आततायी अंग्रेज़ों के विरुद्ध भारतीय वीरता की अभिव्यक्तियाँ धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र की वीरता
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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
आततायी अंग्रेज़़ों के विरुद्ध भारतीय वीरता अपने सभी पारम्परिक रूपों में व्यक्त हुई। हमारे शास्त्रों में वीरता के अनेक रूप वर्णित हैं, जिनमें मुख्य है- धर्मवीर, युद्धवीर और दानवीर। इन सभी रूपों में हम भारतीय वीरता को अभिव्यक्त देखते हैं।
वीरता का संस्कृति से अभिन्न सम्बन्ध है। ईसाई संस्कृति में मूक रहकर कष्ट-सहन (साइलेंट सफरिंग) और दूसरों को छल-बल; क्रूरता एवं प्रलोभन से स्वपंथ-दीक्षा (प्रॉसिलिटाइजेशन) को ही बहादुरी माना जाता है। इस्लाम में गैर-मुस्लिम को बलपूर्वक मुसलमान बनाने को वीरता माना जाता है। भारत में वीरता का दायरा बहुत बड़ा है और वह सार्वभौम नियमों से परिभाषित है। श्रेष्ठ लक्ष्य एवं कार्य के लिए युद्ध, त्याग, दान, जीवन-समर्पण आदि को ही यहाँ वीरता कहा जाता है। बड़े-बड़े योद्धा, दानी तथा तपस्वी यहाँ वीर कहे जाते हैं।
यह मानना कि ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है, एकदेशीय है, किसी एक स्थान में सीमित है, और किसी एकमात्र या कतिपय विशिष्ट मध्यस्थों द्वारा ही बोलता और सुनता है, भारतीय परम्परा में इसे मूढ़ता एवं अंधविश्वास कहा जाता है और इसके लिए मरना-मारना भयंकर तामसिक तथा मूढ़ कर्म कहा जाता है। परन्तु मध्यकाल में यूरोप में तथा अरब क्षेत्र में ‘मेरे ईश्वर’और ‘तेरे ईश्वर’, ‘मेरी पूजा’और ‘तेरी पूजा’का भेद मरने-मारने का आधार बन गया। इस भयंकर तमस को ही प्रकाश कहा गया। कई शताब्दियाँ इसी अंधविश्वास में डूब गईं।
मध्यकालीन ईसाई अंधविश्वासों से मुक्ति का विचार विभिन्न यूरोपीय देशों में चीन और भारत के सम्पर्क में आने के बाद फैला। क्योंकि पादरियों ने वहाँ प्रचार कर रखा था कि उनके अपने क्षेत्र से बाहर विश्व में केवल अज्ञान और अंधेरा है तथा समुद्र में तटीय क्षेत्रों से ज़्यादा आगे जाने पर प्रेतात्माएँ नाविकों को अतल खड्ड में खींच लेती हैं। परन्तु जब मार्को पोलो चीन और भारत की यात्रा कर वहाँ के राजाओं से उपहार लेकर वापस लौटा और अपने यहाँ के धनी लोगों को बताया कि चीन और भारत में बहुत विशाल राज्य हैं, अतिविकसित सभ्यता है, पुस्तकें हैं, कागज हैं, लेखन है, लिपियाँ हैं, अत्यन्त उन्नत अस्त्र और शस्त्र हैं, बारूदी आग्नेयास्त्र हैं, प्रामाणिक भौगोलिक नक्शे हैं, घडिय़ाँ हैं और चिकित्सा की अत्यन्त उन्नत विधियाँ हैं, तो मार्को पोलो के संस्मरणों की हस्तलिखित प्रतिलिपियों के जरिये यूरोप के धनियों में यह वार्ता फैलने लगी और एक के बाद एक देशों में ‘रेनेसां’तथा ‘एनलाइटेनमेन्ट' की प्रवृत्तियाँ उभरने लगीं। धनियों से किस्से-कहानियों के रूप में छनकर उनके श्रमिकों और अधीनस्थों तक बात गयी और कई दुस्साहसी लोग समुद्री यात्रा के लिए छोटी-छोटी डोंगियों में चल पड़े।
इनमें से कुछ लोगों ने पादरियों के मुँह से सुन रखा था कि बाइबिल में वर्णित इण्डी नामक कोई अत्यन्त समृद्ध देश है, जहाँ पहुँचने पर सोना ही सोना मिलेगा और अन्तहीन समृद्धि हाथ लगेगी। इसलिए अपने-अपने जागीरदारों से अनुमति लेकर, क्योंकि वहाँ बिना अनुमति के दूर जाना किसी के लिए सम्भव नहीं था, प्राणदण्ड का खतरा था, इसलिए अनुमति लेकर, कई लोग जोखिम उठाकर चले, जिनमें मरने वालों की संख्या बहुत बड़ी है और कहीं पहुँचने वालों की संख्या बहुत थोड़ी। इन थोड़े से लोगों में से ही कोलम्बस और वास्कोडिगामा हैं, जो क्रमश: स्वदेशी अमेरिकी और भारतीय नाविकों तथा व्यापारियों की कृपा से किसी प्रकार समुद्र तट पर पहुँच सके।
इन दुस्साहसी नाविकों को तब तक मुख्यत: लूटपाट और समुद्री डकैती का ही अभ्यास था। इसलिए समुद्र में भी डच, फ्रेंच, पुर्तगीज और अंग्रेज़ आपस में भयंकर खूनखराबा करते रहे। इस डकैती और लूट को ही वे लोग व्यापार कहते थे।
18वीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में कटते-मरते किसी प्रकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भूखे-कंगले तथा बर्बर कर्मचारियों को मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता क्षेत्रों में व्यापार की अनुमति प्राप्त हो गयी। इसके पहले 17वीं शताब्दी ईस्वी में सूरत में डचों, पुर्तगालियों और अंग्रेज़ों की जमकर आपसी मारकाट हुई। छल-बल से अंग्रेज़ों की कम्पनी को क्षेत्रीय जागीरदार से सूरत में व्यापार करने की आज्ञा मिल गयी। कुछ समय बाद टॉमस रो ने जहाँगीर की चाटुकारिता करके कम्पनी के लिए कुछ और व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं। जगह-जगह वे लोग पत्थरों के छोटे-छोटे दुर्ग बनाने लगे, जैसा वे यूरोप में करते थे। भारतीय राजाओं के भव्य महलों के सम्मुख ये तथाकथित दुर्ग झोंपडिय़ों जैसे ही थे। इसी प्रकार समस्त संसार में व्यापार कर रहे भारत के अत्यन्त समृद्ध हज़ारों व्यापारियों के लिए ये लोग मामूली फुटकरिया सौदागर ही नजऱ आते थे। इसलिए किसी ने भी इनकी ओर ध्यान नहीं दिया।
शुरू में ये लोग आपस में ही अपने-अपने छोटे-छोटे कारखानों को एक दूसरे को दहेज और रिश्वत में देते-लेते रहते थे। ऐसे ही मुम्बई का एक छोटा-सा टापू ब्रिटिश राजकुमार को पुर्तगाली राजकुमारी से विवाह के उपलक्ष्य में दहेज में मिला, जहाँ उन्होंने पत्थर का एक किला बनाया। राजकुमार ने कम्पनी को यह किला किराये पर दे दिया। इसी को केन्द्र बनाकर कम्पनी वालों ने मुम्बई में एक कस्बे जैसा बनाया।
17वीं शताब्दी ईस्वी के अन्त में कम्पनी के एक नौकर जाब चार्नाक ने बंगाल के एक नवाब की कामवासना और धनवासना की पूर्ति करते हुए गंगा के तट पर दलदली इलाके में सूतानाटी और कोलकाता गाँवों को पुरस्कार में पाकर बसाया, क्योंकि समृद्ध शहरी इलाके में बड़े व्यापारी तथा नागरिक इन्हें रहने नहीं देते थे। धनी लोगों और जागीरदारों की चाटुकारिता कर 18वीं शताब्दी ईस्वी में ये धीरे-धीरे बढऩे लगे और प्लासी में दो नवाबों की आपसी लड़़ाई में एक के पक्ष में छल-बल और दगाबाजी से सेना की दल-बदली का प्रयोग कर उससे व्यापार के लिए कई अधिकार प्राप्त कर लिये। चूँकि तब तक इंग्लैण्ड में कोई समृद्ध और सुदृढ़ राज्य नहीं था, इसलिए इन लोगों को इंग्लैण्ड की ही तरह भारत में भी जिस इलाके में फैल जाएँ, उसे अपनी जागीर प्रचारित करने की हास्यास्पद आदत बनी रही। जबकि तथ्य यह था कि ये भारत के किसी भी इलाके के जागीरदार 18वीं शताब्दी ईस्वी में नहीं थे। 18वीं शताब्दी ईस्वी तक इनकी हैसियत भारत में वैसी ही थी, जैसी धोबी या नाई या घरेलू सेवकों के समूह किसी इलाके को आपस में मेरा-तेरा कहकर खुश रहते और लड़ते-भिड़ते रहते हैं।
अलग-अलग नवाबों की सुरक्षा के लिए वचन देकर भारतीय सिपाहियों की टुकडिय़ों की भरती की इन्होंने अनुमति ले ली और सिक्योरिटी कम्पनियाँ चलाने लगे। जिसे वे स्वयं पहले ‘सेपॉय’कहते थे, बाद में उसे ही छलपूर्वक ये अपनी भारतीय ‘आर्मी’ बताते रहे। भारत के राजाओं और नवाबों के बारे में जासूसी और भेदनीति से काफी जानकारियाँ इकट्ठीकर ये कभी इस और कभी उस राजा या नवाब का पक्ष लेकर पुरस्कार पाते रहे तथा बाद में नवाबों की अनुमति से और कई जगह हिन्दू राजाओं की भी अनुमति से अपनी रक्षा टुकडिय़ों में भारतीयों की भरती करते रहे। इस बीच भारत में बहुत बड़े इलाकों में मराठों का शासन रहा और दक्षिण में हिन्दू विजयनगर साम्राज्य तथा कतिपय नवाबों की जागीरें रहीं और उत्तर में बड़े इलाके में राजपूतों और सिखों का शासन रहा। परन्तु कम्पनी कुछ ऐसा प्रचार करती रही कि मानो उसी का भारत का बड़े इलाके में प्रभुत्व है। सर्वमान्य तथ्य यह है कि 19वीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के तीन छोटे-छोटे प्रभाव-क्षेत्र थे- (1) बंगाल के कुछ गाँवों में, (2) चेन्नई के आसपास और (3) मुम्बई में। पहले उन्होंने 19वीं शती ईस्वी के आरम्भ में दिल्ली के मुगल राजा की रक्षा के लिए स्वयं को विनयपूर्वक समर्पित किया। फिर, अपनी संस्कृति की प्रेरणा के अनुसार छलपूर्वक वे स्वयं को मुगलों का ‘अभिभावक’स्वयं को प्रचारित करने लगे।
