श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य... कर्म ही आनन्द
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आनन्द प्राप्ति की इच्छा प्रत्येक प्राणी के अन्तस् में विद्यमान होती हुई उनके कर्म का, सतत पुरुषार्थ की प्रेरणा का असज्र उत्स है। किन्तु आश्चर्य! सब कुछ करते हुए भी आनन्द को खोजता ही रह जाता है मानव।
हर एक कर्म जिसे उसके उत्साह, आनन्द, गौरव, शौर्य का प्रतीक बनना (होना) चाहिए था, छोड़ जाता है उसे और भी अधिक श्रान्त, क्लान्त और आकुल। आखिर कारण क्या है इसका? निवारण क्या है इसका? मानव चेतना की इस व्यापक समस्या को बहुत पहले ही जान कर भगवान् श्री कृष्ण हमारे प्रश्नों का समाधान अपने ज्ञानमय व्याख्यान ग्रन्थ गीता में प्रस्तुत करते हैं-
ध्यायतो विषयान् पुंसस्सङ्गस्तेषुपजायते। सङ्गात् सञ्जायते कामस्ततो क्रोधोऽभिजायते।
क्रोधात् भवति सम्मोह: सम्मोहात् स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।
योगस्थ कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्धयसिद्धयो समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
कर्म जो कि वस्तुत: आनन्द का अद्भुत स्रोत है, उसे विषाक्त कर देने वाली व्यक्ति मात्र की एक ही वस्तु है, और वह है सङ्ग (आसक्ति)। सङ्गदोष से दूषित चित्त वाला व्यक्ति कामनाओं का शिकार होकर क्रोधित होता है। तदुपरान्त सम्मोहित होता है और अपने लक्ष्य को विस्मृत कर अन्तत: विनाश को प्राप्त हो जाता है। यह सरणी है उसके निम्र गमन की।
इसके विपरीत यदि कर्म को सचेतन सङ्गल्प के साथ पूर्ण किया जाए तो हमारे छोटे से छोटे कर्म भी हमारे लक्ष्य में समर्पित होते हुए हमारे अन्दर आनन्द के एक-एक पुष्प को खिलाते जाते हैं और ऐसे दिव्यकर्मी योगी का जीवन भर जाता है। पुण्य कर्मों की पावन मधुर सुगन्ध जो उसके अन्तर्तम को उसके आस-पास के परिवेश को सदा ही सुवासित रखती है। कर्म के इस आनन्द को पाने के लि उस दिव्यकर्मी योगी को अन्य किसी परिणाम, फल विशेष की चाह नहीं अपितु उसके लिए कर्म ही पर्याप्त है, कर्म ही आनन्द है। अतएव प्रभु श्रीकृष्ण ऐसे दिव्यकर्मी योगी को सर्वोच्च स्थान प्रदान करते हुए मानव मात्र का आह्वान कर रहे हैं, वही हो जाने के लिए, सर्वदा आनन्दित रहने के लिए-
तपस्विभ्योऽधिको योगी, ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक:।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन।।
सहजता मर्म
हर श्वास कर्म
अस्तित्व दिव्य हो गया।
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01 Mar 2025 17:58:05
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