योग की शक्ति से राष्ट्रीय-निर्माण
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आचार्या साध्वी देवप्रिया
संकायाध्यक्षा एवं कुलानुशासिका
पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
संतोष से सभी प्रकार की कामनायें छूट जाती हैं। हमें भगवान् का शुक्रिया करना चाहिए और कहना चाहिए कि प्रभु से जो मिला है, उसका बहुत-बहुत आभार। फिर हमें किसी अन्य चीजों को प्राप्त करने की बेचैनी नहीं होती है...... हमारे शेष जीवन में यह सब प्राप्त किया जा सकता है। यह हमारा कर्तव्य भी है मगर इस प्राप्ति की कामना में हमें वर्तमान के सुख, चैन को बर्बाद नहीं करना चाहिए। |
आज अच्छे लोगों को अच्छे लोगों की कमी नहीं है, उन्हें अच्छे लोग मिल ही जाएँगे। अगर किसी ने यह सोच लिया कि पता नहीं मुझे अच्छे लोग मिलेंगे या नहीं। तो निश्चित ही उसे अच्छे लोग न मिलकर नकारात्मक प्रवृत्ति के लोग मिल जाएँगे। इसलिए ऐसा सोचने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे सोचने से क्या सारा संसार बदल जाएगा? विचार करने से सारा संसार भी बदलेगा। इस प्रकृति का कुछ ऐसा विधान है कि हम जो कुछ भी सोचते हैं, यह तथास्तु कह देती है। हमारा मन कल्पवृक्ष जैसा है। हम हमारे मन में जैसा संकल्प लेते हैं, जैसा विचार करते हैं, वैसी-वैसी प्रतिक्रिया (Response) हमें अपने घर-परिवार में, अपने रिश्तेदारों से, अपने सगे-संबंधियों से मिल जाती है। एक व्यक्ति कहता है कि मैं अच्छा कर रहा हूँ और निश्चित रूप से मेरे जीवन में अच्छा ही होगा तो उसके साथ अच्छा ही होता है। इसी प्रकार एक व्यक्ति चाहता है कि मेरे घर-परिवर में सुख-शांति हो, सब योगीजन रहें, कोई भी भोगी न हो।, वह यह चाहता तो अवश्य है, मगर उसे यह भी पता है कि उसके परिवार वाले लोग सुधरने वाले नहीं हैं। इस दूसरे विचार ने उसके पहले विचार को नष्ट कर दिया। स्वयं अपने पहले अच्छे संकल्प को दूसरे बुरे संकल्प से काट दिया। हमें इन सब चीजों का पता नहीं चलता। हम दिन भर में अपने जीवन में एक सकारात्मक विचार उठाते हैं और फिर उसे एक नकारात्मक विचार से काट देते हैं। ऐसे ही हम एक विक्षिप्त अवस्था में रहते हैं। यहाँ महर्षि पतंजलि हमें बताते हैं कि आप योगी बन सकते हैं। दैनिक व्यवहार में आप उस योग को उतार सकते हैं। बस आपको अपने चित्त को एकाग्र रखना है, सकारात्मक सोचना है, नकारात्मकता का भाव मन में भी नहीं लाना है। उदाहरण के तौर पर- यदि कोई माता अपनी रसोई में खाना बना रही है तो उसे यह सोचना चाहिए कि मैं खाना नहीं, एक प्रसाद तैयार कर रही हूँ, औषधियों को बना रही हूँ और जो व्यक्ति इस भोजन का, इस प्रसाद का या इस औषधि का सेवन करेगा, उसकी शारीरिक व मानसिक स्थिति वही होगी, जैसी मैं चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि घर में कोई रोगी न हो, तो कोई रोगी नहीं रहेगा। पुराने जमाने में हमारी दादी-नानी