आपसी पे्रम एवं सौहार्द का प्रतीक है, होली
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डॉ. विपिन कुमार द्विवेदी
सहायक प्राध्यापक, संस्कृत विभाग, प.वि.
भारत अनेक उत्सवों एवं त्यौहारों का एक अनूठा मिला-जुला संगम है। जिसमें मौसम के अनुसार त्यौहारों का आयोजन न केवल आत्मिक प्रसन्नता के लिए है अपितु भौतिक एवं शारीरिक प्रसन्नता एवं शुचिता भी इससे प्राप्त होती है। समान रूप से परस्पर जोडऩे का कार्य भी ये त्यौहार बड़े ही अच्छे ढग़ से करते हैं। इन्हीं त्यौहारों में से एक त्यौहार है होली। जो अपने सौहार्दपूर्ण वातावरण एवं आपकी भाईचारे को कायम रखने में पूर्ण सफल रहा है। इस त्यौहार की विशेष बात यह है कि शत्रु भी इस दिन गले मिलते हैं। वृद्धों में भी युवा शक्ति की तरह अठखेलियाँ देखी जाती हैं। बच्चों एवं युवाओं में एक विशेष प्रकार से हर्ष एवं उल्लास रहता ही है। त्यौहार रंगों से जुडक़र जीवन में विविध प्रकार की परिस्थितियों को दर्शाते हुए उनमें प्रसन्न एवं मुस्कुराते रहना भी एक बड़ी प्रेरणा है। फाल्गुन मास बसन्त का बड़ा ही सरस मास है जहाँ एक ओर विविध हरे-भरे शस्यों से घटा की प्राकृतिक शोभा अपने उत्कृष्ट शिखर पर होते है। वहीं दूसरी तरह उद्यान, तडांग एवं आम की अमराईयों एवं पुष्प गुच्छों मे भ्रमण करता हुआ समीर तन-मन को मुग्ध कर देता है। वसुधा का श्रृंगार बड़ा मनमोहक होता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को जब चन्द्रमा अपने पूर्ण यौवन में रहता है। चारों तरफ उसकी ज्योत्सना सर्वत्र फैली रहती है तभी होलिका दहन उत्सव मनाने की परम्परा है। पौराणिक आख्यान के अनुसार शिष्य कश्यपु की बहन का नाम होलिका था, जिसने विष्णु के परम भक्त प्रहलाद को छल से जलाने की चेष्टा की थी जबकि वह उसकी बुआ थी। रिश्तों में इस प्रकार का असन्तोष न फैले, इसलिए ईश्वर ने प्रहलाद की रक्षा कर होलिका को मृत्यु दण्ड से दण्डित किया। ताकि पवित्र रिश्तों की मर्यादा बनी रहे। लोग परस्पर सम्बन्धों के महत्त्व को समझें। लेकिन हर्ष एवं उल्लास का प्रतीक तो है ही किन्तु छल, दम्भ एवं दानवता को जलाने का एवं सुखमय एवं शान्तिपूर्ण जीवन जीने का एक श्रेष्ठ माध्यम भी हैं। शीत के चंगुल से छुटकर जब भगवान् भास्कर के उष्ण एवं पवन की शीतलता में शीतल बनी हुई किरणों की उष्णता को पाते हैं, तब उनके शरीर में एक अजीबो-गरीब स्फूर्ति एवं मेधा रहती है और इस त्यौहार के संयोग से वे और भी हर्षोंउल्लास में आकृष्ठ मग्न हो जाते हैं। सायं होते ही बच्चों का झुण्ड प्रसन्नता एवं उल्लास के कारण गलियों व मुहल्लों में दौडऩे लगता हैं, ढ़ोल एवं मंजीरों के ताल से चौराहों एवं घर गुञ्जायमान हो जाते हैं। लोकगीत में छिपी भारतीय संस्कृति का मुखर स्वर बड़ी तेजल से फैलने लगता है। भिन्न-भिन्न प्रान्त व क्षेत्र की परम्पराओं एवं त्यौहार के आयोजन की रीतियों से यह त्यौहार और भी आकर्षक एवं मनमोहक बन जाता है। शारीरिक आधि से लेकर व्याधि तक को शमन करने का पूर्ण प्रकल्प इस त्यौहार में चलता है। ऋतु संधि काल में होने वाली व्याधियों से मुक्ति पाने के लिए लोग हल्दी से बने उबटन को शरीर पर लेप कर शरीर को स्वच्छ व स्नान करते हैं। थोड़े चावलों को माताएँ, बच्चों व घर के सभी सदस्यों को उतारकर होलिका में डालती है। बाकि उनमें किसी भी प्रकार की न्यूनता हो भी तो वह होलिका में दग्ध हो जाय। गोबर के उपलों की माला बनाकर जिससे चन्द्रमा एवं सूर्य के प्रतीक बनायें जाते हैं, उन्हें पूर्ण ऊर्जावान् एवं प्रकाशवान् बनाने के लिए उन्हें होलिका में प्रक्षिप्त किया जाता है।
