नेतृत्व में महिलाएं
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वंदना बरनवाल, राज्य प्रभारी
महिला पतंजलि योग समिति, उ.प्र. मध्य
महिलाओं ने हमेशा से अपनी दृढ इच्छा शक्ति और अदम्य साहस की बदौलत समाज के लगभग हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को दर्ज कराया है| साथ ही उन्होंने अपनी भूमिका को अत्यंत गरिमामयी बनाते हुए उसे महत्वपूर्ण भी साबित किया है| |
आदि से लेकर अनंत तक, जब से सृष्टि की शुरुआत हुई और जब तक सृष्टि रहेगी तब तक, अनेकों बन्धनों और चुनौतियों के साथ महिलाएं परिवार और समाज की धुरी ही नहीं बल्कि केन्द्र भी रहेंगी। यद्यपि आज भी समाज में महिलाओं के लिए चुनौतियाँ अनगिनत हैं तथापि भारतीय महिलाओं ने हमेशा से अपनी दृढ इच्छा शक्ति और अदम्य साहस की बदौलत समाज के लगभग हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाया है। साथ ही उन्होंने अपनी भूमिका को अत्यंत गरिमामयी बनाते हुए उसे महत्त्वपूर्ण भी साबित किया है। सुबह से लेकर रात तक अनेकों भूमिकाओं को निभाने के साथ ही उनमें संतुलन को साधते हुए आज महिलाएं जहाँ एक ओर कुशल गृहणी बनकर परिवार का संचालन करती हैं तो वहीं दूसरी ओर वह अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाने में भी किसी से कमतर नहीं हैं। बावजूद इसके पुरुष प्रधान समाज होने के कारण आज भी उन्हें बहुत सी कही-अनकही और दृश्य-अदृश्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है क्योंकि बहुत से लोग इस धारणा से स्वयं को अलग नहीं कर पाते कि महिलाएं सिर्फ घरेलू कार्य और साज-श्रृंगार में ही दक्ष होती हैं। परन्तु उनकी यह धारणा उस समय निरर्थक साबित होती है जब किसी भी कार्य क्षेत्र में उनका सामना चुनौतियों से जूझती एक महिला के दृढ आत्मविश्वास से होता है। तब उन्हें पता लगता है कि आज अनंत शक्तियों की स्वामिनी भारतीय नारी साज-शृंगार एवं गृहकार्य के साथ समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता से लोहा मनवा रही है। आज महिला पतंजलि योग समिति की लाखों बहनें भी स्वयं इसका उदाहरण हैं जो अपने घर परिवार आदि की जिम्मेदारी का भी सफलतापूर्वक निर्वहन करती हैं और साथ ही परम पूज्य स्वामी जी महाराज के आशीर्वाद तथा श्रद्धेया डॉ. साध्वी देवप्रिया जी के दिव्य मार्गदर्शन में योग को घर घर पहुँचाने में भी कोई कसर नहीं छोड़तीं।
आज का युग वैसे भी आधुनिक भारत की उस महिला शक्ति का युग है जो भारतीय संस्कारों के दायरे में रहते हुए हर स्तर पर ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं जिनसे पूरा देश प्रेरित हो रहा है। अपने कार्यों से हर दिन नयी राहें गढ़ रही और नित्य प्रति मील के नए पत्थर स्थापित कर रही वे किसी ना किसी क्षेत्र में नजर आ ही जाती हैं जहाँ वो पूर्व की स्थापित रीतियों से आगे बढक़र कुछ नया करते हुए नए इतिहास भी रच रही हैं। अपने साहस और सूझबूझ से हर दिन बदलाव की वे ऐसे नवीन कीर्तिमान रच रही हैं जिन पर चलकर उनकी स्वयं की ही नहीं बल्कि परिवार, समाज और देश की भी तस्वीर बदल रही है। अपनी असीम ऊर्जा से लगातार आगे बढ़ते हुए समाज को और साथ ही आने वाली पीढिय़ों को भी वे अपने पद चिन्हों के माध्यम से नयी दिशा दिखा रही हैं। निश्चित रूप से कोविड महामारी के चलते वर्ष 2020 सभी के लिए मुश्किलों भरा रहा। लेकिन इन मुश्किलों के बीच भी महिलाओं ने हमेशा की तरह आगे से आगे बढक़र काम करते हुए अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। यदि सिर्फ अपनी महिला पतंजलि योग समिति की बहनों की ही बात करें तो कोविड की तमाम चुनौतियों के बावजूद उन्होंने परम पूज्य स्वामी जी महाराज के सिर्फ एक आह्वान पर घर बैठे प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए दान एकत्रित कर डाला। यही नहीं उन्होंने योग कक्षाओं के संचालन से लेकर सह योग शिक्षक प्रशिक्षण शिविरों के आयोजनों तक कभी भी अपने उत्साह में कमी नहीं आने दी। कोविड के कारण उनकी फिजिकल कक्षाएं नहीं लग सकीं तो क्या हुआ, महिला पतंजलि की बहनों की वर्चुअल कक्षाएं लगीं