के चित्त की स्थिति योग दर्शन जैसी किताबों के अध्ययन के बगैर ही इसी प्रकार की होती थी। उनके चित्त की स्थिति होती थी- योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:। (योगदर्शन, 1.1) चित्त की वृत्ति का निरोध अर्थात् क्लिष्ट वृत्तियों का निरोध। पहले के लोग संयुक्त परिवार में रहते थे तथा कुटुंब के सभी बच्चों को भोजन बनाने वाली माता अपने बच्चों के समान मानती थी। अपनी देवरानी, जेठानी, ननंद के बच्चे सब अपने ही मानती थी। भले ही उन्होंने गीता को नहीं पढ़ा, योग सूत्रों को नहीं पढ़ा, लेकिन वे उसी समता में जीती थी।
आज समस्या यह है कि हम योगयुक्त जीवन कैसे जीएँ? इस विषय में हम जानते तो सब कुछ हैं लेकिन जीएँ कैसे? उस समता में, उस चित्त वृत्ति के निरोध में रहें कैसे? आज सब बोलते हैं नकारात्मक (Negative) नहीं सकारात्मक सोच (Positive Thinking), लेकिन सकारात्मक सोच करें कैसे? नकारात्मक विचार व्यक्ति के मन में आते ही रहते हैं। यहाँ पर उसका उपाय बताया है- अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:। (योगदर्शन, 1.12) अर्थात् इसका कोई विकल्प नहीं है, केवल और केवल अभ्यास करना पड़ेगा और वैराग्य का अर्थ है कि संसार की चीजों में आसक्ति नहीं रखनी। गीता व दूसरे धर्मशास्त्रों में तीन बातें कहीं गई हैं कि योग से नीचे जो तीन स्थितियाँ आती हैं, वे हैं- काम, क्रोध और लोभ। आचार्य शंकराचार्य तथा गीताकार ने भी इन शब्दों का प्रयोग किया है और हम लोक व्यवहार में भी यही सुनते आए हैं। इनमें क्रोध, काम और लोभ के बीच में आता है। हमारे जीवन में जब कभी प्रतिकूल परिस्थिति आती है तो हमें क्रोध आता है। हम किसी महात्मा, गुरु, संत के पास जाते हैं या गीता का पाठ करते हैं या योग दर्शन पढ़ते हैं और कहते हैं कि मुझे इस गुस्से से पीछा छुड़ाना है। जो इस गुस्से से पीछा छुड़ाना चाहता है वह सचेत मन (Concious Mind) हैं और गुस्से के संस्कार अवचेतन मन (Sub-concious Mind) में भरे हुए हैं। तो हम कितनी भी गीता पढ़ें, जब वैसी परिस्थिति आएगी तो अवचेतन मन से वे संस्कार निकलेंगे ओर उसे क्रोध आ जाएगा। यदि हम किसी महापुरुष के पास जाते हैं कि आप हमें आशीर्वाद दे दीजिए कि हमारा गुस्सा दूर हो जाए, तो वह बेकार है। गुस्सा कोई ऐसी चीज नहीं है कि कोई महात्मा इसे समाप्त कर दे। इसका उपाय मात्र एक है- वैरागय और अभ्यास। अभ्यास का अर्थ है- तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास: (योगदर्शन, 1.13)।
कभी न कभी तो हमारी समता भी प्रसन्नता की स्थिति बनती है, 24 घण्टे में कुछ क्षण तो ऐसे आते ही हैं। बस उन क्षणों को हमें पकडक़र रखना है और कुछ नहीं तो सुषुप्ति में तो वह अवस्था सभी की आती ही है। कितना भी कष्ट क्यों न हो किन्तु (रात्रि में जब हम गहरी निद्रा में सोते हैं तो उस समय, न तो हमारे पास धन होता है, न बल होता है, न कोई पद होता है, न प्रतिष्ठा होती है, फिर भी हम सुखी होते हैं। इससे पता चलता है कि सुख बाहर नहीं हमारे अंदर ही है। हम उन पलों को पकडऩे की कोशिश करें।)
