महिलाओं के लिए अति उपयोगी 15 औषधीय पौधे
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डॉ. चंचला तिवारी, डॉ. मीनाक्षी
पतंजलि जड़ी-बूटी अनुसंधान विभाग, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार
प्राचीनकाल से ही आयुर्वेद में वर्णित विभिन्न औषधीय पौधों का विभिन्न रोगों में बहुत लाभकारी प्रभाव पाया गया है। अच्छे स्वास्थ्य की शुरुआत घर से होती है एवं घर पूर्ण रूप से महिलाओं पर निर्भर होता है, अगर नारी स्वस्थ है तो घर का प्रत्येक सदस्य स्वस्थ होगा, ऐसी संकल्पना है। प्रस्तुत लेख में महिलाओं में होने वाली विभिन्न बीमारियों जैसे कि श्वेत-प्रदर, रक्त प्रदर, गर्भाशय की सूजन, कटि-शूल आदि अनेक रोगों की चिकित्सा को दृष्टि में रखकर आयुर्वेद में वर्णित कुछ महत्वपूर्ण औषधीय पौधों तथा उनसे मिलने वाले लाभों का वर्णन निम्रलिखित है।
1. अशोक [Saraca asoca (Roxb.) Willd.]
इस पौधे की छाल, बीज एवं पुष्प महिलाओं के स्वास्थ्य दृष्टि से रक्त प्रदर/अत्यधिक मासिक स्राव, कष्टार्तव (आर्तव चक्र के दौरान होने वाली वेदना), अवसाद, रक्तार्श (खूनी बावासीर), गर्भाशय अर्बुद (रसौली), श्वेत प्रदर आदि में बहुत ही लाभकारी है। यह एक प्रकार से गर्भाशय अवसादक एवं बल्य के रूप में कार्य करता है, इसलिए अनियमित मासिक चक्र एवं गर्भस्राव को रोकने में भी अशोक उपयोगी है।
2. निर्गुण्डी [Vitex negundo L.]
यह आर्तवजनन में सहायक है, इसलिए अनियमित मासिक-चक्र को नियमित करता है। महिलाओं में स्रावित होने वाले प्रोलेक्टीन हॉर्मोन के स्तर को भी यह नियंत्रित करता है। जिसके बढ़ने से अवसाद एवं अनियमित मासिक धर्म जैसे विकार हो जाते हैं। निर्गुण्डी महिलाओं के FSH (Follicle Stimulating Hormone) को नियंत्रित करने के कारण गर्भाधान (Conception) में भी बहुत लाभकारी है। महिलाओं में पाये जाने वाले अवसाद जन्य रोग-पेशीशूल (Fibromyalgia) में भी यह अत्यधिक लाभ पहुँचाता है।
3. घृतकुमारी [(Aloe vera (L.) Burm.f.)]
वर्तमान में यह महिलाओं के बीच सौंदर्य एवं स्वास्थ्य सवंर्धन की दृष्टि से काफी प्रचलित है। इसके पत्रों का प्रयोग कई सौंदर्य प्रसाधनों एवं औषधि निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है। यह पेशी शैथिल्कारक होता है, इसलिए पेशीयों में बढ़े हुए तनाव को कम कर मांस-पेशीयों की होने वाली पीड़ा में लाभ पहुँचाता है। यह सूजन को भी कम करता है। इसमें विटामिन A, B1, B2, B6, B12, C एवं E पाया जाता है, जिसके सेवन से क्षमता की वृद्धि होती है। इसमें विभिन्न खनिज जैसे कि कॉपर, लौह, कैल्शियम आदि भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो कि महिलाओं के लिए अति आवश्यक तत्व हैं। यह गर्भाशय के लिए सर्वोत्तम पोषक तत्व है। यह वयरोधक भी है, अन्य विभिन्न रोगों जैसे कि अनियमित मासिक-धर्म, कष्टार्तव, रजोनिवृत्ति (Menopause) संबंधी विकारों में लाभकारी होने के कारण इसको महिलाओं का मित्र माना जाता है।
4. मुस्तक [Cyperus rotundus L.]
सामान्य तौर पर मुस्तक की जड़ों को प्रयोग में लाया जाता है। यह मासिक धर्म संबंधी कई विकारों जैसे कि कष्टार्तव, मासिक धर्म के पहले होने वाली चिड़चिड़ाहट (Premenstrual Syndrome) एवं शरीर के कई भागों में सूजन आदि में लाभकारी है। यह जीवाणुरोधी, स्तन्यवर्धक एवं आर्तवजनन गुण युक्त है। यकृत की निष्क्रियता, अजीर्ण, प्रवाहिका, भूख में कमी, पुराण ज्वर व मुहासे आदि रोगों में मुस्तक लाभकारी है।
5. हींग [Ferula assa-foetida L.]