तब तक न तो ब्रिटेन आधुनिक राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) बना था और न ही भारत, इसलिए भारत के राजा-महाराजा अपनी-अपनी सीमाओं के विस्तार में दत्तचित्त थे और इसमें वे कम्पनी की सिपाही-टुकडिय़ों की सेवाएँ भी ले लेते थे, क्योंकि कम्पनी की शक्ति तब तक उन्हें एक सेवक से अधिक नहीं दिखती थी। यही कारण है कि स्वयं बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के तत्काल पहले के समय में बंगाल की मुख्य चिन्ता मुस्लिम आततायियों से हिन्दुओं की रक्षा थी और इसी के लिए संन्यासियों ने शस्त्र उठाये थे। बंकिम के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनन्दमठ’में जिस अमरगीत ‘वन्दे मातरम्’का समावेश है, वह वस्तुत: मुसलमानों से रक्षा के लिए प्रेरणा और संकल्प का गीत है। स्पष्ट है कि उस समय तक अर्थात् 19वीं शती ईस्वी के पूर्वाद्र्ध में भारतीय लोग अंग्रेज़ों को अपने लिए खतरा नहीं देख रहे थे।
परन्तु बंगाल में बहुत जल्दी अंग्रेज़ एक नयी आततायी शक्ति के रूप में दिखने लगे और इसीलिए थोड़े समय बाद उनके विषय में सजगता उभरने लगी। तब भी यदि हम बाँग्ला उपन्यासों को पढ़ें, तो हमें 19वीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ तक अंग्रेज़ों की दशा बहुत ही दीन-हीन नजऱ आती है और उनके आचरण के प्रति तो भद्रजनों में गहरा तिरस्कार ही दिखता है। परन्तु मुस्लिम अत्याचार से व्यथित चित्त के लोगों को आध्यात्मिक साधना की अल्पता के कारण आध्यात्मिक भ्रान्तियाँ हो गयीं और उन्होंने अंग्रेज़ों के आगमन को मुसलमानों के नाश के लिए भेजी गयी शक्ति समझ लिया। इसी अधकचरी आध्यात्मिक साधना में से 19वीं शताब्दी ईस्वी में ब्रह्मसमाज नामक आन्दोलन बंगाल में उभरा, जो शीघ्र ही तीन टुकड़ों में बँट गया।
इसी अवधि में भारत में स्थान-स्थान पर अनेक आध्यात्मिक विभूतियों ने आध्यात्मिक तेज का विस्तार किया। इनमें ऋषि दयानन्द का विशेष स्थान है, जिन्होंने वेदों के प्रति श्रद्धा को और व्यापक तथा गहरी बनाया।
दूसरी ओर, कतिपय आध्यात्मिक भ्रान्तियों के कारण तथा इंग्लैण्ड और यूरोप में कई शताब्दियों के अंधकार के बाद उभरे विद्या-प्रेम से विद्या-प्रेमी भारतीयों के सहज प्रभावित हो जाने के कारण और अंग्रेज़ों द्वारा बढ़-चढक़र दावा तथा दम्भ-प्रदर्शन को सहज मान लेने के कारण बंगाल के तथा कुछ अन्य इलाकों के बहुत सारे मेधावी लोग अंग्रेज़ों के प्रति आकर्षित हुए, जिसका फायदा उठाकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी बढ़ती रही और एक नमक-हराम तथा कृतघ्न समूह होने के कारण अपने संरक्षणदाताओं को ही धर्मच्युत, धर्मभ्रष्ट और धर्मान्तरित करने के पापाचार के लिए भाँति-भाँति के षडय़ंत्र रचने लगी।
वह भारत में आन्तरिक तनावों और हिन्दू-मुस्लिम टकरावों का युग था और इसीलिए कभी मराठों के विरुद्ध राजपूतों ने और कभी सिक्खों के विरुद्ध कश्मीर के डोंगरा सैनिकों ने तथा इसी प्रकार कई जगह जाटों और अन्य समूहों ने मुसलमानों से गहरे अलगाव की भावना के कारण अंग्रेज़ों को सहारा दिया। स्वयं अंग्रेज़ भी वैसे ही नीच हैं और पापी हैं, यह ज्ञान होते ही उन्हें मार भगाने के लिए भी वीरतापूर्ण अभियान छिड़ गये। परन्तु तब भी ‘नेशन स्टेट’की कोई भी बात नहीं होने के कारण राजाओं के आपसी वैमनस्य मिटे नहीं, जिसका फायदा ब्रिटिश राज्य ने उठाया और उसने अनेक भारतीय राजाओं से संधि करके 1857-58 ईस्वी में पहली बार भारत में राजकीय हस्तक्षेप किया। इसके लिए उसने भारत के छोटे-बड़े 525 राजाओं एवं नवाबों से संधियाँ कीं, जिनमें 42 बहुत बड़े राज्य थे तथा 73 मध्यम आकार के शक्तिषाली राज्य थे, शेष छोटे राज्य थे। इनमें कहीं भी अंग्रेज़ों का शासन नहीं था, कतिपय ब्रिटिश हितों की सुरक्षा का वचन अवश्य इन राजाओं ने दिया था।