पूर्व में कहा था कि काम और लोभ के बीच क्रोध है। काम का अर्थ है कामना। कामना का अर्थ है जो हमें आज तक प्राप्त नहीं हुआ, उसको प्राप्त करने की इच्छा। प्राप्ति तो समाप्ति है। कामना है अप्राप्त को प्राप्त करने की इच्छा। ईश्वर ने हमें जो दिया, हम उससे ज्यादा पाना चाहते हैं और जब वह हमें नहीं मिलता तो हमें क्रोध आता है। दूसरी ओर लोभ है। लोभ का अर्थ है जो हमें प्राप्त हो गया, हम उसे पकडक़र रखना चाहते हैं। हम वस्तुओं पर, व्यक्तियों पर, अपने संबंधियों पर अधिकार की भावना (Possiveness) रखते हैं। उन्हें पकडक़र रखने का भाव रखते हैं। कोई माँ अपने बच्चों को स्वतंत्रता नहीं देना चाहती। पति-पत्नि एक-दूसरे को स्वतंत्रता नहीं देना चाहते। हम चाहते हैं जैसा हम चाहें, वह वैसा ही करें। गुरु-शिष्य में भी हम एक-दूसरे को पकडक़र रखना चाहते हैं। शिष्य चाहते हैं कि गुरुजी हमारे अनुकूल आचरण करें और गुरु चाहते हैं शिष्य वैसा ही व्यवहार करें जैसा हम चाहते हैं। इसी का नाम लोभ है। जो प्राप्त हो गया उसको हम छोडऩा नहीं चाहते। यह संसार हमें बता रहा है कि आप छोडऩा चाहें या न चाहें, वस्तुएँ तो आपसे प्रतिपल छूट रही हैं। यदि आपको ऐसा भ्रम है कि आपने पकडक़र रखा है तो मृत्यु आकर एक दिन आपके इस भ्रम को तोड़ देती है। हमारे ऋषियों ने तो बहुत पहले ही बता दिया था-
ईशावास्यं इदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत।
तेन त्यक्तेन भुञ्जिथा: मा गृध: कस्य स्विद् धनम् (ईशोपनिषद्, 1)
अर्थात् सब कुछ यहाँ इस धरती पर, इस अंतरिक्ष लोक में, द्यु-लोक में और तीनों लोकों से भी ऊपर कोई लोक हों तो उन समग्र लोकों में एक सुई के बराबर भी कोई वस्तु हमारी नहीं है और हमारे लिए नहीं है। तो हम अपने शरीर, संबंधों तथा दूसरे शरीरों पर क्या दावा कर सकते हैं। हमें पहले से ही यह मानसिकता बनाकर रखनी है कि यह सब कुछ भगवान् का है और जितनी देर के लिए, जितने दिन के लिए व जिस काम के लिए उसने मुझे भेजा है, मुझे वह करना है। उसने मुझे दूसरों के जीवन से काँटे चुनने भेजा है लेकिन उसके लिए पहले मुझे अपने जीवन के काँटे तो निकालने पड़ेंगे।
खुद ही न चैन जिसने पाया हो जिन्दगी में, वो क्या किसी दिल को सब्रो करार देगा।
पहले किसी ने उस चीज को प्राप्त किया होगा, तभी वह दूसरों को दे पाएगा। यह बात ठीक है कि हम भोग की निन्दा करते हैं लेकिन जो भोग फैलाने वाले व्यक्ति हैं, वो उस भोग के लिए घण्टों अभ्यास करते हैं। इससे यह भी तो निकलकर आता है कि जो योगयुक्त जीवन जीना चाहते हैं और दूसरों को भी योग से जोडऩा चाहते हैं, उनको भी तो योग का अभ्यास करना पड़ेगा।
यदि हम अपने जीवन में काम और लोभ पर विजय प्राप्त कर लेते हैं या इन दोनों से अपने जीवन को मुक्त कर लेते हैं, तो क्रोध स्वत: ही छूट जाता है। |
