जड़ी-बूटी दिवस

जड़ी-बूटी दिवस

   आइए प्रकृति माता को बचाइये। यह प्रकृति भगवान् की उत्कृष्ट कृति है। यह भगवान् की रचना, भगवान् का ही प्रत्यक्ष रूप यह प्रकृति, भगवान् का ही मूर्त्त रूप, सगुण-साकार रूप है। हम एक-एक पेड़, पौधे, वनस्पति व जड़ी-बूटियों की ऐसे देखभाल करें जैसे भगवान् की पूजा करते हैं।
 सम्पूर्ण सृष्टि स्वयं में नियन्त्रित, मर्यादित एवं अनुशासित है। सृष्टि के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म परमाणु से लेकर बड़े-बड़े घटक या इकाईयाँ ये पूरा ब्रह्माण्ड विधाता के विधान या शाश्वत नियमों में बँधा हुआ, दिव्यता से भरा हुआ है। मुनष्य शरीर की भी एक-एक सूक्ष्म कोशिकाओं से लेकर पूरा शरीर तन्त्र सृष्टि की सबसे अद्भुत रचना है। मनुष्य के पिण्ड में भगवान् ने ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्तियों का समावेश कर दिया और सारी दिव्यता देने के साथ-साथ मनुष्य को भगवान् ने पूर्ण स्वतंत्रता भी दे दी।
यह स्वतंत्रता मनुष्येतर जीवों व अन्य सृष्टि के घटकों को प्राप्त नहीं है। वे सब भगवान् के विधान में ही बंधे हुए, उसकी उपासना करते हुए पूर्ण क्रियाशील हैं।
जिस मनुष्य को भगवान् ने अपरिमित ज्ञान, संवेदना व सामर्थ्य से युक्त कर पूर्ण स्वाधीनता दी, वह अपनी अविवेकपूर्ण मांगों, इच्छाओं, महत्त्वाकांक्षाओं या तृष्णाओं को पूरा करने के लिए सृष्टि में विध्वंस करने में लगा और पिछले 200 करोड़ वर्षों में प्रकृति का जो विनाश नहीं हुआ, वह मात्र लगभग पिछले 200 वर्षों में हो गया। आज जंगल, जड़ी-बूटियाँ, पेड़-पौधों का विनाश करने से लेकर मनुष्य ने अपने क्षणिक सुखों के लिए एक लम्बे विनाश को आमन्त्रण दे दिया है। आज पूरी प्रकृति में मनुष्य ने अपनी दुष्कृति से विकृति पैदा कर दी है। हवा, पानी, मिट्टी, आकाश व अन्नाद्रि जीवन के सारे मूल तत्त्वों को विकृत कर दिया है। यदि अभी हम नहीं संभले तो आने वाली मनुष्य जाति के लिए हम घनघोर संकट के बीज बोकर जायेंगे।
आइए प्रकृति माता को बचाइये। यह प्रकृति भगवान् की उत्कृष्ट कृति है। यह भगवान् की रचना, भगवान् का ही प्रत्यक्ष रूप यह प्रकृति, भगवान् का ही मूर्त्त रूप, सगुण-साकार रूप है। हम एक-एक पेड़, पौधे, वनस्पति व जड़ी-बूटियों की ऐसे देखभाल करें जैसे भगवान् की पूजा करते हैं।
भगवान् के, प्रकृति माता के व ऋषियों के हम पर अनन्त उपकार हैं। प्रकृति के उपकारों से उऋण होने के लिए संगठन के पाँचों इकाईयों से जुड़े योग साधक भाई-बहन इसे एक सघन अभियान के रूप में चलायें, यही प्रकृति के प्रति, भगवान् व ऋषियों के प्रति हमारी पूजा, सेवा व आराधना है कि हम अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण कर प्रकृति का संरक्षण करें।
 

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