इसका प्रयोग भारतीय व्यंजनों में स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ औषधि के रूप में भी विख्यात है। यह महिलाओं में स्रवित होने वाले प्रोजेस्टीरोन (Progesterone) के स्तर को बढ़ाता है, जो कि मासिक धर्म की नियमितता के लिए लाभकारी है। यह काष्टर्तव, अनियमित-मासिक स्राव, श्वेत प्रदर, शूल, थकान, अवसाद, शोथ, व्योषापस्मार में बहुत ही उपयोगी है। यह गर्भस्रावी, सूक्ष्मजीवाणुरोधी, अपस्मार रोधी, आध्मान रोधी होता है। यह स्थौल्यता नाशक भी है और ट्राईग्लीसराईड्स के प्रति सक्रिय होता है। यह रतिज विकारों [Sexually Transmitted Diseases (STDs)] एवं संक्रमित जननांग रोगों में लाभ पहुँचाता है। इसमें वायुअनुलोमक, तनाव शामक, कफनिस्सारक, अवसादक आदि गुण पाए जाते हैं।
6. दुधी [Taraxacum officinale (L.) Weber ex F.H.Wigg.]
यह औषधि शरीर में संचित अतिरिक्त जलीय तत्वों को बाहर निकालने व मासिक स्राव से पूर्व होने वाले भारीपन में लाभकारी होती है। यह शरीर से यकृतगत विषाक्त पदार्थों को भी बाहर निकालता है। पामा, कर्कटार्बुद, उच्च रक्त चाप, शूल, रक्त की कमी, कब्ज, यकृतशोथ, अजीर्ण, अवसाद, मधुमेह आदि में भी दुधी उपयोगी है।
7. शतावर [Asparagus racemosus Willd.]
सामान्यत: शतावर के मूल का प्रयोग किया जाता है। यह एक रासायनिक बल्य, पोषक, मूत्रल, उद्वेष्टरोधी, आर्तव जनक, अम्लतारोधी द्रव्य है। स्त्री जननांग संबंधी लगभग सभी समस्याओं में लाभकारी है। यह बंध्यत्व, यौन निष्क्रियता, गर्भस्राव, रजोनिवृत्ति संबंधी विकारों, श्वेत प्रदर, योनि शोथ आदि रोगों में लाभकारी है। यह महिलाओं में स्रावित होने वाले कई सारे हॉर्मोन्स को संतुलित करता है, रक्त का शोधन करता है, व्याधि क्षमता को बढ़ाता है एवं पाचन तंत्र को भी नियंत्रित करता है। यह वाजीकारक, पोषक, प्रशामक, शीतकारक, पिच्छिल गुणों से युक्त होता है। प्रसवोपरांत इसके नियमित सेवन से दुग्धोत्पत्ति सही मात्रा में होती है। यह कष्टार्तव एवं गर्भाशयगत अर्बुद में भी अधिक उपयोगी है।

8. धातकी [Woodfordia fruticosa (L.) Kurz]
धातकी का उपयोग भी आयुर्वेद चिकित्सा में काफी प्रचलित है। प्राय: इसके पुष्प प्रयोग में लाए जाते हैं। यह कषाय, स्तंभक, शोधक, गर्भाशय अवसादक, जीवाणुरोधी, ज्वरघ्न एवं विषनाशक गुण युक्त होता है। कफ-पित्तज विकारों, कुष्ठ, दाह, त्वक् विकार, अतिसार, प्रवाहिका, ज्वर, शिरशूल, बवासीर, आंतरिक रक्तस्राव, यकृत विकार, व्रण सहित महिलाओं के कुछ मुख्य रोगों जैसे कि श्वेत प्रदर, रक्तप्रदर आदि में बहुत ही उपयोगी है। यह गर्भाधान में सहायक है। इसमें बंध्यत्व रोधी, श्वेत प्रदर रोधी सक्रिय गुण भी पाए जाते हैं।
9. मेथी [Trigonella foenum-graecum L.]
मेथी को स्त्रियों का सौंदर्य बढ़ाने वाली बेहतरीन जड़ी-बूटी माना गया है। यह कामोत्तेजना को बढ़ाता है, रक्त शर्करा के स्तर को संतुलित करता है तथा इसमें कोलीन पाई जाती है, जो कि बुद्धि वर्धक है एवं चिंतन की क्षमता बढ़ाती है। मेथी प्रमेह की चिकित्सा में अत्यधिक उपयोगी है एवं स्तन कैंसर का निवारक है। हॉर्मोन्स के स्तर को संतुलित करने की क्षमता होने के कारण मासिक धर्म से पूर्व एवं रजोनिवृत्ति से संबन्धित होने वाले लक्षणों को नियंत्रित करने में यह सहायक होती है, स्तन की नवीन कोशिकाओं की वृद्धि, आकार एवं उनके परिपूर्ण विकास में मेथी का प्रयोग लाभकारी है। इसके अतिरिक्त मेथी में पाए जाने वाले ऑक्सीकरण रोधी तत्व बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करते हैं। मेथी में पाए जाने वाले प्रोटीन एवं निकोटिनिक एसिड बालों को मजबूत बनाते हैं एवं रोमकूपों के पुनर्निर्माण में सहायक होते हैं। मेथी के चूर्ण का मुखलेप झाइयों, कालेधब्बों में लाभकारी है। मोटापे में भी मेथी लाभकारी है।
10. लोध्र [Symplocos racemosa Roxb.]