महर्षि दयानन्द जी 8 से 10 घंटे योग की साधना करते थे, कल्याणकारी प्रवचन का वाचन करते थे। मगर आज केवल महापुरुषों के प्रवचनों से परिवर्तन नहीं आयेगा। परिवर्तन की प्रथम सीढ़ी समाज में चर्चा या प्रवचन, भाषण हो सकती है। दूसरी सीढ़ी है- जो हम बोलें, उसका अपने जीवन में अभ्यास करें, तभी आप परिवर्तन की इच्छा रख सकते हैं। बात चल रही थी काम, क्रोध व लोभ की, हमारी कामनाओं कीं। वे यदि छूटती हैं, तो इसका अर्थ है संतोष। यम-नियमों में, शोच के बाद संतोष दूसरा नियम है। इसलिए कहा गया है कि संतोष से सभी प्रकार की कामनायें छूट जाती हैं। हमें भगवान् का शुक्रिया करना चाहिए और कहना चाहिए कि प्रभु से जो मिला है, उसका बहुत-बहुत आभार। फिर हमें किसी अन्य चीजों के प्राप्त करने की बेचैनी नहीं होती है। हमारे शेष जीवन में यह सब प्राप्त किया जा सकता है। यह हमारा कर्तव्य भी है मगर इस प्राप्ति की कामना में हमें वर्तमान के सुख, चैन को बर्बाद नहीं करना चाहिए। कामना को हमने संतोष से जीता और लोभ को हम जीतते हैं त्याग से। दूसरों की खुशियों के लिए अपनी शक्तियों का विसर्जन कर देना ही त्याग कहलाता है। इससे लोभ छूट जाएगा। यदि हम अपने जीवन में काम और लोभ पर विजय प्राप्त कर लेते हैं या इन दोनों से अपने जीवन को मुक्त कर लेते हैं, तो क्रोध स्वत: ही छूट जाता है।
योग दर्शन में बहुत सारे अन्तराय बताए हैं।
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वान-वस्थितत्वानि चित्त विक्षेपास्तेऽन्तराया:। (योगदर्शन, 1.30)
9 अंतराय बताए हैं- व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रांति, दर्शन, अलब्धभूमि, अनवस्थिति। व्याधि अपने आप में बहुत बड़ा व्यवधान है। बीमारी ठीक करनी है तो योग करो, पूज्य स्वामी जी महाराज भी तो प्रतिदिन योग करने के लिए ही कहते हैं। जैसे-जैसे ये एक-दूसरे से आगे आते जाते हैं, वैसे ही एक-दूसरे से मिटते भी जाते हैं। व्याधि मिटेगी तो स्त्यान मिटेगा, संशय मिटेगा, प्रमाद-आलस्य मिटेगा। अगर हमारा शरीर चुस्त-दुरुस्त है तो उसमें आलस्य-प्रमाद आएगा ही क्यों? और यदि वह बहुत एकाग्र है, शक्ति से सम्पन्न है तो उसमें अनावस्थि तत्व नहीं आएगा। फिर चित्त के विक्षेप भी नहीं आएँगे क्योंकि शरीर का प्रभाव चित्त पर भी पड़ता है। इसी प्रकार से दु:ख, दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व आदि भी इसके साथ जुड़े हुए हैं। जैसे ही व्यक्ति योग से अलग होगा, उसका मन दु:खी होगा। उसे उसके दु:ख का कारण भी पता नहीं चलता और कभी-कभी वह दूसरों पर अपने दु:ख का आरोप लगाने लगता है कि मैं तो इसके कारण दु:खी हूँ। पर जिस संसार के कारण वह दु:खी है, उसे हम बदल नहीं सकते, तो दु:ख मिटेगा नहीं। यदि हम अपने दु:ख को ही नहीं मिटा पाएँगे तो फिर हमने मनुष्य जीवन ही क्यों पाया?