01 नवम्बर, 1858 ईस्वी की रानी विक्टोरिया की घोषणा में भारतीय राजाओं से संधि की और राजाओं के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप न करते हुए केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रभाव वाले इलाकों तक स्वयं को सीमित रखने की खुली घोषणा है। उसमें विक्टोरिया ने साफ कहा है कि आज से मेरा भतीजा कर्जन ब्रिटिश क्षेत्र वाले भारत का पहला वाइसराय होगा। स्वयं ब्रिटिश अभिलेखों में उसके पहले कम्पनी के जो महाप्रबन्धक थे, उन्हें ईस्ट इण्डिया कम्पनी का ही महाप्रबन्धक (गवर्नर जनरल) कहा गया है, कहीं भी भारत का गवर्नर जनरल नहीं कहा गया है। वैसे भी सम्पूर्ण भारत का गवर्नर जनरल तो तथ्यत: अंग्रेज़ कभी था ही नहीं। पहली बार सम्पूर्ण भारत का गवर्नर जनरल कांग्रेस के सहयोग और अनुरोध से 15 अगस्त, 1947 ईस्वी को माउण्टबेटन बना है। यह तथ्य भी भारत के अधिकांश बौद्धिक (जिन्हें बौद्धिक कहना इस शब्द का अपमान है) भूल गये हैं। स्पष्ट है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी वीरों की कम्पनी नहीं थी। छोटे व्यापारियों की और मुख्यत: धोखेबाजों, लुटेरों, तस्करों और डकैतों की कम्पनी थी। इसलिए उसके समक्ष किसी भारतीय वीरता की कोई बड़ी आवश्यकता नहीं पड़ी। छल-बल से कई बार उसने भारतीय सैनिकों के एक हिस्से को अपनी सेना बताकर दूसरे हिस्से से लड़ाया तथा कई बार एक भारतीय राजा को दूसरे भारतीय राजा से लड़ाया। इसीलिए युद्ध से सम्बन्धित भारतीय वीरता का समय वस्तुत: 1857 ईस्वी में ही आया। जब यह बात खुल गयी कि कम्पनी के नमक-हराम लोग भारत के लोगों का धर्म बिगाडऩा चाहते हैं। यदि अपनी घोषणा के अनुसार कम्पनी के लोग सामान्य मानवीय आचरण करते और कृतज्ञता के भाव उनमें होते तो वे आज भी भारत में व्यापार कर रहे होते और उनमें से कई लोग भारत में बसकर सहज ही घुल-मिल गये होते। भारत के विराट इतिहास को देखते हुए इस तथ्य को भुलाना नहीं चाहिए।
1858 ईस्वी के बाद भारतीयों के समक्ष यह स्पष्ट होने लगा कि ईसाई अंग्रेज़ों के मन में खोट है और बड़ी-बड़ी बातें करते हुए ये भारत के ईसाईकरण का प्रयास कर रहे हैं। तब इन छली और प्रपंची तथा बाहरी अजनबी समूहों को भगाने का अभियान चला, परन्तु तब तक ये देष में काफी भ्रम फैला चुके थे और कई जगह भारतीयों के सहयोग से शक्तिशाली भी हो चुके थे, इसलिए इनको भगाने के अभियान में कई बार शब्द-चातुर्य का भी सहारा लेना पड़ा। 1947 ईस्वी के बाद वैसे किसी शब्द-चातुर्य को दोहराने की कोई आवश्यकता भारतीयों को अब नहीं है। इसीलिए अंग्रेज़ों को भारत का तत्कालीन शासक कहना अब गलत है। उन्हें भारत पर छल-बल से कुछ समय के लिए काबिज बाहरी अजनबी आततायी कहना ही उचित है। जो यह नहीं कह पाता, वह न तो अन्तर्राष्ट्रीय विधि का कोई ज्ञान रखता है और न ही भारतीय इतिहास परम्परा का। यहाँ इस सन्दर्भ में यह कह देना आवश्यक है कि हमने बाहरी अजनबी आततायियों को वीरता के विभिन्न स्वरूपों के प्रयोग से वापस भगाया। अत: उसके एक भाग को अब भी स्वाधीनता आन्दोलन कहना गलत है। वैसे भी संसार में कहीं भी किसी भी आन्दोलन से स्वाधीनता आज तक नहीं मिली है। स्वाधीनता सदा युद्ध से मिलती है और युद्ध के विविध रूपों के समन्वित प्रयोग से प्राप्त की जाती है। परन्तु वस्तुत: भारत कभी पराधीन था ही नहीं। उसके एक भाग पर अनेक भारतीय राजाओं के सहयोग से कुछ समय के लिए बाहरी, अजनबी, पापाचारियों का समूह अत्याचार करने में सफल रहा, केवल यही भाषा किसी भी स्वाभिमानी भारतीय को शोभा देती है। सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक राष्ट्र अपने इतिहास को इसी रूप में रखता है।
इस सन्दर्भ में यह स्पष्ट हो जाता है कि अंग्रेज़ों ने भारत में जो पापाचार किया, उसके पीछे उनके ‘रेलिजन’की प्रेरणा ही थी। अत: वह एक आध्यात्मिक विकृति से भरपूर पापाचार था, इसलिए उसका वास्तविक प्रतिकार केवल सही और सम्यक् आध्यात्मिक पुरुषार्थ ही हो सकता था। जो लोग लंदन तथा अन्य ईसाई शहरों में पढक़र इस आधारभूत तथ्य से अनजान हो गये थे, वे ही इसे देशी-विदेशी की शब्दावली में रखते रहे हैं। समस्या अंग्रेज़ों का बाहरी होना नहीं था, समस्या उनका सनातन धर्म के ज्ञान से रहित होना और ईसाइयत जैसे धर्मशून्य विचार में धँसे होना था, जिसने उन्हें कृतघ्नता, नीचता और अन्तहीन पापाचार की प्रेरणा दी। अंग्रेज़ों की आध्यात्मिक विकृति और आध्यात्मिक तमस ही चर्चा का मुख्य विषय होना चाहिए।
