21वीं शताब्दी में आयुर्वेद की पुनर्स्थापना का संकल्प पतंजलि अनुसंधान संस्थान के माध्यम से
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डॉ. रुपेश शर्मा, योग संदेश विभाग
कोरोना महामारी में कोरोनिल एक चमत्कारी औषधी के रूप में सामने आई थी, तब दवा माफियाओं द्वारा इस पर काफी प्रश्नचिन्ह लगाए गए थे। लेकिन ऋषियों द्वारा प्रदत्त आयुर्वेद के वैज्ञानिक अनुसंधान के पूरक पतंजलि अनुसंधान संस्थान (पी.आर.आई.) द्वारा प्रामाणिक अन्वेशण के आधार पर निर्मित इस महा-औषधि को डब्ल्यू.एच.ओ. (W.H.O) द्वारा सर्टिफिकेशन दिया गया है। पूज्य स्वामी जी महाराज तथा श्रद्धेय आचार्य जी महाराज की उपस्थिति में इसकी औपचारिक घोषणा दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन तथा केन्द्रीय सडक़ परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री श्री नितिन गडकरी ने की। इस अवसर पर पूज्य स्वामी जी महाराज तथा उपस्थित महानुभावों ने अपने वक्तव्य दिए जो संक्षेप में प्रस्तुत हैं-
पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज
परमाध्यक्ष-पतंजलि योगपीठ
आज एक एतिहासिक दिन है। आज विरक्त शिरोमणि शिवाजी महाराज जी की जयंती है और योग-आयुर्वेद की वैश्विक प्रतिष्ठा का दिन है। कोरोनिल एविडेंस बेस्ड मेडिसिन है, इसे एविडेंस बेस्ड के तौर पर रिसर्च बेस्ड ट्रीटमेंट बेस्ड के तौर पर देखा जाना चाहिए। आयुर्वेद एक चिकित्सा पद्धति के साथ जीवन पद्धति भी है जिसे एविडेंस बेस्ड रिसर्च व एक्सपीरियंस मेडिसिन के रूप में देखने की आवश्यकता है। आयुर्वेद हमारी सनातन पद्धति से जुड़ा हुआ है जिसकी वैश्विक स्तर पर अपनी एक प्रतिष्ठा है। आज का दिन आयुर्वेद की प्रतिष्ठा के रूप में देखा जाएगा। पतंजलि ने आज का दिन चुना इसलिए क्योंकि आज छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती का भी दिन है। और आज के दिन भारत वैश्विक स्तर पर हेल्थ के क्षेत्र में, चिकित्सा के क्षेत्र में पूरे विश्व का नेतृत्व करने की दशा में आ गया है। भारत के आत्मनिर्भर से लेकर सम्पूर्ण विश्व के प्रत्येक नागरिक आत्मनिर्भर बने, आज योग और आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिकों के द्वारा प्रमाणिक किया गया है। साथ ही आयुर्वेद को वैज्ञानिक प्रमाणिकताओं के साथ प्रतिष्ठित करने के लिए आज हम यहाँ उपस्थित हुए हैं। पतंजलि ने अभी तक सैकड़ों रिसर्च पेपर्स प्रकाशित किए हैं। अलग-अलग रोगों के बारे में अलग-अलग प्रकार के ड्रग्स को इन्वेंट किया है और अलग-अलग प्रकार की जो हमारी योग की क्रियाएँ हैं उनको भी वैज्ञानिक तथ्यों के साथ में हमने पूरी दुनिया के सामने रखा है। जो पहले से स्थापित तथ्य थे उनके विपरीत डाईबिटीज़ के मरीजों को नॉन डायबिटिक करके, लाईफ स्टाइल डिज़ीज चाहे वह बी.पी. हो, थाईराइड हो, ओबेसिटी हो, नॉन कम्युनिकेबल डिज़ीज के साथ कोरोना जैसी कम्युनिकेबल डिजीज़ पर भी हमने एक प्रमाणिक कार्य किया है। इसमें मॉडर्न मेडिसिन साइंस के द्वारा स्थापित जितने भी प्रोटोकॉल हैं और उसके जो पैरामीटर्स हैं, उनके मापदण्डों के अनुरूप हमने सबसे पहले डेंगु के खिलाफ डेंगुनिल बनाया। फिर हमने कोरोना के संदर्भ में कोरोनिल बनाया। कोरोना के संदर्भ में अभी तक वल्र्ड के टॉप इम्पेक्ट वाले रिसर्च जनरल में 9 रिसर्च पेपर्स पब्लिश हो चुके हैं तथा 16 रिसर्च पेपर्स अभी पाइप लाइन में हैं। इसी प्रकार से अलग-अलग बीमारियों के बारे में सैकड़ों रिसर्च पेपर हम पहले ही प्रकाशित कर चुके हैं और जब हमने पिछली बार यहाँ रिसर्च के संदर्भ में कॉन्फ्रेंस की थी तब भी हमने रिसर्च फाउण्डेशन के जितने भी हमारे रिसर्च पब्लिकेशन हैं, वो सारे हमने आपको उपलब्ध करवाए थे। इसके बारे में हम पहले ही बता चुके हैं और अब जो इसके बाद दूसरे रिसर्च पेपर्स जो पब्लिश हो चुके हैं, उन सबको कंपाईल करके यह दूसरा एक पूरा महाग्रंथ बन गया है। जैसे हमारे वेदों की 20 हजार एक सौ ऋचाएँ हैं, ऐसे ही यह वो सारे रिसर्च पेपर्स हैं जिसका पूरा डाटा उपलब्ध है। अब आज का जो संदर्भ है मैं उस पर आना चाहता हूँ। जब हमने कोरोनिल, श्वासारी, अणु तेल के द्वारा लाखों लोगों को जीवन दान देने का कार्य किया, तब बहुत लोगों ने प्रश्न उठाए थे कि इसके साइंटिफिक पैरामीटर्स को फोलो किया है या नहीं। कुछ लोगों के मन में ऐसा रहता है कि रिसर्च का काम तो केवल विदेश में ही हो सकता है। वो भी आयुर्वेद में रिसर्च का काम कोई करे तो लोग शक की निगाहों से देखते हैं। वो शक के सारे बादल हमने अब छाँट दिए हैं।