अत: हमें यह सोचना पड़ेगा कि यह मेरे ही चित्त का अन्तराय है, इसे मैं ही हटा सकता हूँ। सौमनस्य का उल्टा है दौर्मनस्य। दूसरों के प्रति अच्छे विचार न होना, अपनों के प्रति अच्छे भाव न होना, अपने प्रति हम उच्च चेतना में स्थित न रहें, निम्र चेतना में स्थित रहें, ये सारे दौर्मनस्य की श्रेणी में आते हैं। भगवान् कृष्ण ने गीता के 16वें अध्याय में मन का तप बताया है। उसमें उन्होंने एक चीज बताई- मनोविग्रह:, जिसका अर्थ मन का विग्रह करना है।
गीता में 16वें अध्याय में भगवान् कृष्ण ने मन का तप करना बताया है। मनुष्य जहाँ अपने मन को लगाना चाहता है, यदि वह तुरन्त वहाँ लग जाए और जहाँ से हटाना चाहता है वह वहाँ से तुरन्त हट जाए- तो यह मन का तप कहलाता है। मन हर मनुष्य के पास होता है मगर मन को चलाना हर मनुष्य के बस की बात नहीं होती। मन पर पूर्ण नियंत्रण रखना सिर्फ योगियों के सामर्थ्य की बात है। योगी जीवन का ह्रास करने वाला पुरुष नकारात्मक पहलुओं से तुरन्त अपने मन को हटाकर जहाँ लगाना होता है, लगा लेता है। और मन को लगाना कहाँ चाहिए? भगवान् में लगाना चाहिए, परमार्थ में लगाना चाहिए, सेवा में लगाना चाहिए, ईश्वर भक्ति में लगाना चाहिए, दीन-दुखियों की सेवा में लगाना चाहिए, अर्जन में लगाना चाहिए, फिर उस अर्जन का विसर्जन करने में लगाना चाहिए। वे अपने चित्त को वहाँ लगा लेते हैं और अपने जीवन को बड़े आनन्द से जीते हैं, इसलिए मन का नियंत्रण आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर इसे ऐसे समझा जा सकता है यदि पोता-पोती अपनी दादी या नानी को महंगें से महंगा मोबाईल फोन उपहार स्वरूप देते हैं, तो वह इनके लिए उसी प्रकार है जिस प्रकार कोई खिलौना इनके हाथों में दे दिया गया हो। क्योंकि ऐसे मोबाइल को इन्होंने पहले कभी नहीं चलाया। इसलिए वह आज भी नहीं चला पा रहे हैं, मगर यही मोबाइल यदि किसी व्यापारी के हाथों में या मोबाईल विशेषज्ञों के हाथ में होता है तो वह इस मोबाइल से लाखों-करोड़ों रुपये का व्यापार कर लेता है। सुख के साधन भी जुटा लेता है। यह सब कुछ सम्भव है अभ्यास व प्रयोग से। यह सब कुछ इसी बात पर निर्भर करता है कि हमें किसी चीज का कितना अभ्यास है या उसे हमने, इससे पहले कितनी बार प्रयोग किया है।
अब बात करते हैं वैराग्य की। वैराग्य भी हमें तभी उपस्थित होगाजब हम अपने भीतर सांसारिक वस्तुओं के प्रति अनासक्ति का भाव ला पाएँगे और वह तभी आएगा जब हम अभ्यास करेंगे। हमें अपने यौगिक कर्मों के माध्यम से अभ्यास करने की आवश्यकता है। यदि हमें एक घण्टा अभ्यास करना है तो हमें 23 घण्टे अपने प्रत्येक क्रिया में उस अभ्यास को लाने की आवश्यकता है। महर्षि पतंजलि जी ने भी इसकी यही परिभाषा की है-
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढ़भूमि:। (योगदर्शन, 1.14)