स्वाभाविक है कि ब्रिटिश ईसाई पापाचार के वास्तविक स्वरूप को मूलत: भारत की आध्यात्मिक विभूतियों ने ही देखा और अपनी साधना तथा सिद्धि के अनुपात में उन्होंने इसके उपचार भी सुझाये। स्वयं बंकिम ने इसे सही रूप में देखा था। बंकिम ऋषि थे और उन्होंने भारतमाता का समाधि के क्षण में साक्षात् दर्शन किया था। उन्होंने देखा था कि भारतमाता जगदम्बा का रूप विशेष हैं, इसलिए वे दैवी सत्ता हैं और परमशक्तिमान हैं। हमें उनके स्वरूप का ध्यान करना है और ज्ञानपूर्वक उस ध्यान में स्थित रहना है, तब हम अनन्त शक्ति के स्वामी होंगे और अपराजेय होंगे।
दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन लोगों को अपने अमरगीत ‘वन्दे मातरम्’में बंकिम ने ललकारा था कि ‘‘हे माँ, भला कौन तुम्हें अबला कह रहा है, तुम तो साक्षात् जगदम्बा हो, बहुबल धारिणी हो, तारिणी हो, लाखों-करोड़ों भुजाओं वाली और उन भुजाओं में शस्त्र धारण करने वाली हो, सबको सुख-शान्ति, समृद्धि और आनन्द देने वाली तथा सुजला सुफला हो, तुम्हारी हवा मलयानिल है जो सबके चित्त को शान्ति और आनन्द देती है', उनमें से ही कुछ लोग बाद में उसी जगदम्बा का रूप विशेष- भारतमाता- को दीन-दुखी, बन्दिनी, अंग-भंग की हुई आदि जाने क्या-क्या बताने लगे और बताते रहते हैं। स्पष्ट है कि ये लोग आध्यात्मिक चेतना से रहित हैं। यदि भारत के सत्ता-सम्पन्न और बल तथा साधन से भरपूर सुख में डूबे हुए लोग स्वयं आनन्दित रहते हुए भारतमाता को दुखियारी या दीन-हीन या खण्डित देखते हैं, तो वे राजनेता हो सकते है, परन्तु दिव्य भारतमाता के वे कपूत ही हैं। साथ ही, वे स्वयं नहीं देख पाते कि ऐसी छवि वर्णन कर वे भारतमाता को अपने से कमजोर किसी बूढ़ी थकी उदास माँ की तरह दर्शा रहे हैं, उसके वास्तविक दिव्य, दैवी, परम शक्तिशाली स्वरूप को वे देख ही नहीं पाते हैं। यह सदा ध्यान रखना चाहिए। परन्तु यह ध्यान आध्यात्मिक चेतना से सम्पन्न रहने पर ही सम्भव है।
1858 ईस्वी में पहली बार ब्रिटिश राज ने भारत के एक अंश पर छल-बल से कब्जा किया और यह कब्जा सैंकड़ों भारतीय राजाओं के साथ संधिपूर्वक ही सम्भव हुआ। परन्तु शीघ्र ही वे पापाचार पर उतर आये और हिन्दुओं के साथ विशेषकर भेदभाव करने लगे। यही तथ्य है।
एक भारतीय भेदिये के कारण तात्या टोपे को पकडक़र 1857 ईस्वी में जब फाँसी दे दी गई, तब तक भी अंग्रेज़ भारतीयों से बहुत भयभीत थे। 1860 ईस्वी में सोसायटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट बना। कुछ समय बाद इण्डियन आर्म्स एक्ट के द्वारा भारतीयों को अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना शस्त्र रखने का अधिकार छीन लिया गया। सोसायटी एक्ट के द्वारा सामाजिक गतिविधियों पर शासकीय नियंत्रण स्थापित कर दिया गया और 1860-61 ईस्वी में भारतीय दण्ड संहिता और जाब्ता फौजदारी कानूनों का रूप स्थिर हुआ तथा भारत की न्याय परम्परा को समाप्त कर दिया गया। सिविल सर्विस परीक्षाओं में पहले तो भारतीयों को भी शामिल करने का अभियान चला और फिर उसमें जबर्दस्त भेदभाव होने लगे, जिनके विरुद्ध सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने 1876 ईस्वी में एक राष्ट्रीय संस्था बनाकर अभियान छेड़ दिया। इसी समय इंग्लैण्ड में ऐसा कानून हाउस ऑफ़ कॉमन्स में पेश किया गया, जिसमें भारतीय मजदूरों को कोड़े मारना, भले ही उससे जान चली जाए तथा भारतीय वेशभूषा और भारतीय भाषाओं का अपमान करना आदि के प्रावधान थे। इसके बाद 1877 ईस्वी में दिल्ली में एक दरबार बुलाया गया जिसमें आने की रानी विक्टोरिया को हिम्मत नहीं हुई, परन्तु भयभीत अंग्रेज़ों और उनके साथियों ने इस दरबार में भारतीय राजाओं के एक हिस्से की स्वीकृति से, जो दरबार में उपस्थित ही नहीं हो सकीं, उन विक्टोरिया को इण्डिया की साम्राज्ञी घोषित कर डाला। क्योंकि इंग्लैण्ड के लोगों को भारतीयों से युद्ध का डर था और उस युद्ध की सामर्थ्य छीनने के लिए ये सारे तिकड़म हो रहे थे।
