बेटी से सृष्टि का नवसृजन

ब्रह्मचारी शेखर, वैदिक गुरुकुलम्

इस विषय पर लिखने का मैंने इसलिए विचार किया क्योंकि हमारे आवास पर एक चालक के यहाँ एक बेटी ने जन्म लिया। मुझे पता चला तो मैंने भी उन्हें शुभकामनाएँ दी। उन्होंने प्रति उत्तर में थोड़ा उदास होकर कहा, भाई जी! शुभकामनाएँ किस लिए? बेटी हुई है। यह शब्द जो मैंने सुने, आप में से अधिकतर लोग काफी बार अपने आसपास सुन चुके होंगे। जाने हमारे समाज में कुछ लोगों कि सोचने की क्षमता इतनी निकृष्ट कैसे हो गई। अत्यंत दु: की बात है कि बेटियों को दुनिया में आने से पहले ही अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩी पड़ती है। कुछ ही समय पहले संयुक्त संघ ने बच्चियों के विषय में चौंकाने वाले आँकड़े प्रस्तुत किए। इन आँकड़ों के अनुसार भारत की आबादी में 20 मिलियन बहनों एवं माताओं की गिनती ही नहीं, प्रत्येक वर्ष पैदा होने वाली लगभग 2 मिलियन बच्चियों में से 1 मिलियन बच्चियाँ अपना पहला जन्मदिवस नहीं देख पाती। प्रत्येक पाँच में से एक कि मृत्यु लिंग भेद के कारण हो जाती है, इसका मुख्य कारण मानव जाति की गलत धारणा है कि बेटा ही वंश को आगे लेकर जाता है। परन्तु बेटी नहीं बचाओगे तो माँ कहाँ से पाओगे, नारी ही है जो एक होकर भी अनेक आयामों में कार्य करती है, जैसे संबंधों के विषय में वह बेटी, बहन, माता, भार्या आदि सभी दायित्वों को पूर्ण प्रीति से निष्पादन करने के साथ-साथ राष्ट्रीय तथा वैश्विक परिपेक्ष्य में असीम प्रियेता तथा अभ्युता नि:श्रेयसा के साथ निर्माण कार्य को सिद्ध रूप प्रदान करती है। नारी को विश्व की निर्मात्री शक्ति भी है। वह राष्ट्ररूपी परिवार की रीढ़ है। नारी की उत्कृष्टता पर ही राष्ट्र की प्रकृष्टता एवं उत्थान निर्भर करता है। इसी के साथ-साथ बेटी, बहन, माता किसी एक विशेष स्थान, देश या फिर सीमा के इस पार हो या उस पार, मातृशक्ति के कारण वह सदा सीमाओं से परे होती है। भारतीय ऋषियों ने शास्त्रों मेंमातृदेवोभवअर्थात् नारी को देवी बताया है और यह सत्य भी है क्योंकि वह अल्प में सन्तुष्ट होकर अनुदान बृहद करके लौटती है। उदाहरण के लिए हम समझ सकते हैं जैसे संसार में राम, कृष्ण, गौतम, कणाद, पतंजलि, पाणिनि, अत्रि, बंदा बैरागी, महर्षि रमण आदि गुरू शंकराचार्य, सरदार भगत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द आदि अनेकों महापुरुष तथा वर्तमान युग में हम सबके समक्ष उपस्थित पूज्य स्वामी जी एवं पूज्य आचार्यश्री ये सभी किसी किसी माँ कि कोख से जन्में इन दिव्य पुत्रों में देवत्व से परिपूरित संस्कार उनकी माताओं ने ही भरे हैं इसलिए यह स्वयं से सिद्ध है कि जो माता देवत्व को जन्म दे तो उसे देवी नहीं तो और क्या कहें। मनु महाराज जी ने भी कहा है
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रोतास्तु पूज्यन्ते सर्वास्त्राफला: किया (मनु. 1/56)
अर्थात् जहाँ पर नारी की पूजा होती है वह देवता भी रमण करते हैं तथा जहाँ इनको हीन दृष्टि से देखा जाता है, वहाँ सब कार्य निष्फल हो जाते हैं। माताएँ-बहनें तथा सम्पूर्ण नारीत्व जहाँ कदम रखता है वहाँ उन्नति का प्रवाह फूट पड़ता है। सतत सक्रियता उमड़ पड़ती है। विश्वरूपी घर देवालय बन जाता है। संसार नव सुरभि से महक उठता है। सम्पूर्ण जगत में वसुधैव कुटुम्बकम की प्रतिध्वनि गुंज उठती है। शास्त्रों में- जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि, अर्थात् माता और मातृभूमि को स्वर्ग प्राप्ति से भी विशेष माना है।
इसलिए परम पूज्य स्वामी जी के संकल्प से तथा पूज्या साध्वी देवप्रिया जी के नेतृत्व में नारी जागरण में पतंजलि योगपीठ द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जा रही है। इसी के अन्तर्गत 2008 में विधिवत महिला योग समिति की स्थापना हुई। जिस वृक्ष के बीज उस समय बोये गये थे। आज वह विराट् रूप धारण कर चुका है। उसकी शाखाएँ सम्पूर्ण विश्व में फैल गई हैं। लाखों महिलाएँ अपने गुरुवर के सपनों का भारत बनाने में लगी हैं तथा पूर्ण भक्ति के साथ वह अपना योगदान अर्पित कर रही है। चाहे वह परिवर्तन की लड़ाई हो या योग क्रान्ति, स्वदेश क्रान्ति, आयुर्वेद क्रान्ति तथा वर्तमान में चल रही शिक्षा की क्रान्ति, वह पूज्य स्वामी जी के द्वारा चलाए जा रहे विशाल यज्ञ में अपनी-अपनी आहुति निस्वार्थ रूप से दे रही है। इसी के साथ पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में पतंजलि विश्वविद्यालय, आयुर्वेद कॉलेज में हजारों बहनें श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं एवं वैदिक कन्या गुरुकुलम् में सैकड़ों बहनें महाराजश्री के आशीर्वाद से तथा पूज्या साध्वी देवमयी जी के सान्निध्य में आजीवन ब्रह्मचारिणी तथा साध्वी रहकर राष्ट्रसेवा, भगवत सेवा की दीक्षा लेकर, साथ ही वेद, दर्शन, उपनिषद् व्याकरणादि का श्रेष्ठ रूप से अध्ययन कर रही है। वह अपने आपको मातृशक्ति के भाव में रखते हुए भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के नेतृत्व की संरचना तैयार कर रही हैं तथा उन्हें अपने प्रेमरूपी तप से तपा रही है। वही आगे जाकर सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान रूपी जल से तृप्त कर देगा। इसी के साथ परम पूज्य स्वामी जी का शून्य से सृजन का स्वप्र पूरा होगा। इसलिए ही तो कहाँ है बेटी से सृष्टि का नव सृजन सम्भव है।
बेटी ये कोख से बोल रही, माँ कर दे मुझ पर भी उपकार
मत मार मुझे जीवन दे दे, देखने दे मुझको भी संसार।
 

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