और खूब लगीं और प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से नयी योग शिक्षिकाएं भी तैयार होती चली गयीं। लॉक डाउन का समय रहा हो या फिर उसके बाद का समय, हमेशा की तरह बहनों ने योग शिक्षिका की भूमिका के साथ न्याय करते हुए किसी अन्य भूमिका के साथ अन्याय भी नहीं होने दिया और एक गृहिणी के सभी दायित्वों को पूरा करते हुए दूसरी अन्य जिम्मेदारियों को भी पूर्ण समर्पण और निष्ठा के साथ निभाया। उन्होंने मां, बेटी, बहन, पत्नी आदि की भूमिका में रहते हुए घर के सदस्यों की मुश्किलों को सुलझाया तो डॉक्टर, नर्स, अधिकारी, कर्मचारी और पुलिस की भूमिका भी लगनपूर्वक निभाया। इसीलिए तो उन पर ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं -
असंभव को कर संभव, हर बाधा से टक्कर लेती है
जरुरत पड़े तो गरजती है वो, और इतिहास बदल देती है।
खामोशी में हुंकार है उसकी, दृढ़ता की है वो धनी
निडर निर्भीक बढ़ती है, ऐसी है हमारी महिला पतंजलि।
हर रोज आसानी से ऐसी अनेकों भूमिकाओं को निभाने वाली एक महिला निर्विवाद रूप से घर, परिवार और समाज की रीढ़ की हड्डी होती है और बिना किसी दोष के उसके निर्माण में अहम भूमिका निभाती है। परिवार, समाज और राष्ट्र ही नहीं बल्कि विश्व के विकास और प्रगति के लिए भी हमेशा से महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। इस भागीदारी को और अधिक प्रोत्साहित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर अलग-अलग कदम उठाये जाते हैं और इन सबमें सबसे मुख्य है 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का मनाया जाना। देखा जाये तो अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की उत्पत्ति असल में एक मजदूर आंदोलन से हुई जिसे बाद में संयुक्त राष्ट्र ने भी मान्यता दे दी। दरअसल इसकी नींव आज से 113 वर्ष पहले यानी साल 1908 में पड़ गयी थी जब अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में लगभग पंद्रह हजार महिलाएं सडक़ों पर उतरी थीं क्योंकि उस समय पुरुषों के मुकाबले में महिलाओं के काम के घंटे कम हुआ करते थे और साथ ही उनका वेतन भी पुरुषों की अपेक्षा कम होता था। यही नहीं महिलाओं के पास मतदान तक का अधिकार नहीं था। इन्हीं सब विसंगतियों को लेकर वहाँ की महिलाएं प्रदर्शन कर रही थीं। महिलाओं के इस विरोध प्रदर्शन के एक साल बाद, अमरीका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहले राष्ट्रीय महिला दिवस को मनाने की घोषणा की थी। बाद में वर्ष 1910 में इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने का विचार एक अमरीकी महिला क्लारा जेटकिन ने दिया जब वो डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में कामकाजी महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में शिरकत कर रही थी। उस समय उस कांफ्रेंस में 17 देशों से आई 100 महिलाओं ने सर्वसम्मति से क्लारा जेटकिन के इस प्रस्ताव को मंजूर किया और इस तरह से तकनीकी दृष्टि से पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस वर्ष 1911 में मनाया गया। बाद में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड आदि देशों में भी लाखों महिलाओं ने नौकरी में भेदभाव खत्म करने, सरकारी संस्थानों में सामान अधिकार और मताधिकार में भी समानता के लिए रैलियां निकाली गयीं। रूस में भी 1917 में महिलाओं ने हड़ताल कर मतदान का अधिकार प्राप्त किया। उसके बाद से ही हर वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा और वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ से इसे औपचारिक मान्यता मिली। पूर्व में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की कोई थीम नहीं होती थी पर वर्ष 1996 में इसे पहली बार एक थीम के तहत मनाया गया था जिसको "Celebrating the Past, Planning for the Future" अर्थात ‘अतीत का जश्न, भविष्य की योजना’नाम दिया गया था। तब से हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मनाने के लिए एक खास थीम रखी जाती है और इस बार यानि वर्ष 2021 में इस दिन