कोरोना के पूरे प्रोटोकॉल को फोलो करते हुए और किस तरह से कोरोनिल, श्वसारी, अणु तेल द्वारा हमने लाखों लोगों की जान बचाई और करोड़ों लोगों के भीतर हौंसला जगाया। कोरोना के संदर्भ में मैं किसी भी पैथी के संघर्ष को प्रतिष्ठापित नहीं करना चाहता। भारत में सबसे ज्यादा रिकवरी रेट है, सबसे कम डेथ रेट है और करोड़ों लोग संक्रमित होने के बाद स्वस्थ हुए हैं। उसमें जहाँ एक ओर आधुनिक विज्ञान (Modern Science) की भूमिका है तो दूसरी ओर बहुत बड़ी भूमिका प्राचीन विज्ञान (Ancient Science) की भी है, योग-आयुर्वेद की भी है। करोड़ों लोग अपने घर बैठे भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम, सूर्य नमस्कार की प्रैक्टिस कर रहे थे। करोड़ों लोग अपने घरों में काढ़ा पी रहे थे, कसाय पी रहे थे, क्वाथ पी रहे थे और उससे एक नया कीर्तिमान बना है। मैं आज सबसे पहले उन्हीं दो बुकलेट के विमोचन के लिए यहाँ पर आदरणीय हर्षवर्धन जी को आदरणीय श्री गडकरी जी को निवेदन करता हूँ कि इसके विमोचन के लिए अनुग्रह को स्वीकार करें।
इस देश के लिए गौरव की बात है कि पहली बार वैश्विक स्तर पर हमारे देश के डॉक्टर व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) की गवॄनग काउंसिल के चेयरमैन के तौर पर बहुत बड़ा उत्तरदायित्व निभाने का सौभाग्य मिला है। भारत W.H.O. का नेतृत्व (Lead) कर रहा है। हमारे बहुत ही गरिमापूर्ण व्यक्तित्व जिन्होंने स्वास्थ्य को हमेशा सेवा माना है, मंत्री बनने के बाद भी रोगियों की सेवा करने को अपना सौभाग्य समझते हैं, ऐसे चिकित्सक व स्वास्थ्य मंत्री और स्वभाव से करुणाशील व दूरदर्शी डॉ. हर्षवर्धन जी की अध्यक्षता में हमारे मुख्य अतिथि श्री नितिन गडकरी जी जिनके साथ हमारा अनन्य आत्मीय प्रेम है, आज इस बड़े महत्वपूर्ण क्षण के साक्षी बन रहे हैं। श्री गडकरी जी की कार्यशैली बहुत कुशल है। सडक़ परिवहन का उनका कार्य पूरे देश में दिखाई दे रहा है। उनकी अध्यक्षता में देश में विश्वस्तरीय लाखों किलोमीटर की सडक़ों का जाल बिछा दिया गया है। इनके भीतर देश के निर्माण की बड़ी सोच है, नेतृत्व का सामर्थ्य है। आज हम इन दोनों विभूतियों का पतंजलि योगपीठ व पतंजलि अनुसंधान संस्थान की ओर से अभिनंदन करते हैं। श्रद्धेय आचार्य जी, पतंजलि अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अनुराग वार्ष्णेय का अभिनंदन करते हुए सर्वप्रथम बुकलेट विमोचन का कार्य सम्पन्न करते हैं।
कोरोना को लेकर जो साइंटिफिक प्रोटोकॉल हैं उन्हें फोलो करते हुए हमने जो औषधि बनाई हैं उसके सारे रिसर्च पेपर्स हमारे पास हैं, 9 रिसर्च पेपर्स इन्टरनेशनल जनरल में प्रकाशित हो चुके हैं तथा 16 अभी पाईप लाईन में हैं।
आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस के तीन बड़े मकसद हैं। योग, आयुर्वेद को वैज्ञानिक मापदण्डों के साथ साइंटिफिक रिसर्च इनोवेशन इन्वेंशन के जितने भी प्रोटोकॉल हैं उन्हें सभी को फोलो करते हुए एविडेंस बेस्ड मेडिसिन ट्रीटमेंट के तौर पर योग-आयुर्वेद की वैश्विक प्रतिष्ठा, एक सस्टेनेबल हेल्थ व योग-आयुर्वेद भारतीय जीवन पद्धति पूरे विश्व में प्रतिस्थापित हो और आत्मनिर्भर भारत से लेकर विश्व का प्रत्येक व्यक्ति स्वास्थ्य के संदर्भ में आत्मनिर्भर बने। इस संकल्प के साथ आज हमने कोरोना से लेकर अलग-अलग बीमारियों पर रिसर्च बेस्ड ट्रीटमेंट, रिसर्च बेस्ड जो पूरा का पूरा यह हमारी प्राचीन ज्ञान (Ancient Knowledge) था उसकी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए पुरुषार्थ किया है। आज से 4 साल पहले जब मोदी जी पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट का उद्घाटन करने के लिए पधारे थे तो उन्होंने कहा था कि मैं योग, आयुर्वेद को एविडेंस बेस्ड प्रैक्टिस के तौर पर मेडिसिन के तौर पर देखता हूँ। उसके कई चरण हमने पूरे कर दिए हैं। उस पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट का शिलान्यास, उसकी आधारशिला हमारे श्री हर्षवर्धन जी ने रखी थी। तो हम उनका भी कृतज्ञ हृदय से अभिनन्दन करते हैं। जिसकी संस्थान की नींव उन्होंने डाली थी, आज उसके ऊपर एक बहुत बड़ा अनुसंधान का भवन बनकर तैयार हो गया है जिसमें एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक कार्य किया जा रहा है। हमारे अभिभावक के रूप उपस्थित दोनों मंत्रियों से कहूँगा कि वह अपने आशीषों से अनुग्रहित करें।