वे कहते हैं कि अभ्यास को दीर्घकाल तक व निरन्तर करते रहना है। केवल एक-एक घंटे में फँसने की आवश्यकता नहीं है, चौबीस घंटे करने की आवश्यकता है। शुरू-शुरू में 5 मिनट से प्रारंभ करके इसकी समय अवधि को लगातार बढ़ाना चाहिए। इसी प्रकार अभ्यास व वैराग्य का हमारे जीवन में स्थान बताया जा सकता है। इस प्रकार हमें अपने जीवन में अभ्यास व वैराग्य का प्रयोग करना चाहिए और फिर व्यवहार काल में भी महर्षि पतंजलि ने बहुत अच्छी बात कही है कि हमारी भावनाओं में भी कितना बल है। महर्षि पतंजलि ने बताया है कि विचार व भावनाएँ हमारे अन्त:करण है। मनुष्य को इनका उपयोग करना नहीं आता। हृदय तो प्रत्येक मनुष्य रखता है मगर इनका उपयोग किन भावनाओं में करना है, यह सभी को नहीं आता। मन सबके पास है, मन में कैसे विचार उठाने चाहिए, कैसे इनका सदुपयोग करना चाहिए, यह प्रत्येक मनुष्य को नहीं आता। महर्षि पतंजलि हमें बताते हैं-
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:ख पुण्यापुण्य
विषयाणां भावनातश्चित्त प्रसादनम्।। (योगदर्शन, 1.33)
अर्थात् हम योग या भोग जो भी कर रहे हैं, चित्त की प्रसन्नता के लिए ही तो कर रहे हैं। हमारी प्रत्येक क्रिया, हमारी दौड़-धूप, हम जो भी अपने जीवन में कर रहे हैं, चाहे वह भोग हो या योग, हम सब अपने मन की खुशी के लिए ही तो करते हैं। पर यहाँ प्रसादनम् का अर्थ केवल प्रसन्नता नहीं है, इसका दूसरा अर्थ है निर्मलता। चित्त तभी प्रसन्न होगा जब मन निर्मल होगा। सुख-साधन जुटा लेने से चित्त प्रसन्न नहीं होगा क्योंकि अभी इस चित्त में मलीनता है। यहाँ हमें प्रसन्नता का उपाय बता दिया- मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा। वैसे उपेक्षा कोई भाव नहीं है, अत: मुख्य तीन ही भाव हैं। सुखी व्यक्ति या पुण्य आत्माओं को देखकर हम प्रसन्न हों, उनके साथ हमारी मैत्री का भाव हो और जो दु:खी हैं उनके प्रति हमारी करुणा की भावना हो। करुणा का अर्थ यह नहीं कि हम उनके साथ रोने लगें। करुणा का अर्थ है हम उनको वहाँ से उबारें।
जैसे हम कहीं जा रहे हैं, रास्ते में आगे कोई खड्डा आ गया और हमारा एक साथी उसमें गिर गया। अब जरूरी नहीं है कि उसके प्रति यदि हमारी करुणा है तो हम भी उसी खड्डे में गिरें। हम करुणा का मतलब यही समझ लेते हैं कि एक व्यक्ति रो रहा था और उसके पास बैठे दूसरे व्यक्ति की आँखों में एक भी आँसू नहीं था। पता नहीं कैसे हृदयहीन व्यक्ति हैं जिनमें कोई करुणा ही नहीं है। उसके हृदय में तो उनके साथ रोने की कोई भावना ही नहीं है। आपको उसका रुदन कैसे मिटाया जा सके, यह सोचने की आवश्यकता है। उस व्यक्ति को क्या जरूरत है? उसको हमारी शारीरिक सेवा की जरूरत है, आर्थिक सहायता की जरूरत है, भावनात्मक सहायता की जरूरत है, किसी विचार की जरूरत है। उसको देखकर उसकी स्थिति से उबार लेना ही करुणा का स्वरूप है। यह हमारे बल हैं- मैत्री, करुणा, मुदिता, हर्षित रहना, कुछ न कुछ तो दिया ही है भगवान् ने। सुख दिया तो उसकी कृपा और दु:ख दिया तो भी वह कुछ सिखाना, अपलिफ्ट