के लिए जो थीम रखी गई है उसका नाम है "Women in leadership: Achieving an equal future in a COVID-19 world" अर्थात ‘नेतृत्व में महिलाएं - कोविड-19 के समय में समान भविष्य को हासिल कर रहीं। उचित भी है, कोविड महामारी के मुश्किल समय में भी महिलाओं की भूमिका और नेतृत्व क्षमता को कोई कैसे नजरंदाज कर सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत कैसे और क्यों हुई इसके पीछे की कहानी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि ज्यादातर देशों, खास तौर पर पश्चिमी देशों में महिलाओं की स्थिति कैसी थी। और इस लिहाज से दुनिया के ज्यादातर देशों की तुलना में भारत में महिलाओं की स्थिति बहुत बेहतर थी। सनातन वैदिक हिन्दू धर्म में अगर पुरुष के रूप में देवता और भगवानों की पूजा-प्रार्थना की जाती है तो वहीं देवी के रूप में मां सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और दुर्गा की पूजा हमेशा से होती चली आ रही है। हमेशा से उन्हें मां, देवी, साध्वी, गृहिणी, पत्नी और बेटी के रूप में सम्मान देते हुए पूजने की प्रथा है। कोई भी धार्मिक कार्य उनकी उपस्थिति के बिना शुरू नहीं होता यहाँ तक कि यज्ञ और धार्मिक प्रार्थना में यज्ञकर्ता या प्रार्थनाकर्ता की पत्नी का साथ बैठना भी आवश्यक किया गया। इतिहास गवाह है कि भारत में महिलाओं को धर्म और राजनीति में भी पुरुष के समान ही समानता हासिल थी। ये सब मात्र इसलिए नहीं था कि लिंग भेद को मिटाते हुए महिलाओं को समानता का अधिकार देने का कोई कानून था बल्कि ऐसा इसलिए था कि भारतीय महिलाएं हमेशा से हर क्षेत्र में पारंगत थीं। वे विदुषी होने के साथ ही युद्ध कला में भी पारंगत होती थीं यानि शास्त्र और शस्त्र दोनों ही विद्याओं में निपुण और इसीलिए आवश्यकता पडऩे पर वे कुशलता से राजपाट भी संभालती थीं। वे वेद पढ़ती थीं और पढ़ाती भी थीं। शस्त्र हो या शास्त्र, उनका सामना करने से प्रकांड विद्वान और बड़े-बड़े वीर योद्धा भी घबराते थे। कितना असीमित ज्ञान का भण्डार रहा होगा मैत्रेयी के पास जो विद्वानों के शास्त्रार्थ में जीत हार का निर्णय के लिए उनको चुना गया था। हमारा इतिहास यदि मैत्रेयी, गार्गी जैसी महिलाओं से लेकर राजे-रजवाड़ों से ताल्लुक रखने वाली रानी लक्ष्मीबाई, रानी राजेश्वरी देवी, रानी चेनम्मा, रानी अवन्तीबाई, रानी तलमुंद कोइर, बेगम आलिया, बेगम जीनत महल, बेगम हजरत महल जैसी अनेकों वीरांगनाओं से भरा हुआ है तो वहीं साधारण सी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाली उदा देवी, अजीजन बाई, झलकारी बाई, मस्तानीबाई, रनवीरी, शोभा देवी, महावीरी देवी, आशा देवी जैसी अनेकों महिलाएं ने भी अपने कार्यों से अमिट छाप छोड़ी है। आजाद भारत और नए भारत के निर्माण भी महिलाओं ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर लोकसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के पदों को सुशोभित करते हुए तकनीकी ज्ञान, कला, वाणिज्य, खेल, प्रशासनिक सेवा, सेना आदि सभी क्षेत्रों में भी अपनी छाप छोड़ रही है।
वैसे भारत में महिलाओं के सम्मान में सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अतिरिक्त भी अलग अलग दिवसों में कार्यक्रम आयोजित होते हैं। मसलन 10 मार्च को पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले के स्मृति दिवस के उपलक्ष में भी महिला दिवस मनाने की परंपरा है। सावित्री बाई फुले ने स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल एवं विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाया था। इसके साथ ही भारत में पहली महिला राज्यपाल सरोजनी नायडू के जन्म तिथि 13 फरवरी को भी महिला दिवस के रूप में मनाते हैं। सरोजिनी नायडू स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ ही स्त्रियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली प्रमुख कार्यकर्ता थीं और उन्हें ‘नाइटेंगल ऑफ इंडिया’के रूप में भी जाना जाता है। उनको देश की पहली महिला राज्यपाल होने का गौरव भी हासिल है। इसी प्रकार प्रत्येक 15 