श्री नितिन गडकरी
माननीय सडक़ परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री, भारत सरकार
मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि हमारे योग विज्ञान, आयुर्वेद में रिसर्च करने के लिए पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी ने,
पूज्य स्वामी जी ने एक बहुत बड़ा अनुसंधान संस्थान की स्थापना की है। यह बात जरूर है कि हम लोग कहते हैं कि नॉलेज भविष्य की बहुत बड़ी ताकत है। मैं अक्सर दो बातें दोहराता हूँ- एक innovation interpinalship science technology research speed and successful practices name it at knowledge and conversion of knowledge into wealth, यह हमारे देश का भविष्य है। इसलिए जो हमारी पूर्व परम्परा है, जो हमारा आयुर्वेद है, योग विज्ञान है, यह पूरे विश्व को दिशा दे सकता है। शायद हिन्दुस्तान में रहकर इस बात का महत्व समझ में नहीं आता है पर आप कभी जर्मनी में जाओगे और जर्मन व्यक्ति से बात करेंगे तो वहाँ आयुर्वेद के बारे में हमसे भी आगे उनकी रिसर्च को देखेंगे। तब हमें पता चल जाता है कि विश्व में इसलिए स्वाभाविक रूप से अनुसंधान करना और वैज्ञानिक तरीके से उसको एक अप्रुवल करने के बाद उसका सर्टिफिकेशन करना, यह भी बहुत आवश्यक होता है। और इसलिए पूज्य स्वामी जी के प्रति हम सभी का आदर है, सम्मान है, प्रेम है कि एक समय हमारे रोजमर्रा के जीवन में जो चीजों का हम प्रयोग कर रहे थे, जिसकी रायल्टी विदेश में जा रही थी, उसके अच्छे विकल्प के रूप में उन प्रोडक्ट को तैयार करके उन्होंने हमारे स्वदेशी के विचारों पर आधारित आधुनिक उत्पादनों को देश-विदेश की जनता में लोकप्रिय किया और उस अनुभूति से लोगों का विश्वास भी आयुर्वेद विज्ञान पर बढ़ा। एक प्रकार से पूरे विश्व में हमारी भारतीय संस्कृति, इतिहास, विरासत, आयुर्वेद, योग, विज्ञान इससे यशस्वी एम्बेस्डर के रूप में हम आदरणीय स्वामी जी को देखते हैं। इसके कारण आज पूरे विश्व में एक चेतना भी प्रकट हुई है। हमारा अलग-अलग प्रकार का योगासन हो, योग विज्ञान हो, प्राणायाम हो, कपालभाति हो। आज पूरे विश्व में इसका अनुकरण कर रहे हैं और एक बात सच है कि चमत्कार के बगैर कोई नमस्कार नहीं करता। जब इन सब बातों की अनुभूति लोगों में आई तब उन्होंने उन बातों को स्वीकार किया है और हमारी यह जो पूर्व परम्परागत हमारे आयुर्विज्ञान में रिसर्च करने के लिए मैं विशेष रूप से आचार्य बालकृष्ण जी को धन्यवाद दूंगा। आयुर्वेद से जुड़ी कोरोनिल में 300 से अधिक वैज्ञानिकों का योगदान है। जब मैंने आचार्य बालकृष्ण जी को नजदीक से देखा तो किसी भी चीज का सफल अध्ययन करना आपका व्यक्तित्व है और मैं तो मैनेजमेंट का विद्यार्थी हूँ। प्रबोधन, प्रशिक्षण, रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट इन तीनों सूत्रों पर हमारी संरचना है। प्रबोधन का कार्य पूज्य स्वामी जी करते हैं। प्रशिक्षण का कार्य भी करते ही हैं और आचार्य बालकृष्ण जी रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट, इसके लिए उन्होंने विशेष रूप से स्वयं को समर्पित किया है। यह जो सब वैज्ञानिक हैं, इनका उपयोग करके लगातार इन्टरनेशनल स्टैंडर्ड के वैज्ञानिक लेबोरेट्री की स्थापना करना, उसके साथ हर चीज जिसके बारे में हम दावा कर रहे हैं कि इसका यह परिणाम है उसका वैज्ञानिक रिपोर्ट वो भी उन्होंने वर्ल्ड के जनरल में यह सब पब्लिकेशन पहुँचाए हुए हैं। रिसर्च एण्ड डवलपमेंट का कार्य करते हैं। इसके लिए उन्होंने विशेष रूप से एक टीम रखी हुई है और स्वयं को भी इसमें समर्पित किया हुआ है। और मुझे लगता है कि जब आयुर्वेद से निर्मित दवाईयों का