कराना या अपग्रेड कराना चाहते हैं। तो हर हाल में हम ऐसे विश्वास और मुदिता की भावना बनाकर रखने का अभ्यास करें। यह भी महर्षि पतंजलि ने अपने योग दर्शन में स्वयं ही बता दिया। मैत्री आदि सुबलानि, यह बल हैं। हमारे जैसे किसी व्यक्ति के पास धन बल है, जन बल है, पद-प्रतिष्ठा का बल है, सुयश का बल है, उसके पास कोई राजनैतिक बल है, अनेक-अनेक प्रकार के बल होते हैं। शारीरिक बल है, विद्या का बल है तो इन सबसे बड़े बलों में भी यही बल हैं, मैत्री, करुणा, मुदिता बहुत बड़े बल हैं, यह बलेषुहस्तीबलादिनी, (योग दर्शन) हाथी आदि का जो बल है, उन बलों से बड़े बल हैं। हम यह कह सकते हैं कि जो लोग मैत्री करने योग्य नहीं हैं तो हम उनसे कैसे मैत्री करें? यह लोग तो करुणा करने के योग्य हैं ही नहीं, तो उन पर करुणा कैसे करें? इसका उत्तर उन लोगों के लिए नहीं है अपितु हम मैत्री, करुणा इसलिए करें क्योंकि हम अच्छे हैं, हम मैत्री करने के योग्य हैं। वह योग्य है या नहीं, कोई बात नहीं। हम करुणा करने के योग्य हैं, इसलिए हमें करुणा करनी चाहिए। महर्षि पतंजलि ने हमें जीने का यह इतना सुन्दर सलीका सिखाया है। जैसा मैंने शुरू में कहा था कि ऐसा नहीं है कि योग केवल अतीन्द्रिय वस्तु है। अतीन्द्रिय भी है लेकिन योग में कैसे जीना है, हमारा व्यवहार कैसा हो, सुबह से शाम तक का यह शिष्ट तरीका भी हमें योग ही सिखाता है। मैं कहती हूँ कि सारी दुनिया, सारा जमाना योगी न बने तो कोई बात नहीं है, जो योग की महिमा को जानते हैं, योग से प्रेम करते हैं वे योग का प्रचार-प्रसार निरंतर जारी रखें। स्वामी विवेकानंद जी ने इस संसार से विदा होते समय एक ही शब्द कहा था कि मैं अपने जैसे 100 ऐसे संन्यासी चाहता था और यदि वह मुझे मिल जाते तो मैं भारत को नहीं पूरी दुनिया को बदल सकता था लेकिन वह मुझे मिले ही नहीं। अब देखो 135 करोड़ की जनसंख्या में से 135 लोग मिलना, या ये कहें कि 135 भी नहीं केवल 100 व्यक्ति मिलना कितना कठिन कार्य है। ऐसे जुनूनी, जो योग के प्रति सच्ची श्रद्धा व निष्ठा रखने वाले हैं और जिनका यह मिशन है कि वे इस संसार को एक नई दिशा व दशा देना चाहते हैं, उनका मिलना बहुत कठिन कार्य था।
श्रद्धेय स्वामी जी महाराज ने अपने जीवन में योग का आलम्बन लेकर अपने जीवन की शुरूआत की और उस योग का ही हम सारा विस्तार देखते हैं। पतंजलि योगपीठ हरिद्वार ने लाखों नहीं करोड़ों लोगों के जीवन में खुशियाँ लाने का जो काम किया है, जो समाधान देने का काम किया है, ऐसे ही सैकड़ों योगी जो हम इनसे जुड़े, ऐसा तो प्रयास कर रही सकते हैं। ऐसे यदि सैकड़ों व्यक्ति भारत में पैदा हो जाएँ तो भारत तो क्या सारे विश्व की भी दिशा और दशा को बदला जा सकता है। बस हमें संकल्प लेने की आवश्यकता है। हमें योग का व्रत लेना है, यज्ञ का व्रत लेना है, सेवा का व्रत लेना है, हमें गो-व्रती बनना है, विद्याव्रती बनना है, हमें व्रतों का जीवन में जितने भी अच्छे व्रत हैं, यम-नियम जो दस व्रत हैं- उनका हमें व्रत लेना चाहिए, संकल्प करना चाहिए। योगी बनना गीता में भी सबसे अच्छा बताया है। गीता के छठे अध्याय में जब अर्जुन ने पूछा कि हम बनें कैसे? क्योंकि मन तो अति चंचल है।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।। (गीता, 6.34)
