जीवन के दिव्य सूत्र
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स्वामी रामदेव
हमारा जीवन खेत की तरह है, हम जैसे ज्ञान-विचार, शिक्षा व संस्कार के बीज इसमें डालेंगे, वैसी ही हमारी भावनाएँ तथा वैसी ही मारी वाणी, व्यवहार व आचरण हो जायेगा।
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जीवन भगवान् का हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार, देन या सौगात है। मनुष्य धरती पर भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना है। मनुष्य जीवन में हम विश्व की सर्वश्रेष्ठ ऊचाईयों को पा सकते हैं।
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मनुष्य में बीज रूप में समस्त शुभ-अशुभ ज्ञान, संवेदनाएँ एवं सामर्थ्य समाहित हैं। हमें ईश्वरीय प्रेरणाओं, ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वरीय दिव्य संवेदनाओं एवं ईश्वरीय दिव्य सामर्थ्य से युक्त होकर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में पूर्ण सफलता, समृद्धि व पूर्ण सुख शान्ति को प्राप्त करना है।
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हमारा जीवन खेत की तरह है, हम जैसे ज्ञान-विचार, शिक्षा व संस्कार के बीज इसमें डालेंगे, वैसी ही हमारी भावनाएँ तथा वैसी ही मारी वाणी, व्यवहार व आचरण हो जायेगा।
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योग एवं वैदिक शिक्षा से हमारा ज्ञान शुद्धतम हो जाता है ज्ञान के शुद्ध होने से हमारी भावनाएँ या इच्छाएँ भी स्वत: ही शुद्ध श्रेष्ठ सात्विक हो जाती हैं तथा जैसी हमारी भावना या इच्छा होती है, वैसा ही हमारा कर्म, प्रवृत्ति, सेवा पुरुषार्थ, वाणी,व्यवहार व आचरण होता है।
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हमारे जीवन के तीन बड़े पहलू हैं, एक है हमारा ज्ञान-शिक्षा, दीक्षा, समझ, संस्कार, विचारधारा, मान्यता, अवधारणा, सिद्धान्त, नीति, आदर्श, निष्कर्ष निर्णय, लक्ष्य, स्वभाव व अभ्यास। इस ज्ञान के स्त्रोत हैं-गुरू, शास्त्र, परम्परा, परिवार, परिवेश समाज, प्रकृति, अनुभव एवं हमारी अन्त: प्रज्ञा व अन्त: प्रेरणा। दूसरा पहलू है हमारी भावनाएँ या ईच्छाएं। जैसा हमारा ज्ञान पक्ष होता है, वैसी ही भावनाओं, इच्छाओं, कामनाओं, संवदेनाओं, महत्वा कांक्षाओं, संकल्पों, अपेक्षाओं का जन्म होता है अर्थात् वैसी ही हमारी चाह हो जाती है। ये इच्छाएँ सत्ता, सम्पत्ति, सम्मान, सम्बन्ध व वैषयिक सुखों पर मुख्यत: केन्द्रित होती हैं। दिव्य ज्ञान, यथार्थ-सत्य ज्ञान होने पर व्यक्ति कामना मुक्त, अकाम, पूर्णकाम, निष्काम, आत्मकाम, ब्रह्मकाम या दिव्य काम हो जाता है।
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हमारे विविध क्षेत्रों में ज्ञान के आधार पर ही हमारे विचार एवं विभिन्न विचार धाराएं बन जाती हैं। आज विश्व का सबसे बड़ा संकट है आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक क्षेत्र में दोष पूर्ण, अज्ञान व अविवेक पूर्ण विचार धाराएं एवं उन्हीं विचारों-विचारधाओं एवं सिद्धान्तों के आधार पर बनाई गई नीतियाँ, विकास के मॉडल, योजनाएँ एवं परियोजनाएँ।
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भारतीय ऋषिज्ञान परम्परा या सत्य सनातन वैदिक ज्ञान परम्परा को छोड़कर पाश्चिमात्य ज्ञान परम्परा एवं उसी के अनुरूप नीतियों से ही अनीति, अन्याय व शोषण का बोलबाला हो रहा है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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