प्रमाणिकरण होगा और वैज्ञानिक लैबोरेट्री के द्वारा तब जो निष्कर्ष निकालेंगे उसके ऊपर कोई चर्चा भी नहीं कर सकता, कोई विवाद भी नहीं हो सकता और इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात जिसके लिए मैं पूज्य स्वामी जी को धन्यवाद दूंगा कि अभी तक हम आयुर्वेद में यह दवाई लोग ले लिया करते थे क्योंकि विश्वास था, फायदा भी होता था पर अब इसका वैज्ञानिक मूल्यांकन एनालाइसिस करके उसके रिसर्च पेपर के साथ उसका प्रजेंटेशन, यह दुनिया के सामने करने का काम भी इन्होंने किया है और इसके लिए किसी भी चीज के बारे में हम कहेंगे कि यह इस विषय पर इसका सबसे अच्छा परिणाम होगा। रिसर्च पेपर के द्वारा हमारे वैज्ञानिक लेबोरेट्री के द्वारा उसके प्रयोगों के द्वारा यह प्रमाणिक करने के कारण इसकी विश्वसनीयता काफी बड़े प्रमाण में बढ़ेगी। हमारे देश में एलोपैथिक है, आयुर्वेदिक है, होम्योपैथी है, यूनानी भी है और इनमें लगातार रिसर्च करना समय की आवश्यकता है। मैंने चार-पांच दिन पहले अपने घर पर एक मीटिंग बुलाई थी और उसमें डॉ. हर्षवर्धन जी के मार्गदर्शन में काम करने वाले अनेक वैज्ञानिक प्रयोगशाला के प्रमुख थे और मीटिंग का विषय था लिथियम आयन बैटरी की विश्व में आने वाले 10 साल में भारत को सुखी समृद्ध करना। पैट्रोल, डीजल के पर्याय के रूप में हम इलेक्ट्रिक व्हिकल, इलेक्ट्रिक बाईक, इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा, इलेक्ट्रिक बस, इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर, वो भी अब हो गया। यह हम कैसे तैयार कर सकते हैं। और यह भारतीय वैज्ञानिक उनके रिसर्च के आधार पर हम कैसे काम कर सकते हैं। तब मुझे पहली बार पता चला कि लिथियम आयन बैटरी का 81 प्रतिशत पार्ट हिन्दुस्तान में तैयार होता है और मैं उन सब वैज्ञानिकों के सामने मैंने एजेन्डा रखा कि दो साल के अन्दर पैट्रोल की कार, डीजल की कार, पैट्रोल की बाईक, स्कूटर और उसके साथ इलेक्ट्रिक स्कूटर, बाईक, कार, इलेक्ट्रिक बस दो साल के अन्दर दोनों की कीमतें समान होनी चाहिए और जब यह बात मैंने उनसे कही तो उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से होगा और हमारे देश में वैज्ञानिकों की कोई कमी नहीं है और उनको सपोर्ट करने के लिए उन्हें फैसिलिटी देने के लिए उनके पीछे खड़े रहने की आवश्यकता है। आज आचार्य बालकृष्ण जी के रूप में और पूज्य स्वामी जी के रूप में इस अनुसंधान संस्थान में 300 वैज्ञानिक रात-दिन कार्य कर रहे हैं और उनके पीछे पतंजलि का गुडविल तो है ही पर आचार्य बालकृष्ण जी का, पूज्य स्वामी जी का दोनों का आशीर्वाद और मार्गदर्शन जिसके कारण उनकी और ताकत बढ़ी है और उसके ऊपर जो अनुसंधान हुआ है, उसके आधार पर आज का कार्यक्रम हो रहा है। मैं इस अनुसंधान के लिए देश की जनता को इसका फायदा तो होगा ही पर यह वैज्ञानिक रूप से यह कार्य करने के लिए पूज्य स्वामी जी को और आचार्य जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ। उनका अभिनंदन करता हूँ और मुझे खुशी है कि अब सब बातों का वैज्ञानिक आधार लेकर वो जनता के सामने आए हैं तो निश्चित रूप से लोगों का भी विश्वास इसके ऊपर और अच्छे तरीके से बढ़ेगा और हमारे स्वास्थ्य के बारे में एक जो यह नई दिशा पतंजलि ने विशेष रूप से दी है। इसके लिए मैं उनके प्रति आभार भी व्यक्त करता हूँ, धन्यवाद भी देता हूँ और इसी प्रकार का अनुसंधान कार्य जो इन्टरनेशनल स्टैंडर्ड रिसर्च के बराबरी का हो और Already है। और इसमें आगे ऐसी ही बढ़ोतरी होती रहे ताकि हमारी यह अनुसंधान संस्थान केवल देश का ही नहीं, विदेश में बैठे हुए अनेक लोगों के बारे में भी दिशा निर्देशन दे सकता है। ऐसा कार्य आगे भी भविष्य में होगा, ऐसा विश्वास व्यक्त करते हुए पूज्य स्वामी जी को अभिवादन करते हुए आचार्य बालकृष्ण जी का भी अभिनंदन, धन्यवाद और जो 300 वैज्ञानिक हैं, डॉ. अनुराग जी जिसमें काम कर रहे हैं, उनके सब साथियों को भी मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, धन्यवाद, नमस्कार।
पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज
परमाध्यक्ष-पतंजलि योगपीठ