इस सबके विरुद्ध आध्यात्मिक चेतना से सम्पन्न भारतीयों की साधना चलती रही और सर्वप्रथम गौरक्षिणी सभाओं का गठन हुआ, जिनके द्वारा भारतीय मानस को जगाया गया। 1890 से 1900 ईस्वी के बीच गौरक्षिणी सभाओं का काम इतना व्यापक हुआ कि इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी में संग्रहीत तत्कालीन गोपनीय दस्तावेज़ों में अंग्रेज़ अधिकारी बारम्बार यह डर जता रहे हैं कि किसी भी दिन इन गौरक्षिणीय सभाओं और सनातन धर्मसभाओं के कारण भारत में पुन: अंग्रेज़ों के विरुद्ध आग भडक़ सकती है और हमें भारत से हटना पड़ सकता है। ये दस्तावेज़ अब सार्वजनिक हो चुके हैं और इनका बहुत सा सन्दर्भ मैंने अपनी पुस्तक ‘‘सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतीक गौमाता' में दिया ही है।
ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के द्वारा पहले ही स्वदेशी जीवन की पुनःप्रतिष्ठा का अभियान छेड़ दिया था, जिससे भारतीयों में आत्मविश्वास एवं आत्मगौरव की भावना आ रही थी। इसी बीच श्री रामकृष्ण परमहंस के दिव्य प्रभाव से स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय आत्मगौरव और अध्यात्म चेतना को नयी ऊँचाइयों पर प्रतिष्ठित किया। वह समस्त साधना इतनी गहरी थी कि 1890 ईस्वी में ही श्री अरविन्द ने यह टिप्पणी कर दी थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस वस्तुत: अंधों के द्वारा अंधों का मार्गदर्शन है और भारतीय चेतना से इसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है। श्री अरविन्द ने लिखा था कि- ‘‘ब्रिटिश संसद में एक नकली बहस चल रही है कि भारतीयों के साथ बड़ा अन्याय हुआ है, अब हमें उनके साथ न्याय करना चाहिए। यह वस्तुत: भारतीयों के साथ छल और वंचना का ही अगला चरण है। भारत में अंग्रेज़ी अख़बार इस वंचना और छल के वाहक हैं।’’
यह महत्त्वपूर्ण है कि श्री अरविन्द, जो समस्त यूरोपीय साहित्य और विशेषकर अंग्रेज़ी साहित्य के बहुत बड़े तथा भारतीयों में अद्वितीय अध्येता थे, उन्होंने जब 1905 ईस्वी में ‘भवानी मन्दिर’नामक एक पुस्तिका प्रकाशित कर बँटवायी तो उसमें सबसे प्रारम्भ में ही लिखा था- ‘‘ओम नमश्चण्डिकायै’’। इस पुस्तिका में श्री अरविन्द ने भवानी के लिए एक मन्दिर की स्थापना का आव्हान किया था और बताया था कि- ‘‘भवानी अनन्त ऊर्जा हैं, वे माँ हैं और परम शक्ति हैं, शुद्ध शक्ति हैं। हम उनसे प्रार्थना करेंगे और उनकी साधना करेंगे तो वे अनुग्रहपूर्वक हमें शक्ति देंगी। शक्ति बिना हम पुन: आत्मगौरव सम्पन्न जीवन नहीं जी सकते। शक्ति से सम्पन्न भारतीय ही ‘राष्ट्र’हैं। इस सनातन राष्ट्र का नयी ऊर्जा के साथ पुनर्जन्म साधना के द्वारा ही होगा। धर्म की साधना से ही हम शक्ति सम्पन्न होंगे। अध्यात्म ही हमारी शक्ति है। वही हमारा मार्ग है। भक्ति वह मन्दिर है, जिसे पूरे राष्ट्र में पुन: प्राणप्रतिष्ठा से सम्पन्न होना है। बड़ी संख्या में गृहस्थ आश्रम से मुक्त रहकर ज्ञान की साधना करने वाले ब्रह्मचारी ही भारतमाता का अनुग्रह प्राप्त करेंगे और भारत में शक्ति का विस्तार करेंगे।’’श्री अरविन्द की इस ओजस्वी पुस्तिका ‘भवानी मन्दिर’को लोकमान्य तिलक ने मराठी में अनुवाद कर ‘केसरी’में छापा।
श्री अरविन्द ने 1894 ईस्वी में ही यह देख लिया था और लिखा था कि- ‘‘अंग्रेज़ों की बुद्धि स्थूल जगत तक सीमित है। वे लोग केवल राजनैतिक संस्थाएँ खड़ी करने और छल-बल से उन्हें चलाने में निपुण हैं। उनकी बुद्धि यांत्रिक है। उनमें वैज्ञानिक जिज्ञासा और आध्यात्मिक ‘विजऩ’का पूर्ण अभाव है। वे केवल इन्द्रियगोचर जगत को देख पाते हैं, जबकि विज्ञान उससे परे जाकर सूक्ष्म जगत को देखता है और अध्यात्म मूल परमसत्ता तथा परमचेतना को देखता है और सृष्टि के कारण तक जाता है। अंग्रेज़ भौतिक वस्तुओं के संग्रह की अपनी अनथक लिप्सा के कारण चकाचौंध पैदा कर दुनिया को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। परन्तु सृष्टि के सूक्ष्म तत्त्वों का उन्हें कोई ज्ञान नहीं है।’’