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस भी मनाया जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य कृषि विकास, ग्रामीण विकास, खाद्य सुरक्षा तथा ग्रामीण गरीबी उन्मूलन में ग्रामीण महिलाओं के महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करने के साथ ही उनकी महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान को सम्मानित करना भी है। इन सबके अतिरिक्त परम पूज्य स्वामी जी महाराज के आशीर्वाद से विगत कुछ वर्षों से महिला पतंजलि योग समिति द्वारा नवसंवत्सर के दिन भी राष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन धूमधाम से किया जाता है। नव संवत्सर चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन मनाया जाता है जिसे वर्ष का सबसे शुभ एवं महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस तिथि को कुछ ऐसे अन्य कार्य भी सम्पन्न हुए हैं जिनसे यह दिवस और भी विशेष हो गया है जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, माँ दुर्गा की साधना हेतु चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिवस, आर्यसमाज का स्थापना दिवस आदि। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ भी हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। ब्रह्म पुराण में लिखा है -
चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। - ब्रह्म पुराण
इतनी श्रेष्ठ संस्कृति और इतना सब कुछ होने के बाद भी समाज के कुछ हिस्से की सीमित सोच से आज भी महिलाओं अक्सर नयी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। संभवत: इसका मुख्य कारण वर्षों से इस समाज को पुरुष प्रधान समाज के तौर पर देखा गया। हालाँकि इसी समाज ने कई दशकों से चली आ रही और सीधे तौर पर महिलाओं से ही सम्बंधित बहुत सी कुरीतियों को दूर करने का साहस भी दिखाया जैसे कि सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह, भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा आदि कुप्रथाओं का निराकरण लगभग हो ही चुका है। बावजूद इसके समाज में लिंग भेद के कारण आज भी महिला और पुरुष के कार्यों और उनको दी जाने वाली सुविधाओं में भेद-भाव और असमानताएं स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। कुछ समय पूर्व हुआ एक सर्वेक्षण इस भेद-भाव को स्पष्ट रूप से बल देता है जिसमें कहा गया है कि महिला-पुरुष के बीच लैंगिक असमानता को खत्म करने में अभी भी 100 साल और लग सकते हैं। इस अनुमान के पीछे भी कारण है। वर्ष 1991 की जनगणना में भारत में 0 से 6 वर्ष की आयु की लड़कियों की संख्या लडक़ों के मुकाबले 945 थी। विडम्बना देखिये 2001 यह घटकर 927 पर पहुंची तो 2011 में और भी लुढक़कर 918 पर आ गयी। हम स्वयं को विकासशील देश मानते हैं पर विकासशीलता का पैमाना ये तो नहीं हो सकता। लड़कियों की अनुपातिक संख्या में इतनी बड़ी गिरावट किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को निश्चित रूप से सोचने को मजबूर करती है और इसीलिए केंद्र सरकार द्वारा जनवरी 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की योजना की शुरुआत की गई। सरकार द्वारा हाल ही में लिंगानुपात के आंकड़ों की सूची में फिलहाल आंध्र प्रदेश प्रथम स्थान पर है जहाँ लिंगानुपात 985 है। यानि समाज में व्याप्त भेद-भाव की बात को सिरे से नकारा तो कतई नहीं जा सकता खास तौर पर ऐसे हिस्से में जहाँ शिक्षा का प्रचार प्रसार नहीं हो सका है। सही मायने में यदि कहा जाये तो यह अपने आप में अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम मानव जाति को लिंग के आधार पर बाँटने लग जाएँ। आधार लिंग का हो या फिर कोई और, बंटवारे हमेशा कमजोर बनाता है। हमको यह समझ लेना होगा कि प्राकृतिक रूप से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज की अपनी अहमियत और उपयोगिता होती है और यदि हम ये कहते हैं कि जाति और धर्म तो जन्म से निर्धारित होते हैं तो हमें यह भी याद रखना होगा कि लिंग का निर्धारण भी एक मां द्वारा गर्भ धारण करते ही हो जाता है। यानि जाति