परम पूज्य योग-ऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से निःसृत शाश्वत सत्य...
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युगधर्म व योगधर्म
भारत की निर्णायक भूमिका- वैश्विक दृष्टि से भारत को निर्णायक भूमिका में लाने के लिए सबसे पहले हमें देश को आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त शक्तिशाली बनाना पड़ेगा। आज भारत में 80 करोड़ देशवासी गरीबी, भूख, लाचारी, बेबसी का दरिद्र जीवन जी रहे हैं। फूड सिक्योरिटी के तहत हमें उन्हें भोजन देना पड़ रहा है। माना कि उनके योगक्षेम का ध्यान रखना हमारा धर्म है लेकिन इससे भी बड़ा धर्म है उन्हें समर्थ बनाना, उनके सशक्तिकरण हेतु एक तात्कालिक व दीर्घकालिक योजना बनाना। लगभग 40 करोड़ लोग मध्यम वर्ग के हैं, ये देश पर भार या बोझ नहीं परन्तु इन्हें भी हमें उच्च मध्यम वर्ग में लाना होगा और अधिक शक्ति सम्पन्न बनाना होगा तथा 10 से 15 करोड़ लोग समर्थ हैं, इनके इर्द-गिर्द पूरे देश की अर्थव्यवस्था विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व खबर पालिका घूमती रहती है। इन 10-15 करोड़ लोगों को हमें और अधिक शक्तिशाली व साथ ही दानशील, सेवाशील, उदार व करुणावान् बनाना होगा। अजीम प्रेम जी, टाटा व पतंजलि की तरह अर्थ से परमार्थ, समृद्धि से सेवा या कहें ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त पर चलने व जीने की दृष्टि के साथ हमें आगे बढऩा होगा। जब सम्पूर्ण राष्ट्र इस प्रगतिशीलता के साथ आगे बढ़ेगा व आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, बौद्धिक व वैज्ञानिक दृष्टि से महाशक्तिशाली होगा तभी दुनिया हमारी बात सुनेगी। भारत विश्व को दबाना, धमकाना या मिटाना नहीं चाहता। भारत विश्व के सामने एक अहिंसक, सात्त्विक, आध्यात्मिक विकास या समृद्धि का आदर्श प्रतिमान स्थापित करना चाहता है।
सामान्यत: आम लोग अपने घर-परिवार व व्यापारादि तक ही सोचते हैं लेकिन देश में स्वभावत: कुछ लोग देशभक्ति की भाव चेतना से पूर्णत: ओतप्रोत होते हैं और वे राष्ट्रहित व राष्ट्रधर्म का सर्वोपरि मानकर जीते हैं तथा अपना सर्वस्व मातृभूमि के लिए न्यौछावर करने को उद्यत रहते हैं। ऐसे ही देशभक्त, राष्ट्रप्रेमी पुण्यात्माओं के बल पर कोई भी देश, धर्म व संस्कृति यशस्वी होती है।
मैं स्वयं, पूज्य आचार्यश्री व पूरी पतंजलि संस्था, संगठन अपने देश, धर्म व संस्कृति के लिए अपना सर्वस्व अर्पित व समर्पित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। योगायुर्वेद, स्वदेशी एवं संस्कृति हित सेवा करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, आर्थिक व सांस्कृतिक उत्थान हेतु राष्ट्रसेवा में एक बड़ी भूमिका हमने निभाई है तथा आगे भी निभायेंगे। अन्तत: हम सब सात्त्विक विचार, संस्कार वाले सभी भारतवासी संगठित होकर योगधर्म व राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए अपने युगधर्म को निभायेंगे और योगमय भारत राष्ट्र व योगमय स्वस्थ, समृद्ध, आध्यात्मिक विश्व बनायेंगे।
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01 Mar 2025 17:58:05
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