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। (गीता, 6.35)
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन, इसमें संदेह नहीं कि चंचल मन को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है, फिर भी अभ्यास (सतत प्रयत्न) और वैराग्य से (रागात्मक वृत्तियों से विरक्त होकर) उसे नियंत्रण में किया जा सकता है।
वहाँ भी अभ्यास और वैराग्य की ही बात बताई गई है। हम योगदर्शन में बात कर रहे थे और अंत में इस अध्याय के श्लोक में इन्होंने बताया कि आपको योगी बनने का अभ्यास करना है।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक:।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्ताद्योगी भवार्जुन। (गीता, 6.46)
अर्जुन योगी बन जा, योगी सबसे महान् होता है। तो योगी का अर्थ केवल एक-दो घण्टा आँख मूंदकर बैठना नहीं है या किसी खास तरह का भोजन करना या अपने शरीर को किसी प्रकार का सुख देना, यह इसका अर्थ नहीं है। हमारे जीवन के प्रत्येक कर्म में, हमारे प्रत्येक आचरण में, हमारे व्यवहार में, हमारे विचार में, हमारे भाव में एक ऐसी विशिष्टता आए, एक ऐसा आकर्षण पैदा हो जैसा हम योगेश्वर भगवान् कृष्ण के विषय में सुनते हैं। कृष्ण के नाम का अर्थ ही यही है जो सबको आकर्षित करे वह है कृष्ण। यह शब्द ‘कृष्’ आकर्षक धातु से बनता है जिसकी तरफ सब आकर्षित होते हैं, वही कृष्ण है। और यह आकर्षण हमेशा पैदा होता है योगयुक्त जीवन जीकर। हम ऐसा अभ्यास करें कि जो हमारी आगे आने वाली पीढ़ी है, जो जमाना है, उसका आकर्षण भोग की तरफ न हो, योग की ओर हो।
हम तो श्रद्धेय स्वामी जी महाराज को बहुत नजदीक से देखते हैं, पिछले 30 वर्षों से श्रद्धेय स्वामी जी महाराज का जीवन देख रहे हैं। वह जो बोलते हैं, वैसे ही मैंने उनको जीते हुए देखा है और इनके इसी योग युक्त जीवन के कारण आज कम से कम 500 साधु-संन्यासी भाई-बहन यहाँ आकर इस आकर्षण से युक्त होकर अपना जीवन उसी क्षेत्र में उनकी आज्ञा अनुसार लगाने के लिए तैयार हैं और कितने ही लोगों को आज आकर्षण हो गया है कि केवल भारत के ही नहीं पूरे विश्व के 200 देशों के ऐसे देश जिनको हम मुस्लिम कंट्री कहते हैं, उनका भी योग के प्रति आकर्षण होना, यह अभ्यास और वैराग्य का ही परिणाम है। इस प्रकार का जीवन जीने के लिए हम सभी संकल्प लें।
इसी प्रकार योग का प्रचार-प्रसार व विस्तार करते रहें। पहले अपने जीवन में और उसके बाद जन-जन के जीवन में। इन्हीं भावनाओं के साथ आप सभी को हृदय से बहुत-बहुत प्रणाम।
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