और धर्म की तरह ही लिंग के चुनाव का अधिकार भी किसी के पास नहीं है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि शारीरिक बनावट और सौष्ठव के लिहाज से स्त्री और पुरुष की बराबरी नहीं हो सकती। बावजूद इसके यदि महिलाएं भी पुरुष जैसी बन गयीं तब तो वो कार्बन कॉपी कहलाएंगी ना कि शक्तिशाली क्योंकि नकल करने से तो सिर्फ कार्बन कॉपी ही तैयार होते हैं और ईश्वर ने महिला को धरती पर पुरुष की कार्बन कॉपी बनने के लिए नहीं भेजा है बल्कि पूर्ण स्त्री बने रहने के लिए ही भेजा है। इसलिए सनद रहे कि नकल के फेर में हमें कभी भी अपनी पहचान, अपना गौरव, अपनी भूमिका को कतई नहीं भूलना है। महिला हो या पुरुष विकास की सीढियों को तेजी से लांघते हुए आज हर कोई शिखर पर पहुंचना चाहता है और शीर्ष पर बने रहना चाहता है। अत: ऐसे में आज जब महिलाएं स्वयं अपने बुलंद इरादों से अपनी कहानी खुद लिख रही हैं तो उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि दो शिखरों का मिलन कभी नहीं होता है। अत: शिखर पर पहुँचने की कहानी गढ़ते समय स्त्री और पुरुष दोनों को अपने अपने अहंकार के शिखर से दूरी भी बनाकर रखना होगा। ईश्वर ने प्राकृतिक रूप से एक स्त्री और एक पुरुष को एक दूसरे का पूरक बनाया है जहाँ न कोई छोटा है और ना कोई बड़ा। इसलिए अगर आज इक्कीसवीं सदी की महिलाएं अपनी शक्ति को पहचान कर अपने अधिकारों के लिए लडऩा सीख चुकी हैं तो इसका अर्थ यह भी नहीं हो कि घर और परिवार में दरारें पडऩी लग जाएँ। भगवान राम को भी जन्म लेने के लिए माता कौशल्या की कोख चाहिए तो मर्यादा पुरुषोत्तम होने के लिए सीता की जरुरत होती है।
हजारों फूल चाहिए एक माला बनाने के लिए
हजारों दीप चाहिए एक आरती सजाने के लिए
हजारों बूंद चाहिए एक समंदर बनाने के लिए
पर बस एक स्त्री चाहिए नर को नारायण बनाने के लिए
वर्तमान में तो फिलहाल पारिवारिक और सामाजिक रुझान यही है कि यदि महिलाओं के प्रति कहीं किसी प्रकार का अंकुश है तो वहीं उनमें अपने पैरों पर खड़े होने की जिद्द भी है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि आप अपने को जैसा सोचेंगे, आप वैसे ही बन जायेंगे। यदि आप स्वयं को कमजोर मानते हैं तो आप कमजोर ही होंगे। और यदि आप स्वयं को मजबूत सोचते हैं तो आप मजबूत हो जायेंगे। इक्कीसवीं सदी की महिलाओं ने इस बात को गाँठ बाँध लिया है और स्वयं को कमजोर न मानते हुए उद्देश्य की प्राप्ति और भूमिका से न्याय के लिए आगे बढ़ रही है। आज राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक सभी दृष्टि से इतिहास करवटें ले रहा है और जब कभी भी इतिहास करवटें लेता है तो उस दौर के लोगों को अपनी-अपनी भूमिका स्वयं सुनिश्चित करनी होती है। अत: समय की यही मांग है कि आज हम महिलाओं को भी अपनी भूमिका तय करने के लिए किसी और पर निर्भर ना होते हुए स्वयं तय करनी होगी। बड़े कार्य को करने के लिए मौके तलाशे नहीं जाते बल्कि मौके स्वयं चलकर हमारे पास आते हैं, हमें उन मौकों को बस पहचान लेना है। वर्तमान में योग ने भी महिला सशक्तीकरण में अहम भूमिका निभाई है। ऐसी महिलाएं जो घर की जिम्मेदारियों के कारण घर से बाहर काम करने नहीं जा सकतीं उनके लिए योग ने नए द्वार खोल दिए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में कुशल योग टीचर्स की मांग सालाना 35 प्रतिशत की दर से बढ़ी है और सिर्फ अपने देश में ही योग प्रशिक्षण का कारोबार करीब 2.5 हजार करोड़ रुपए का हो चुका है जिसमें लगाए जाने योग शिविर, कॉर्पोरेट कंपनियों को दिया जाने वाला प्रशिक्षण आदि सभी शामिल है। यही नहीं अब तो योगासन को खेलों में भी शामिल किया जा चुका है। इसलिए ये वो समय है जब बाकी क्षेत्रों के साथ ही योग के क्षेत्र में भी महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका में देखने को दुनिया आतुर है इसलिए -
उठ खड़ी हो, और बता दो दुनिया को,
तुम हो तो, तो ही है दुनिया ये सारी।
लेखक
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01 Mar 2025 17:58:05
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