होलिका के चारों ओर परिक्रमा करते हुए लोग फाल्गुन के एवं होली के सुन्दर-सुन्दर गीत गाते हैं। गोबर के उपले बनाकर उन्हें माला में गूंथकर आपस में बदलने की मान्यता भी है, जिससे एक दूसरे के प्रति सम्मान बढ़ता है एवं भेदभाव की हीनता समाप्त होती है। खेतों के नये चने व गेहूँ की फसल प्रौढ़ावस्था की ओर अग्रसर होती है। इस दौरान लोग इन फसलों को थोड़ा-थोड़ा लेकर होलिका की आग में भूनकर लेते हैं, जिससे नव शस्य के स्वाद से वे अपने आप को नवीन तथा ऊर्जा से सम्पन्न समझते हैं। होलिका दहन के उपरान्त दूसरे दिन रंग भरी होती है। इस दिन लोग होलिका के भस्म को मिलकर गाने-बाजे के साथ एक दूसरे के शरीर में परिहास बड़ा लगाते हैं। फाल्गुनी गीत गाते हुए चारों तरफ घूमते हुए देव स्थान में जाकर विधिवत् ईश्वर पूजा करके गीत गाकर पुन: अपने-अपने घरों में चले जाते हैं। घर पर विविध प्राकर के पकवान् बनायें जाते हैं, शाम को लोग हाथों में अबीर व गुलाल लेकर एक दूसरे के घर जाकर प्रेम से अबीर व गुलाल लगाते हैं। छोटे-बड़ों को लगाकर उनके चरण स्पर्श करते है और बड़े-छोटों को जी भर के आशीर्वाद व शुभकामनाएँ प्रेषित करते हैं। बच्चे व स्त्रियां बाल्टी में रंग घोलकर एक दूसरे के ऊपर डालते हैं। रिश्तों में भी परिहास के अनुकूल लोग रंग-क्रीड़ा करते हैं। शाम को भी गायक मण्डली घर-घर जाकर होली के गीत गाती हैं, अबीर व गुलाल लगाते हैं। कई स्थानों पर तो होली मिलन का कार्यक्रम चलता है, जिनमें कई नेता व पदाधिकारी भी हर्षोल्लास के साथ कार्यक्रम में सम्मिलित होते हैं और आपस में होली खेलते है। कहीं-कहीं पर कवि सम्मेलन का आयोजन भी होता है।
कवि अपनी व्यङ्गयात्मक पंक्तियों से होली के सुन्दर त्यौहार को और भी रोचक बना देते हैं। राजमार्गों, चौराहों व गलियों में हर तरफ लोग रंग से धूसरित होकर हाथों में गुलाल व रंग लेकर भागते हुए नज़र आते हैं। उस समय होली की हुडदंग का माहौल चारो तरफ हो जाता है। इस त्यौहार में कभी-कभी लोग नशे का भी सहारा लेने लगते हैं जोकि औचित्यपूर्ण नहीं है, क्योंकि यह त्यौहार अपने आप में हर्ष व उल्लास का एक नशा ही है। जो इस नशे में नहीं रमा। तो ऐस लोग बाह्य नशे में रहकर इस त्यौहार की रौनक को फीका कर देते हैं। लड़ाई व झगड़े तक की भी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस परिस्थिति में आपस में सौहार्दपूर्ण एवं भातृभाव से रहकर इस त्यौहार का आनन्द उठाना चाहिए एवं एक-दूसरे के गले लगकर अपनी पुरानी रंजिशों को भूलकर प्रेमभरा बर्ताव करना चाहिए ताकि होली का एक स्वस्थ एवं भावपूर्ण उत्सव सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोते हुए अच्छी तरह सम्पन्न हो सकें तथा सभी में ‘सर्वजन सुखाय एवं सर्वजन हिताय’की भावना का पल्लवन सतत् होती रहे।
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01 Mar 2025 17:58:05
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