प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान सम्मत उस पर अनुसंधान करते हुए यह कोरोना की औषधी का भी क्लिनिकल कंट्रोल ट्रॉयल हमने निम्स से प्रारम्भ किया। इसलिए हम डॉ. तौमर और निम्स का भी कृतज्ञतापूर्वक अभिनंदन करते हैं कि हमको पहला एक क्लिनिकल कंट्रोल ट्रॉयल करने का एक अवसर उन्होंने हमें प्रदान किया और कोरोनिल, श्वासारी, अणु तेल से यह यात्रा शुरू हुई। डेंगुनिल, पीड़ानिल से लेकर फैटी लीवर, लीवर सिरोसिस और हेपेटाइटिस जैसे रोगों के संदर्भ में अभी तक स्थापित मान्यता यह थी कि एक बार किसी को हेपेटाइटिस-ए, बी, सी हो गया तो नेगेटिव नहीं होता। उसको भी हमने लिवोग्रिट, लीवामृत से नेगेटिव करके दिखाया। डॉ. सरीन से 2-3 बार मिला हूँ, हमारे भारत के लीवर के बहुत बड़े एशिया के माने हुए डॉक्टर हैं। उन्होंने कहा कि स्वामी जी हमने अपनी लाईफ में यह नहीं देखा था कि यह नेगेटिव भी हो जाता है और मैंने सामान्य लोगों से लेकर आर्मी में ब्रिगेडियर और जनरल से लेकर डॉक्टर सबसे पहले हमने हेपेटाइटिस का पेशेंट डॉ. भारती, रामकृष्ण मीशन का ठीक किया था आज से 25 साल पहले। लेकिन उस समय हमारे पास सैकड़ों, करोड़ों रुपए खर्च करके कोई रिसर्च सेंटर बना दें, 300 से ज्यादा वैज्ञानिकों को रखें, करोड़ों रुपए हम उनको सैलरी भी दें, फैसिलिटी प्रोवाइड करा सकें, सैल एण्ड ट्रॉयल से लेकर एनिमल ट्रॉयल से लेकर, ह्यूमन ट्रॉयल तक जो ड्रग डिस्कवरी का एक पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर हमारे पास नहीं था। आदरणीय डॉ. हर्षवर्धन जी व गडकरी जी जिन्हें हमने थोड़ी देर के लिए ही आमंत्रित किया है, उनके प्रस्थान के उपरांत आपको पूरा यह ड्रग डिस्कवरी का पूरा यह जो साइकिल है इसमें इन-विट्रो से लेकर के, इन-वीवो से लेकर के ह्यूमन ट्रॉयल तक का प्री-क्लिनिकल, पोस्ट क्लिनिकल ट्रॉयल, सबका डाटा जो इस बुक में भी दिया है, उसके संदर्भ में आपको दिग्दर्शन श्रद्धेय आचार्य जी करेंगे। यह पूरा अनुसंधान जिसमें कोरोनिल एक औषधि है, मैंने कहा डेंगुनिल से लेकर के पीड़ानिल, आर्थोग्रिट से लेकर के लीवोग्रिट, लीवामृत, कार्डियोग्रिट, सिस्टोग्रिट पूरी एक लम्बी सिरीज है। आज पूरे इस अनुसंधान के कार्य को आप सबके बीच रखते हुए मुझे गौरव हो रहा है। वहीं हमारे बीच बैठे श्री गडकरी जी जो पतंजलि योगपीठ की स्थापना से लेकर आज तक हमें निरंतर एक अभिभावक की तरह आशीर्वाद देते रहे हैं, सदा इस प्रकार का प्रेम मिलता रहे और हमारे देश के स्वास्थ्य मंत्री जी हमारे बीच में हैं। हम गौरव अनुभव कर रहे हैं इस कार्य को उनका आशीर्वाद, उनका मार्गदर्शन प्राप्त है। मैं डब्लू.एच.ओ. के गवर्निंग कमेटी के जो चेयरमैन हैं, हमारे भारत के स्वास्थ्य मंत्री हैं से लेकर के एक दृष्टि सम्पन्न एक शील सम्पन्न मंत्री हैं, ऐसे डॉ. हर्षवर्धन जी को बहुत ही हर्ष व आनन्द के साथ आमंत्रित करता हूँ, वह भी अपने आशीष से हमें अनुग्रहित करें।
डॉ. हर्षवर्धन जी
माननीय स्वास्थ्य मंत्री, भारत सरकार
आज से लगभग 27 साल पहले जब मुझे दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कार्य करने का मौका मिला था, जितना भी आयुर्वेद के बारे में पढ़ा है, लिखा है, समझा है, उसके कारण उसकी प्रतिष्ठा को सारे संसार में मॉर्डन सांटिफिक तरीके से पुनस्र्थापन करने का एक स्वपन हमेशा मन में रहा है। उसका कारण यह है कि हम सब जानते हैं कि आयुर्वेद का सारा ज्ञान बहुत कुछ अथर्ववेद में समाहित है। चरक, सुश्रुत संहिता में जो ज्ञान था उसको यह सब जानकारियाँ जो अन्तर्राष्ट्रीय रिकगनाइज्ड डाटा है उसमें विद्यमान हैं या समाहित है। छठीं शताब्दी में इसको चायनीज भाषा में ट्रांसलेट किया है, नवीं शताब्दी में इसको पर्शियन अरेबिक भाषा में ट्रांसलेट किया गया। 12वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी के मध्य में यूरोपियन भाषा में अनुवाद किया गया था। भारत का निश्चित रूप से दुर्भाग्य रहा कि ब्रिटिश काल में जो अपना ट्रेडिशनल इण्डियन मेडिशनल सिस्टम था इसको सारी दुनिया में रिकगनाइज होना था, इसका प्रचार होना चाहिए था, उस प्रकार का प्रोत्साहन नहीं दिया गया और उसको इस प्रकार का प्रोत्साहन देने के लिए भारत को स्वतंत्र प्राप्ति का इंतजार करना पड़ा। इन सब बातों का मैंने गहराई से अध्ययन किया था इसलिए दिल्ली में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में एक सेंटर स्थापित किया जिसका नाम ‘दिल्ली रिसर्च सेंटर फॉर मॉर्डनाइज प्रमोशन ऑफ आयुर्वेदा’और इसके प्रमुख थे एम्स के फार्मोकोलॉजी विभागप्रमुख प्रो. जे.