यहाँ यह स्मरण करना उचित होगा कि श्री जवाहरलाल नेहरू, जिन्हें विज्ञान की कोई भी जानकारी नहीं थी और जो विधि तथा साहित्य के अध्येता थे, प्राय: अंग्रेज़ों की नकल को ही ‘साइंटिफिक टेम्पर’ कहते रहते थे। जबकि श्री अरविन्द ने अंग्रेज़ों के मूल स्वभाव को भलीभाँति देख लिया था। जो बात श्री अरविन्द ने कही, वही श्री बंकिम का भी मत था। उल्लेखनीय है कि बंकिम श्री रामकृष्ण परमहंस के आत्मीय सम्पर्क में थे। स्वामी विवेकानन्द ने भी उन्हीं सत्यों का उद्घोष किया, जिन्हें श्री अरविन्द ने अपने लेखन में वाणी दी है। इसी प्रकार 1890 से 1910 तक गौरक्षिणी सभाओं और सनातन धर्मसभाओं की जो व्यापक गतिविधियाँ चलीं, उनमें पंजाब के कूका संतजन, ऋषि दयानन्द, स्वामी अलाराम, श्रीमन् स्वामी, पंडित रामचन्द्र, स्वामी श्रद्धानन्द तथा पंडित दीनदयालु शर्मा जैसी आध्यात्मिक विभूतियों की उल्लेखनीय भूमिका थी।
1863 ईस्वी में नरेन्द्रनाथ दत्त (बाद में स्वामी विवेकानन्द) और दीनदयालु शर्मा जी का जन्म हुआ। 1886 ईस्वी में दीनदयालु जी ने ‘गंगा धर्मसभा’की स्थापना की। इसके 4 वर्ष बाद देशभर में ‘भारत धर्म महामण्डल’का व्यापक विस्तार हुआ, जिसमें महामना मदनमोहन मालवीय और, पंडित दीनदयालु शर्मा की ही अग्रणी भूमिका थी। पंडित दीनदयालु शर्मा की ऐसी राष्ट्रव्यापी प्रतिष्ठा थी कि जब जार्ज पंचम और महारानी 1911 ईस्वी में नई दिल्ली आए तो प्रश्न यह उठा कि जब दोनों की भेंट हो, तो कौन किसके सम्मान में पहले खड़ा हो। अन्त में निर्णय हुआ कि एक कैम्प में ब्रिटिश सम्राट और साम्राज्ञी होंगे तथा जब पंडित दीनदयालु आयेंगे, तब वे दोनों कैम्प से निकलकर दीनदयालु जी के स्वागत के लिए खड़े मिलेंगे। वैसा ही हुआ और दीनदयालु जी ने ब्रिटिश सम्राट और साम्राज्ञी को संस्कृत में आशीर्वाद दिया। इसे अंग्रेज़ वाइसरायों से गाँधी जी की भेंट के सन्दर्भ में तुलना करके देखने पर आध्यात्मिक विभूतियों की महिमा स्पष्ट हो जायेगी। गाँधी जी सदा ब्रिटिश वाइसराय के सामने झुककर अभिवादन करते थे। उनके लिए वाइसराय कभी भी खड़े नहीं हुए। ब्रिटिश सम्राट की तो बात ही अलग है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जहाँ स्वदेशी का प्रचार सर्वप्रथम 1905 ईस्वी में श्री अरविन्द ने किया था, वहीं अस्पृष्यता निवारण की पहल सर्वप्रथम सनातन धर्म महामण्डल ने ही की थी। अखिल भारतीय सनातन धर्मसभा के महासम्मेलनों में 1912 ईस्वी से ही जाति पर आधारित अस्पृष्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किये जाते थे। 1921 ईस्वी में तो दीनदयालु शर्मा ने उसकी एक संस्कृत में व्याख्या ही कर दी थी, जिसका अर्थ था- ‘‘जो भारतीय धर्म में निष्ठा करे और भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति माने तथा भारत को पुण्यभूमि माने, वही हिन्दू है।’’श्री अरविन्द और लोकमान्य तिलक दोनों ने दीनदयालु जी को अपने समय की बड़ी आध्यात्मिक विभूति कहा था। प्रसिद्ध लेखक पंडित चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ने तो अपनी संस्कृत कविता में उन्हें धर्मप्राण भगवान कृष्ण का अंशावतार ही कहा था। इन आध्यात्मिक विभूतियों के प्रभाव से काशी नरेश तथा दरभंगा, कपूरथला, पटियाला, कश्मीर, रीवां, कूच-बिहार सहित सैकड़ों राज्यों के राजाओं ने गौरक्षिणी सभाओं और सनातन धर्म महासभा के लिए श्रद्धापूर्वक दान दिया और इन सबने ही मिलकर सनातन धर्म की रक्षा के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प सनातन धर्म महामण्डल के अधिवेशन में पारित किया। बाद में तत्कालीन शिक्षा सचिव बटलर और जवाहरलाल नेहरू के संयुक्त प्रयासों से इस विश्वविद्यालय का मूल चरित्र नष्ट कर डाला गया।
पंडित शिवकुमार शास्त्री, पंडित गंगाधर शास्त्री, पंडित चन्द्रशेखर शास्त्री, स्वामी शान्तानन्द सरस्वती, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी गंगेश्वरानन्द जी महाराज आदि आध्यात्मिक विभूतियों ने भारत के आध्यात्मिक तेज को पुन: प्रदीप्त करने के लिए उस अवधि में निरन्तर प्रयास किये। यों लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय और बिपिनचन्द्र पाल- तीनों ही आध्यात्मिक ज्ञान से सम्पन्न राष्ट्रीय विभूति थे। उस समय भारत धर्म महामण्डल और सनातन धर्म महासभा की सभाएँ बलूचिस्तान, क्वेटा, डेरा इस्माइल ख़ाँ, चमन, लाहौर, रावलपिंडी आदि स्थानों पर भी बड़े स्तर पर होती थीं। महान संगीतज्ञ श्री विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने गान्धर्व महाविद्यालय की स्थापना पंडित दीनदयालु जी की प्रेरणा से ही की थी। स्थान-स्थान पर सनातन धर्म संस्कृत कॉलेज की स्थापना के लिए तत्कालीन भारतीय राजाओं ने धनराशि दान की।