लोध्र कषाय, शीत वीर्य, शोथरोधी एवं ग्राही गुणों से युक्त होता है। अतिसार, प्रवाहिका, रक्तार्श, रक्तस्राव, श्वेतप्रदर, रक्तविकार, त्वचाविकार तथा अन्य गर्भाशयगत रोगों की चिकित्सा में लोध्र मुख्यत: प्रयोग होता है। लोध्र त्वचा रोगों जैसे कि युवानपीड़िका, लालिमा एवं शोथ में प्रयोग होता है। इसका लेप सौंदर्यवर्धक है।
11. त्रिपत्र [Trifolium pratense L.] [Red Clover]
इसका प्रयोग प्रजनन क्षमता में एवं असंतुलित हॉर्मोन्स की चिकित्सा, मासिक धर्म से पूर्व होने वाले लक्षणों डिम्बोत्सर्जन/स्त्री जननकोशिका उत्सर्जन, अल्प मासिक धर्म एवं कष्टार्तव में लाभकरी होता है। इसका क्षारीय प्रभाव योनि के क्कद्ध को संतुलित करके गर्भधारण करने में सहायक होता है। इसका प्रयोग अस्थिसुषिरता एवं रजोनिवृत्ति से संबंधित होने वाले लक्षणों में भी लाभकारी होता है। साथ ही यह स्तनरोगों एवं गर्भाशयगत रोगों में लाभकारी है।

12. यष्ठीमधु (मुलेठी) [Glycyrrhiza glabra L.]
यष्ठीमधु मूलसत्त काली यष्टीमधु कैंडी (खांड/मिश्री) में सुस्वाद के रूप में प्रयोग होता है। इसका सक्रिय संघटक/तत्व ग्लाइसिरिजन मसालों के रूप में लोकप्रिय है, क्योंकि यह इक्षु-शर्करा (सुक्रोज) से 50 गुना अधिक मीठा होता है। इस जड़ी-बूटी के औषधीय प्रयोगों के अंतर्गत इसे कास सिरप के समान प्रयोग किया जाता है एवं यह ग्रहणी व्रण में भी लाभकारी है। जब हॉर्मोन्स की बात आती है, यष्टीमधु सम्भवत: जड़ी-बूटियों में सबसे सशक्त है। यष्टीमधु के एस्ट्रोजेनिक यौगिक अवसाद की चिकित्सा में लाभ पहुँचाते हैं। एड्रीनल हॉर्मोन्स जैसे कि कार्टिसॉल के विघटन को रोक कर यह तनाव के स्तर को कम करता है, शरीर के मुख्य तनाव रोधी हॉर्मोन एवं टेस्टोस्टेरोन के स्तर को बढ़ाता है। पोलिसिस्टिक ओवेरियन सिण्ड्रॉम जिसमें टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ाता है, जिससे बन्ध्यत्व, शरीर भार की वृद्धि, मुखगत: रोग एवं युवानपीड़िका जैसी चिकित्सा में प्रयोग होता है।
13. अश्वगंधा [Withania somnifera (L.) Dunal]
अश्वगंधा महिलाओं के लिए एक चमत्कारी औषधि के रूप में है। यह बलकारक है एवं जीवनीय शक्ति तथा व्याधिक्षमत्व को बढ़ाता है। इसका प्रयोग थाईरॉइड में अत्यन्त लाभकारी है। यह स्मृतिवर्धक एवं मेध्य है। यह पेशी शिथलीकरण, मोटापा एवं तनाव को कम करने में सहायक होता है। यह सामान्य दुर्बलता एवं कामशक्ति वर्धक है। यह अनिद्रा एवं अन्य मानसिक रोगों में भी प्रयुक्त होता है।
14. हल्दी [Curcuma longa L.]
हल्दी मसाले के रूप में एवं शोथरोधी गुण के कारण लोकप्रिय है। इसमें पाए जाने वाला कुरक्यूमिन तत्व कैंसर रोधी होता है। यह जीवाणुरोधी तथा कवकरोधी है। यह विविध प्रकार के संधिशोथ में उपयोगी है। यह सौंदर्यवर्धक है। इसका प्रयोग जीर्ण स्तन कैंसर में भी लाभकारी है। इसका प्रयोग अजीर्ण, अतिसार एवं उदरशूल एवं त्वचागत रोगों में लाभकारी है।
15. गुडूची (गिलोय) [Tinospora sinensis (Lour.) Merr.]
यह रसायन की तरह कार्य करता है एवं बुढ़ापे के उत्क्रमण को कम करता है। यह शोथरोधी, ज्वररोधी एवं मूत्रल है। इसका प्रयोग मूत्रविकारों, सामान्य दुर्बलता तथा अजीर्ण में होता है। यह स्तन्यशोधक एवं मेध्य है। इसका प्रयोग खालित्य (बालों का झड़ना) तथा पालित्य (बालों का असमय सफेद होना) में होता है। गिलोय संधिवात एवं आमवात में भी लाभकारी है।

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01 Mar 2025 17:58:05
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