एन. शर्मा। जिस प्रकार के विषयों की चर्चा आज यहाँ हो रही है जिसके बारे में पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने काम किया है, वह सारा काम और आयुर्वेद से जुड़ी हुई जिस भी प्रकार की जानकारी सारे देश में जिस भी माध्यम से प्राप्त हो सकती है उसका सारा काम एक स्थान पर इकट्ठा डिजिटली स्थापित किया जाए, इसका सारा काम ‘दिल्ली रिसर्च सेंटर फॉर मॉर्डनाइज प्रमोशन ऑफ आयुर्वेदा’का था लेकिन दुर्भाग्य से 1998 में हमारी सरकार चली गई और जो सबसिक्वेंट सरकारें थी, उन्होंने इस विषय की गहराई, गंभीरता, सात्विकता को समझने का प्रयास नहीं किया। थोड़े ही समय के बाद प्रो. जे.एन. शर्मा के देहान्त के बाद वो सेंटर जिस भाव से बना था, उसका लक्ष्य ही परिवर्तित किया गया। 1999 में मुझे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने आर्गेनाइजेशन में साऊथ इस्ट एशिया के देशों के लिए काम करने के लिए निमंत्रित किया। उस समय के कुछ तथ्य आपके सामने रखना चाहता हूँ। सन 2000 में दिनांक 1, 2 व 3 नवम्बर को विश्व स्वास्थ्य संगठन का सबसे प्रतिष्ठित सेंटर जो कोवे जापान में है उस स्थान पर तीन दिन की मीटिंग हुई जिसका नाम था ‘हेल्थ एण्ड वेलफेयर सिस्टम डेवलप फॉर 21 सेन्चुरी’। इस मीटिंग में दुनिया से 125 लोगों को बुलाया गया था। भारत से भी 2 लोगों को बुलाया गया था। तीन दिन की मीटिंग में बहुत सारे डिश्कशन हुए, वहाँ पर भी एक किताब का विमोचन किया गया था और वो कोवे रिकमेंडेशन के नाम से जानी जाती है। उसमें 21वीं शताब्दी में भारत या दुनिया के अंदर जो हेल्थ एण्ड वेलफेयर सिस्टम डेवलपमेंट है, उसके संदर्भ में जो बातें की गई उसमें से दो महत्वपूर्ण बातों का आज के परिप्रेक्ष्य में उल्लेख करना चाहता हूँ। वह दोनों बातों का स्वामी रामदेव जी से रिलिवेंस है। उस समय सन 2000 की मीटिंग के रिकमेंडेशन में कहा गया था कि अगर आने वाली 21वीं शताब्दी में भारत को या दुनिया को ‘हेल्थ फॉर ऑल’इस गोल को प्राप्त करना है तो भारत के पतंजलि योग के माध्यम से दुनिया में सबसे ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक ऊर्जा प्रतिपादित होगी। उसकी एक रिकमेंडेशन यह थी और दूसरी एक रिकमेंडेशन यह थी कि भारत या भारत के समान देशों की पारंपरिक औषधियों को फोकस कर प्रिवेंटिव हेल्थ, प्रोमोटिव हेल्थ, पोजिटिव हेल्थ पर है। 21वीं शताब्दी में सारी दुनिया को बहुत महत्वपूर्ण रोल अदा करना पड़ेगा। ये उस रिकमेंडेशन का अंग था। कोवे का जो रिसर्च सेंटर है, W.H.O. का यह वह स्थान है जो W.H.O. के लिए भी पॉलिसी बनाने में इंस्ट्रीमिंग करता है और इन पॉलिसिस को W.H.O. अपने मेम्बर्स के माध्यम से स्टेट को देता है। आज जो आयुर्वेद है, इसके संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन में भी सब प्रकार की मान्यता है, सब प्रकार का रिकगनाइजेशन है। और अगर मैं दुनिया के देशों की गिनती गिनना शुरू करूं तो प्रमुख देश जो मुझे कम से कम ध्यान में आते हैं- आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कोलम्बिया, क्यूबा, मोरिशस, इसी तरीके से हमारे पड़ोस में जो देश है जैसे- बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, चीन, हंगरी आदि ऐसे बहुत सारे देश जो दुनिया के अंदर हैं, इन्होंने तो अपने भारत के आयुर्वेद सिस्टम को रेगुलर मेडिसिन सिस्टम के रूप में लागू किया है। इन्होंने इसको रिकगनाइजेशन किया है। यानि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेद का रिकगनेशन है और अभी आप जानते हैं, थोड़े ही समय पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन के डॉयरेक्टर जनरल डॉ. टैट्रोस ने भारत के प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर फोन किया और कहा कि सारी दुनिया का आयुर्वेद का सबसे बड़ा सेंटर जो कम्प्रहेंसिव नॉलिज बेस्ड, रिसर्च बेस्ड या