गौरक्षिणी सभाओं और सनातन धर्म महासभाओं का 1910 ईस्वी तक आते-आते इतना प्रभाव फैल गया कि अंग्रेज़ सरकार अपने क्षेत्र में इनको प्रतिबन्धित करने के लिए तरह-तरह के हथकण्डे अपनाने लगी। इस प्रकार सत्य यह है कि धार्मिक एवं सांस्कृतिक विभूतियों के द्वारा ही भारत में सांस्कृतिक चेतना प्रवाहित रही और उनके ही प्रभाव से भारत के वीर क्रान्तिकारी श्रीमद्भगवद्गीता को अपना सबसे प्रिय और पूज्य ग्रन्थ मानते रहे। इससे एक ऐसा राष्ट्रीय परिवेश बना, जिससे गाँधी जी को भी भारत के धर्मप्रेमी लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता स्थापित करने के लिए गीता पर अपने ढंग का भाष्य लिखना पड़ा। जबकि उन्होंने प्रौढ़ावस्था के प्रारम्भ तक संस्कृत नहीं पढ़ी थी और गीता भी पहली बार इंग्लैण्ड में अंग्रेज़ी अनुवाद के रूप में पढ़ी। गाँधी जी 1919 ईस्वी तक अपने को ब्रिटिश राज्य की निष्ठावान प्रजा ही कहते रहे थे और इंग्लैण्ड के सारे अन्यायों का विरोध एक निष्ठावान प्रजा के रूप में ही सत्याग्रह करते हुए कर रहे थे। गीता के विषय में भी गाँधी जी ने अपने भाष्य की भूमिका में कहा यही कि मेरा मानना है कि वस्तुत: कौरवों और पाण्डवों के बीच वैसा कोई ऐतिहासिक युद्ध नहीं हुआ है, अपितु वेदव्यास ने मानव मन के भीतर चल रहे सत् और असत् के संघर्ष को ही इस महाकाव्य के द्वारा चित्रित किया है। ऐसी मान्यता रखते हुए भी उन्हें लोक स्वीकार्यता के लिए भगवद्गीता पर भाष्य लिखना पड़ा। इसका कारण यही है कि भारतीय मानस में धार्मिक और सांस्कृतिक विभूतियों की साधना की गहरी छाप तब तक थी।
इस छाप को जड़-मूल से नष्ट करने का काम स्वयं को गाँधी जी का उत्तराधिकारी प्रचारित करने वाले श्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 1947 ईस्वी के बाद व्यवस्थित रूप में हुआ है और शिक्षा तथा संचार माध्यमों से भारतीय आध्यात्मिक चेतना और संस्कारों का निष्कासन कर दिया गया है। इसके कारण समकालीन भारतीय साहित्य में भी काल-प्रवाह, पुनर्जन्म आदि शाश्वत सत्यों का कोई संकेत तक नहीं मिलता। परन्तु आततायी अंग्रेज़ों को मार भगाने की वीरता की मूल प्रेरणा भारतीयों को इस आध्यात्मिक प्रवाह से ही मिली है। उसी प्रकार भारत में तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में नीचतापूर्ण और नृशंस पापाचार की प्रेरणा अंग्रेज़ों तथा अन्य यूरोपीय ईसाइयों को उनकी अपनी आध्यात्मिक संस्थाओं से मिली है, जो भारतीय दृष्टि से आध्यात्मिक विकृति के केन्द्र माने जायेंगे।
वीरता के इस विराट विस्तार को, जिसमें धर्माचार्यों तथा अन्य धर्मवीर महापुरुषों की वीरता, क्रान्तिकारी युद्धवीरों की वीरता और धर्म के लिए दान देने वाले दानवीरों की वीरता सम्मिलित है, पूरी तरह छिपाने के लिए ही आततायियों के विरुद्ध भारतीयों की वीरता को ‘स्वाधीनता आन्दोलन’ जैसी कमजोर सी संज्ञा दी जाती है। विश्व का सत्य यह है कि आज तक किसी भी देश को आन्दोलनों से स्वाधीनता नहीं मिली है। युद्ध से ही स्वाधीनता मिलती है। भारत के विषय में यह बात उतनी केन्द्रीय नहीं है, क्योंकि उस रूप में सम्पूर्ण भारत में केन्द्रीय शासन कभी भी विदेशियों का हो ही नहीं पाया। भारतीयों की विशाल संख्या के सहयोग से साझा शासन 90 वर्षों के लिए लगभग आधे से कुछ अधिक भारत में अंग्रेज़ो ने अवश्य किया, जिन्हें हमारे धर्मवीरों, युद्धवीरों और दानवीरों ने भागने को विवश कर दिया। यही भारतीय इतिहास का तथ्य है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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