख ये दो चीजें हैं जिनमें प्रत्येक मनुष्य को चुनाव करना होगा।
चुनाव अनिवार्य है, सत्य या रसातल:
क्योंकि यह विरोध, भागवत सत्य के अवतरण के विरूद्ध यह निस्सार बाधा और अवरोध हमेशा के लिये नहीं टिका रहा सकता। प्रत्येक मनुष्य को अंत में इस ओर या उस ओर, परम सत्य के पक्ष में या उसके विपक्ष में आना ही होगा। अतिमानसिक उपलब्धि निम्नतर अज्ञान के दुराग्रह के साथ-साथ नहीं बनी रह सकती, द्विविध प्रकृति में प्राप्त सतत संतुष्टि के साथ इसका कोई मेल नहीं बैठता। अत: चुनाव अनिवार्य है- सत्य या रसातल।
साभार: श्री अरविन्द्र की पुस्तक से
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01 Mar 2025 17:58:05
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