आयुर्वेद से जुड़ी जो भी कार्य हैं वो सारी दुनिया को प्रतिपादित हो सके, वो हम भारत के अंदर प्रतिस्थापित करना चाहते हैं। आज विश्व स्वास्थ्य संगठन में विश्व स्तर पर काम प्रारंभ हुआ है कि दुनिया का ग्लोबल सेंटर आयुर्वेद के लिए भारत के अंदर स्थापित हो। एक बात का उल्लेख मैं और करना चाहता हूँ कि साउथ इस्ट एशिया रिजन का विश्व स्वास्थ्य संगठन का 10 साल से ज्यादा समय तक का दिल्ली में जो हमारा रिजनल ऑफिस है उसके रिजनल डॉयरेक्टर डॉ. हूटॉन इण्डोनेशियन थे, वर्तमान में दुर्भाग्यवश उनका देहांत हो गया। मैं आपको 90 के दशक की बात बता रहा हूँ। उस समय मैं दिल्ली का स्वास्थ्य मंत्री था और वे स्वयं मॉर्डन मेडिसिन सिस्टम के डॉक्टर थे। लेकिन उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन से रिटार्यमेंट लिया उससे पहले उन्होंने एक साल लगाकर बहुत महत्वपूर्ण किताब लिखी ‘रॉल ऑफ आयुर्वेदा फॉर द मॉर्डन वर्ल्ड’। उसमें उन्होंने आयुर्वेद के विषय में अपनी जानकारी तथा वर्किंग विद W.H.O. एण्ड वर्किंग विद हेल्थकेयर सिस्टम फॉर होल वर्ल्ड के संदर्भ में उन्होंने जानकारी दी तथा अपने अनुभव साझा किए। आयुर्वेद पर कोई बायस होकर प्रश्नचिन्ह लगा सकता है लेकिन आज आयुर्वेद की जानकारी वेदों से लेकर सभी स्थानों पर उपलब्ध है। यह विकिपीडिया पर भी उपलब्ध है। 1906 में एक ‘हिन्दु सुप्रियोरिटी’नाम की किताब हरविलास शारदा जी ने। उसमें जो मेडिसिन का अध्याय है उसमें बहुत सारी जानकारियाँ हैं, और वो सारी जानकारियाँ वे हैं जो आयुर्वेद के बारे में या भारत के पारंपरिक औषधियों के बारे में विदेशियों ने कहा है। इसलिए यहाँ जितने भी लोग उपस्थित हैं उनको मैं यह कहना चाहता हूँ कि आयुर्वेद के संदर्भ में जो उपयोगिता है, प्रामाणिकता है, भविष्य में हेल्थकेयर सिस्टम में, रोगी को निरोगी बनाने में जिस प्रकार से सहायता कर सकता है इसके बारे में कोई संशय नहीं होना चाहिए। मुझे इस बात की खुशी है कि 2014 में जब मुझे थोड़े समय के लिए स्वास्थ्य मंत्री बनने का मौका मिला था तो उस समय महत्वपूर्ण काम- पहला पतंजलि अनुसंधान संस्थान का शिलान्यास करने का अवसर मुझे हरिद्वार जाकर मिला तथा बाद में प्रधानमंत्री जी ने देश को समर्पित किया था। उस समय पूज्य स्वामी जी ने कहा था कि माननीय प्रधानमंत्री जी का जो सपना है कि मॉर्डन सांइटिफिक तरीके से आयुर्वेद को दुनिया में प्रस्तुत करने का कार्य इस तरह के संस्थान को करना चाहिए। और उसी साल मोदी जी ने आयुष का एक मंत्रालय भारत में स्थापित किया। उसी 6 महीने में जब मुझे स्वास्थ्य मंत्री बनने का मौका मिला तो हमने भारत में पहला नेशनल आयुष मिशन स्थापित किया। यानि इस परिप्रेक्ष्य में स्वामी जी का जो सपना है, वही सरकार का भी है। और आज इस बात की खुशी है कि कोविड काल के अन्दर कोविड के लिए प्रिवेंशन और ट्रीटमेंट की दृष्टि से जहाँ एक तरफ पूज्य स्वामी जी के संस्थान ने पूरा रिसर्च किया और प्रेजेंटेशन भी आगे करेंगे। हमारे सामने सबसे बड़ा चैलेंज था हमारे देश के सामने कि हम अच्छे हैं यह हम मानते हैं, दुनिया भी दबे स्वर में मानती है परन्तु स्वीकार नहीं करती है। लेकिन जब हम इसे मॉर्डन साइंटिफिक टूल के साथ प्रस्तुत करेंगे तो इसको कोई चैलेंज नहीं कर सकता। आचार्य बालकृष्ण जी महाराज बहुत विद्वान् हैं, मैंने उनकी आयुर्वेद की कई पुस्तकें पढ़ी हैं। कोविड काल में आयुष मंत्रालय ने भारत में 140 स्थान पर 109 प्रकार की स्टडीज की जिसमें 39 स्टडीज प्रोफाइल एक्सस पर तथा 32 स्टडीज ट्रीटमेंट पर कीं। प्री-क्लिनिकल स्टडीज तथा ओब्जर्वेशनल स्टडीज सबके मैंने जो परिणाम देखे, हर प्रकार के इनकरेजिंग व पॉजिटीव परिणाम सामने आए। कोविड काल में आयुर्वेद देश व दुनिया में और ज्यादा स्थापित हुआ है, आयुर्वेद को और किसी बड़े सर्टिफिकेशन की जरूरत नहीं है। इसको टेक्रिकल तरीके से अध्ययन करेंगे तो भारत में 30,000 करोड़ रुपए की आयुर्वेद की अर्थव्यवस्था है। जिसमें प्रामाणिक डाटा के अनुसार प्रतिवर्ष 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होती थी। लेकिन ये अभी प्री-कोविड इरा का डाटा है। लेकिन अभी पोस्ट कोविड इरा में हमारे भारत की आयुर्वेद की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ रेट जो पहले 15 से 20 प्रतिशत था वह अब 50 से 90 प्रतिशत हो गया है। यह अपने आप में इस बात का सूचक और परिचायक है कि भारत व दुनिया के लोगों ने किस प्रकार आयुर्वेद को स्वीकार किया है। एक्सपोर्ट व फोरन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट की दृष्टि से आयुर्वेद के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियाँ हुई हैं। आचार्य बालकृष्ण जी ने स्वामी रामदेव जी के मार्गदर्शन में जो रिसर्च किया है, उसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ। मार्डन व साइंटिफिक तरीके से आयुर्वेद को पूरी दुनिया में पुनस्र्थापित करने का जो यज्ञ है उसमें जितनी ज्यादा से ज्यादा आहुतियाँ डाली जाएगी वो भारत के लिए तो गौरव का विषय होगा, लेकिन पूरी मानवता, देश व दुनिया के लोगों के स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसको विश्वकल्याण का एक बहुत बड़ा प्रकल्प मानकर इस कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए।
पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज
परमाध्यक्ष-पतंजलि योगपीठ
मैं अभी अंत में दो-तीन वाक्य कहना चाहूँगा। मैंने बहुत से भारत के स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ संवाद किया, उनके साथ बैठा हूँ। आज भारत के स्वास्थ्य मंत्री के साथ बैठकर मुझे गौरव अनुभव हो रहा है। नहीं तो ज्यादातर ऐसा होता था स्वास्थ्य मंत्री ऐलोपैथी के बारे में बात करते थे। हमारी ऐलोपैथिक से भी सिंपेथी है। लाइव सेविंग ड्रग्स के तौर पर बहुत से आयाम हैं। चिकित्सा में कोई कम्पिटीशन नहीं है, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। वो इसलिए जरूरी है कि जहाँ समाज में हारमनी जरूरी है, वहीं यहाँ पैथियों में भी हारमनी जरूरी है। अपने पर गर्व होना चाहिए। अपनी निजता से नफरत क्यों? और कोरोना के प्रीवेंशन के लिए कोरोना के ट्रीटमेंट के लिए जो आफट्री इफैक्ट हैं, लोंग कोरोना है, उसे डील करने के लिए योग-आयुर्वेद से लेकर के श्वासारी, कोरोनिल, अणु तेल से लेकर के जो हमारी पद्धतियाँ हैं, उसको हम निरंतरता के साथ आगे बढ़ाएँ तो मुझे लगता है कि थोड़े दिनों के बाद ये सारे कोरोना का रोना धोना, इसके बादल भी छँट जाएँगे और एक नए स्वस्थ विश्व में प्रवेश कर पाएँगे। कुछ लोग दवाई बनाते हैं व्यापार के लिए, हमने व्यापार के लिए कोई दवाई नहीं बनाई। उपचार की भावना से दवाई बनाई है। पिछले 30 वर्षों का डाटा कहूँ आपसे तो यदि बाजार से उनके मूल्य का जो डिफ्रैंस है, उसको आप वैल्युएट करें, उसे कैल्कुलेट करें तो 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के कम मूल्य की औषधियाँ बाजार में यदि मोती पिष्टी 300 रुपए की मिलती है तो हमने 30 रुपए की दी। वहीं शंख प्रदा, मुक्ता शुक्ति और अविपत्तिकर चूर्ण और तमाम तरह के रस, रसायन, भस्म, पिष्टी, अवलेह, पाक वो हमने 5 से 10 गुना हमसे ज्यादा की बेच रहे थे। हमारे विशुद्ध रूप से इस देश को बाजार मानकर नहीं, परिवार मानकर के, व्यापार मानकर नहीं उपचार व उपकार की भावना से यह कार्य किया और अभी तो डब्लू.एच.ओ. के गवर्निंग काउन्सिल के चेयरमैन हैं, मेरा तो सपना है कि आने वाले 30 सालों में योग-आयुर्वेद में इस कदर कार्य करें कि डब्लू.एच.ओ. का हेड ऑफिस इण्डिया में बन जाए। वो सपना है हमारा एक तरफ आत्मनिर्भर भारत का मिशन चल रहा है तो वर्ल्ड बैंक, आई.एम.एफ. तथा यू.एन.ओ. भी भारत में क्यों नहीं हो सकता। उसका हेड ऑफिस क्यों नहीं हो सकता। दुनिया बदलती है वक्त के साथ परिप्रेक्ष्य बदलते हैं। आज हम बहुत गौरवान्वित हैं कि दो हमारे केन्द्रीय मंत्रियों ने आकर यह केवल एक संस्था की बात नहीं है, किसी ब्राण्ड की बात नहीं है, यह हमारी संस्कारों की बात है, हमारी परंपराओं की विरासत की बात है। उस योग-आयुर्वेद की विरासत को अपना आशीर्वाद देकर के, उसका समर्थन देकर के हमें अनुग्रहित किया। मैं एक बार पुन: कृतज्ञित हृदय से इनका आभार व्यक्त करता हूँ।
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01 Mar 2025 17:58:05
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